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रविवारीय विशेष: अजय नावरिया की कहानी कुमार साहब

DEC 20 , 2020
रविवारीय विशेष: अजय नावरिया की कहानी कुमार साहब

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आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए अजय नावरिया की कहानी। यह कहानी बताती है कि आजादी के वक्त जो हालात थे, जाति को लेकर वही हालात आज भी हैं। यह कहानी सिर्फ प्रेम में जाति के बीच में आ जाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह शहरों में भी भेदभाव को तवज्जो देने की कहानी है। हमारे आसपास ऐसे कई कुमार साहब हैं, जिनकी योग्यता से ज्यादा उनकी जाति पर बात होती है।

एक पल भी ऐसा नहीं था उनके पास जो सुकून से लबालब हो। एक निचाट अकेलापन हमेशा घेरे रहता। घर में उन्हें कभी प्यार का एक कतरा नहीं मिला। हालांकि घर से बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया थी उनकी मुट्ठी में। शहर में, देश और विदेश में भी। अब भी जाने कितने थे, जो अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार थे। घर के भाई-बंदो ने तो ऐसा घोंटा कि वे अठारह के होते-होते मुंबई भाग निकले, खाने-कमाने को।

क्या चाहिए था आखिर उन्हें और आखिर किस से?

लोग उनसे पूछते हैं, इतना गम कहां से इकट्ठा कर लिया उन्होंने कि सुबह-सुबह ही गम गलत करने बैठ जाते हैं। यह सुन कर वे जोर का ठहाका लगाते हैं। लोग हैरान होते कि क्या ये दीवाने हो गए हैं पर बात तो हमेशा होश की करते हैं। जरा नहीं बहकते कि बात में कोई ऊंच-नीच हो। शांति का मनमोहक संगीत धीमे-धीमे उठता रहता हमेशा उनके आसपास। जिंदादिली और हौंसले से भरे रहते हमेशा। जो पास आता, वह भी जैसे बहती नदी में तरंगित हो जाता, ऊर्जा से भर जाता। ऐसे सवालों का अक्सर वे कोई जवाब न देते। लोग अब भी उनकी इतनी इज्जत करते कि एक हद के बाद कोई उनसे हठ भी न करता।  

सबसे पुराना सहायक अल्लाबख्श ही है जो, कंधे दबाते-दबाते कह ही देता। जानता है कुछ न कहेंगे, एक टीसती मुस्कुराहट बिखरेगी बस। “साहिब सुबह-सुबह तो ये जहर ठीक नहीं है।”

“क्या जहर नहीं है अल्लाबख्श?”

“ये तो जहर ही है न साहिब।”

अल्लाबख्श सोचता, यह शख्स जो इतना बुझा हुआ दिखता है कि कहीं कोई आंच तक नहीं दिखती, कैसे इतना बेलौस हंसता चला जाता है। ये कहकहे खोखले हैं या हम ही इन्हें ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं।

“चाय तो पीते हो न सहरी में?”  

उन्होंने पूछा तो अल्लाबख्श ने हां में सिर हिलाया।

“वह भी जहर जैसा ही है कुछ लोगों के लिए। धीमा जहर। मुझे अब किसी चीज से नुकसान नहीं पहुंचता। नुकसान पहुंचाने वाली सिर्फ एक शै है और वह है वक्त। एक दिन तो मर ही जाएंगे हम सब।” पूरा मकान जैसे खारे पानी में डूब गया। तभी पास की मस्जिद से मीठी अजान उठी।

“जाओ भाई नमाज पढ़ आओ। ये दिलकश पवित्र अजान मुझे न जाने कहा-कहां खींच ले जाया करती है।” यह कह कर वे धीमे-धीमे बुल्लेशाह का गीत गुनगुगाने लगते।  

“मैनूं लगणा इश्क अवलणा, अव्वल दा, रोज अजल दा।

विच कड़ाही तिल-तिल पावे, तलिआं नूं चा तलदा।

मोइआं नूं एह वल-वल मारे, दलियां नूं एह दलदा ।

की जाणां कोई चिणग कखी ए, नित सूल कलेजे सलदा।

बुल्ल्हेशौह दा न्योंह अनोखा, ओह नई रलाइआं रलदा।” 

