Home कला-संस्कृति कविता रविवारीय विशेषः पंकज मित्र की कहानी, बैल का स्वप्न

रविवारीय विशेषः पंकज मित्र की कहानी, बैल का स्वप्न

OCT 17 , 2020
रविवारीय विशेषः पंकज मित्र की कहानी, बैल का स्वप्न
चित्र साभारः द फेडरल

आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए पंकज मित्र की कहानी। पंकज मित्र अपनी पीढ़ी के समर्थ रचनाकार हैं और उनकी कहानियों में बहुत विविधता होती है। पात्रों के मनोभावों को पकड़ने में माहिर पंकज मित्र अपनी कहानियों में उपेक्षित और वंचित वर्ग को सामने लाने और समाज के बाकी हिस्से को इससे परिचित कराने का काम करते हैं। फिलवक्त रांची में रहते हैं। 

जेम्स खाखा को भी मालूम था कि लोग उसके पीठ-पीछे उसे बैल कहते थे, कुछ साहसी किस्म के लोग तो सामने भी कह डालने मे हिचकते नहीं थे। अब जैसे उसी दिन चौधरी ने कह दिया, ‘‘बैल जैसा तो खटते रहे डिपार्टमेंट के लिए जिंदगी भर, कोटा में होके भी तो बीस साल बाद बाद प्रमोशन मिला, तो क्या मिला?’’ और जेम्स खाखा हमेशा कर तरह उस समय वो खिसियायी हुई हँ....हँ....हँ... करके चुप और बाद में, ‘‘अजी जानते हैं न हम भी तो कहने सकते थे बहुत बात उसको, कि बेट्टा तुम्हारा बाप तो गेजटेड ऑफिसर था तुमको तो नहीं बनाने सका। हमारा बाप तो पूरब-पश्चिम (लंगोटी) पहन के अउर बहंगी में सब्जी ढोके भी हमको तो ऑफिसर बना दिया’’ लेकिन कह नहीं सके, हर बार ऐसा ही होता था। बस कहने नहीं सकते थे, जेम्स खाखा के रिटायरमेंट के कुछ ही महीने बचे थे जब उनके और उनके समकालीन ‘आग लगे बज्जर गिरे आफिस पर’ वाली गति को प्राप्त हो चुके थे, वह लगे हुए थे काम में। ‘क्यों’ पूछने पर बताते हैं, वही फादर अगस्टीन और वर्क इज वर्शिप वाली कहानी, जब फादर पहली बार सुदूर जंगल में बसे उसके गांव पधारे थे।

‘‘इतना ऊंचा आदमी... बेट्टा आदमी सच का है कि क्या है इतना बड़ा आदमी होने सकता अउर हम तो बेट्टा नाटा बच्चा। इधर से देखें उधर से देखें (जब आप कल्पना कीजिए कि तकरीबन साठ साल को छूती हुई उमर का चार फुट छह इंच का आदमी बड़ी-बड़ी सफेद मूंछें, नाटकीय भंगिमाएं दिखाता हुआ कभी उछलकर इधर कभी उधर जा रहा है) फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा, पूरा चमड़ा गोरा लाल-लाल एकदम। हाथ में छुएं, उधर छुएं, जानते हैं न खी...खी...खी...अरे बेट्टा एकदम असली आदमी है इ तो, हम तो जांघ तक भी नहीं पहुंचने सकते थे उसका। इतना बड़ा लाल हाथ बढ़ाकर समझे न बोला, ‘हैलो’’... हम तो उस समय पढ़ते थोड़ा ही थे तो समझने नहीं सके। हम सब बच्चा लोग हंसने लगे, ताली बजाने लगे, तो फादर भी हंसने अउर बजाने लगा ताली। फिर पैकेट से चॉकलेट दिया। कहां बेल्जियम का आदमी। हमारे गांव में ही रह गया। पादरी था तो रहने सका। हम रहने सकते? ’’

फिर तो ये कहानी इतनी तफसीलों में जाती, इतनी कि सुननेवालों में धीरे-धीरे खिसकते जाने का सिलसिला चल निकलता-कोई जरूरी काम, कोई बाथरूम जाने के, कोई किसी बहाने तो कोई किसी बहाने। अब जिसे सूझा नहीं कोई माकूल बहाना या फिर जेम्स खाखा से ही ओवरटाइम साइन करवाना तो सुनते पूरी कहानी...पांचवी.. सातवीं...दसवीं न जाने कितनी बार...

