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सीताचरित्र: पढ़ें जानकी-राम विवाह पर एक और प्रसंग

निराला बिदेसिया - DEC 08 , 2021
सीताचरित्र: पढ़ें जानकी-राम विवाह पर एक और प्रसंग
राम, लक्ष्मण, सीता
निराला बिदेसिया

आज विवाहपंचमी है। जानकी-राम के विवाह का दिन। सीताराम विवाह के एक अलग प्रसंग से गुजरा। 'सीताचरित्र' किताब के जरिये। किताब के लेखक हैं-दयाचंद्र गोयलीय। अवध इलाके के वाशिंदा, लखनउ के रहनिहार थे। 1914 में उनकी यह किताब आयी थी। सुना-जाना कि उस जमाने में खूब धूम मची थी इस किताब की। पर, कहानी अलग थी,सीधे हजम होनेवाली नहीं थी, इसलिए 'सीताचरित्र' किताब और उसमें दर्ज कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ न सकी। पर, यह तो एक बात है। किताब है बहुत दिलचस्प। राम और रामायण की घटनाओं पर दर्जनों किताबें हैं, सबमें राम कथा की अलग-अलग कहानियां हैं। अलग-अलग व्याख्या-नजरिया। उसी कड़ी में इस किताब को माना जाना चाहिए। अगर मानस और दृष्टि, दोनों को इसी फ्रेम में ढालकर इसे पढ़ेंगे तो संवाद की खूब संभावना बनती है, पर विवाद की कतई नहीं। लेखक गोयलीय की प्रस्तावना पढ़ते हुए अहसास होता है कि वह इसे रचने से पहले राम और रामायण की अनेक कथाओं का जमकर अध्ययन किये होंगे। अनेक दास्तानों से गुजरे होंगे।

कहानियां अनेक हैं, पर चूंकि आज विवाहपंचमी है, तो इसमें दर्ज सीता विवाह की कथा पर ही बात करेंगे। कहानी की शुरुआत सीता के जन्म से ही होती है। कथा के अनुसार सीता इकलौती संतान नहीं थी राजा जनक और सुनयना की। सुनयना जुड़वां संतान को जन्म दी थीं। एक बेटा, एक बेटी। उस जमाने में राजाऔं और दैत्यों की लड़ाइयां चलती थीं। राजा जनक से भी एक दैत्य या राक्षस की पुरानी अदावत थी। वह हिसाब-किताब बराबर करने के फिराक में रहता था। उसे मौका मिला। सुनयना के जुड़वां बच्चों के जन्म लेने के बाद ही उसने बदला साधा। जन्म लेते ही सीता के भाई को यानी जनक-सुनयना के बेटे को हवा में ले उड़ा। दूर आकाश में। फिर हवा में उछाल दिया बच्चे को। जमीन पर फेंक दिया। ऐसा कर राक्षस यह सोचते हुए आगे बढ़ गया कि उसने जनक से हिसाब बराबर कर लिया। जनक के बेटे को मार डाला। पर, संयोगवश ऐसा हुआ नहीं। वह बच्चा जब आकाश से या हवा से जमीन पर गिर रहा था, उसी वक्त एक राजा उधर से गुजर रहा था। वह राजा था जनकपुर के ही पड़ोसी राज रथनृपर का राजा चंद्रगति। देशाटन पर निकले राजा के साथ रानी भी थी। रानी बच्चे को उठाकर घर ले गयी। बच्चे को अपना बेटा बनाया। नाम रखा- भामंडल।

इधर बेटे के गम में जनक और सुनयना का संताप चरम पर। सीता स्वभाव से चंचला। धीरे-धीरे अपनी विनम्रता और व्यवहार से माता-पिता के दुखों को कम कर दीं। सीता बड़ी होने लगी। सौंदर्य की चर्चा चहुंओर होने लगी। गुणों की भी। पिता जनक को विवाह की चिंता होने लगी। जनक का पहले से राजा दशरथ के यहां से आव-जान,आमद-रफ्त, आपसी सैन्य सहयोग का रिश्ता था। जनक-सुनयना ने विचार किया कि बेटी व्याहेंगे दशरश के कुमार राम से।

