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टेक/डेटावाद का साम्राज्य: कंपनियां ही तय कर रही हैं कि लोग और समाज किस दिशा में जाएंगे

एस.के. सिंह - MAY 23 , 2022
टेक/डेटावाद का साम्राज्य: कंपनियां ही तय कर रही हैं कि लोग और समाज किस दिशा में जाएंगे
व्यक्ति और समाज दोनों स्तर पर टेक्नोलॉजी हावी

“कंपनियां ही तय कर रही हैं कि लोग और समाज किस दिशा में जाएंगे, ये अनेक देशों की सरकारों से भी ताकतवर”

एक दशक पहले तक किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि मनुष्य के खान-पान, रहन-सहन, पसंद-नापसंद, रिश्ते और सबसे अहम, सोचने का तरीका भी अपना नहीं रह जाएगा। टेक्नोलॉजी हमारे ऊपर इतनी हावी हो जाएगी कि व्यक्ति और समाज दोनों स्तर पर अधिकांश बातें टेक्नोलॉजी कंपनियां ही तय करेंगी। आधुनिक जीवन में इनके बिना रहना लगभग असंभव हो गया है। हमारे इर्द-गिर्द जो कुछ भी हो रहा है  उन्हें यही कंपनियां आकार दे रही हैं। दुनिया की प्रगति ही टेक्नोलॉजी के सहारे हुई। चाहे वह बिजली की खोज हो, भाप इंजन की या मोटर गाड़ियों की, टेक्नोलॉजी ने हमारे जीवन को निरंतर बदला है। लेकिन पहले जो भी टेक्नोलॉजी आई उसे लाने वाले के पास सीधे लोगों को नियंत्रित करने की ताकत नहीं थी। डिजिटल टेक्नोलॉजी इस मायने में अलग है। टेक्नोलॉजी और पैसे के मेल से टेक्नोलॉजी लाने वाले ही आज तय कर रहे हैं कि लोग और समाज किस दिशा में जाएंगे।

आधुनिक जीवन को प्रभावित करने वाली पांच प्रमुख कंपनियां हैं गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक, एपल और अमेजन। इन्हें ‘फ्राइटफुल फाइव’ यानी डरावनी पांच कंपनियां कहा जाता है, क्योंकि ये अनेक देशों की सरकारों से भी अधिक ताकतवर हो गई हैं। डिजिटल जगत में आप कुछ भी करना चाहें, इनमें से किसी न किसी कंपनी से आपका साबका जरूर पड़ेगा।

इन्हें कंपनियां नहीं देश कहिए

डिजिटल टेक्नोलॉजी के विस्तार की गुंजाइश असीमित है। इसलिए इन ‘बिग टेक’ कंपनियों की वैल्यूएशन अनेक देशों की जीडीपी से अधिक हो गई है। इनके मालिकों के पास अथाह पैसा हो गया है। चाहे टेस्ला के इलॉन मस्क हों, फेसबुक के मार्क जकरबर्ग या अमेजन के जेफ बेजोस उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि उनका एक ऐप या टेक्नोलॉजी समाज को प्रभावित करने वाला इतना बड़ा टूल बन जाएगा। ये पूंजीपति इस स्थिति को समझ रहे हैं इसलिए अपनी पोजीशन और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। मस्क के ट्विटर को खरीदने को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

बड़ी कंपनियों का औपनिवेशिक रूप पहले भी दिखा है। भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया जैसे उभरते देशों में इन्हें बड़ा बाजार दिखा तो 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने औपनिवेशक सोच के साथ ही वहां प्रवेश किया। उन्हें अपने पुराने प्रोडक्ट के लिए यह नया बाजार दिखा। इन देशों के नए मध्यवर्ग ने भी उन प्रोडक्ट को हाथों-हाथ लिया। लेकिन टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट के मामले में ऐसा नहीं है। ये पूरी दुनिया में एक साथ उपलब्ध हैं। समस्या यह है कि इनसे पहले कोई कंपनी हमारे बारे में उतना नहीं जानती थी, जितनी जानकारी ये कंपनियां रखती हैं।