गाते-गाते जाने कब आंखें बंद हुईं और जाने आवाज तेज होती चली गई कि दर्द। जब आंखें खुली तो सामने अल्लाबख्श टुकुर-टुकुर देख रहा था। उन्हें याद आया कि वह उनसे कई बार कह चुका है कि जब वे अपनी मादरेजबान पंजाबी में कुछ भी बोलते हैं, तो उसे उन का कहा एक भी लफ्ज समझ नहीं आता। किशोर अवस्था तक का समय अल्लाबख्श ने बहराइच में बिताया था, जहां उसके अब्बू किसी मारवाड़ी सेठ के यहां काम करते थे। इसलिए जब उन्होंने कोई ऐसी-वैसी बात किसी से करनी होती तो वे या तो पंजाबी में करते या अंग्रेजी में।

“समझना चाहते हो?” अल्लाबख्श की आंखों में जिज्ञासा दिखी, तो उन्होंने पूछ लिया। उसने हां में सिर हिलाया। वे समझाने लगे कि मुझे इश्क हो गया है। ये बहुत अनोखा और निर्दयी इश्क है। ये दुनिया बनने के पहले दिन से ही है। मुझे बहुत दुख उठाने पड़ते हैं क्योंकि वो मेरा प्यारा, मुझ बिरहन को तिल-तिल कर मारता है। ये इश्क की राह है ही ऐसी कि इसमें जो मर चुके हैं, ये इश्क उन्हें और भी घेर-घेरकर दुख देता है। बुल्लेशाह कहते हैं कि उस प्यारे का प्रेम बड़ा ही अनोखा है।  वैसा प्रेम किसी और का नहीं हो सकता।

ठंडे पानी की एक बोतल उनके नजदीक रख कर अल्लाबख्श बाहर निकला। फ्लैट से बाहर निकलते हुए अल्लाबख्श के कानों तक आवाज आई कि बाहर से ताला लगा जाना। लिफ्ट के पास पहुंचा अल्लाबख्श तो देखा कि लिफ्ट अभी तीसरे फ्लोर पर ही है। सोलहवें फ्लोर पर पहुंचने में वक्त लगेगा। अल्लाबख्श याद करने लगा, कैसे साहिब ने जानबूझ कर सबसे ऊपर का फ्लोर खरीदा था, जबकि बिल्डर गुप्ता जी इन्हें ग्राउंड फ्लोर देने को तैयार थे। पूना में यह तीसरी बिल्डिंग बनाई थी उन्होंने। वह मुरीद थे साहिब की शायरी और अफसानों के, उनकी लिखी फिल्मों की कहानी के, फिल्मों के लिए लिखे कितने ही डायलॉग उन्हें जबानी याद थे, जो कई बार वे दोहराते। साहिब के साथ पहले तो कई बार गुप्ता जी भी मुंबई चले जाते थे, पर अब साहिब ने जाना बहुत कम कर दिया है। साठ के पूरे हो जाएंगे इस तीस अक्टूबर को। गुप्ता जी बार-बार कहें कि कुमार साहब इस उम्र में नीचे का फ्लोर ज्यादा मुनासिब होगा। पर साहिब अपनी ही जि़द पर कि नहीं बुरे लोग सुकून में खलल डालेंगे और फिर आखिर सोलहवां फ्लोर ही तय हुआ।

“अच्छा-बुरा क्या होता है कुमार साहब। आप तो खुद फिलोस्फ‍र हैं, सब मन की बाते हैं, शेक्सपियर ने भी तो यही कहा है।” गुप्ता जी हंस कर बोले तो उखड़ से गए साहिब।

“शेक्सपियर कहेंगे, तो क्या सब मान लूं।” इसके बाद वे बोलते ही चले गए, “अच्छा–बुरा होता है। हमारे मानने न मानने के बावजूद ये दुनिया दो हिस्सों में बंटी है। दुनिया की हर चीज। चांद, तारे, ग्रह, उपग्रह, पेड़, पौधे, हवा, मिट्टी, जानवर, कीड़े और इंसान भी। सब दो हिस्सों में बंटे हैं। अच्छे का मतलब है, जो फायदा पहुंचाए, कम से कम परेशान न करे और बुरे का मतलब जो नुकसान पहुंचाए। और ये बंटवारा इंसान ने नहीं किया है। यह होता है, बस इंसान तो इसे जानने और समझने की कोशिश करता है।”

गुप्ता जी ने हंसते हुए हाथ जोड़ दिए और कहा, “ठीक है बड़े भाई, जैसी आप की मर्जी, मैं ठहरा दुनियादार व्यापारी पर इतना तो जानता हूं कि परेशानियों के हल फलसफे में ही नहीं, हालातों में भी होते हैं।”

