उम्रदराज हीरो अपनी बनाई गई मर्दाना छवि की बदौलत धूम-धड़ाके से रूपहले परदे पर वापसी की गढ़ रहे नई पटकथा
वापसी इस दौर का सबसे चर्चित विषय है। अक्षय खन्ना का धुरंधर में किरदार सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे बॉबी देओल के एनिमल के किरदार ने बटोरी थी। लोग कह रहे हैं, ‘‘वापसी हो तो लॉर्ड बाबी और रहमान डकैत जैसी हो वरना न हो।’’ 2000 के दशक में, टाइट टी-शर्ट पहने, थोड़े से दब्बू अक्षय खन्ना के मुकाबले, काले कपड़ों में, बोल्ड धुरंधर वाले अक्षय की कोई तुलना ही नहीं है। आदित्य धर की फिल्म में, बहरीन के एक गाने, ‘फस्ला’ की धुन पर सलाम करते हुए नाचने वाले अक्षय खन्ना का यह लुक इंस्टाग्राम पर ऐसा वायरल हुआ कि ‘ट्रेंड’ करने लगा।
धुरंधर में खन्ना का लुक सोशल मीडिया पर देसी मर्दानगी, स्वैग और ‘ऑरा’ का उदाहरण बन चुका है। इसके साथ ही यह चर्चा शुरू हो गई कि उनकी बहुमुखी प्रतिभा का ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाया। ‘कमबैक’ की बहस में चर्चा यह भी है कि कैसे बॉलीवुड पिछले एक दशक या उससे अधिक समय तक उनकी क्षमता को समझने में चूक गया। इससे पहले ऐसी ही बात बॉबी देओल के एनिमल (2023) में प्रदर्शन के बाद शुरू हुई थी। एनिमल को भी बॉबी का भव्य ‘कमबैक’ बताया गया था।
देओल और खन्ना को जो बात जोड़ती है, वह दोनों का ही ‘वायरल’ हो जाना है। दोनों के अभिनय से ज्यादा, सोशल मीडिया पर उनके दृश्य वायरल हैं। दूसरी समानता है, वह हिट ट्रैक जो दोनों के वायरल सीन से जुड़ा हुआ है। जैसे एनिमल में देओल की एंट्री के लिए ईरानी गाना, ‘जमल कुडू’ बजा था, तो धुरंधर में खन्ना के लिए, ‘फस्ला।’ सोशल मीडिया में दोनों ही ट्रैक के लिए लोग दीवाने हैं।
बहुचर्चित कमबैक?
डूमस्क्रॉलिंग (लगातार नकारात्मक खबरें देखने की लत) करते हुए, एनिमल के बाद ऐसे रील्स और मीम्स आम हो गए थे, जो लोगों को बॉबी देओल की तरह धैर्य रखने की सीख देते थे और भरोसा दिलाते थे कि जिंदगी एक दिन देओल जैसे कमबैक का मौका जरूर देगी। एनिमल के बाद देओल अपने करियर के नए शिखर पर नजर आए, जहां कंगुवा (2024), बैड्स ऑफ बॉलीवुड (2025) और बंदर (2025) जैसे चर्चित काम उनके हिस्से आए। खन्ना के मामले में यह थोड़ा अलग था। धुरंधर ऐसे दौर में आई जब वे पहले से ही मजबूत, लेकिन हाशिए पर चली गई भूमिकाएं कर रहे थे। 2017 की इत्तेफाक और मॉम, 2019 की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और सेक्शन 375, दृश्यम 2 (2022) जैसी फिल्मों में अच्छा काम करने के बावजूद उनके काम का शोर नहीं मचा। फिर इसी साल आई छावा और धुरंधर ने लोगों को एक बार ‘फिर’ खन्ना पर बात करने को मजबूर कर दिया।
कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय की फिल्ममेकर और फिल्म अध्ययन की प्रोफेसर मधुजा मुखर्जी इसका कारण ‘न्यू मीडिया कंडीशन’ को मानती हैं, जहां कमबैक का विचार गढ़ा जाता है। वह कहती हैं, “यह कमबैक अमिताभ बच्चन के खुदा गवाह (1992) या शाहरुख खान के पठान (2023) जैसी वापसी नहीं है। अब चीजें वैसे काम नहीं करतीं। अब यह मीडिया इवेंट्स की शृंखला होती है। कुछ चीजें एक हफ्ते वायरल होती हैं और फिर हवा हो जाती हैं।”

एनिमल में बॉबी देओल
