Home सिनेमा बॉलीवुड अच्छा कंटेट कभी चलन से बाहर नहीं होता : आयुष्मान खुराना

अच्छा कंटेट कभी चलन से बाहर नहीं होता : आयुष्मान खुराना

गिरिधर झा - JUL 12 , 2019
अच्छा कंटेट कभी चलन से बाहर नहीं होता : आयुष्मान खुराना
अच्छा कंटेट कभी चलन से बाहर नहीं होता : आयुष्मान खुराना

जाति हिंसा पर हाल ही में आई फिल्म आर्टिकल 15 में आइपीएस ऑफिसर की भूमिका में आयुष्यमान खुराना ने सभी का ध्यान खींचा है। आउटलुक ने यह पता लगाने के लिए उसने लंबी बात की कि कैसे वे फिल्म दर फिल्म खुद को निखारते रहे।

2012 में आई विकी डोनर से लेकर हाल ही में आई आर्टिकल 15 कर की आपकी यात्रा कैसी रही, आपने अलग तरह की भूमिकाओं को करने में बहुत ख्याति अर्जित की है?

ये यात्रा बहुत ही अच्छी रही। अपनी पहली फिल्म से ही मैंने अलग राह चुनी। इसीने मुझे अलग तरह की फिल्में करने का मौका दिया। विकी डोनर एक तरह की केस स्टडी थी क्योंकि कम बजट के बावजूद इसकी बहुत चर्चा हुई। इसने मेरे लिए वैसा बेंचमार्क बनाया, जैसा मैं खुद बनाना चाहता था। लेकिन मेरी अगली तीन फिल्में (नौटंकी साला! / 2013, बेवकूफियां / 2014 और हवाईजादा / 2015) अच्छी नहीं रहीं। फिर दम लगा के हइशा (2015) से मैं फिर पटरी पर आ गया। फिर बरेली की बर्फी, शुभ मंगल सावधान (2017), अंधाधुन और बधाई हो (2018) ने मुजे फिर से सफलता का स्वाद दिया। 

विक्की डोनर हिंदी सिनेमा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इसने दर्शकों के स्वाद में ताज़ा बदलाव दिया। क्या इससे यह हुआ कि नए जमाने जिन दर्शकों के पास आउट-ऑफ-द-बॉक्स कहानियों और पात्रों को स्वीकार करने में परेशानी थी वो अलग ढंग से सोचने लगे?

इसका श्रेय निश्चित रूप से उन ऑडियंस को जाता है, जिन्होंने नई तरह की स्क्रिप्ट के लिए टेस्ट डवलप किया है। दर्शक भी विकसित हो रहे हंर जैसे, सिनेमा और समाज बदल रहा है।

इस बदलाव के पीछे क्या कारण है?

दर्शकों के पास बहुत सारे ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफार्मों के आने के साथ विश्व सिनेमा तक उनकी पहुंच आसान हो गई है। इसके अलावा, 1990 के दशक में मध्यवर्ग शायद ही कोई विदेश यात्रा कर पाता हो पर अब ऐसा नहीं है। और छोटे से बड़े शहरों में आ कर बस जाने वाले अधिकांश लोग 20वें दशक के हैं और वे लोग आसानी से इन नई कहानियों के साथ जुड़ाव बना लेते हैं। लोकप्रियता में इन कारणों का बहुत योगदान है।

आपके पास बड़ी संख्या में अच्छे विषय आ रहे हैं, आप इसे कैसे देकते हैं?

मैं अच्छे स्क्रिप्ट राइटरों और निर्देशकों के साथ काम कर रहा हूं। मैं विकी डोनर के निर्देशक रहे शूजीत सरकार के साथ फिर से काम कर रहा हूं। उनकी अगली फिल्म गुलाबो स्टूडियो में। हितेश केवल्य की शुभ मंगल ज्यादा सावधान में भी काम कर रहा हूं। आनंद एल राय इसके प्रोड्यूस कर रहे हैं। अमर कौशिक के साथ बाला कर रहा हूं। पिछले साल उन्होंने स्त्री निर्देशित की थी। सभी स्क्रिप्ट अलग हैं, मनोरंजक हैं, रेलेवेंट हैं। एक वक्त था जब नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी की फिल्में चर्चा का विषय होती थीं लेकिन पैसा नहीं कमाती थीं। लेकिन अब सौ-दो सौ करोड़ की छोटे बजट वाली फिल्में भी बढ़िया कमाती हैं। 

तो क्या यह माना जाए कि अंततः अब सिनेमा को स्टार एक्टर की बजाय एक्टर स्टार मिलने लगे हैं?

अब यहां हर तरह के कलाकारों के लिए जगह है। सिंबा यदि अच्छा कमाती है तो बधाई हो भी पीछे नहीं रहती। इसलिए कंटेंट से भरपूर सिनेमा के दौर में भी स्टार पावर की कामना नहीं की जा सकती ...। कभी-कभी यह इससे भी बड़ा होता है। जब फार्मूला फिल्मों को बड़ी ओपनिंग मिलती थी तब इसमें स्टार पॉवर के अलावा कुछ नहीं होता था। ठीक इसी वक्त यदि विषय अच्छा होगा तो दर्शक आप पर भरोसा करना शुरू कर देंगे। अच्छा कंटेंट कभी चलन से बाहर नहीं होता।

अभी तक आप किसी छवि में कैद नहीं हुए हैं, ऐसा कैसे कर पाए हैं?