अल्लाबख्श ने गुप्ता जी के लिए चाय रख दी। “गुप्ता जी, फलसफा हालातों से निकलने का हल ही नहीं बताता बल्कि हालातों को सहने, उन्हें बदलने और उनमें जीने की कुव्वत भी पैदा करता है।”

अब इधर तो गुप्ता जी का आना भी बहुत कम हो गया है। वैसे इधर बहुत सारे लोगों का आना कम हो गया है। पहले तो हर शाम कोई न कोई आया रहता था। कभी-कभी तो चार-पांच लोग हो जाते। कोई शराब ला रहा होता, कोई फल, मेवे, मिठाईयां, तो कोई घर पर खासतौर पर बनवाई बिरयानी या कोरमा। हर किसी को उनसे कुछ न कुछ काम था। हर किसी को कहीं न कहीं सिफारिश करानी होती थी। मंत्री जी से, फिल्म लाइन के किसी आदमी से, किसी शायर से और वे सबके काम बाखुशी किया भी करते। कोई कभी निराश हो कर उनके दरवाजे से नहीं गया। अभी दो-एक साल पहले तक भी उनकी कही बातों को सब लोग महत्व देते थे। पर अब वह बात नहीं रही। कुछ ही लोग हैं, जो अब उन के कहे पर काम कर देते हैं, ज्यादातर तो “देखते हैं कुमार साहब” या “वक्त बदल गया है कुमार साहब” कह कर टाल जाते हैं।

कुमार साहब गुस्से में फोन पटक देते, “सब समझता हूं मैं। दो ही साल में जमाना अचानक ऐसा कितना बदल गया।”

ऐसे वक्त में वे बहुत देर तक खामोश हो जाते। शराब तो वे पहले भी पीते थे पर इन दो सालों में, तो यह कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। हालांकि गोरे रंग में अब भी वही पुराना गुलाबीपन है, जो पहले था। डॉक्टर ने सब चेकअप करने के बाद कहा था, “माशाअल्लाह, बहुत मजबूत कलेजे के मालिक हो कुमार साहब।” वे ठठा कर हंसे और बोले, “कभी हमारे दिल में भी झांक कर देखो डॉक्टर साहब, वह भी ऐसा ही पठान निकलेगा, भले बहुत वार झेले हैं बेचारे ने।”

डॉक्टर के जाने के बाद कुमार साहब पैंतालीस साल पुराने जालंधर की गलियों में पहुंच गए। तब कुमार साहब सोलहवें साल में दाखिल हो रहे थे और देश की आजादी को भी सोलहवां बरस ही लगा था। वहीं वह टकराई थी, स्कूल से लौटते वक्त। दो चोटियां किए वह अपनी सहेली के साथ सामने की गली में मुड़ी और इधर ये अपनी बेख्याली में, बचते-बचते भी बुरी तरह भिड़ गए। “ए तू अंधा हो गया, दिन-दहाड़े टक्कर मार रहा है, लड़कियों को। कुत्ता-हरामी कहीं का।” साथ वाली लड़की खड़ी-खड़ी गालियां दे रही थी। उन्होंने अब भी उस का चेहरा तक नहीं देखा था और नीची नजर किए वे बस माफियां मांगे जा रहे थे। अचानक आंख उठा कर जब उस पंद्रह साल की लड़की की तरफ उन्होंने देखा, तो कुछ पल देखते ही रह गए, फिर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़े। उन्हें ऐसे गिरते देख पहले तो दोनों लड़कियां अवाक रह गईं, फिर कुछ समझ कर दुपट्टे से मुंह दबाए हंसती हुईं भाग गईं। तभी पास की किसी मस्जिद से अजान की आवाज उठी थी।

अगले दिन सुबह सात बजे ही वे गली के उसी मोड़ पर आ कर खड़े हो गए। स्कूल भी नहीं गए। धूप तेज थी, पर उन्हें महसूस नहीं हो रही थी। दोपहर के डेढ़ बजे के आसपास का वक्त‍ था कि उन्होंने देखा वही कल वाली दोनों लड़कियां चली आ रही हैं। पहली ने दूसरी को कुहनी मार कर दिखाया, कि देख जिसको कल टक्कर लगी थी, वो गली के दरवाजे पर खड़ा है। दोनों उन्हें नजरअंदाज करती हुई निकल गईं। थोड़ा दूर निकलने पर उनमें से एक के हंसने की आवाज आई।

