Home कला-संस्कृति शहरनामा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में बसी ‘रंगीली-गेवाड़ घाटी’ यानी अपना प्यारा चौखुटिया

शहरनामा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में बसी ‘रंगीली-गेवाड़ घाटी’ यानी अपना प्यारा चौखुटिया

दीप्ति जोशी गुप्ता - JUL 18 , 2021
शहरनामा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में बसी ‘रंगीली-गेवाड़ घाटी’ यानी अपना प्यारा चौखुटिया
यादों में शहर

“देव-भूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में बसी ‘रंगीली-गेवाड़ घाटी’ यानी अपना प्यारा चौखुटिया”

रंगीली-गेवाड़ घाटी

पर्वतराज हिमालय स्वयं जिसके मस्तक का ताज है, जिसकी धरा पर पग धरते ही स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती है, ऋषि-मुनियों द्वारा सैकड़ों वर्षों की तपस्या के फलस्वरूप जो तपोभूमि में परिणत हो दिव्यता से परिपूर्ण हुई,जहां आज भी साक्षात शिव और शक्ति का वास है, शांत, सुरम्य ऊंची-नीची पहाड़ी ढलानों से आच्छादित चीड़, देवदार, और बांज के जंगलों से भरपूर जहां मां रामगंगा विराजती हैं, जिसकी हवा में शंख, घंटे, करताल की प्रतिध्वनि संपूर्ण वातावरण को सम्मोहित कर देती है, वह है देव-भूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में बसी ‘रंगीली-गेवाड़ घाटी’ यानी अपना प्यारा चौखुटिया।

जुझारू, जिंदादिल हिम-पुत्रियां

पहाड़ों से भी ज्यादा जटिल जिनके जीवन की हर राह है, जिनके घर के पुरुष सेना में भर्ती होकर कभी सीमा पर, तो कभी सियाचिन की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में, जीवन के संपूर्ण सुखों से वंचित रहकर भारत माता की सेवा में अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं, वहीं  पिया मिलन की बाट जोहतीं, सौभाग्य-सूचक लाल सिंदूर से अपनी मांग सजा, काले चरियो (मंगलसूत्र) की माला का संबल थामे वे संभाल लेती हैं सब कुछ। कहीं कुछ बिखर न जाए, ऐसी जांबाज और जिंदादिल होती हैं ये हिम-पुत्रियां! उनकी  सहनशीलता, ओजस्वी छवि के विषय में कुछ कहना  ‘सूर्य को दीपक दिखाने जैसा’ है। जो इकलौते बैल के साथ कंधे पर जुआ रख हंसते-हंसते सारा खेत जोत लेती हैं, भूखे पेट पर कपड़ा बांध रोपाई के गीतों को गुनगुनाती, प्रवासी जीवन साथियों के वियोग में बहने वाले आंसुओं से धान, मंडुए, कोदा-झंगोरा की बालियों को सींच देती हैं। न वो कान्हा की गोपी हैं और न अयोध्या की कोमलांगी। वे अपने ढंग की अनूठी हिम-पुत्रियां हैं।

फ्योली-पीरुल के बीच जिंदगी

वज्र से भी ज्यादा कठोर और चीते जैसी फुर्तीली इन पहाड़िनों की जीवन शैली में विधाता भी शायद ‘आराम’ शब्द लिखना भूल गया। पत्थर, बरफ और पीरुल (चीड़ के वृक्ष से गिरने वाले पत्ते) के शूल भी जिनके पैरों को छेदते-भेदते हार गए, लेकिन नहीं छोड़तीं ये ब्रह्म-मुहूर्त में प्रारंभ होने वाला अपना जीवन-चक्र! पौ फटने से पहले, मन में पलते संघर्ष को साथ लिए निकल पड़ती हैं, जान हथेली पर लिए घने जंगल की ओर। वे निर्भीक होती हैं इसलिए जंगली जानवरों और उससे भी बड़े इनसान रूपी घात लगाकर बैठे हैवानों की जालिम नजरों से नहीं डरती हैं क्योंकि वे जानती हैं आत्मरक्षा के सारे दांवपेच। रणचंडी बनना उन्हें बखूबी आता है, बिजली की द्रुतगति से लपक कर चढ़ पड़ती हैं बांज के अंतिम छोर तक, गिरने की परवाह किए बगैर। पहाड़ पर चढ़कर घास का ‘पुआल’ काटते समय बज उठती है उनके हाथों की कांच की चूडि़यां। जंगल से लौटते हुए सुस्ताने के लिए कुछ देर जब गाड़-गधेरों के ठहरे हुए पानी में देखती हैं अपना मलिन प्रतिबिंब तो मुस्करा उठती हैं, अपने ही ‘बुरांश’ से लाल गालों की छवि देख हो जाती हैं स्वयं पर ही मोहित। इस तरह वे भूल जाती हैं सारी थकान, पीठ और सर पर रखा हुआ लकडि़यों का बोझा। वे चहक उठती हैं ‘फ्योली’ के पीले फूल-सी उन्मुक्त, मदमस्त। कुछ ऐसे ही विरले अनोखे और अद्भुत गुणों से सराबोर है मेरी ‘रंगीली-गेवाड़-घाटी’ की अत्यंत परिश्रमी बहादुर पहाडि़नें।

