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LIC की बिकेगी हिस्सेदारी: एजेंट परेशान छोटे निवेशक डरे, दबदबा खत्म करने की नीति

यग्नेश कंसारा और ज्योतिका सूद - FEB 11 , 2021
LIC की बिकेगी हिस्सेदारी: एजेंट परेशान छोटे निवेशक डरे, दबदबा खत्म करने की नीति
कोलकाता की इस भव्य इमारत में एलआइसी का ऑफिस और गेस्ट हाउस है

“एलआइसी का आइपीओ देश का अब तक का सबसे बड़ा आइपीओ होगा, लेकिन जीवन बीमा बाजार में एलआइसी का प्रभुत्व कम होने का डर”

एक लाख करोड़ रुपये का आरंभिक पब्लिक ऑफर (आइपीओ)। यह संख्या इतनी बड़ी है कि कोई भी चकित हो सकता है। जीवन बीमा निगम (एलआइसी) का यह आइपीओ भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आइपीओ होगा। इसके शेयर खरीदने वालों की संख्या भी करोड़ों में हो सकती है। देश की इस सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी के आंशिक विनिवेश का करोड़ों पॉलिसीधारकों और 12 लाख एजेंटों पर भी असर होगा। एलआइसी ऐसा ब्रांड है जो भारत को जोड़ता है। यह ऐसा नाम है जो ज्यादातर भारतीयों में भरोसा जगाता है, चाहे वे शहर के रहने वाले हों या गांव के। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, अभिनेता अमिताभ बच्चन, आप और मैं, सबने एलआइसी की पॉलिसी ले रखी है। हर साल मार्च में वित्त वर्ष खत्म होने से पहले करदाता टैक्स बचाने के लिए पॉलिसी खरीदते हैं।

सीतारमण ने अपने तीसरे बजट में एलआइसी एक्ट में संशोधनों की घोषणा की। अगर संसद इसे पारित कर देती है तो शेयर बाजार में एलआइसी की लिस्टिंग का रास्ता साफ हो जाएगा। आप और मैं पॉलिसीधारक होने के साथ इसके शेयरधारक होने का भी गर्व महसूस कर सकते हैं। एलआइसी में अभी सरकार की ही 100 फीसदी हिस्सेदारी है। आइपीओ में 10 फीसदी शेयर बेचे जा सकते हैं। आइपीओ 2020-21 में ही लाने की योजना थी, लेकिन ऐसा हो न सका। अब 2021-22 की तीसरी या चौथी तिमाही में आइपीओ आ सकता है।

वित्त मंत्री ने पॉलिसीधारकों, एजेंटों, निवेशकों और विदेशी प्रतिस्पर्धी कंपनियों के हितों को संतुलित रखने की कोशिश की है, लेकिन एजेंट समेत कुछ लोग चिंतित हैं। सबसे अधिक चिंता छोटे निवेशकों में है। उन्हें लगता है कि वे आइपीओ में एलआइसी के शेयर खरीद ही नहीं पाएंगे। उनके इस डर की वजह भी है। एलआइसी की शेयर पूंजी 31 मार्च 2020 को 100 करोड़ रुपये थी। प्रति शेयर 10 रुपये फेस वैल्यू के हिसाब से 10 करोड़ शेयर बनते हैं।

अभी तक एलआइसी का आधिकारिक वैलुएशन नहीं हुआ है, लेकिन स्वतंत्र रूप से वैलुएशन निकालने वाली फर्म आरबीएसए एडवाइजर्स का अनुमान 9.9 से 11.5 लाख करोड़ रुपये का है। इस वैलुएशन पर एक शेयर की कीमत 99,000 रुपये से 1,15,000 रुपये होती है। ऐसे में आइपीओ में छोटे निवेशकों के लिए पांच शेयर खरीदना भी मुश्किल होगा। दस शेयर खरीदने की बात तो वे सोच भी नहीं सकते।