यदि आपने एक बार कुछ स्क्रॉल किया, तो आपको वही परोसा जाता है, जो आपने देखा। फिर चाहे दोबारा आपको उसे देखने की इच्छा हो या न हो। मुखर्जी मानती हैं कि खन्ना और देओल से जुड़ा ‘कमबैक’ असल में एल्गोरिदमिक निर्माण है। वे कहती हैं, “एल्गोरिदम आपको वही दिखाता है, जो आप देखते हैं। हैशटैग इसे आगे बढ़ाता है।’’
सदी के मोड़ पर देओल और खन्ना जाने-पहचाने चेहरे थे, लेकिन दोनों को ही कभी मुख्य भूमिका नहीं मिली। मुखर्जी कहती हैं, “देओल के साथ एक तरह की बनावटी छवि जुड़ी हुई है, लेकिन उनमें से कोई भी सच्चा स्टार नहीं था।” स्टार्स से आगे बढ़ने के दौर में कभी स्टार्स की बपौती रहा ‘ऑरा’, अब इस दौर में कोई पैमाना नहीं रह गया है। एनिमल और धुरंधर के साथ, ‘लॉर्ड बॉबी’ और ‘डकैत’ खन्ना, पर्दे पर शायद ही कभी लोकप्रिय रहे हों। यह सोशल मीडिया पर छवि निर्माण की ऐसी तकनीक है जो बॉलीवुड की पारंपरिक समझ से बिल्कुल अलग है।
धर्मा कॉर्नरस्टोन एजेंसी और अन्य सितारों के लिए पहचान और पोजिशनिंग गढ़ चुके एडिटर-एट-लार्ज और इमेज आर्किटेक्ट अर्नेश घोष, पुनर्निर्माण और मांग के बीच के संबंध की बात करते हैं। वे कहते हैं, “यह समझना जरूरी है कि बॉबी और अक्षय दोनों ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने सुनहरे दौर में समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए। वे युवा अवस्था में स्टार थे, लेकिन प्रासंगिक नहीं बने रह सके।
घोष इंडस्ट्री की बजाय खुद की ब्रांडिंग के महत्व पर जोर देते हैं। वे कहते हैं, “स्टार की आकर्षकता सीधे उसके दर्शक वर्ग पर निर्भर करती है। अजय देवगन ने अपने ‘सॉफ्ट बॉय’ दौर से सिंघम युग में इसलिए बदलाव किया क्योंकि उनके दर्शक बड़े हो गए थे और सॉफ्ट बॉय उन्हें आकर्षित नहीं करता था। शाहरुख, सलमान और अक्षय कुमार अपने दर्शकों के लिए स्थायी ब्रांड बन पाए। बॉबी और अक्षय ऐसा नहीं कर पाए। इसलिए जैसे-जैसे मिलेनियल्स बड़े हुए, उनकी दिलचस्पी उनमें खत्म होती गई।”
रिक्तता: क्या और क्यों
2015 तक उम्र बढ़ना पुरुषों के लिए बुरी बात मानी जाती थी। फिर मिलिंद सोमन की अचानक वापसी या शाहरुख खान की फिल्म डियर जिंदगी (2016) के बाद, मिलेनियल्स ने उम्र को अच्छी बात, आत्मविश्वास की निशानी के रूप में देखना शुरू कर दिया। 40 साल के पुरुष की छवि बदल गई। अब वह तोंद वाला, गंजा, थका हुआ और पत्नी के दबाव में रहने वाला पुरुष नहीं रहा। इंस्टाग्राम ने इसमें अहम भूमिका निभाई। हम बड़े उम्र के पुरुषों को अच्छी सेहत में, सफल, अमीर आदि देखने लगे। जेन जेड इस चर्चा में शामिल हुई, तो बड़े उम्र के पुरुष आकर्षक बन गए। उन्हें बड़ी उम्र के पुरुष आकर्षक लगने लगे।”
घोष इंटरनेट पर ‘डैडीफिकेशन’ (उम्रदराज पुरुष का भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से वांछनीय बन जाना। जहां उम्र कमजोरी नहीं ताकत है) के पहलू पर भी बात करते हैं। जिसे वे वायरल होने का साइड इफेक्ट हैं। वे कहते हैं, ‘‘अगर तुलना करें तो बॉबी ‘डैडिफाइड’ हो चुके थे। वे यौन रूप से आकर्षक लगने लगे थे। इत्तेफाक या छावा में अक्षय खन्ना ‘डैडिफाइड’ नहीं थे। लेकिन धुरंधर में वे जरूर हैं। वे आत्मविश्वासी और स्टाइलिश दिखाई देते हैं। यहां हमें यह भी समझना चाहिए कि ‘डैडिफाइड’ जांबाजों के उभार का एक सामाजिक-राजनैतिक निहितार्थ भी हो सकता है। शायद यह उस दक्षिणपंथी कट्टरता से उभर रहा हो, जहां आक्रामक और बेपरवाह होना ही मर्दाना का पर्याय हो गया है।