बात देवलोक तक फैली कि जनक अपनी बिटिया राम से व्याहेंगे, इसकी चर्चा देवलोक में होने लगी। खबरची नारद ने बात सुनी। उनकी जिज्ञासा जगी। सीता को देखने की इच्छा बलवती हुई। इस जिज्ञासा के साथ कि देखें तो सही कि वह है कैसी? गुण-रूप कैसा है कि इतनी चर्चा हो रही? चल दिये जनकपुर के वास्ते। साधु बनकर। सीता आईने में अपना चेहरा निहार रही थी, केश संवार रही थी, सी उसी वक्त नारद वहां पहुंचे। सीता के पीछे ही खड़े हो गये। आईने में केश-दाढ़ी बढ़ाये साधु को देखकर सीता घबरा गयीं। डर गयीं। वहां से भागीं। नारद भी पीछे-पीछे। द्वारपालों ने नारद को रोक दिया। नारद तुनक गये, नाराज हो गये,गुस्से में आ गये। तय कर लिये कि सीता से बदला लेंगे। पर, इतना खतरनाक बदला लेने को सोचे कि कहानी सुनकर मन सुन्न हो जाएगा, रूह हिल जाएगी।

नारद वहां से लौटे। लौटकर सीता की पेंटिंग बनाये। जीवंत तस्वीर। तस्वीर को लेकर रथनुपुर राज पहुंचे और वहां भामंडल के सामने रख दिये। वही भामंडल, जो सीता के जुड़वा भाई थे और राक्षस के अपहरण की वजह से जनक परिवार से बिछ़कर रथनुपुर के राजकुमार बन गये थे।


उस तसवीर को लेकर वह रथनृपुर राज में पहुंचे। भामंडल के पास। सामने सीता की बनाई हुई तसवीर रख दी। भामंडल मोहित हो गया। सुध बुध खो बैठा। नारद प्रसन्न। यही चाहते थे। भामंडल ने जिद ठानी कि अब ब्याह तो इसी पेंटिंग वाली लड़की से करेंगे। पिता राजा चंद्रगति ने समझाया कि राजपरिवार का खयाल करो। जनक वगैरह छोटे राजा हैं। उनके यहां काहे को व्याह करना। पर, भामंडल टस से मस होने को तैयार नहीं। जिद पर अड़ा रहा। हारकर पिता चंद्रगति ने जनक के यहां प्रस्ताव भेजा। जनक ने मन की बात बतायी कि वह बेटी तो राम से व्याहने को सोच लिये हैं। अब चंद्रगति का गुस्सा उबाल मारा। उसे अपमान लगा। उसने जनक को ललकारा कि मेरे पास से सागरवार्त धनुष ले जाइये जनक। अगर राम से सीता को व्याहना है तो कहिए राम को सिर्फ इसे चढ़ाकर भी दिखा तो दे! गर, राम ऐसा ना कर सकें तो याद रखिए जनक कि आपकी बिटिया को जबर्दस्ती उठाकर लावेंगे। चंद्रगति के सामने जनक छोटे राजा। वह धनुष लेकर लौट गये।

भामंडल अब भी जिद पर। उधर राम ने धनुष चढ़ा दिया। शादी हो गयी। तमतमाया भामंडल अयोध्या को निकला। आक्रमण करने। राम को मारकर सीता को पाने। पर, उसे राह में ही मालूम चल गया कि जिस सीता के लिए वह गुस्से में है, वह तो उसकी बहन है। भामंडल का मन सुन्न। ग्लानी से भर गया। अयोध्या सीता के पास पहुंचा। खूब रोया बहन के गले लगकर। खबर तो भामंडल के पिता चंद्रगति को भी मिल गयी। वह तो इस खबर को सुनते ही चारो खाने चित्त। अपराधबोध से भर गये। राजपाट छोड़ जंगल चले गये। दूसरी ओर भामंडल असली भाई का फर्ज निभाने लगा। आजीवन सीता के साथ भाई के तौर पर खड़ा रहा। यहां तक कि जब राम रावण से लड़ाई लड़ रहे थे, तो भी भामंडल एक प्रमुख योद्धा बना।


कहानी अटपटी है।रामचरित मानस से एकदम अलग। पर रामचरितमानस से इतर रामायण की अनेक कहानियां तो कही ही जाती रही हैं। खुद बिहार के पटना के ही राष्ट्रभाषा परिषद में एक और दिलचस्प किताब मिलती है। उस किताब का नाम है-रामजन्म। तुलसीदास से सैकड़ा साल पहले लिखी गयी थी वह किताबम पर गोयलीय की किताब सीताचरित्र की सबसे खास बात यह है कि वह बहुत सावधानी से रचते-बुनते हैं एक-एक वाक्य को अपनी किताब में। सीता-चरित्र लिखते समय वह राम केमान-मर्यादा या प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देते।


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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