इस चिंता को दूर करने के लिए सरकार एलआइसी की शेयर पूंजी बढ़ा सकती है। इस तरह कुल शेयरों की संख्या बढ़ जाएगी। अगर शेयर पूंजी 100 करोड़ से बढ़कर 300 करोड़ रुपये होती है, तो इसमें 10 रुपये वाले 30 करोड़ शेयर बनेंगे। कंपनी की वैलुएशन तो वही रहेगी, लेकिन एक शेयर की कीमत घटकर 33,000 से 38,333 रुपये रह जाएगी। तब छोटे निवेशकर 10 शेयर भी खरीदने की स्थिति में होंगे। इक्विरस कैपिटल के वेंकटराघवन एस. कहते हैं, “छोटे निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार आइपीओ में शेयर की कीमत 1,000 रुपये से कम रख सकती है।”

एलआइसी एक्ट में जो बदलाव किए गए हैं, उसके मुताबिक इसकी शेयर पूंजी 25,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाई जा सकती है। इससे एक शेयर की कीमत 400 रुपये रह जाएगी। लेकिन इसके लिए सरकार को एलआइसी में 24,900 करोड़ रुपये डालने पड़ेंगे। अगर सरकार बीच का रास्ता चुनती है, यानी 10,000 से 12,500 करोड़ रुपये तक निवेश करती है, तब भी एक शेयर की कीमत 1,000 रुपये से कम ही रहेगी।

इस बात से निवेशक भले खुश हों, विशेषज्ञों की चिंता अलग है। एलआइसी के एक पूर्व चेयरमैन के अनुसार प्रति शेयर 400-1000 रुपये कीमत रखने का मतलब कंपनी की वैलुएशन कम आंकना है। एलआइसी का 2019-20 में नई पॉलिसी के प्रीमियम से 1.78 लाख करोड़ रुपये मिले थे। उस वर्ष तमाम जीवन बीमा कंपनियों ने जितनी नई पॉलिसी जारी की थी, उनमें 76 फीसदी हिस्सेदारी एलआइसी की थी।

निवेशक शेयर की कीमत कम रखना चाहते हैं तो पॉलिसीधारकों को ज्यादा बोनस पसंद है। एलआइसी हर साल पॉलिसीधारकों को अच्छा खासा बोनस देती है। 2020-21 के पहले छह महीने में इसने पॉलिसीधारकों को 51,000 करोड़ रुपये का बोनस दिया। अभी एलआइसी सालाना प्रॉफिट का 95 फीसदी पॉलिसीधारकों में वितरित करती है और बाकी सरकार को देती है। विशेषज्ञों की चिंता यही है कि सिर्फ 10 फीसदी शेयर रखने वाले निवेशकों को भी मुनाफे का बड़ा हिस्सा मिलेगा।

लाइफ इंश्योरेंस एजेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट देवीशंकर शुक्ल कहते हैं, “इससे एलआइसी की पॉलिसी में लोगों की रुचि घट सकती है। सरकार आगे अपनी और हिस्सेदारी बेचती है, तो पॉलिसीधारकों को मिलने वाला मुनाफे का हिस्सा और घट सकता है।” शेयर बाजार नियामक सेबी के नियम के मुताबिक 4,000 करोड़ से ज्यादा बाजार पूंजीकरण वाली कंपनी को आइपीओ में कम से कम 10 फीसदी और उसके बाद तीन वर्षों में और 15 फीसदी शेयर बेचने पड़ेंगे।

नई पॉलिसीधारकों को आकर्षित करने और पुराने को बनाए रखने के लिए सरकार उनके लिए दो ऑफर लेकर आई है। पहला ऑफर सरकार की गारंटी का है। एलआइसी की पॉलिसी में लोग जो पैसा लगाएंगे, उस पर सरकार की गारंटी होगी। विदेशी बीमा कंपनियां एक समान नियमों की बात कह कर सरकारी गारंटी खत्म करने की मांग कर रही थीं। लॉ फर्म खेतान एंड कंपनी के पार्टनर अरविंद वेणुगोपाल कहते हैं, “न तो बजट भाषण में, और न ही वित्त विधेयक में सरकारी गारंटी में बदलाव की बात कही गई है।” बजट के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीतारमण ने स्पष्ट किया कि यह गारंटी बनी रहेगी। इससे पॉलिसीधारकों और एलआइसी के एजेंटों की चिंता दूर हुई है। शुक्ल कहते हैं, “पॉलिसीधारकों ने सरकार की गारंटी वाली स्कीमें खरीदी हैं। इसलिए उनका भरोसा एलआइसी में है।”