पहली बार सोशल मीडिया पर लोग आकर्षित हुए तो माना गया कि यह सबको समान अवसर देने का बेहतरीन माध्यम है। ऐसा माध्यम जो सरकार और समाज के दमन के खिलाफ बोलने का अवसर देता है। अरब जगत में 2011 में आंदोलन शुरू हुए तो फेसबुक और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ही आंदोलनकारियों को जोड़ने का काम किया। तब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था, “सेलफोन और सोशल नेटवर्क ने युवाओं को अभूतपूर्व तरीके से संगठित होने का मौका दिया है।” हाल के वर्षों में 'ब्लैक लाइव्स मैटर' तथा 'मी टू' जैसे अभियान सोशल मीडिया की ही देन कहे जा सकते हैं। लेकिन अब निजी जीवन में इनका हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इन कंपनियों के एल्गोरिदम के माध्यम से ही जुड़ते हैं। याद कीजिए गूगल का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिदम, आप जो लिखना चाहते हैं उसमें वह मदद करता है। किसी को उपहार देना चाहते हैं तो आपकी पसंद के मुताबिक अमेजन बताता है कि क्या खरीद सकते हैं। ये कंपनियां बता रही हैं कि लोग किस तरह अपना समय बिताएं, किनके साथ मिलें, किस तरह सोचें। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ इनकी ताकत भी बढ़ती जा रही है। बीते एक दशक में सोशल मीडिया की दुनिया इतनी बदली कि हर देश इन कंपनियों को नियंत्रित करने की जरूरत महसूस कर रहा है।

यूरोपियन यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयन का कहना है, “हमें विशाल इंटरनेट कंपनियों की राजनीतिक ताकत पर लोकतांत्रिक सीमा लगाने की जरूरत है। नई टेक्नोलॉजी का यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि दूसरें तय करें कि हमें कैसा जीवन जीना है।”

ईयू प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर

ईयू प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर 

इन कंपनियों की विशालता का अंदाजा लगाइए- फेसबुक के करीब 300 करोड़ मासिक एक्टिव यूजर हैं। गूगल का दावा है कि उसके यूट्यूब प्लेटफॉर्म पर रोजाना 100 करोड़ घंटे वीडियो देखे जाते हैं। अमेजन रोजाना 16 लाख पैकेट की डिलीवरी करती है। ई- कॉमर्स, फाइनेंस, मनोरंजन और संचार में दुनिया की 10 सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों का 

 दबदबा है। उनका मार्केट कैप 10 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है। अगर इन्हें एक इकोनॉमी माना जाए तो यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।

इसी विशालता ने बिग टेक को अनेक देशों से भी ज्यादा ताकतवर बना दिया है। इनके पास इतना पैसा, इतनी ताकत है कि ये समानांतर सरकार बन गई हैं। कोविड-19 के कारण जब पूरी दुनिया लॉकडाउन में थी, तो वह समय इनके लिए वरदान बन गया। टेक्नोलॉजी में जो कुछ होता है, उस पर इनका प्रभाव तो होता ही है। नतीजा यह हुआ कि अक्टूबर 2020 में एपल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और अल्फाबेट (गूगल की पेरेंट कपनी) की वैल्यूएशन एक लाख करोड़ डॉलर को पार कर गई। इनकी आर्थिक क्षमता का कोई मुकाबला नहीं है। इनके सामने नई कंपनियों के लिए खड़ा होना भी मुश्किल है क्योंकि ये आसानी से अपने प्रतिद्वंद्वी को खरीद सकती हैं।

ट्रंप पर सोशल मीडिया दुरुपयोग के लगे थे आरोप

ट्रंप पर सोशल मीडिया दुरुपयोग के लगे थे आरोप

सरकारों के लिए भी इनके बिना काम करना मुश्किल हो गया है। दो साल पहले कोरोना फैला तो न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू कुओमो ने माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और गूगल के पूर्व सीईओ एरिक स्मिट को बुलाकर यह चर्चा की कि महामारी से लड़ने के लिए सरकार का कामकाज कैसे डिजिटाइज किया जाए। इंग्लैंड में भी इन कंपनियों से कोविड-19 से लड़ने के लिए टेक्नोलॉजी सॉल्यूशन पर चर्चा की गई। सरकारों के प्रचार का तो ये प्रमुख माध्यम बन गए हैं। भारत में भी नेता और मंत्री आम जन के बीच दिखें या नहीं, ट्विटर पर जरूर दिख जाएंगे।