शायद मेरे थिएटर बैकग्राउंड के कारण। इसने मुझे न सिर्फ एक्टिंग बल्कि म्यूजिक और स्क्रिप्ट राइटिंग में भी मदद की है। थिएटर वर्सेटाइल होने में मदद करता है। थिएटर के दिनों में मैंने बहुत गंभीर भूमिकाएं की हैं। लेकिन आर्टिकल 15 की भूमिका जैसा अवसर मेरे पास अब तक नहीं आया था। अब मुझे अच्छा लगता है कि मैं अलग-अलग भूमिकाएं कर पाता हूं। 

आइपीएस अफसर की भूमिका निभाना कैसा लगा?

यह अब तक का सबसे कठिन रोल था। हर वक्त यह रोल मेरे दिमाग में चलता रहता था। मैं और निर्देशक एक जैसा सोच पाते थे। हम जाति विभाजन और कई बातों पर बात करते थे। यह पहली फिल्म थी जिसमें मैं इतनी गहराई तक डूब गया था।

फिल्मों में आने से पहले आपने टेलीविजन पर बहुत काम किया। क्या आपने तब ही तय कर लिया था कि आप टिपिकल मसाला फिल्में नहीं करेंगे?

टेलीविजन ने मुझे अलग ढंग से सोचने का मौका दिया। मैंने एक एंकर और एक पत्रकार के रूप में भी काम किया जिससे मुझे, अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं का साक्षात्कार करने और फिल्मों की समीक्षा करने के कई मौके मिले। इससे स्क्रिप्ट के प्रति समझ विकसित हुई, अलग तरह की संवेदनशीलता आई। मैं हमेशा कुछ अलग करना चाहता था। विकी डोनर से पहले मेरे पास कई अवसर थे। पर मैंने सही फिल्म के लिए इंतजार किया। मैं शूजित सरकार जैसे किसी निर्देशक के साथ काम करना चाहता था जिसकी क्रेडेबिलीटी हो। मुझे यह सोच कर ही अच्छा लगता है कि गुलाबो स्टूडियो के जरिए मैं उनके साथ फिर से काम कर रहा हूं।

इस फिल्म में तो आपके साथ अमिताभ बच्चन भी हैं?

हां, पर अभी तक उनके साथ मेरी शूटिंग शुरू नहीं हुई है। जुलाई में हम लोग जल्द ही इकट्ठे शूटिंग शुरू करेंगे।

विकी डोनर के बाद आपकी तीन फिल्में फ्लॉप हो गई थी। तब क्या आपको लगा था कि अलग तरह के विषयों को चुनने में आपसे चूक हो रही है?

सफलता आपको हर बात नहीं सिखा सकती। असफलता आपको बहुत कुछ सिखाती है। और वही आपकी दोस्त, मार्गदर्शक होती है। उस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। वह वक्त मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। विकी डोनर की तरह ही दूसरी फिल्म जब मुझे ऑफर हुई तो मैं थोड़ा असमंजस में था। लेकिन दम लगा के हइशा ने मुझे बदल दिया।

आप इस पीढ़ी के दुर्लभ गायक-अभिनेता हैं। क्या इन दिनों आपको गाने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं?

फिलहाल मैं जिंदगी के सबसे व्यस्त दौर से गुजर रहा हूं। मैं एक के बाद एक फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त हूं। इसलिए गायिकी थोड़ा पीछे खिसक गई है। मेरा सारा ध्यान एक्टिंग पर है। लेकिन जब भी समय होगा मैं अपनी गायिकी के लिए समय निकालूंगा।

आप एक के बाद एक फिल्में कर रहे हैं, ऐसे में एक चरित्र से दूसरे चरित्र में स्विच कैसे करते हैं?

ऐसा करने में काफी अच्छा हूं। मैंने अंधाधुन और बधाई हो की शूटिंग साथ-साथ की है। लेकिन आर्टिकल 15 जैसी फिल्म के लिए बहुत सा शोध चाहिए होता है और अलग तरह की मानसिक तैयारी भी। लेकिन आपको एक रोल से दूसरे रोल में स्विच करने के लिए सावधानी रखनी पड़ती है।

इस तरह की गहन भूमिका निभाने के बाद, आपको टिपिकल बॉलीवुड मसाला फिल्म करने का मन नहीं करता जिसमें आपकी बाहों में ग्लैमरस नायिका हो और आप पेड़ों के आसपास नाच रहे हों?

मैं 90 के दशक का बच्चा हूं और मुझे ऐसा करना अच्छा ही लगेगा। पर उसमें भी मैं कुछ अलग करना चाहूंगा। मैं कभी भी खांटी व्यावसायिक फिल्मों से उत्साहित नहीं होता।

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