फिर तो फादर अपने फादर से भी ज्यादा मानने लगे जेम्स को और तब जेम्स कहां था उसका नाम। ये भी तो फादर अगस्टीन ने ही दिया था बपतिस्मा के बाद और सेंट जोन स्कूल में नाम लिखाने के बाद, उसके पहले तो कभी पूरब-पश्चिम (लंगोटी) पहनकर तो कभी नंगे ही ‘चुडरू’ (हां तब यही नाम था उसका, शायद नन्हें से चूहे की तरह होने के कारण) अपनी बहती हुई नाक, फूला पेट लेकर डहर-डहर डोलता रहता। सात भाइयों और तीन बहनों के बीच कहीं पर था चुडरू, तो उसका ख्याल भी कौन रखता। नाम की तरह की फुर्ती भी थी चुडरू की। सड़ाप से इस पेड़ पर तो फिर उस पेड़ पर, पलक झपकते ही अपने हमउम्रों के हाथ से टपका हुआ आम या चुआ हुआ महुआ लेकर उड़न-छू, बाएं हाथ से नाक पोंछकर टनाक से ढेला सीधे आम पर टप्प से नीचे, फादर अगस्टीन के काम दौड़-दौड़कर करता। लालच वही कभी बिस्कुट, कभी ब्रेड और सबसे ज्यादा चॉकलेट का...एकदम स्वाद लग गया था मुंह को जैसे। कभी-कभी शाहाना अंदाज से अपने भाइयों-बहनों को भी ब्रेड में से हिस्सा दे देता... खासकर सोमरी, अपनी छोटी बहन को....

एक दिन उठा लिया फादर की जूठी प्लेट को धोकर रखने के लिए, तभी फादर ने दिया था वह मंत्र, ‘नो! नो! नो! कीप इत, कीप इत देयर, आय शैल वॉश इत मायसेल्फ।’

समझ नहीं पाया चुडरू कुछ लेकिन कुछ फादर के इशारों, और उनकी व्यस्त मुद्राओं से आतंकित होकर प्लेट रख दी उसने ये सोचकर कि कुछ गड़बड़ी उससे हो गई है और आज तो अब चॉकलेट नहीं मिलने वाली...

‘वर्क इज वर्शिप माय सन’, नीले मखमल के कवरवाले सोफे पर बैठकर,  आंखों में असीम करूणा का भाव लेकर बोला गया यही वाक्य मंत्र बन गया उसके लिए बाद में और फादर की करूणामयी मुद्रा बस गई। उसी दिन चुडरू के दिल में, कानों में गूंजने लगा मधुर घंटियों का स्वर-जिंगल बेल्स, आंखों में बस गया था नीले मखमल की कवरवाला सोफा जिसे अक्सर वह सपने या जेम्स के शब्दों में कहें तो स्वप्न में देखने लगा।