ये कंपनियां जिस तरह बिग डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रही हैं उससे आने वाले दिनों में ये हमारे काम के तौर-तरीके बदल देंगी। इन कंपनियों के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा यूजर के डाटा से आता है। इसे ‘सर्विलांस कैपिटलिज्म’ नाम दिया गया है। गूगल का 83 फीसदी और फेसबुक का 99 फीसदी रेवेन्यू विज्ञापनों से आता है। ऑनलाइन विज्ञापन में इन्हीं दोनों का दबदबा है।

इन पर निर्भरता का उदाहरण देखिए। आज ज्यादातर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान क्लाउड स्पेस में अपना डाटा स्टोर करते हैं और क्लाउड बिजनेस में माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन और अलीबाबा बस चार कंपनियों का दबदबा है। चाहे इंटरनेट कंपनियां हों या वित्तीय संस्थान, सब क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हैं। अब तो पारंपरिक इंडस्ट्री की भी इन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। भारत में भी पेमेंट ऐप, कैब एग्रीगेटर, फूड डिलीवरी जैसे प्लेटफॉर्म इन्हीं के क्लाउड का इस्तेमाल करते हैं।

हाल के वर्षों तक टेक्नोलॉजी के विकास में सरकारी संस्थान बड़ी भूमिका निभाते थे। लेकिन लेकिन अब यह काम निजी कंपनियां कर रही हैं। फाइटर जेट और आधुनिक हथियार से लेकर सेल्फ ड्राइविंग कार, अंतरिक्ष यान, ड्रोन तक सब कुछ।

इस तरह पूरी दुनिया की व्यवस्था चंद कंपनियों या कहें व्यक्तियों के हाथों में सिमटती जा रही है। लेकिन चुनिंदा हाथों में इतनी बड़ी ताकत होना अपने आप में खतरा है। इसलिए नई बहस यह है कि इन पर कैसे नियंत्रण किया जाना चाहिए। क्योंकि आर्थिक ताकत के अलावा उनके पास डिजिटल टेक्नोलॉजी में वह दक्षता भी है जिसे काबू में करने का तरीका कोई नहीं जानता। बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों का बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से प्लेटफॉर्म आधारित है जहां से उन्हें खरीदार और विक्रेता, दोनों का भरपूर डेटा मिलता है। यही उनके लिए सबसे बड़ा एडवांटेज है। यह डेटा उन्हें आर्थिक ताकत के साथ आर्थिक नीतियां तय करने की भी ताकत देता है।

इन कंपनियों की राजनीतिक ताकत दो तरीके से है। एक तो लॉबिंग है और दूसरा, विशाल ग्राहक आधार भी इन्हें राजनीतिक ताकत देता है। उबर पर कई देशों में नियम तोड़ने के आरोप लगे, लेकिन हर जगह उसने अपने ग्राहकों के जरिए नियम बदलने का दबाव बनाने की कोशिश की। उबर के तो सिर्फ 12 करोड़ यूजर हैं, सोचिए गूगल और फेसबुक क्या कर सकती हैं जिनके यूजर की संख्या अरबों में है।

ट्विटर, फेसबुक और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए युद्ध का मैदान बन गए हैं। ये प्लेटफॉर्म राजनीतिक दलों को मतदाताओं के बारे में बहुमूल्य सूचनाएं देते हैं। इसका बड़ा उदाहरण कैंब्रिज एनालिटिका कांड है, जिसमें फेसबुक पर अमेरिकी मतदाताओं के डेटा का इस्तेमाल राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में किया गया। ये टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म राजनीतिक दलों को मतदाताओं तक पहुंचने का रास्ता उपलब्ध कराने के साथ जोखिम भी बढ़ाते हैं। जैसे, मतदाताओं के बीच विरोधी नेता या पार्टी के प्रति भ्रामक और फर्जी सूचनाएं फैलाना। भारत में भी ‘आइटी सेल’ इसके लिए कुख्यात है।

