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राहत पैकेज से हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री निराश, बोली संकट के मुकाबले रियायतें कम

नीरज झा - MAR 27 , 2020
राहत पैकेज से हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री निराश, बोली संकट के मुकाबले रियायतें कम
राहत पैकेज से हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री निराश, बोली संकट के मुकाबले रियायतें कम
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नीरज झा

“अभी ऐसी स्थिति है कि हमें व्यापार से पहले देश को देखना होगा। इसलिए हमने सरकार के आदेश से पहले ही 19 मार्च को एडवाइजरी जारी करते हुए देश भर के सभी रेस्टोरेंट को बंद करने की अपील की। गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा गरीब तपकों को राहत पैकेज देते हुए 1,70,000 करोड़ के ऐलान और शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से उठाए गए कदम ने लोगों में एक उम्मीद की किरण जगा दी है। फिर भी इस बात की आशंका अभी भी बनी हुई है कि प्राइवेट इंडस्ट्री का क्या होगा, अगर ये बंदी लम्बे समय तक रहती है तो। क्योंकि वित्त मंत्री की तरफ से दिए गए इकनॉमी पैकेज में हम लोगों को कुछ मिला नहीं है।” यह कहना है नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआएआई) के प्रेसिडेंट अनुराग कटारियार का। निजी धंधों के बीच देश में हॉस्पिटैलिटी सेक्टर एक ऐसा क्षेत्र है जहां एनआएआई के मुताबिक करीब 73 लाख कर्मचारी काम करते हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस सेक्टर में 15 लाख लोग अपनी नौकरी गंवा सकते है। सरकार से निराशा व्यक्त करते हुए एनआरएआई प्रेसिडेंट कटारियार कहते हैं,“सही मायने में कहा जाए तो अभी तक सरकार की तरफ से कोई खास कदम इस सेक्टर के लिए नहीं उठाए गए हैं। हां, आरबीआई की तरफ से उठाए गए कदम राहत भरे हैं। देखिए, किसी को शौक नहीं होता है कि वह अपने कर्मचारी को निकाल दे या उनकी सैलरी में कटौती करे। इसके लिए पहली जरूरत हमारे पास कैश की है। पैसे नहीं होंगे तो हम कैसे कर्मचारियों को वेतन दे पाएंगे। क्योंकि इस सेक्टर का सालाना टर्न ओवर 4 लाख करोड़ से ज्यादा का है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना का नुकसान हो रहा है। यह स्थिति फिलहाल ठीक होती नहीं दिखाई दे रही है। उम्मीद है कि सरकार परिस्थितियों को संतुलित करने के लिए कारगर कदम उठाएगी। जो पैसे इस सेक्टर से सरकार को टैक्स या जीएसटी के तौर पर दिए जाते हैं, उसकी समय-सीमा बढ़ाई जाने से कुछ राहत मिली है। लेकिन अभी और उम्मीद है जिससे हम संभल पाएं।”

वहीं, बातचीत में श्रम मंत्रालय के एक अधिकारी बताते हैं कि इस संकट से निपटने के लिए इम्प्लाइज स्टेट इन्शुरेंस कॉरपोरेशन (ईएसआईसी) के तहत कर्मचारियों को राहत देने की योजना पर काम चल रहा है। इम्प्रेसरियो इंटरटेनमेंट एंड हॉस्पिटैलिटी प्रा. लिमिटेड के सीईओ और एमडी रियाज अमलानी कहते हैं, “यह वक्त फायदे और नुकसान का नहीं है। देश भर के 60 रेस्टोरेंट में हमारे करीब 3,500 कर्मचारी काम करते है। हमारे सामने चुनौती इस बात की है कि हम अपने कर्मचारियों को सैलरी कैसे दें, क्योंकि यह उद्योग पूरे नकदी पर टिका हुआ है। अगर दो-तीन हफ्ते तक ऐसी ही स्थिति रहती है तो फिर हम कर्मचारियों को भुगतान करने में असक्षम होंगे। यदि तीन हफ्ते के लिए लॉकडाउन रहता है तो इस इंडस्ट्री को लगभग 75 हजार करोड़ का नुकसान होगा।” आगे रियाज कहते हैं, “अगर ये स्थिति रहती है और सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती है तो हम बर्बाद हो जाएंगे। इसलिए सरकार को टैक्स के रूप में इस सेक्टर से दिए जाने वाले पैसे की मियाद को कम-से-कम एक साल के लिए बढ़ाया जाना चाहिए ताकि हम खुद को बैलेंस कर सकें।” ईएसआईसी स्कीम के तहत दिए जाने वाले राहत पर वो कहते हैं, “सरकार यदि ऐसी योजना बना रही है तो उन्हें अभी तक इसकी घोषणा कर देनी चाहिए। जितने भी हमारे कर्मचारी छुट्टी पर भेजे गए हैं वो पे-लिव पर हैं। लेकिन यदि कुछ ऐसा नहीं होता है तो हमे कुछ सोचना पड़ेगा।”