ठीक यही वह वक्त था जब चुडरू के सपनों और हकीकत में घालमेल होना शुरू हो गया और जेम्स खाखा बन जाने के बहुत बाद तक बल्कि अब तक बदस्तूर जारी है। बहुत सारी घटनाएं लगता है उसके सामने घटी हैं और किसी न किसी रूप में उसने हिस्सा लिया है उन घटनाओं में। बहुत सारे बयान लगता है उसी के हैं। हालांकि निश्चित रूप से कुछ करना मुश्किल ही है। मसलन फादर अगस्टीन का वह चमत्कार जब उन्होंने शीशे के दो बड़े बर्तन में पानी भरकर एक में डुबाया एक पत्थर जैसा सख्त माटी का ढेला और दूसरे में प्रभु यीशु की क्रूसविद्ध मूर्ति। थोड़ी देर के बाद ही एक छोटी-सी लकड़ी चुडरू के हाथ में देकर कहा, तुम लोग इसी पत्थर-पहाड़ की वर्शिप करता। देखो, तुम खुद देखो तुम्हारा गॉड कितना वीक-लकड़ी लगते ही फिच्च से रह गया माटी का ढेला और प्रभु की मूर्ति उसी तरह अटूट-लकड़ी से हिलाया तो टन से बजा शीशे की दीवार से टकराकर, इसके बाद जो बिस्कुट मिला उसका लाजवाब स्वाद अभी तक याद है उसे। हालांकि, कुछ बदमाश लड़कों ने यह कहकर भड़काने-चिढ़ाने की कोशिश की थी कि साहब लोग कुत्तों को खिलाते थे वह बिस्कुट, फिर फादर अगस्टीन का बप्पा को कई बार मिलना और धीरे-धीरे बप्पा की आंखों में आती चमक और इसी चमक को फौलादी चमक में बदलते देखना जब गांव के पहान और गांव के बूढ़ा उसे कुछ समझाने की कोशिश करते और जोर-जोर से बप्पा का सिर हिलाना और एक ही बात कहना, ‘‘ना चुडरू पढ़तो।’

लेकिन अब चुडरू कहां था वह... अब तो जेम्स खाखा....खाखा का मतलब कुड़ुख में होता है ‘काला कौआ’- जब उसके बप्पा ने बताया तो उसे थोड़ा अजीब-सा लगा था शायद, शाहों वाले नाम जेम्स के साथ काला कौआ यानि खाखा का पुछल्ला... जैसे नीले मखमल के कवरवाले सोफे पर फटी मूंज की चटाई बिछा दी हो किसी ने... फिर दफ्तर में नाम बिगाड़नेवाले कितने ही तो रहते हैं, कोई खुन्नस... कोई नाराजगी.... अब सामने के क्वार्टर में रहनेवाले क्लर्क प्रसाद को जब से समय से ऑफिस आने की याद दिलाई जेम्स ने तब से अपने बच्चों को जोर-जोर से डांटता था- ‘खा-खाके परेशान किए हुए हैं खा-खाके, जब देखो खाता रहता है। जंगली कहीं का सब, सब जंगल से पकड़ के हमरे ही माथे पर बैठाना था।’

जेम्स की आवाज में दर्द उभर आता, ‘जानते हैं न सब समझते हैं। लोग ऐसा कहता है वैसा कहता है। अब काम नहीं करेगा तो बोलना तो पड़ेगा और तो किसी का कुछ बुराई तो नहीं किए थे होंगे कभी, हम भी कहने सकते थे बहुत कुछ लेकिन कहने नहीं सके। छोड़िए बुरा मानता है तो माने।’

अब बुरा माननेवाली बात तो थी ही। भारत सरकार के उस दफ्तर में जहां अधिकांश लोगों का मानना था कि काम करना मतलब ‘गुनाह बेलज्जत’ वहां पर एक साढ़े चार फुट का मूंछोंवाला आदिवासी, जिसकी रिटायरमेंट में बस चंद महीने ही बचे हैं, सुबह उठकर अपने हाथों से कुकर की कटोरियों में दाल-चावल-सब्जी बनाकर, घर-परिवार से साप्ताहिक नाता रखकर दस बजे रोज दफ्तर पहुंच जाए और काम करता जाए तो दफ्तर में कुछ इस तरह की बातचीत तो होनी ही थी, अरे मारिए, साला यही लोग तो सरकार का दामाद है काम करके होगा क्या? परमोशन तो पहले इन्हीं लोगों का होगा न। शर्माजी ने गुटखे का पाउच फाड़कर मुंह में डालते हुए कहा।