टेक कंपनियों का विस्तार

आज अमेजन के पास अपने विमानों का बेड़ा है। यह ई-कॉमर्स के अलावा शिपिंग और प्रकाशन बिजनेस में भी है। जैपोस नाम की इसकी जूता कंपनी है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भी तेजी से बढ़ रही है। इसका अमेजन ईको घरेलू असिस्टेंट बन गया है। फेसबुक के पास दुनिया के सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्क में से एक इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप भी हैं। गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट है। यह जीमेल, क्रोम ब्राउजिंग, यूट्यूब, गूगल पे, गूगल मैप न जाने कितनी तरह की सेवाएं देती है। दुनिया में 70 फीसदी से ज्यादा स्मार्टफोन एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं और यह सिस्टम गूगल का ही है। कहने का मतलब यह कि आप कोई भी प्रोडक्ट या सर्विस इस्तेमाल करना चाहें, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन कंपनियों के पास जाना ही पड़ेगा। ये कंपनियां जिस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में विस्तार कर रही हैं उससे आने वाले दिनों में इनकी भूमिका और बढ़ेगी।

इनका नियंत्रण इतना व्यापक है कि नए बिजनेस के लिए इनके बिना आगे बढ़ना नामुमकिन सा हो गया है। किसी नए स्टार्टअप को ग्राहक बनाने के लिए इनका इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। अगर उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन देना है तो फेसबुक या गूगल पर ही जाना पड़ेगा। निर्भरता सिर्फ ग्राहक बनाने में नहीं, दूसरे मामलों में भी है। उदाहरण के लिए, आप नेटफ्लिक्स पर जो भी वीडियो देखते हैं वह अमेजन के सर्वर पर स्टोर होता है। नेटफ्लिक्स और अमेजन के बीच प्रतिस्पर्धा है, फिर भी नेटफ्लिक्स अमेजन पर निर्भर है। किसी ने नया ऐप बनाया तो उसे गूगल या एपल के ऐप स्टोर पर ही डालना पड़ेगा। दूसरी कंपनियां चाहे जितनी सफल हों, उनकी सफलता में इनकी भागीदारी जरूर होती है। आज कोई भी सेक्टर नहीं जिसमें इनका दखल न हो। डिजिटल मार्केट ही तय कर रहा है कि दूसरे बाजार भविष्य में कैसे विकसित होंगे।

नए कानून

डिजिटल कंपनियों ने लंबे समय तक बिना किसी जवाबदेही के काम किया है। ताकत बढ़ने के साथ इनके प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक कंटेंट भी बढ़ रहा है। इसलिए तमाम देश इन पर लगाम लगाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। बाइडन प्रशासन अमेजन, गूगल और अमेजन के तथाकथित गैर-प्रतिस्पर्धी व्यवहार की छानबीन करने जा रहा है। अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन और कई राज्यों ने फेसबुक पर प्रतिस्पर्धा विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए 9 दिसंबर 2021 को मुकदमा दायर किया। उसी महीने यूरोपियन यूनियन ने ऑनलाइन हेट स्पीच रोकने और प्रतिस्पर्धा के नए नियम बनाए। अब यूरोपियन कमीशन एआइ आधारित टेक्नोलॉजी को रेगुलेट करने के लिए नियम बना रहा है। इंग्लैंड अपना अलग टेक्नोलॉजी रेगुलेटर बनाने जा रहा है। भारत भी आइटी कानून के बाद नया डेटा कानून लाने जा रहा है। चीन के नियामकों ने 24 दिसंबर को अलीबाबा के खिलाफ प्रतिस्पर्धा संबंधी जांच शुरू की और बाद में उस पर 2.8 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया। उससे पहले उसने एंट फाइनेंशियल के आइपीओ पर रोक लगा दी थी।