अब उनका रोज का यही नियम हो गया। सुबह स्कूल के लिए निकलते पर सारा दिन शहर के किसी गुरुद्वारे या शहर के बाहर किसी खंडहर या रेल की पटरियों के किनारे बिता देते और एक बजे से पहले वहीं आ खड़े होते। यही समय होता, जब आसपास की मस्जिदों से अजान उठना शुरू होती। रोज कई तरह के मनसूबे बांधते पर उसके सामने आते ही जैसे हिम्मत जवाब दे जाती, जोरों से दिल धड़कने लगता।

गुरुद्वारे में अरदास करते कि वाहे गुरूजी कोई तो राह निकालो, कोई तो जुगत बने। एक दिन एक विज्ञापन पढ़ा कि शहर में एक बंगाली मुसलमान तांत्रिक आया है, जो वशीकरण कर प्रेमी को प्रेमिकाओं से मिला देता है और फिर वे उसे कभी छोड़ कर नहीं जातीं। वे वहां पहुंच गए। काम करने से पहले उसने दस रुपये मांगे, तो उनका मुंह उतर गया। पूछा, “जालंधर में कब तक डेरा है”, पता चला एक हफ्ते का। वे अपना सा मुंह ले कर वापस आ गए।

सात भाई बहनों में छठवें नबंर के थे, उन्हें खाने को ही मिल जाता था, यही गनीमत थी। सातवां दिन भी बीत गया। दोनों आतीं, पास से भवें चढ़ाकर निकलतीं और आगे जा कर दुपट्टे में मुंह छिपा कर हंसती। बात ऐसे नहीं बनेगी, चार दिन बाद बंगाली बाबा भी चला जाएगा। इसलिए अब उन्होंने तय किया और सुबह-सुबह रेलवे स्टेाशन के पास पुराने बाजार में जा खड़े हुए, जहां बेलदारी के लिए मजदूर खड़े होते थे। ठेकेदार वहीं से मजदूर उठाते थे। तीन दिन बेलदारी के बाद अब उनकी जेब में बारह रुपये थे।

वे सुबह-सुबह ही बाबा के पास पहुंच गए। बाबा ने मंत्र पढ़ कर एक पुड़िया में राख दी और कहा उसे पानी में घोल कर पिला देना। उन्होंने बाबा से साफ-साफ कह दिया कि ये तो नामुमकिन है, आप तो कोई और ही उपाय बताओ। तब बाबा बोले कि अच्छा जहां से वह गुजरती हो, वहां डाल देना, बस उस का पैर पड़ जाना चाहिए, उसके बाद तीन-चार मंत्र बता दिए कि जैसे ही पैर पड़े, ये पढ़ते रहना, एक सौ आठ बार और हां इसका असर बहुत तेज है, जरा गलती हुई, तो लड़की पागल हो जाएगी। फिर मुझे दोष मत देना।

बाबा कब के चले गए और वे राख जे़ब में लिए लिए घूमते रहे पर उसे जमीन पर न डालते कि कहीं कोई गलती हो गई, तो वह पागल हो जाएगी। पंद्रह दिन बीत गए पर बात आगे न बढ़ी। न खाने की सुध, न पीने की और नींद तो जाने कहां ही चली गई। बस हर वक्त उसी का चेहरा सामने घूमता। पंद्रह ही दिनों में शरीर आधा रह गया। गोरा रंग काला पड़ गया और आंखों से नूर खो गया।

“कुछ बोलेगा भी या यहीं खड़ा-खड़ा जोगी बनेगा?” आज उसकी सहेली अचानक जाते-जाते सामने आ खड़ी हुई। दूसरी दो कदम आगे जा रूक गई। उन्हें काटो तो खून नहीं।

“तेरा नाम क्या है ओए?” कहते हुए वह चल पड़ी। “गूंगा है बेचारा शायद।” 

उसके आगे बढ़ते ही वह बोले “जी रतन कुमार।”

“उसका सतजोत कौर है, सिखणी है, तू ठहरा मोना... अपना रास्ता देख दीवाने।” एक पल को वह रूक कर बोली और फिर दोनों चल पड़ीं।

“कल गुरु जी का सच्चा खालसा बन जाना है मैंने, सुन ले सतजोत कौरे।” रतन वहीं से तेज आवाज में बोला। उस समय संयोग से गली खाली ही थी। दोपहरी में वैसे भी गलियां खाली सी ही रहती थीं।

