Home अर्थ जगत सामान्य जीवन सरल बीमा पॉलिसी के बारे में जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, धोखाधड़ी के आरोप

जीवन सरल बीमा पॉलिसी के बारे में जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, धोखाधड़ी के आरोप

JUL 15 , 2019
जीवन सरल बीमा पॉलिसी के बारे में जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, धोखाधड़ी के आरोप
जीवन सरल बीमा पॉलिसी के बारे में जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, धोखाधड़ी के आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जीवन बीमा निगम की बीमा पॉलिसी जीवन सरल में लाखों ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी किए जाने के आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

पॉलिसीधारक भी प्रार्थी बने, केस अस्वीकार

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने एलआइसी की ओर से पेश हुए सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि कुछ पीड़ित बीमा पॉलिसी खरीदार भी पक्षकार हैं। पीड़ित पॉलिसी खरीदार अपनी शिकायतों के समाधान के लिए उपभोक्ता अदालतों में जा सकते हैं। मेहता ने कहा कि याचिका संख्या तीन और चार ऐसे व्यक्ति हैं जो सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं और पॉलिसी कवर में हैं। याचिका को हम इसी आधार पर चुनौती देते हैं। इस मामले में हित रखने वाले लोग जनहित याचिका कैसा दाखिल कर सकते हैं।

बेंच ने कहा- वैकल्पिक तरीका अपनाएं शिकायतकर्ता

इस दलील पर बेंच ने कहा कि हम ऐसी जनहित याचिका को नहीं सुनेंगे जिसमें याचिका संख्या तीन और चार का पक्षकार बनना संदेहास्पद है। वे अपनी शिकायतों के समाधान के लिए वैकल्पिक तरीका अपना सकते हैं।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता मनी लाइफ फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि इस पॉलिसी में अनेक ग्राहकों खासकर सेवानिवृत लोगों के साथ धोखाधड़ी की जा रही है। उन्होंने दलील दी कि स्कीम के प्रस्ताव पत्र में परिपक्वता राशि घटाने का कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि इसमें ज्यादा मृत्यु लाभ देने का प्रावधान है। परिपक्वता लाभ के बारे में पॉलिसी दस्तावेज में भी उल्लेख नहीं है। ग्राहकों को उनके अदा किए गए प्रीमियम से भी कम राशि मिल सकती है।

आठ फीसद ब्याज की मांग उठाई थी

याचिका के अनुसार पॉलिसीधारक व्यक्तिगत स्तर पर शिकायत करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए वे एक गैर सरकारी संगठन के रूप में याचिका के तौर पर यह मामला उठा रहे हैं। याचिका में आठ फीसदी ब्याज के साथ लाभ देने का आदेश देने की मांग की गई थी।

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