दुनियाभर में सरकारें टेक्नोलॉजी कंपनियों की ताकत कम करने के लिए एक साथ कदम उठा रही हैं। ऐसा पहले कभी किसी इंडस्ट्री के साथ नहीं हुआ। सरकारें इन कंपनियों की बढ़ती ताकत की बात तो करती हैं, लेकिन समाधान पर एकमत नहीं हैं। उनमें आपस में ही विवाद है। बाइडन प्रशासन ने कहा है कि अमेरिकी टेक कंपनियों पर नया टैक्स लगाने वाले देशों पर टैरिफ लगाया जा सकता है।

इनके लिए बाजार ही सब कुछ है। इसका एक उदाहरण हाल ही ऑस्ट्रेलिया में देखने को मिला। ऑस्ट्रेलिया पिछले साल यह नियम बना रहा था कि गूगल और फेसबुक अगर किसी वेबसाइट की खबरें दिखाएंगी, उसके बदले उन्हें उस वेबसाइट को पैसे देने पड़ेंगे। इसके विरोध में गूगल ने ऑस्ट्रेलिया में अपना सर्च इंजन बंद करने की धमकी दी। फेसबुक ने खबरों के लिंक शेयर करना बंद कर दिया। लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने कानून बनाया और अब दोनों मीडिया कंपनियों को खबरों के बदले भुगतान कर रही हैं।

डिजिटल दुनिया में निजता की कोई जगह नहीं रह गई है, न ही इस बात की कि कोई सूचना सही है या गलत। अब अमेरिकी संसद नए एंटीट्रस्ट, प्राइवेसी और स्पीच के नियम बना रही है। यूरोपियन यूनियन कानून बना रहा है ताकि फेसबुक, ट्विटर, यू ट्यूब प्लेटफॉर्म पर गलत सूचनाओं को तत्काल हटाएं।

ताकत का प्रतीकः दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एपल का कैलिफोर्निया स्थित मुख्यालय

ताकत का प्रतीकः दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एपल का कैलिफोर्निया स्थित मुख्यालय

दुनिया को इन कंपनियों का उपनिवेश बनने से रोकने के लिए सभी प्रमुख देशों को मिलकर काम करने की जरूरत है। अमेरिकी डेमोक्रेट सांसद डेविड सिसिलीन ने कहा है, “यह मोनोपोली मोमेंट है। टेक कंपनियों का एकाधिकार खत्म करने और डिजिटल इकोनॉमी में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सभी देशों को साथ काम करना पड़ेगा।” यह इसलिए भी सच है क्योंकि विभिन्न देशों के भिन्न-भिन्न नियमों से स्थिति और जटिल हो सकती है। फेसबुक के वाइस प्रेसिडेंट और इंग्लैंड के पूर्व उप प्रधानमंत्री निक क्लेग ने एक मीडिया वार्ता में कहा, “आने वाले महीनों और वर्षों में बनने वाले कानून इंटरनेट और विश्व अर्थव्यवस्था पर 

 गहरा प्रभाव डालेंगे। उम्मीद है कि अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे देश इंटरनेट के लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने की दिशा में मिलकर कार्य करेंगे।”

इन कंपनियों की मौजूदगी दुनिया के लगभग हर देश में है। किसी एक देश के रेगुलेटर के लिए उन पर पूरी तरह नियंत्रण रख पाना मुश्किल है, क्योंकि टेक्नोलॉजी में जितनी तेजी से बदलाव हो रहे हैं, कानून उतनी तेजी से बदलना संभव नहीं। इसलिए देश दंडात्मक प्रावधानों पर अधिक जोर दे रहे हैं। यूरोप इनके वैश्विक रेवेन्यू के दस फीसदी तक जुर्माने का कानून बना रहा है। नए कानूनों की घोषणा करते हुए यूरोपियन कमीशन की वाइस प्रेसिडेंट मार्गरेट वेस्टेज ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करेंगे कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म समाज और नागरिकों के लिए जो खतरा उत्पन्न करेंगे, उसके लिए उन्हें जवाबदेह बनाया जाए।” टेक्नोलॉजी कंपनियों को लक्षित यूनियन का यह तीसरा बड़ा कानून है। हालांकि अभी इन कानूनों पर आधिकारिक रूप से मंजूरी मिलनी बाकी है। इनके जनवरी 2024 से ही लागू होने की उम्मीद है।

