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शहरनामा/लखनऊ: दुरुस्त शीन काफ और तहजीब वाला शहर

वाणी त्रिपाठी - JAN 09 , 2022
शहरनामा/लखनऊ: दुरुस्त शीन काफ और तहजीब वाला शहर
यादों में शहर
वाणी त्रिपाठी

“दुरुस्त शीन काफ और तहजीब वाला शहर”

शीन काफ से दुरुस्त

आज भी मैं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को शीन काफ से दुरुस्त कहती हूं, इसलिए कि जो मिठास यहां की भाषा में, खासकर यहां के रिक्शेवालों में तब थी, अब भी है। तब से मेरा मतलब है, मेरे बचपन के दिन। हमारी गर्मियों की छुट्टियों के अधिकतर दिन लखनऊ में बीतते थे। पिताजी के बड़े भाई मशहूर डॉक्टर थे और पुराना किला में उनकी कोठी की सारी स्मृतियां अब भी ताजा हैं। सबसे पहली स्मृति वह है, जिसकी वजह से मैं लखनऊ को शीन काफ से दुरुस्त शहर बोलती हूं। एक रिक्शावाला ताऊजी के घर आकर जिस तरह से अपने रिक्शे पर बिठाता था, वह सुनने लायक है, ‘हुज़ूर, आज आपके मिजाज कैसे हैं? बताइए, आपके दौलतखाने से हम आज किस जगह की तरफ मुंह करेंगे?’ मैं हतप्रभ होकर पिताजी की ओर देखती, जो मुस्कराकर कहते थे, ‘हुज़ूर, आज हम हजरतगंज जाकर गंजिंग करेंगे।’ फिर हमें समझ में आया कि लखनऊ के हजरतगंज में घूमने-फिरने, खाने-पीने को ‘गंजिंग’ कहा जाता है। जिस तरह उर्दू मिजाज का कोई शायर शायरी करे, उसी तरह की बोली मैंने वहां के रिक्शेवालों से सुनी।

मलैय्यो की ठंडी भोर

लखनऊ में हर नुक्कड़ पर पान और मिठाइयों की दुकानें मिलेंगी। अगर आप चौक जाएं तो छोटी गलियों में मिठाई की इतनी दुकानें मिलेंगी, जितनी शायद देश में दूसरे हिस्सों में न हों। छोटी-छोटी खोली जैसी दिखने वाली दुकानों में सुबह-सुबह नाश्ते में खस्ता कचौड़ी, आलू की सब्जी, जलेबी और पान वहां की गंगा-जमुनी तहजीब का भाग रही हैं। मुझे पिताजी की छोटी उंगली पकड़ कर उनके साथ की गई स्वाद यात्रा की यादें आज भी ताजा हैं, चाहे टीका मंगल की कचौड़ी-सब्जी हो या शुक्ला की चाट या फिर रामाश्रय की तिरंगा बर्फी। सर्दी की छुट्टियों में हर सुबह अजीब-सी आवाज में किसी के ‘मलैय्यो’ चिल्लाने से नींद खुलती थी। थोड़ी देर बाद बड़ी-सी मिट्टी की बाल्टी लिए एक आदमी अवतरित होता था। ‘मलैय्यो’ लखनऊ और बनारस दोनों शहरों की खासियत है और यह सिर्फ सर्दियों में मिलती है। इसे लखनऊ में मिश्री मक्खन के नाम से भी जाना जाता है, जिसके नीचे केसरिया दूध होता है और ऊपर छना हुआ झाग। मलैय्यो का स्वाद मुंह में बसा है।

