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राज कपूर ने अपनी पहली फिल्म में जो दिखाया, वही कहानी उनके स्टूडियो के साथ दोहराई गई

मुंबई के चेंबूर में 6 एकड़ में फैला आरके स्टूडियो। शोमैन राज कपूर का आरके स्टूडियो। 16 सितंबर को खबर आई...
राज कपूर ने अपनी पहली फिल्म में जो दिखाया, वही कहानी उनके स्टूडियो के साथ दोहराई गई

मुंबई के चेंबूर में 6 एकड़ में फैला आरके स्टूडियो। शोमैन राज कपूर का आरके स्टूडियो। 16 सितंबर को खबर आई कि हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा जल गया है। 51 साल में इस स्टूडियो ने 21 फिल्में बनाईं। स्टूडियो के समकालीन राजकमल स्टूडियो ने 45 साल में 23 फिल्में बनाईं। नवकेतन फिल्म्स ने 50 सालों में 32 फिल्में बनाईं। इनमें 10 सालों का सफर गुरूदत्त के स्टूडियो ने तय किया, जिसने सिर्फ 8 फिल्में बनाई। इन ऐतिहासिक स्टूडियो की कहानी आगे की कड़ियों में लेकिन फिलहाल बात आरके स्टूडियोज की।

मजबूत सामाजिक मुद्दों और लव स्टोरी आरके स्टूडियो की थीम रही है। आरके स्टूडियो और आजादी के बाद के भारत की कहानी एक साथ चलती है। 50 के दशक का नेहरू का सोशलिस्ट मॉडल हो या 80 के दशक के अंत में ब्रेन ड्रेन जैसे मुद्दे, परिवार के अंदर से लेकर बाहर तक के हालात, इस स्टूडियो की कहानियों में बखूबी दिखाई दिए। इन फिल्मों की एंटरटेनमेंट वैल्यू भी काफी होती थी।

'आग' फिल्म की कहानी दोहराई गई

राज कपूर के पिता पृथ्वी राज कपूर का पृथ्वी थियेटर पहले से काफी फेमस था। राज कपूर भी ऐसी कोई चीज करना चाहते थे लेकिन उनका रुझान फिल्मों में था। कैमरा देखकर उनके रोंगटे खड़े होते थे। चेंबूर में 6 एकड़ जमीन खरीदी और 24 साल की उम्र में एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बन गए। 1948 में उनकी पहली फिल्म आई। आग।

फिल्म 'आग' के एक दृश्य में राज कपूर

ये फिल्म केवल नाम के एक लड़के के थियेटर बनाने के जुनून के इर्द-गिर्द घूमती है यानी राज कपूर खुद की ही कहानी कह रहे थे। इस फिल्म में केवल का थियेटर जल जाता है, उसके सपने जल जाते हैं। यही हाल आरके स्टूडियो का हुआ। इस बार केवल (राज कपूर) का स्टूडियो जल गया, जो उसके लिए किसी थियेटर से कम ना था। जो उसकी दुनिया थी। ये फिल्म तब चल नहीं सकी थी।

स्टूडियो की कामयाब फिल्मों का दौर

आग के फ्लॉप होने के एक साल बाद आई बरसात। आरके स्टूडियो की पहली हिट फिल्म। नरगिस और राज कपूर की हिट जोड़ी ने इस बार कमाल किया। फिल्म के पोस्टर में राज कपूर हाथ में वायलिन लिए नरगिस के साथ उस आइकॉनिक पोज में नजर आते हैं, जो बाद में आरके स्टूडियो का सिंबल बन गया।

यही पोज आरके स्टूडियो का लोगो बना

उस जमाने में बरसात ने 1.1 करोड़ का कारोबार किया था जो कि आज के वक्त में तकरीबन 312 करोड़ के बराबर है। आग (1948) से लेकर जागते रहो (1956) तक स्टूडियो की हर फिल्म में राज कपूर के साथ एक ही चेहरा दिखता था। नरगिस का। वो अलग किस्सा है।

सामाजिक सरोकार और नेहरू के सोशलिज्म की छाप

भारत नया-नया आजाद हुआ था इसलिए आरके स्टूडियो की फिल्मों में तब के भारत की समस्याएं और एक नए भारत की चाह दिखाई देती है। नेहरूवियन सोच का काफी प्रभाव राज कपूर और स्टूडियो पर रहा।  50 के दशक में इसी विचारधारा और स्टैंड के साथ स्टूडियो खड़ा रहा।

इसकी एक झलक उनकी मशहूर फिल्म आवारा में देखने को मिलती है। जेल में राज कपूर का किरदार कहता है- ये रोटी बहत जुल्मी है साहब, 12 बरस पहले अगर ये हमें जेल के बाहर मिल गई होती तो हमें इस तरह जेल के चक्कर ना लगाने पड़ते। यहां गैर-बराबरी और अपराध के कारणों की तरफ राज कपूर इशारा करते हैं।

फिल्म 'आवारा' में राज कपूर 

ऐसा नहीं था कि इसमें सिर्फ राज कपूर का ही विजन शामिल था। उनके साथ के ए अब्बास, शैलेंद्र, राजेंद्र सिंह बेदी जैसे लेखक, गीतकार भी थे। ये लोग प्रगतिशील, सोशिलस्ट लोग थे। इन फिल्मों में एक किरदार होता था, जिसे राज कपूर आम आदमी की पहचान की तरह दिखाते थे। चार्ली चैप्लिन के हुलिए वाला आम आदमी। राज कपूर पर चार्ली का काफी प्रभाव भी था। गीतों में भी वही झलक थी और इसमें राज कपूर का साथ दिया शंकर जयकिशन ने। नए भारत का आइडिया संगीत में भी झलकता था।