एकदोम ठीक, एस.सी. माने जानता है तो, एइ शोरमा, सुनो एस.सी. है सोना का चांद, एस.टी. माने सोना का टुकड़ो-इ लोग सब सोना है हम लोग साला लोहा भी नहीं।

चटर्जी बाबू ने सिगरेट सुलगाकर सुलगते हुए दिल को राहत पहुंचाने की कोशिश की।

यही जंगलिया को देख लिजिए न, साला पहले आदमी था अब अण्डरसाइण्ड बना गया। औडर निकालने लगा। अण्डरसाइण्ड विल प्रोसीड ऑन टूर-बैल सार के...इसी को कहते हैं माय करे कुटान-पिसान, बेटा के फुटानिए बिहान-सिंहजी ने खैनी ठोंककर दबाया।

इस सबके बीच, सुनी-अनसुनी आवाजों के बीच, जेम्स खाखा अपने काम में मसरूफ हो जाता। यही मसरूफियत कई परेशानियों से निजात देने का अपना सेफ्टी मैकेनिज्म भी था। अभी पिछले ही हफ्ते घर से छोटा भाई आकर अपने सबसे छोटे बेटे को हवाले कर गया।

भइया अब हम तो इसको पढ़ाने नहीं सकेंगे, आप तो करने सकते हैं कीजिए नहीं तो इ तो कॉलेज का मुंह नहीं देखने सकेगा। पत्नी जेम्स की तरफ देख रही थी-अपने ही तो चार पहले से कॉलेज जा रहे हैं अब पांचवां और सिर्फ पांचवां ही क्यों। जब से नौकरी कर रहा है जेम्स-भतीजों, भाइयों, बहनों, भांजों की परमानेंट सराय रहा है उसका घर। किराए के खपरैल घर से शुरू होकर यात्रा अपने अधबने घर तक तो पहुंची लेकिन इस कठिन यात्रा में सफर का सारा सरो-सामां चुक गया।

घर की सारी खाद्य-अखाद्य चीजें खत्म हो गई थीं उस वक्त जब बप्पा कई दिनों के लिए फिर गायब हो गया था, बीच-बीच में बप्पा ऐसा करता था। दरअसल उसका सपना था वैद्य बनने का जिसे लोग खब्त कहते थे। पहान ने भी उसे कई बार समझाया कि वह अपने काम पर ध्यान दे पर वह कहां मानने वाला था। जड़ी-बूटियों की तलाश में एक टांगी लेकर पूरब-पश्चिम (लंगोटी) पहनकर निकल जाता तो कई दिनों तक वापस नहीं लौटता। ऐसे ही एक वक्त में फादर अगस्टीन ने घर जाकर सबसे मिलकर आने का छुट्टी दी थी। कहा, सुबह तक लौट आना, उस रात से ज्यादा लंबी रात जेम्स ने कभी नहीं देखी। घर में खाने को कुछ न था। बीज वगैरह भी उबाल करके खाए जा चुके थे। सोमरी का बिलखना... उफ... मुंह अंधेरे ही उठकर आ गया। स्टोर रूम से बिस्कुट के कई पैकेट, ब्रेड लिए और जाने लगा। कुछ ही देर का तो रास्ता है। तुरंत देकर लौट आएगा। फादर जाग चुके थे, फूलों को पानी दे रहे थे।

जेम्स! किदर जाता है फिर, अबी तो आया घर से।

वो फादर मेरा भाई लोग, मेरा मिस्टर सोमरी भूका, अभी ये सब देके लौट आएगा। उसने हाथ फैलाकर बिस्कुट-ब्रेड दिखाए।

नो-नो-नो माय सन! अभी मार्निंग में तुम्हारा बहोत काम बाकी। भूल गया आज संडे। ये सब तुम्हारा भाई लोग के लिए नहीं, जो गॉड के अम्ब्रेला के नीचे आया उसी के लिए, उसी को मिलगा स्वर्ग का राज्य।

