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असरदार है पर जानदार नहीं है पैडमेन

आखिरकार, पैडमेन रीलिज  हो ही गई। पिछले कई महीनों से पैडमेन-पैडमेन के नाम की रट से सोशल मीडिया भरा हुआ...

सुपरमैन से बड़ा है PADMAN

आखिरकार,पैडमेन रीलिज हो ही गई। अक्षय की सोशल फिल्मों की कड़ी में यह तीसरी फिल्म है। माहवारी के दौरान...

फिल्म समीक्षा : तुम्हारी नहीं सबकी सुलू

एक इमरजेंसी लाइट, एक हॉटकेस, एक कुकर और भी न जाने क्या-क्या सुलू ने अलग-अलग कॉम्पीटिशन में पुरस्कार के...

फिल्म समीक्षा: उलझनों का इत्तेफाक

आजकल की हिंदी फिल्मों में बिना भाषणबाजी फिल्म खत्म हो जाए तो खुद को भाग्यशाली ही समझना चाहिए। इस फिल्म...

काश सुपरस्टार की फिल्म सुपरहिट होती

क्या यह महज संयोग है कि गुजरात चुनाव के वक्त बड़े परदे पर गुजरात के एक शहर वड़ोदरा की एक मुस्लिम परिवार...

समीक्षा शेफ : सैफ ने परोसी साधारण डिश

चांदनी चौक का छोरा रोशन कालरा छोरे-भटूरे की छोटी सी दुकान चलाने वाले से बहुत प्रभावित है। वह उन्हीं की...

समीक्षा : जुड़वां-2 देख लो नौ से बारह

एक होती है फिल्म और एक होती है फिल्लम। फिल्म होती है आलोचकों के लिए और फिल्लम होती है दर्शकों के लिए जो...

समीक्षा भूमि : संजू बाबा को कमबैक चाहिए तो दोबारा बनना पड़ेगा ‘मुन्ना’

 एक पिता जिसकी बेटी के साथ गैंग रेप हुआ है। बाप-बेटी चैन से जीना चाहते हैं, लेकिन समाज जीने नहीं देता।...

समीक्षा लखनऊ सेंट्रल : न गायक न कैदी

छोटे शहर के लाइब्रेरियन का बेटा और बड़े ख्वाब। किशन गेहरोत्रा (फरहान अख्तर) ऐसे ही सपने देखने वाला बेटा...

समीक्षा सिमरन : अंग्रेजी-गुजराती खिचड़ी

जटिल दिमाग के लोगों की भूमिका निभाने में कंगना को महारत हासिल है। शायद यह उनका अपना व्यक्तित्व है।...

फिल्म समीक्षा : दाउद वर्सेज डैडी

मुंबइया फिल्म उद्योग का पसंदीदा विषय है, गैंगवार, गैंगस्टर, भाई लोग। घूम फिर कर निर्माता-निर्देशक हर कुछ साल में इस विषय पर आ ही जाते हैं।

फिल्म समीक्षा: लड़कों का पोस्टर चल जाएगा

जब बॉक्स ऑफिस पर दो फिल्में टकराती हैं तो सबसे बड़ा सवाल होता है, कमाई कौन करेगा। कमाई का तो पता नहीं पर दर्शक डैडी के बजाय पोस्टर बॉएज देखना ज्यादा पसंद...

शुभ मंगल में असावधानी

आनंद एल राय निर्माता के रूप में शायद ‘तनु वेड्स मनु’ से आगे कुछ चाह रहे थे। इस बार उन्होंने निर्देशन की बागडोर आर एस प्रसन्ना के हाथों में दे दी। फिल्म के...

जरा सा निशाना चूक गई बाबूमोशाय की बंदूक

बाबूमोशाय बंदूकबाज फिल्म के शीर्षक से यह तो पता चल रहा है कि यह बंदूक की कहानी है। बंदूक होगी तो गोलियां भी होंगी, गोलियां होंगी तो गालियां खुद ब खुद चली...

आखिर क्यों खाएं, ‘बरेली की बर्फी’

हंसाना दुनिया का सबसे कठिन काम है। लव स्टोरी में तो सच में बहुत कठिन। लेकिन तिवारी दंपती ने मिल कर बहुत सारे चेहरों पर मुस्कान ला दी है। मीठी-मीठी बर्फी...

1947 पार्टिशन में आखिर माऊंटबेटन हीरो बन ही गए

भारत की आजादी का विभाजन त्रासदी का महाकाव्य है। इस पर अनगिनत फिल्में बनाई जा सकती हैं। इस फिल्म के इतने आयाम हैं कि विश्व का हर फिल्मकार भी उस त्रासदी पर...


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