सरकार का दूसरा ऑफर यह है कि आइपीओ में 10 फीसदी शेयर एलआइसी के मौजूदा पॉलिसीधारकों के लिए सुरक्षित होंगे। उन्हें शेयर की कीमत पर 10 फीसदी डिस्काउंट भी मिलेगा। वेंकटराघवन कहते हैं, “डिस्काउंट का मतलब यह हुआ कि दूसरे निवेशकों की तुलना में आइपीओ में हिस्सा लेने वाले पॉलिसीधारक 11 फीसदी फायदे में रहेंगे।” सेबी के नियमों के अनुसार अभी सिर्फ छोटे निवेशकों और कंपनी के कर्मचारियों के लिए आइपीओ में शेयर सुरक्षित रखे जा सकते हैं। लेकिन एलआइसी के मामले में छूट दी जा सकती है।

इन दोनों वजहों से एलआइसी के 12 लाख एजेंट भी प्रसन्न हैं, जो खुद को एलआइसी परिवार का हिस्सा समझते हैं। अनेक एजेंट मानते हैं कि उनके जीवन में खुशहाली एलआइसी की वजह से ही आई है। चेन्नई के 53 साल के एजेंट अशोक कुमार कहते हैं, “यह सिर्फ बीमा कंपनी नहीं, यह हमारे परिवार में बड़े भाई की तरह है। मैं अपने क्लाइंट का ख्याल रखता हूं और एलआइसी मेरा।” अशोक हर महीने करीब 20 लाख रुपये कमाते हैं। एक दशक पहले वे साइकिल चलाते थे, आज उनके पास एसयूवी है। अशोक 2011 में एजेंट बने। वे अपने परिवार में तीसरे एलआइसी एजेंट हैं। सबसे पहले उनकी मां ने 55 साल की उम्र में एजेंट की प्रवेश परीक्षा पास की थी। छह साल बाद वे रिटायर हो गईं। उसके बाद अशोक की पत्नी कृष्णा प्रेमा एजेंट बनीं।

दिल्ली स्थित एलआइसी एजेंट पी.के. सोनी ने बताया कि एलआइसी के कारण ही वे अपना घर बना सके, बेटी की शादी की और रिटायरमेंट के बाद का जीवन भी सुरक्षित किया। सोनी के अनुसार, “एजेंट होने का मतलब है कि आपकी नियमित आय होती रहती है। आपको आगे बढ़ने का मौका भी मिलता है।”

एलआइसी के प्रति सम्मान के बावजूद सोनी और कुमार आइपीओ को लेकर चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि लिस्टिंग के बाद कंपनी का फोकस मुनाफा बढ़ाने पर होगा। तब एजेंटों का कमीशन कम किया जा सकता है। एलआइसी ने 2019-20 में एजेंटों को 20,100 करोड रुपये का कमीशन दिया था। पिछले पांच वर्षों के दौरान कमीशन कम हुआ है और आगे भी यह घट सकता है। पंजाब निवासी एजेंट शमशेर सिंह कहते हैं, “हमें ग्रामीण इलाकों में सरकार विरोधी सेंटीमेंट का सामना करना पड़ रहा है। कृषि कानूनों की वजह से लोग पहले ही नाराज हैं। अब उन्हें लग रहा है कि सरकार एलआइसी को बेच देगी।” हालांकि एलआइसी एक्ट में जो संशोधन प्रस्तावित हैं, उनके मुताबिक सरकार की हिस्सेदारी कभी 51 फीसदी से कम नहीं होगी। फिलहाल कंपनी का निजीकरण भी नहीं किया जाएगा। लेकिन जिस तरह सरकार एक-एक करके बिजनेस से बाहर निकल रही है, उसे देखते हुए लोगों में अनिश्चितता स्वाभाविक है।

बजट के अनुसार सरकारी कंपनियों को रणनीतिक और गैर-रणनीतिक दो हिस्से में बांटा जाएगा। रणनीतिक कंपनियों में बीमा, बैंकिंग, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, रक्षा और खनन कंपनियां आएंगी। रणनीतिक क्षेत्रों में कम से कम सरकारी कंपनियां रहेंगी। बाकी का निजीकरण किया जाएगा, दूसरी सरकारी कंपनियों के साथ विलय होगा या फिर उन्हें बंद कर दिया जाएगा। गैर- रणनीतिक सभी कंपनियों को या तो बेच दिया जाएगा या बंद कर दिया जाएगा।