फादर ने छीन लिया था उसके हाथ से स्वर्ग का राज्य। चुडरू टुकुर-टुकुर देखता रहा उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि रोज वह पढ़ता है कि गरीबों को ही मिलगा स्वर्ग का राज्य, द फादर, द सन एंड द होली स्पिरिट उस राज्य से उसके भूखे भाइयों को, सोमरी का बाहर कैसे फेंक दिया जाएगा। ईश्वर का हाथ नहीं कांपेगा ऐसा करते हुए। आज वह छिप-छिपकर बैठेगा भी नहीं उस नीले मखमल के कवर लगे सोफे पर। नहीं देखेगा कभी भी स्वप्न में भी उस सोफे को। हाफ पैंट और टीशर्ट का पहनकर... उसके भाई-बहन उसके सामने तक आ नहीं रहे थे। छिप-छिपकर देखते और खिल-खिल कर हंसने लगते... सोमरी को हंसते देखकर उसे इतनी लाज आई कि बस्स। आज रात सोते समय उसे वही दृश्य फिर से दिखे थे.... शायद सपने में... वही खिल-खिल... जैसे सभी मजाक उड़ा रहे हों उसका... बहुत देर तक बेआवाज रोता रहा था वह।

आवाज से नींद खुली थी उसकी। खट! खट!

बाबा...बाबा दरवाजा खोलिए! भैया सीढ़ी से गिर पड़ा है, सीढ़ी से....

साथ ही बैकग्राउंड में कुछ दबी आवाजें थीं। जॉन की आवाज... निक्की छोड़ दे, छोड़ दे न।

धत तेरे की। इतनी रात में छत पर जाने की क्या जरूरत थी। आंख मलते हुए उठ बैठा था वह।

क्या हुआ, ये चिल्ला-चिल्ली क्यों है। पत्नी भी जागकर चैकी से नीचे उतर रही थी।

तुम्हारा लाडला सीढ़ी से गिर पड़ा है, देखो जाओ। ओह! सुबह ड्यूटी पर हजारी बाग भी निकलना है। अब इ लड़का झंझट कर दिया। पता नहीं क्या करने सकेंगे।

पत्नी दौड़ती हुई आई। जेम्स भी चश्मा ढूंढ़कर कमरे से निकला। उसका बड़ा लड़का दाहिने हाथ को पकड़कर कराह रहा था। लेकिन जेम्स के आते ही कराहना बंद कर दिया उसने और दर्द की तस्वीर उसके चेहरे पर छप गई। कुहनी के पास हाथ का ढांचा बता रहा था, डिस्लोकेशन तो है ही और भी कुछ हो सकता है। जेम्स ने कड़वी निगाह डालते हुए पूछा, रात में क्या करने गया सीढ़ी में?

कड़वी निगाह का जवाब जलती निगाह से जॉन ने दिया, आपको कौन बुलाया, सो जाइए जाकर।

कैसे बोलता है, देखती हो, सीढ़ी में रेलिंग्स नहीं है। जानता है सीमेंट बालू सब रखा है वहां पर। सावधानी नहीं रखा।

रेलिंग बनाए क्यों नहीं? जॉन कहां चुप रहने वाला था।

जिम में जाके खाली मसल बढ़ाया दिमाग नहीं बढ़ाया। थोड़ा-थोड़ा कुआं खोदते हैं तो पानी पीते हैं। फुटानी कैसा है साहब का। खाली टाइम जींस पहनने अउर जुल्फी बढ़ाने से होगा। कमाकर लाओ ना, तब पता चलेगा।

छोड़िए न आप तो जानते हैं फिर भी। पत्नी ने सफेद झंडा लहराने की कोशिश की।

नहीं, क्या जानते हैं, ऐ क्या जानते हैं, तुम बोलो एइसा कहना ठीक है? जेम्स ने सवाल की गोली दाग दी।

हां ठीक है, यही अभी भतीजा-भतीजी का होता तो इधर-उधर नाचने लगते। जॉन के मन में न जाने कितने दिनों का जहर जमा था।