और उसी शाम रतन कुमार ग्रंथी जी से सिख धर्म में आने का रास्ता पूछ आए। अगले दिन जब वो दोनों आईं, तो बोले, “जी मैं रतन सिंह हो गया हूं, गुरु जी का सच्चा सिख।” पर दोनों ने ही अनसुना कर दिया और सीधी चलती गई। कोई बीस-पच्चीस कदम आगे चलने के बाद उसी लड़की ने एक मुचड़ा हुआ सा कागज़ गिराया। रतन ने तेज-तेज चल कर वह कागज उठा लिया और वहां से भागते ही चले गए। दिल जोरों से धड़कता था। वह तीसरी गली में तेजी से पहुंचे। पुर्जी खोली, लिखा था, “कल इसी वक्त। लाहौरी गेट के पास वाली छतरियों के पास।” दिल बल्लियों उछल गया।

कल तक का वक्त काटे से नहीं कटता था। आखिर वह दोनों आईं और छतरी के एक खंभे के पीछे जा खड़ी हुईं। छतरियों के किनारे-किनारे एक नहर बह रही थी। रतन तो वहां पहले ही पहुंच गए थे। वही लड़की बोली, “देख रतन अब तू सिख हो गया है, तो सब मुश्किल आसान हो गई। जानता है तू सतजोत भी उस दिन से सोई नहीं है, न कुछ खाती है और न पढ़ती-लिखती है, बस तुझे ही याद करती है इसलिए मुझे मजबूर हो कर ये करना पड़ा।” उस लड़की ने कहा तो सतजोत ने पीछे से उसे चिकोटी काटी।

“सुरजीत इनसे पूछ कि क्या ये मेरे साथ शादी को तैयार हैं?” सतजोत धीमी आवाज में बोली, तो सुरजीत ने रतन की तरफ देखा, “हां, तेरी कसम, मैं तेरे अलावा अब किसी से शादी नहीं करुंगा।” यह सुन कर सतजोत शरमा गई।

“लो जी अब तो हम कबाब में हड्डी हो गए।” सुरजीत हाथ नचाते हुए चहकी तो सतजोत ने उसे बाहों में भर लिया और धीमे से बोली, “ऐसे कुबोल तो न बोल मेरी बहना, तेरी ही वजह से ये मुझे मिल पाए हैं।”

चार-पांच महीने ऐसे ही चोरी-छिपे मिलने में बीते। अब सतजोत पास आ कर खड़ी होने लगी। सुरजीत दूसरी छतरी के पास जा बैठती। वे दोनों जाने कहां-कहां की बातें करते। इसी बात में उसे पता चला कि वह खत्री जाति की है और उस के पिता पाकिस्तान के पंजाब से बंटवारे के वक्त यहां आए थे। सतजोत के अलावा एक बहन और तीन भाई और हैं। ऐसे ही एक दिन सतजोत कुछ कुछ बोले जा रही थी कि रतन ने बढ़ कर उस के होंठों पर कस कर चुंबन ले लिया। सतजोत के गाल और भी गुलाबी हो गए। “तेरे होंठ, तो शहतूत की तरह मीठे हैं री।” रतन ने कहा तो सतजोत ने मुंह दूसरी ओर कर लिया। 

“इतनी हड़बड़ी भी अच्छी नहीं है जीजे।” जाते-जाते सुरजीत हंसते हुए कह ही गई। दूर बैठे-बैठे भी वह सब गतिविधियों पर नजर रखती।

रोज की ही तरह रतन सही समय पर छतरी के किनारे पहुंच गया, पर उस दिन वे दोनों नहीं आईं। वह अगले‍ दिन भी रात घिरने तक बैठा रहा, पर वह नहीं आईं। अब वह रोज जाता और शाम तक वहां बैठा रहता, पर उसके बाद वह नहीं आई। कुछ दिनों बाद वह उनके स्कूल के बाहर जा खड़ा हुआ। छुट्टी हुई, एक-एक कर सारी लड़कियां निकलीं पर सतजोत और सुरजीत कहीं नहीं दिखीं। अब वह रोज किसी पवित्र नियम से बंधा स्कूल के सामने सुबह आ खड़ा होता और दोपहर तक खड़ा रहता। वहां से वह सीधे छतरियों पर पहुंच जाता और रात तक बैठा रहता। कोई कहता कि उन दोनों को कत्ल कर दिया गया है। कोई बताता कि दूसरे शहर भेज दिया गया है। कोई उन के ब्याह होने की बात करता। पर उसके बाद रतन सतजोत को जालंधर में कभी न मिल सकी। जब पैंतीस साल बाद अचानक दिल्ली के कनॉट प्लेस में सतजोत मिली तो कुछ पल तो दोनों एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश ही करते रहे। फिर पहचान गए। सतजोत के साथ एक जवान लड़की थी, जो उसकी बेटी थी। अब वह उसके विवाह के लिए खरीदारी कर रही थी। वह कुछ देर बातें करते रहे।