इसलिए सरकार के यह कहने के बावजूद, कि वह एलआइसी को नहीं बेचेगी, आखिरकार इस पर भी गाज गिर सकती है। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत करना इसी का संकेत है। इससे बड़ी वैश्विक बीमा कंपनियां भारत आ सकती हैं। एलआइसी को सरकार की गारंटी से उन्हें अभी परेशानी हो सकती है, लेकिन आगे चलकर वे इस स्थिति में होंगी कि इसे हटाने के लिए दबाव बना सकें।

विदेशी बीमा कंपनियां दो कारणों से खुश होंगी। पहला तो यह कि पॉलिसीधारकों को मिलने वाला बोनस कम होगा। इससे एलआइसी दूसरी निजी बीमा कंपनियों के बराबर हो जाएगी। दूसरा कारण एलआइसी के कॉर्पोरेट स्टेटस में बदलाव है। लिस्टिंग के बाद इसे कंपनी एक्ट और सेबी के नियमों का पालन करना पड़ेगा। इससे पारदर्शिता भी आएगी।

अब बात एलआइसी के करीब एक लाख कर्मचारियों की। उन्होंने विनिवेश का विरोध किया है। हालांकि जैसा एक अधिकारी ने बताया, 2025 तक इनकी संख्या 50 हजार के आसपास रह जाएगी। मौजूदा कर्मचारी रिटायर होंगे और नई भर्तियां पहले की तरह कम होंगी। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि सरकार अगर कर्मचारियों को अपने साथ लेना चाहती है तो उसे आइपीओ में उनके लिए भी शेयर का एक हिस्सा सुरक्षित रखना चाहिए, जैसा वह पॉलिसीधारकों के लिए कर रही है।

सरकार एलआइसी के आइपीओ के लिए सभी पक्षों को साथ लेना चाहती है। अगर यह सफल रहा तो दूसरे पड़े आइपीओ का भी रास्ता खुल सकता है। बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कहा है कि एक सरकारी साधारण बीमा कंपनी और दो सरकारी बैंकों का भी निजीकरण किया जाएगा। यह सब 2021 में ही होना है। अब देखना यह है कि इस साल निजीकरण कितनी रफ्तार पकड़ता है। मौजूदा वित्त वर्ष में उसने विनिवेश से 2.1 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अभी तक वह 20,000 करोड़ भी नहीं जुटा पाई है।

(साथ में जी.सी. शेखर, विशव, निर्मला कोनजेंगबम और हिमाली पटेल)

नई रणनीति

एलआइसी का आइपीओ अगले वित्त वर्ष में आएगा, इसके लिए एक्ट में संशोधन

दो बैंकों और एक साधारण बीमा कंपनी का भी निजीकरण किया जाएगा

बीमा में सरकार की मौजूदगी कम होगी, पर एलआइसी में कम से कम 51% हिस्सेदारी

निजी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए बीमा में एफडीआइ 49% से बढ़ाकर 74%

तय सीमा से ज्यादा प्रीमियम वाले यूलिप पर टैक्स काटा जाएगा

पॉलिसीधारकों के लिए क्या

नफा

पॉलिसी खरीदने के लिए जो पैसे दिए, उस पर सरकार की गारंटी बनी रहेगी

आइपीओ में 10% शेयर सुरक्षित रहेंगे, कीमत में भी 10% डिस्काउंट मिलेगा

डिस्क्लोजर नियमों के कारण बैलेंस शीट और निवेश की स्थिति स्पष्ट होगी

एलआइसी का जोखिम कम होगा, और यह ज्यादा मुनाफे वाली कंपनी बनेगी

नुकसान

एलआइसी के मुनाफे का 95% उन्हें मिलेगा, अभी उन्हें 90% हिस्सा मिलता है

ज्यादा वैलुएशन दिखाने के लिए ज्यादा मुनाफा दिखाना पड़ेगा, बोनस घटेगा

एलआइसी और पॉलिसीधारकों के बीच परिवार जैसा बंधन टूट सकता है

कंपनी के खातों की ऐसी बातें सामने आ सकती हैं, जिससे उनके हित प्रभावित होंगे

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