चुप! शट अप। जेम्स दहाड़ा था लेकिन उसे खुद ही अपनी दहाड़ कमजोर-सी लगी थी।

घर में तो एगो बाइक भी नहीं कि होस्पिटल जाने सकेगा आदमी। यह मंझले पीटर की छौंक थी।

है कोनची (कौन चीज) इस घर में। आदमी आने से बैठाने भी सकते हैं? लाज भी आता है। कौन जमाना का लकड़ी का कुर्सी सब है। कोय कहने सकेगा कि एक ओफिसर का घर है। सब तो घुस गया दूसरे को बनाने में। कोय तो पूछता भी नहीं। बड़बड़ाता हुआ जॉन रात में ही बाहर निकल गया। जेम्स ने कातर दृष्टि से पत्नी की ओर देखा। पत्नी, ए जॉन! ए जॉन! करती रह गई।

करवट बदलते हुए जेम्स बोल रहा था, देखो जी! कल तो हम रूकने नहीं सकेंगे। जरूरी सब काम पड़ा है वहां ओफिस में। वहां भी तो देखना जरूरी है न। सुबह होस्प्टिल ले जाना इसको। बैंक में जो होगा निकाल लेना, पता नहीं कितना लगेगा। नींद तो सोनचिरैया बनकर उड़ चुकी थी।

कुछ हद तक तो ठीक ही कह रहा है जॉन, बल्कि उसे खुद भी लगता रहा है और कहता भी है नई-नई नौकरी में आए लड़कों को फर्र-फर्र स्कूटर या मोटरबाइक पर उड़ते देखकर, ‘अजी आप लोग तो आते-आते स्कूटर ले लिए इतने ही दिन की नौकरी में। हम तो कुछ लेने नहीं सकें।‘

मुंह लगे मिश्रा के लिए तो इतना काफी था टपक पड़ने को। ‘‘अरे सर! अब कार ले लीजिए। सीधे चार चक्का पर चढ़िए, दो चक्का पर का चढ़िएगा।‘ जेम्स ने इसे मिश्रा के सामान्यतया किए जानेवाले लल्लो-चप्पो के रूप में लिया। वैसे कभी-कभी मूड खराब रहने पर व्यंगवाले अर्थ को भी लेता था। और कारण भी तो था न! और अगर उस दिन बगलवाले कमरे में मिश्रा के उस भाषण को नहीं सुना होता उसने जिसमें उसके रिटायरमेंट पर किए जानेवाले संभावित फेयरवेल स्पीच की रूपरेखा थी। दोस्तो ये हैं जेम्स खाखा, जिन्दगी भर बैल की तरह खटे। जंगली थे फिर किरिस्तान बने। कौआ थे मोर का पंख लगाके मोर बने। प्रमोशन के पीछे सांड के आड़ में पीछे घूमनेवाला सियार बने कि कभी तो ललका फल गिरेगा। सभी ही...ही...ही...

इसी ही...ही...ही...ने तो मन-तन सुलगा दिया था उसका और कोई अदृश्य शक्ति आ गई थी उसके अंदर जब कॉलेज के दिनों में मुच्छड़ महतो को पटककर कलेजे पर चढ़ गया था, कहां छह फुटा मजबूत कदकाठी का महतो और कहां वह। लेकिन हमेशा ‘का रे जंगलिया! का हाल है बेट्टा‘ से बात शुरू करनेवाला महतो और फिर वही ही....ही...ही...लेकिन बाद में उसे खुद इस घटना पर यकीन नहीं होता। एकाध बार बयान करने की कोशिश भी की है उसने, शायद यह जांचने के ख्याल से भी कि वह ‘स्वपन था होगा कि हकीकत‘ हमको बेट्टा समझा था कि नाटा हमसे सकेगा लेकिन हम भी तो हॉकी पिलियर थे। केतना बार बोले थे, होंगे ऐ बेट्टा महतो, मुंह संभालकर रखो किसी दिन धोका खाओगे। एक दिन हॉकी खेल के आ रहे थे दो-तीन लड़का लोग के साथ महतो खड़ा है रास्ते में।