इन कंपनियों के लिए नए तरह के नियमों की भी जरूरत महसूस की जा रही है, क्योंकि मौजूदा कानूनों के प्रावधान इनके लिए काफी नहीं हैं। उदाहरण के लिए, मौजूदा प्रतिस्पर्धा कानूनों का मकसद यह है कि ग्राहक को उचित कीमत पर सामान मिले। अमेजन आम तौर पर बाजार से कम कीमत पर ही सामान बेचती है, जिससे दूसरी कंपनियों पर भी दाम कम रखने का दबाव बनता है। यह ग्राहक हित में है।

वैसे, यह भी सच है कि इन कंपनियों को रेगुलेट करके बेहतर बनाने का मतलब इन्हें और अधिक ताकतवर बनाना है। फेसबुक का न्यूज फीड दुनिया में सबसे लोकप्रिय है। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में जितने लोग अखबार पढ़ते और टीवी पर खबरें देखते हैं उनसे कहीं ज्यादा फेसबुक पर खबरें पढ़ते हैं। आपत्तियों के बाद फेसबुक ने खबरों में अपने स्तर पर तथ्यों की पड़ताल की व्यवस्था की है। यानी क्या सही है और क्या गलत, यह भी फेसबुक ही तय करेगी। टेक कंपनियां एक तरफ तो डिजिटल दुनिया रच रही हैं, दूसरी तरफ उस दुनिया में निगरानी कैसे बढ़ाई जाए, उसका समाधान भी वही दे रही हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन

सरकारें इन कंपनियों पर नियंत्रण की चाहे जितनी कोशिश करें, लेकिन उनके डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की मदद लेना भी उनकी मजबूरी है। वर्ष 2020 में दुनिया में 64 अरब टेराबाइट से अधिक डिजिटल सूचना स्टोर की गई। इसकी विकरालता इस बात से समझी जा सकती है कि इसे रखने के लिए 500 अरब स्मार्टफोन की जरूरत पड़ेगी। आने वाले दिनों में हम कारों, फैक्ट्रियों और यहां तक कि पूरे शहर को इंटरनेट से जुड़ा पाएंगे। उनसे लगातार डेटा उत्पन्न होगा जिन्हें स्टोर करने के लिए इन्हीं कंपनियों के इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ेगी। इस तरह इन कंपनियों का आकार बढ़ेगा और इन पर नियंत्रण रखने की सरकार की क्षमता भी कम होती जाएगी। कोई भी सरकार ऐसा कदम उठाने से बचेगी जिससे उसके यहां सेवाएं प्रभावित हो। आज कोई भी देश यूट्यूब, ट्विटर या फेसबुक पर लंबे समय तक प्रतिबंध नहीं लगा सकता। भारत में ही देखें तो पूरा सरकारी अमला अपनी उपलब्धियां ट्विटर या फेसबुक पर ही बताता है। नए फैसलों की जानकारी भी कई बार इन्हीं प्लेटफॉर्म पर दी जाती है।

इन कंपनियों ने जिस पैमाने पर डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है उसका मुकाबला करने के लिए भारी-भरकम रकम की जरूरत है। वर्ष 2019 में अल्फाबेट, अमेजन, एपल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट ने रिसर्च और डेवलपमेंट पर 109 अरब डॉलर खर्च किए। यह उस वर्ष इंग्लैंड में सरकार और निजी क्षेत्र द्वारा इस मद में किए गए खर्च का दोगुना है। कोई भी देश अगर टेक्नोलॉजी में ज्यादा नियंत्रण चाहता है तो उसे पहले बड़ा निवेश करना पड़ेगा। यही नहीं, अपडेट करने के लिए लगातार निवेश करते रहना पड़ेगा। तभी वह बिग टेक का मुकाबला कर सकेगा। यूरोपीय देश ऐसी औद्योगिक नीति की बात कह रहे हैं जिसमें सरकारी निवेश बड़े पैमाने पर हो। इसका मकसद इन टेक्नोलॉजी कंपनियों का सरकारी विकल्प खड़ा करना है। उनका यह प्रयास कितना सफल होता है यह सामने आने में वक्त लगेगा।