इसके साथ ही ओल्ड वर्ल्ड हॉस्पिटैलिटी के एमडी संदीप टंडन बताते हैं, “वाकई यह संकट की घड़ी है। हमारे सिर्फ इंडियन एसेंट रेस्टोरेंट एंड बार यूनिट में 500 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। हमारी और हमारे संगठन की सरकार के साथ बातचीत हो रही है। इससे इतर हमने अपने लगभग सभी कर्मचारियों को पे-लिव पर भेज दिया है। अमूमन कुछ कर्मचारी अभी काम पर हैं, जो होम डिलीवरी से जुड़े हुए हैं। उम्मीद है कि हम इस संकट से तुरंत बाहर निकलेंगे।”

मुंबई के एक रेस्टोरेंट में काम करने वाले कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं,“हमारे रेस्टोरेंट के कई कर्मचारियों को अब तक फरवरी महीने का वेतन नहीं मिला है। मार्च का पता नहीं, कब मिलेगा। बड़ी मुश्किल में जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर हूं। सरकार की तरफ से कई बाते कही गई हैं। अगर ऐसा कुछ हम लोगों को मिलता है तो कुछ हद तक राहत की बात होगी।”

सरकार की तरफ से अब तक के उठाए गए कदम और आगे की रणनीति पर एनआरएआई के प्रेसिडेंट अनुराग कटारियार कहते है, “देखिए, अभी तक सरकार की तरफ से कुछ भी ठोस आश्वासन नहीं दिया गया है। उम्मीद है कि गुरुवार को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस अंतिम न हो। सरकार से अनुरोध है कि समय-समय पर वो परिस्थिति के अनुकूल कदम उठाती रहे। मेरा मानना है कि किसी कंपनी के पास जितने पैसे हैं उसी में वह हर किसी की सैलरी में कुछ कटौती करते हुए अपने हर कर्मचारी को पैसा दें, किसी को नौकरी से न निकाले ताकि सभी के घर का चूल्हा जलता रहे। सरकार ने भी गरीब तपकों के लिए कई कदम उठाए हैं जो सराहनीय है। लेकिन, जितनी तैयारी सरकार को कोविड-19 के देश में फैलने से पहले करनी चाहिए थी उसे नहीं किया गया। सही मायने में देखें तो हम सरकार पर इस वक्त काफी निर्भर हैं। क्योंकि, इस सेक्टर की सबसे बड़ी दिक्कत है कि इसमें फिक्स एक्सपेंस काफी ज्यादा होता है, चाहे वो रेंट के रूप में हो या मैनपावर के रूप में। अगर यही स्थिति एक महीने के लिए रहती है और इस सेक्टर के लिए सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठाती है फिर परिस्थिति भयावह हो सकती है। क्योंकि यह इमरजेंसी से भी कठिन दौर है।” आगे वो कहते हैं, “सरकार यदि चाहती है कि इस संकट से उबारे जाए तो जितनी जल्दी हो सके हमारे द्वारा बिजली,पानी और अन्य सुविधाओं के बदले दिए जाने वाले रकम की तारीख को फिलहाल आगे बढ़ा दिया जाए, ताकि हमारे पास पैसा आए। इसके साथ ही जो जीएसटी इनपुट क्रेडिट है उसे भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा सरकार को ईएसआईसी के तहत तुरंत लाभ देने की योजना पर भी काम करना चाहिए।”

इन सारे पहलुओं पर दिल्ली स्थित वसंत कुंज, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के प्रो. और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रो. डॉ. अरूण कुमार कहते हैं,“अभी इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन, सरकार को युद्ध स्तर पर काम करना होगा। जरूरतमंद लोगों तक जरूरी सामान मुफ्त में मुहैय्या कराना होगा तभी इस संकट से निकला जा सकता है। सरकार ने घोषणाएं तो कर दी हैं लेकिन उसे कैसे लोगों तक सुचारु रूप से पहुंचाया जाए, इस पर उन्हें काम करना होगा और जहां तक नौकरी के जाने का सवाल है तो वो संकट तो है ही। नोटबंदी को देखें तो उसमें कई लाख नौकरियां गई थी। यह अनिश्चितकालीन परिस्थिति है।”

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