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व्यावहारिक आर्थिकी जरूरी

आलोक पुराणिक - JAN 24 , 2020
व्यावहारिक आर्थिकी जरूरी
व्यावहारिक आर्थिकी जरूरी

अभिजीत बनर्जी, उनकी पत्नी एस्टर डुफलो को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल क्रेमर के साथ अर्थशास्‍त्र के लिए 2019 का प्रतिष्ठित नोबेल सम्मान मिला। इस सम्मान के बाद वे तो चर्चा में आए ही, साथ ही उनके काम और किताबों की भी चर्चा हुई। यही वजह है कि उनकी किताब गुड इकोनॉमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स की भी खासी चर्चा रही। यह किताब इसलिए खास नहीं है कि इसमें अभिजीत बनर्जी और एस्टर डुफलो अर्थशास्‍त्र, अर्थव्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियों को सामने रखते हैं, बल्कि इस किताब का महत्व इस बात में है कि इसमें दूसरे शोधकर्ताओं द्वारा सामने लाए गए कई ऐसे तथ्यों, जानकारियों को रखा गया है, जो आज के दौर में चल रहे तमाम मसलों को समझने में मदद करते हैं।

किताब के पहले अध्याय, ‘मेक इकोनॉमिक्स ग्रेट अगेन’ में जो दर्ज है, उसका आशय है कि आम तौर पर जनता अर्थशा‌िस्‍त्रयों पर ज्यादा यकीन नहीं करती। एक सर्वेक्षण के हवाले से बताया गया है कि ब्रिटेन में सबसे ज्यादा नर्सों को विश्वसनीय माना गया है। मौसम की भविष्यवाणी करने वालों को अर्थशास्त्रियों से कहीं ज्यादा विश्वसनीयता प्राप्त है। विश्वसनीयता के मामले में सिर्फ नेता ही अर्थशास्त्रियों से नीचे थे। एक तरह से यह सर्वेक्षण आंखें खोलने वाला है।

अर्थशास्‍त्री जितना भाव खुद को देते हैं, उतना महत्व उन्हें समाज देने को तैयार नहीं है। किताब बताती है कि जिन्हें अर्थशास्‍त्री माना जाता है, वो किसी एक्स या वाय बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट होते हैं। इन्हें अपनी फर्म के हितों की चिंता ज्यादा रहती है। आम तौर पर ये मानते हैं कि बाजार के पास लगभग हर समस्या का हल होता है। किताब में कुछ ऐसे तथ्य भी हैं, जिनसे अर्थशास्त्रियों और आर्थिक पत्रकारिता की बिलकुल भी इज्जत अफजाई नहीं होती। प्रख्यात पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने यह जानने की कोशिश की कि 2000 से 2014 तक की अवधि में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के औसत अनुमान वास्तविकता से कितने दूर थे। अनुमान लगाने के दो सालों बाद पता चला कि औसत अनुमान की गलती 2.8 प्रतिशत थी। 2.8 प्रतिशत की गलती अर्थशास्‍त्र में बड़ी गलती मानी जाती है। यह इसी तरह है जैसे, कोई अर्थव्यवस्था से जुड़ी परियोजनाएं यह मानते हुए तय करे कि विकास दर 6.8 प्रतिशत रहेगी, यानी करीब सात प्रतिशत के आसपास। बाद में पता चले कि विकास दर तो सिर्फ चार प्रतिशत रही। किताब ऐसे ही तथ्यों को समझाती है।

भारत में आजकल इसी किस्म की डिबेट चल रही है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम द्वारा कुछ समय पहले लिखे गए एक शोधपत्र में साफ किया गया था कि भारत की विकास दर उतनी नहीं रही है, जितनी आधिकारिक तौर पर बताई गई है। आम तौर पर औद्योगिक क्लस्टरों के विकास पर बल दिया जाता है। क्लस्टर से आशय उस खास इलाके से है, जहां एक ही व्यापार से जुड़ी तमाम गतिविधियां केंद्रित होती हैं। जैसे, तिरुपुर दक्षिण भारत में टीशर्ट निर्माण का क्लस्टर रहा है।