टेक्नोलॉजी कंपनियां भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ये दो प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच योद्धा का भी काम करती हैं। ऐसा नहीं कि निजी कंपनियां पहली बार ऐसा कर रही हैं। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर वर्षों से ऐसे आरोप लगते रहे हैं। पहले कंपनियां पर्दे के पीछे राजनीतिक नेताओं के साथ डील करती थीं, लेकिन टेक्नोलॉजी कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर करोड़ों लोगों की मौजूदगी के कारण खुल कर ऐसा कर रही हैं। फरवरी 2021 में अमेरिका में गैलप के एक सर्वे में ज्यादातर लोगों ने बिग टेक के खिलाफ सख्त नियमों की जरूरत बताई। लेकिन अभी तक इन कंपनियों पर कहीं भी ऐसी कार्रवाई नहीं हुई जिससे यह लगे कि ये अपने कामकाज का तरीका बदलेंगी। चीनी कंपनियों को छोड़ दें तो ज्यादातर प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियां अमेरिकी हैं और सिलिकॉन वैली को लॉबिंग में माहिर माना जाता है।

हर जगह दखल

बस एक पीढ़ी पहले की बात है। इंटरनेट को वैश्वीकरण का आधार माना जाता था। उम्मीद थी कि डिजिटल युग में सूचनाओं का प्रवाह अबाधित होगा, उस पर किसी का नियंत्रण नहीं रहेगा, यहां सबके लिए समान अवसर होंगे। सूचनाओं का प्रवाह तो हुआ लेकिन वैसा नहीं जैसी कल्पना थी। अधिकार ताकत चुनिंदा कंपनियों के हाथों में सिमट गई है। अब उन पर नियंत्रण करने के लिए नियम बन रहे हैं तो डिजिटल स्पेस के भी टुकड़ों में बंटने का खतरा बन गया है। टेक्नोलॉजी की नई व्यवस्था में एक तरफ अमेरिका है तो दूसरी तरफ चीन और रूस जैसे देश। कल्पना कीजिए कि किसी एक देश का डेटा दूसरे देश में नहीं जा रहा है। इससे इंटरनेट ग्लोबल नहीं रह जाएगा।

इन कंपनियों पर दंडात्मक प्रावधान चाहे जितने हों, इनका एकाधिकार फिलहाल खत्म होता नहीं लग रहा है। इनकी भावी योजनाओं को देखते हुए तो बिल्कुल नहीं। बिग टेक कंपनियां इलाज के नए तरीके विकसित करने के लिए नए हेल्थकेयर प्रोजेक्ट में अरबों डॉलर लगा रही हैं। जब स्पेसएक्स, फेसबुक और गूगल पूरी धरती पर वाइ-फाइ सर्विस उपलब्ध कराएंगी तो टेलीकॉम कंपनियों को कौन ग्राहक डेटा के पैसे देगा। टेस्ला के आने के बाद सेल्फ ड्राइविंग कारों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा। पारंपरिक कार कंपनियां रणनीति बदलने पर मजबूर हुईं और अब वे टेक्नोलॉजी कंपनी बनने की कोशिश कर रही हैं। टेक्नोलॉजी कंपनियों और उनके प्रतिद्वंद्वियों के बीच प्रतिस्पर्धा आगे और तेज होगी। अभी तक की प्रतिस्पर्धा में टेक्नोलॉजी कंपनियां ही आगे दिख रही हैं क्योंकि उनके पास बाजार के ट्रेंड का आकलन करने के लिए डेटा है। वे ज्यादा लचीली और इनोवेटिव हैं, उनके पास ऐसे कर्मचारी हैं जो नई सदी की जरूरतों के मुताबिक खुद को ढाल सकते हैं।