निराला जी के ठहाकों की शाम

मेरे पिताजी हिंदी साहित्य से जुड़े थे और वहां 'साहित्यिकी' नामक संस्था चलाते थे। उनके बड़े भाई की बड़ी कोठी का बरामदा बड़ी-बड़ी महफिल या कवि गोष्ठी के लिए खूबसूरत जगह मानी जाती थी। हर महीने के पहले शुक्रवार को मसनदें लग जाती थीं। घर के सब सहायक गर्मियों के दिनों में खस की टाट पर पानी का छिड़काव करते थे। एक बड़े हौद में कई किलो मलीहाबादी आम बर्फ में डुबो दिया जाता था। शाम होते-होते मसनदों पर हिंदी साहित्य की मूर्धन्य हस्तियां विराजमान होती थीं, जिनमें महादेवी वर्मा, वृन्दावन लाल वर्मा, रामचंद्र शुक्ल, अमृतलाल नागर शामिल हैं। जिस दिन वहां सूर्यकांत निराला जी प्रकट होते थे, देर शाम तक ठहाके सुनाई देते थे। 

नवाबों के शहर में गंजिंग

नवाबों के शहर लखनऊ का हजरतगंज उतना ही चमकदार था। कहीं चिकन की दुकान, कहीं गुड्डे-गुड़ियों का खेल लेकिन सबसे सुंदर स्मृति एक कठपुतली वाले की है, जो शायद लखनऊ के सबसे मशहूर मिष्ठान भंडार रामाश्रय के सामने बैठा करता था। जिस तरह से वह दो कठपुतलियों का खेल सुनाया करता, उसे सुनने के लिए मैं पिताजी से खूब जिद करती थी। पिछले दिनों गुलाबो-सिताबो फिल्म में आपने उसका एक छोटा अंश देखा होगा। वे बूढ़े मियांजी, उनकी तुर्कमानी टोपी और मौलाना जैसी लंबी दाढ़ी के साथ उनका कठपुतली का खेल भुलाए नहीं भूलेगा। मुड़कर देखती हूं तो लगता है श्रव्य और दृश्य काव्य आज भी देश में जीवित है क्योंकि लखनऊ जैसे शहर ने उस विरासत को संजोकर रखा है। नवाबों की नवाबियत भले ही खत्म हो गई हो और जो संरक्षण वे देते थे अब नहीं रहे, लेकिन अब भी यहां ऐसी कलाएं जीवित हैं क्योंकि आज भी उनके दर्शक और श्रोता संरक्षक के रूप में मौजूद हैं।

कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन

आज लखनऊ में साहित्य, खाना-पीना, घूमना या गंजिंग करना तो है लेकिन जो खुशनुमापन और आलसीपन था, उसमें जरूर परिवर्तन दिखता है। हजरतगंज के कोने में खूबसूरत चिकन की दुकानें भी हैं लेकिन बीच में निऑन लाइट्स वाले बिलबोर्ड्स आ गए हैं। वह लखनऊ, जहां रिक्शावाला एक जगह से दूसरी जगह ऐसे लेकर जाता था, जैसे किसी अपने को ससुराल से ननिहाल छोड़ने जा रहा हो, वहां अब ट्रैफिक के शोर में सिर्फ काला धुआं दिखता है। मेट्रो के कारण हजरतगंज में खुदाई देखकर मेरी आंखों में आसूं आ गए। मैं आधुनिकीकरण के खिलाफ नहीं, लेकिन जो इस शहर की गंगा-जमुनी तहजीब थी, उसमें परिवर्तन दिखता है। यह वह लखनऊ नहीं जहां ताऊजी की हवेली के सामने अमराई में हम बंदरों की तरह आम तोड़ते थे। मेरी यादों में मेरे बचपन का वह लखनऊ आज भी जीवित है, जिसे मैं ताउम्र सहेज कर रखूंगी।

बकौल अली सरदार जाफरी,

ज़मीन-ए-पाक हमारे जिगर का टुकड़ा है

हमें अज़ीज़ है देहली ओ लखनऊ की तरह

तुम्हारे लहजे में मेरी नवा का लहजा है

तुम्हारा दिल है हसीं मेरी आरज़ू की तरह

वाणी त्रिपाठी

(अभिनेत्री, संस्कृतिकर्मी और सेंसर बोर्ड की सदस्य)

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