मिल-जुल के रहो और प्यार करो, एक चीज यही जो रहती है
हम उस देश को वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है

स्टूडियो में नए लोगों को मौका और उनके साथ ताल-मेल

स्टूडियो में टेक्नीशियनों से लम्बी पार्टनरशिप होती थी। डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी राधू कर्माकर ने स्टूडियो के लिए दस यादगार फिल्में शूट कीं। 1960 में राज कपूर ने उन्हें बतौर डायरेक्टर भी मौका दिया। कई फिल्मों में राज कपूर के असिस्टेंट डायरेक्टर रहे प्रकाश अरोड़ा ने 1954 में बूट पॉलिश बनाई, जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल मेंशन मिला। नए लोगों में शंभू मित्रा और अमित मित्रा ने 1956 में जागते रहो बनाई। क्रिटिकली ये फिल्म काफी पसंद की गई। राज कपूर दूसरे डायरेक्टर के काम में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करते थे।

'जागते रहो' का एक सीन

नेहरुवियन मॉडल और स्टूडियो का साथ लड़खड़ाना

60 के दशक तक नेहरू के सोशलिज्म का सपना डगमगाने लगा था। यहां से सामाजिक फिल्मों में कमी आने लगी। 1962 के युद्द के बाद चेतन आनंद की हकीकत जैसी फिल्में आईं लेकिन तब तक ज्यादातर फिल्में मनोरंजन पर आधारित हो गई थीं।

आरके स्टूडियो की पहली कलर फिल्म थी, संगम। 60 के दशक में स्टूडियो ने सिर्फ एक फिल्म बनाई। स्टूडियो की हालत खराब हो रही थी। फिर 1970 में आई 'मेरा नाम जोकर', जो राज कपूर के बेहद करीबी थी और जिसे ड्रीम प्रोजेक्ट जैसा कुछ कहा जाता है, ये फिल्म वही थी। ये फिल्म 6 सालों में बनी थी। फिल्म के लिए राज कपूर ने सब कुछ दांव पर लगा दिया था। स्टूडियो तक गिरवी रख दिया था।

फिल्म काफी लम्बी बन गई थी और फिल्म में दो इंटरवल थे। राज कपूर को तब बेस्ट डायरेक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला लेकिन जिस फिल्म को आज राज कपूर की मास्टरपीस माना जाता है वो तब उनकी सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म थी। राज कपूर टूट गए। डिप्रेशन में चले गए। उन्हें लगा लोग फिल्म को समझ नहीं पाए। मेरे अंदर के आर्टिस्ट को नहीं समझ पाए।

ये हालात बने कि शायद स्टूडियो बेचना पड़ जाए। लेकिन स्टूडियो बचाने के लिए बाकी जो भी प्रॉपर्टी या गहने थे वो बेच दिए गए और इसमें साथ दिया राज कपूर की पत्नी कृष्णा ने। सारे कर्जदारों को पैसे चुकाए गए।

एक्टर के तौर पर फिर काम नहीं किया

आरके फिल्म्स के लिए राज कपूर फिल्म डायरेक्ट और प्रोड्यूस तो करते रहे लेकिन बतौर एक्टर 'मेरा नाम जोकर' उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई। 1973 में  उन्होंने सुपरहिट फिल्म बॉबी डायरेक्ट की।

70 के दशक में स्टूडियो ने दो ही फिल्में बनाईं। धरम-करम और सत्यम शिवम सुंदरम। इसके बाद हिना और प्रेमग्रंथ जैसी फिल्मों में भी विधवा पुनर्विवाह, भारत-पाकिस्तान संबंध जैसे विषय दिखाई दिए लेकिन उनका एंगल कॉमर्शियल था। इन फिल्मों में वैसा आदर्शवाद नहीं था, जो स्टूडियो की शुरूआती फिल्मों में था।

हिना की शूटिंग के दौरान 1987 में राज कपूर को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड मिला। 1988 में उनकी मौत हो गई।

फिर नहीं उबर पाया आरके स्टूडियो

राज कपूर के बाद उनके लोगों का मनोबल टूट गया। 90 के दशक में उनके बेटों ने एक-एक फिल्म जरूर बनाई पर आरके स्टूडियो का दौर खत्म हो चुका था। वन मैन शो का दौर खत्म हो चुका था। बाद में कोई भी उस शख्स को रिप्लेस नहीं कर पाया। उनके बेटे रणधीर कपूर कहते भी हैं कि ये हमारी गलती है कि हमने स्टूडियो को दोबारा खड़ा करने की कोशिश नहीं की।

आरके स्टूडियो का हेडक्वार्टर

स्टूडियो के फिर से शुरू होने की उम्मीद तब जगी जब रनबीर कपूर ने ये इच्छा जताई लेकिन उन्होंने भी अपना प्रोडक्शन हाउस पिक्चर शुरू के नाम से खोला और बर्फी और जग्गा जासूस जैसी फिल्में बनाईं। अब आर के स्टूडियो के जल जाने के बाद इसके फिर से शुरू होने की उम्मीदों को और झटका लगा है। राज कपूर और केवल का सपना जल चुका है। ऋषि कपूर ने कहा भी है कि स्टूडियो तो मैं फिर से बना सकता हूं लेकिन जो कुछ खो गया है, वो वापस नहीं आ सकता।

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