भारतः विवादों से हुई नियमन की शुरुआत

बात पिछले साल की है। भारतीय जनता पार्टी ने एक स्क्रीनशॉट जारी करते हुए कहा कि यह एक मीडिया टूल किट है। पार्टी का दावा था कि कांग्रेस ने इसका इस्तेमाल कोविड-19 संकट के दौरान मोदी सरकार के खिलाफ ऑनलाइन शिकायतों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने में किया। बाद में पता चला कि टूलकिट फर्जी था। ट्विटर ने भाजपा के उस ट्वीट को मैनिपुलेटेड मीडिया बता दिया। सरकार ने ट्विटर से मैनिपुलेटेड मीडिया का टैग हटाने को कहा पर ट्विटर ने नहीं किया। तीन दिन बाद ही 24 मई 2021 को दिल्ली पुलिस ट्विटर के ऑफिस पहुंच गई। कहा गया कि पुलिस टीम ट्विटर को नोटिस देने के लिए आई है, लेकिन ट्विटर ने इसे धमकाने वाली कार्रवाई बताया। भारत में ऑनलाइन कंटेंट पर बहस लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन ट्विटर के खिलाफ कार्रवाई के बाद यह बहस तेज हो गई।

कार्रवाईः ट्विटर के ऑफिस में दिल्ली पुलिस

कार्रवाईः ट्विटर के ऑफिस में दिल्ली पुलिस

उससे पहले फरवरी 2021 में ही सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए नए आइटी नियम लागू किए थे। इसके मुताबिक सरकार के कहने या शिकायत के 24 से 36 घंटे के भीतर उन्हें किसी भी कंटेंट को हटाना पड़ेगा और 72 घंटे में जांच अधिकारियों की मदद करनी पड़ेगी। अपनी वेबसाइट पर निजता नीति, नियम एवं शर्तें आदि बतानी पड़ेंगी। कंटेंट का मूल स्रोत बताना पड़ेगा और चीफ कंप्लायंस ऑफिसर भी नियुक्त करना पड़ेगा। सरकार ने 25 फरवरी 2021 को नए आईटी नियम जारी किए थे और कंपनियों को पालन करने के लिए तीन महीने का वक्त दिया था इस तरह नियम 25 मई को प्रभावी हुए। फरवरी 2021 में ही सरकार के कहने पर ट्विटर ने 500 से अधिक अकाउंट ब्लॉक कर दिए थे। लेकिन जब पता चला कि वे अकाउंट पत्रकारों, नेताओं और एक्टिविस्ट के हैं, तो उनमें से ज्यादातर को दोबारा चालू कर दिया ।

विवाद तब और बढ़ गया जब ट्विटर ने जून 2021 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत समेत कई पदाधिकारियों के ‘वेरिफाइड ब्लूटिक’ हटा दिए। हालांकि बाद में उनके एकाउंट को दोबारा ब्लूटिक मिल गया। उसी महीने तत्कालीन आइटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ट्विटर ने उनका एकाउंट ब्लॉक कर दिया है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा था, “ये कंपनियां अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इंग्लैंड में तो सभी नियमों का पालन करती हैं, लेकिन जब बात भारत की हो तो वे दोहरा मानदंड अपनाती हैं। अमेरिकी कांग्रेस के बुलाने पर इन कंपनियों के शीर्ष अधिकारी पहुंचते हैं लेकिन जब भारत में उन्हें बुलाया जाता है तो नहीं आते।” फेसबुक पर नफरती भाषण को लेकर भी विवाद छिड़ा। वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के कुछ नेताओं के पोस्ट को फेसबुक में आंतरिक तौर पर तो नफरती माना गया, लेकिन उसे प्लेटफॉर्म से हटाया नहीं। कांग्रेस ने आरोप लगाए कि फेसबुक-व्हाट्सऐप पर भाजपा और संघ का नियंत्रण है। विवाद बढ़ा तो फेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर अनखी दास को जाना पड़ा। हालांकि फेसबुक ने उनके इस्तीफे की वजह कुछ और बताई थी।

रविशंकर प्रसाद

पूर्व आइटी मंत्री रविशंकर प्रसाद

भारत अब डेटा सुरक्षा कानून लाने जा रहा है। दिसंबर 2019 में संसद में व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा विधेयक पेश किया गया था, जिसे संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया। समिति ने कई संशोधनों की सिफारिश के साथ दिसंबर 2021 में रिपोर्ट दी। इसमें ग्राहक डेटा भारत में ही स्टोर करने का प्रावधान है।

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