किताब के तीसरे अध्याय, ‘दि पेन्स फ्रॉम ट्रेड’ में बताया गया है कि अक्टूबर 2016 से अक्टूबर 2017 के बीच एक ही साल में तिरुपुर से निर्यात 41 प्रतिशत कम हो गया। ऐसी स्थिति का दुष्चक्र पूरे इलाके के समग्र विकास पर पड़ता है। केंद्रीकरण के फायदे हैं, पर इसके नुकसान भी कम नहीं हैं। इस अध्याय में आगे बताया गया है कि अर्थव्यवस्था में स्मॉल ब्यूटीफुल (छोटा ही सुंदर) नहीं होता। छोटे उद्योगों की अपनी बहुत समस्याएं हैं। महात्मा गांधी के विचार में तो गांव आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी, पर यह विचार फल-फूल नहीं पाया। इस किताब में अभिजीत बनर्जी की मां निर्मला बनर्जी के एक शोध का हवाला देकर बताया गया है कि बड़ी इकाइयों के मुकाबले छोटी इकाइयां अनुत्पादक होती हैं।

अध्याय चार, ‘लाइक्स, वांट्स ऐंड नीड्स’ में कुछ महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियां हैं। इस अध्याय में जो दर्ज है उसका आशय है कि कट्टरपंथियों, संकीर्ण दिमाग के लोगों को बाजार में सफल नहीं होना चाहिए, क्योंकि सहिष्णुता ही अच्छे कारोबारी का गुण है। उदाहरण के लिए यदि कोई बेकरी वाला यह तय कर ले कि वह समान लिंग वाली शादियों के लिए केक नहीं बनाएगा, तो तर्क के हिसाब से उसका कारोबार मंदा हो जाएगा। उसका काम दूसरे बेकरी वाले के पास चला जाएगा। दूसरे बेकरी वाले मुनाफा कमाएंगे। पर सच्चाई यह है कि बाजार ऐसे काम नहीं करता।

अगर किसी को लगता है कि समान लिंग वाली शादियों के लिए केक न बना कर वह दिवालिया हो जाएगा तो ऐसा नहीं होगा, क्योंकि उसे अपने जैसे विचार रखने वालों का साथ मिल जाएगा। इसी अध्याय में ‘क्रिकेट लैसन्स’ के जरिए जाति को लेकर एक बात समझाने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर इसमें बताया गया है कि जो लोग एक ही जाति के लोगों के साथ क्रिकेट खेलते थे, उनके मुकाबले मिश्रित टीमों के साथ खेलने वाले ज्यादा समायोजनकारी साबित हुए। यह अध्याय बताता है कि चुनाव प्रतिभा के आधार पर होना चाहिए, जाति के आधार पर नहीं। तभी बेहतर टीम का निर्माण होता है।

क्रिकेट सिर्फ मौज के लिए नहीं है। यह भारत जैसे देश में समावेशी समाज के निर्माण की प्रक्रिया में भी इस्तेमाल हो सकता है। किताब यही अंतर्दृष्टि देती है। भारत तमाम तरह के आर्थिक और राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है। इन तनावों के बीच यह किताब कई बातों को इस तरह रखती है कि स्थिति साफ समझ में आने लगती है। किताब की खूबी यही है कि यह थ्योरी के बजाय व्यावहारिकता और आसपास चलने वाले घटनाक्रम पर नजर रखती है। पुस्तक पढ़कर तो यही लगता है कि जमीन से जुड़ा अर्थशास्‍त्र तब ही आ सकता है, जब दृष्टि पत्रकारीय हो और माद्दा प्रोफेसर की तरह शोध कार्य का हो।

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गुड इकोनॉमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स

अभिजीत बनर्जी, एस्टर डुफलो

प्रकाशक | जगरनाट बुक्स

मूल्य ः 314 रुपये | पृष्‍ठ ः 403 

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