का बे जंगलिया! बड़का धियानचन्द हो गया बेट्टा।

एबे मुंह संभाल। हमरा साथ का लड़का लोग तो गद्देदार (गद्दार) निकल गया। सब ले उड़ान, अब हम करने क्या सकते थे, मार दिए माथा से टक्कर पेट में, गिर गया बेट्टा महतो, समझने नहीं सका कि इ नाटा एटैक कर देगा।

सुननेवालों के चेहरों पर विरक्ति का भाव एवं तिर्यक मुस्कान को महसूस कर उसे भी अपनी कहानी पर नायकीनी हो आती। शायद यही सपने और हकीकत के घालमेल का दौर रहा होगा। लेकिन एक बात तो स्पष्ट रूप से याद है उसे कि तभी उसने पहली बार गाली देना सीखी थी। खाली डायनिंग हॉल में जाकर चीखा था, अरे महतो चूतिया...या...की गूंज फैलती चली गई थी। लेकिन अब न तो वह उमर रही न वह बात अब तो ऐसे ही...ही...ही.... वाले मौकों पर तनहाई में बस वजनदार मोटी-सी पंचाक्षरी गाली बुदबुदाता है और संतोष का अनुभव कर लेता है।

सामने तो बस वही है...हं....हं और खिसियानी हंसी... लेकिन इस बार इस बात पर गौर करना ही होगा। वही जॉन ने बात कही...कुआं खुदवाने, जगत बनवाने और जुआठ देने (कुएं के अंदर लगानेवाला जामुन की लकड़ी का कुंदा) में ही काफी पैसा निकल गया जी.पी.एफ. का, नहीं तो इस बार सोचा था कि एक कामचलाऊ सोफा तो ले ही लेगा। घर के रास्ते में ही चमचमाते फर्नीचरों की दुकानें थीं...दाम-वाम भी पूछे और पीछे भी हटा था चौंककर। वजह भी बन रही थी भतीजे की चिट्ठी दिल्ली से आने पर। निशा और बच्चे भी आएंगे दो दिन आपके साथ रांची रहकर तब गांव जाएंगे।

खुशी से मन गनगना उठा था जेम्स का। आखिर उसे गर्व तो था ही उन पर रेलवे में ऊंचे अधिकारी थे दोनों। दिल्ली गया था तो टिका था एक दिन उनके साथ होंडा सिटी और मैकडॉनल्ड और जाने क्या-क्या बातें की थीं अब्राहम ने।

सारी बातें आंखों के सामने घूम जाती हैं रिवाइंड होकर। इसी अब्राहम को लेकर बड़े भइया आए थे रांची। उसके डेरे पर-पढ़ने-लिखने में तो इ ठीक है जेम्स। लेकिन हमार हालात तो तुम जानते ही हो-हम थोड़ा ही सकेंगे। उसके बाद अब्राहम के स्कूल-कॉलेज की फीस, खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, तेल-साबुन सब...रात-दिन मेहनत करता अब्रहाम...‘‘क्या करे अब्राहम! थक गया? लाड़ से पूछता था वह। सर पर हाथ भी फेरता। कभी-कभी ड्यूटी से लौटकर उसे पढ़ाने भी बैठता लालटेन जलाकर चैकी पर उन दिनों लोडशेडिंग भी ज्यादा होती थी। राजधानी कहां बनी थी रांची उस समय। अब तो एकदम स्वपन जैसा लगता है अब्राहम।‘‘