नवरसों से सराबोर असोज

रंगीली-गेवाड़ की कर्मठ हिमपुत्रियों का मिजाज और अंदाज बेहद रौनक से भरा होता है। पारंपरिक परिधानों और आभूषणों से लदी ये बालाएं ‘असोज’ (सितंबर-अक्टूबर माह के बीच का समय) के महीने में अपने खेतों से फसल बटोरती हुईं रंग-बिरंगी तितलियों-सी दृष्टिगोचर होती हैं। पारंपरिक ‘रंगवाली पिछौड़ा’ और बड़ी सी रत्नजड़ित कुमाऊंनी नथ तो जग प्रसिद्ध है ही, साथ ही पहुंची, गलोबंद, मुनाड़, झुमके, चंद्रहार, चंपाकली, तिलहरी, धागुल, ठ्वाक, गोखले, मुंदड़ी, झांवर, बिछुआ जैसे पारंपरिक आभूषण उनके सिंगार में चार चांद लगा देते हैं। यहां की विशेष पारंपरिक पोशाक और बोली पूरे भारत में विशिष्ट पहचान रखती है।

राजुला-मालूशाही की प्रेम कथा

चौखुटिया का स्थानीय अष्टमी मेला ‘आठू मेला’ भी कहा जाता है। इसमें पहले मां अगनेरी देवी को प्रसन्न करने के लिए भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन पिछले 8-9 वर्षों से बलि प्रथा बंद कर दी गई है जो मुख्य आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। नंदादेवी मेला, सोमनाथ का मेला प्रसिद्ध है। यहां के अखरोट, नाशपाती के आलावा बैराट के लाल चावल की खीर, हलवा, लापसी, चावल के आटे की रोटी और पूड़ी, मंडुआ की रोटी तथा भट्ट की चुड़कानी स्थानीय व्यंजन हैं। डुबके एक विशिष्ट व्यंजन है जो पीलिया जैसी घातक बीमारी में रामबाण का काम करता है। दर्शनीय स्थलों में लखनपुर कत्यूर की राजधानी, गेवाड़ की कुलदेवी मां अगनेरी का मंदिर, मासी भूमिया मंदिर, नंदादेवी तड़ागताल जाबर मंदिर वगैरह। बैराठ ‘राजुला मालूशाही’ के प्रेम की लोककथा प्रसिद्ध है और इसीलिए चौखुटिया का नाम ‘रंगीली गेवाड़’ हुआ। 

जीवंत कुमाऊंनी संस्कृति

कुमाऊंनी लोकगीत और संगीत को स्थापित करने वाले, लोकगायक स्वर्गीय गोपाल बाबू गोस्वामी, चौखुटिया की माटी में ही पले बढ़े। उन्होंने प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोक गाथाओं जैसे ‘राजुला मालूशाही’ तथा ‘हरूहीत’ की  कथा को अपनी आवाज देकर सदा-सदा के लिए अमर कर दिया। उनके लोक गीतों में कुमाऊंनी संस्कृति जीवंत हो उठती है।

dipti joshi gupta

(लेखिका कवयित्री हैैं, उनका कविता संग्रह 'नवगीत' चर्चित रहा है। )

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