अगले हफ्ते आ रहा है। उसके पहले किसी तरह ड्राइंग रूम जिसमें सिर्फ पलस्तर तक होकर ही काम अटक गया और पलस्तर पर ही बच्चों ने चित्र-वित्र लटका रखे हैं ड्राइंग नाम को सार्थक करने के लिए। ड्राइंग रूम में सोफा कामचलाऊ भी हो, लगा देना है। किसी से सुना था हल्की-सी याद है उसे। फादर के डेरे का कुछ फर्नीचर बिक्री के लिए था। खैर, इसी बीच पता लगाएगा वह। नीले मखमल के कवरवाला सोफा भी हो सकता है बिक्री हो रहा होगा। कितनी कीमत रखी होगी पता नहीं। पैसे तो बैंक में डेढ़-दो हजार ही बच रहे थे। काफी पैसा तो जॉन के हाथ के इलाज में निकल गया। पहुंचा तो फादर वर्गीज फूलों में पानी दे रहे थे।

गुड मॉर्निंग फादर।

वेरी गुड मॉर्निंग, बोलो जेम्स, कैसा है?

ठीक है फादर, एक काम से आया था।

हां, हां, बोलो।

सुना था वो फर्नीचर वगैरह...होने से हम लेने सकते थे....

नीले मखमल कवरवाले सोफे के वे सपने रंगीन धुंध बनकर छा रहे थे।

हां, हां, सिक्स थाउजैन्ड रखा है प्राइस। इतना चीप में सोफा कहां मिलेगा। थोड़ा वेलवेट को इधर-उधर रिपेयर कर देगा तो परफेक्ट हो जाएगा।

फादर....अभी तो सिर्फ टू थाउजैन्ड है बाकी नेक्स्ट मंथ में देने चलेगा....

ऊ, ठीक है जेम्स तुम गुड सोल। इसलिए अलाऊड। लेकिन नेक्स्ट मंथ में दे देना जरूर। फिर ये मनी तो पुअर वेलफेयर फंड में जाएगा।

और इसके बाद की कहानी तो बड़ी मुख्तसर-सी है। उस सोफे को ठेले पर लदवाए मूंछों पर विजयी मुस्कान चिपकाए जब जेम्स खाखा अपने अधबने घर के दरवाजे पर आए तो देखा छोटे बच्चे धमाचैकड़ी मचा रहे हैं। उसके दिल्ली निवासी भतीजा और बहू आ चुके थे, उसको अच्छा लगा।

कब आया रे अब्राहम। लड़ियाते हुए पूछा जेम्स ने। उसको देखकर वही गर्वबोध जो कुम्हार को सुंदर बर्तन देखकर होता होगा।

ये सड़ा हुआ सोफा कहां से उठा लाए। हाथ में प्लास्टरधारी जॉन ने वार किया। ठेलेवाले को पैसे देते हुए घूरकर देखा उसे।

छह हजार में खरीदे हैं छह हजार में। तुमको सड़ा दिखता है।

क्या छह हजार में, अरे मार्केट में तो दस हजार से शुरू करके कितना सोफा मिलता है वैरायटी भी रहता है। बड़ा ओल्ड फैशन का है यह तो।

हां हम लोग डिजायनर सोफा लिए थे, आजकल तो मेटल का फैशन है। पैंतीस कि चालीस लगा था। यह बहू थी।

क्या चाचा आप भी। सब काम संक्षेप में ही करते हैं। अभी भी रिटर्न कर आइए। बैल समझ के कोई सटा दिया है आपको इ सड़ा सोफा। भतीजा हंसते हुए अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ धौल-धप्पा करते हुए अंदर चला जा रहा था।

जेम्स खाखा मार खाए हुए बैल की तरह सर झुकाए टुकुर-टुकुर नीले मखमल के कवरवाले सोफे के उस जगह को देखे जा रहा है जहां से मखमल का कवर घिसकर बदरंग हो गया है।

लेखक परिचय

15. 01.1965। अंग्रेजी साहित्य में पीएच. डी, आकाशवाणी जमशेदपुर में कार्यक्रम अधिशासी

क्विजमास्टर, हुड़ुकलुल्लू, जिद्दी रेडियो, बाशिंदा@तीसरी दुनिया चर्चित कहानी संग्रह।

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से