इधर-उधर की कुछ बातें करने के बाद सतजोत ने सीधे पूछा, “तुम्हारी वाईफ क्या करती है?”

“मैं कुछ नहीं भूल सका और तुम सब भूल गई सतजोत... याद नहीं तुम्हें मैंने तुम्हारी कसम खाई थी कि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से शादी नहीं करुंगा।”

“याद है सब। पर तुम आदमियों के लिए ये दुनिया बहुत आसान और आरामदेह है। कभी औरत बन के समझना इसे, समझ सकोगे। शायर हो, बड़े आदमी हो, फिल्मों में लिखते हो रतन जालंधरी के नाम से। तुम्हारी लिखे सब गाने सुने हैं मैंने, सब फिल्में देखीं, सुरजीत जालंधर में ही है, तीन मिलों की मालकिन है, उसी ने आप के बारे में पता कर के बताया था, पंद्रह साल पहले।”

कुमार साहब हैरान थे कि सतजोत को उनकी सब खबर है फिर भी एक बार पूछा तक नहीं कि कैसे जीता हूं। उस पर ताने मारती है कि आदमियों के लिए ये दुनिया बहुत आसान है। ये दुनिया सिर्फ दरिंदों के लिए आसान और आरामदेह रह गई है। औरत और मर्दों में जिनमें जितना ज्यादा जानवर जिंदा है, उतनी जिंदगी आसान।

“सब कुछ जानते हुए भी, कभी मिलने की ख्वानहिश नहीं हुई?”

उसने पहले बेटी की तरफ देखा, जो अब भी अपनी शादी के लिए अपनी पसंद के सूट चुने जा रही थी। फिर बोली, “बहुत बाद में पता चला। पर शादी तो हमारी दुनियावालों ने तब भी नहीं होने देनी थी।”

“क्यों?”

“वही सिख बन जाने के बाद भी वो आप का पीछा कहां छोड़ती। बाद में भाईयों ने बताया और आप इसीलिए मुझे अपने मोहल्ले का पता भी गलत बताते थे न। अब तक दुख है मुझे कि आपने मुझे भी और जैसा ही गिरा हुआ समझा।”

उस मुलाकात के बाद उनका फिर कभी मिलना नहीं हुआ। उसके जाने के बाद बहुत से लोग आए और चले भी गए। कुछ के तो आने और जाने तक का पता न चला। जब वे आए थे, तो कोई उमंग तक न उठी, किसी हिलोर ने हिलाया तक नहीं और चले गए तो कोई खलिश या खरोंच तक न हुई। वे सब कुछ मंगने आए थे। उनके हाथों में एक अदृश्यत फेहरिस्त थी, चाहतों की। कुमार साहब उन्हें पूरा कर देते थे ताकि जल्द से जल्द उन की रूखसती हो। 

कुछ के जाने के मामूली निशान जिस्म पर बने, रूह अछूती ही रह गई और फिर कुछ दिनों के बाद वे निशान भी न रहे। रूह और जिस्म फिर पहले जैसे ही हो गए, ताजादम और नए-नकोर। सतजोत के जाने के बाद मानो वे अनचाही वस्तुओं के मालगोदाम में बदल गए। वह ताजगी, पाकीजगी, वैसी मौज, वैसी मस्ती, वैसा दुख, वैसा उत्साह फिर कोई न पैदा कर सका।

वे खोजते रहे उसी खुशबु को सब में, पर वह याद बन गई, एक मरीचिका बन गई। प्रेम फिर नहीं मिला उन्हें। प्रेम में जो कुछ हम करते हैं, वह कुछ करने जैसा नहीं होता, वह अपने जीने जैसा ही होता है। कोई अवरोध उस में नहीं होता, जैसे हवा या पानी के अनुकूल ही बहना। कहीं कोई शिकन नहीं, कोई अटकाव या हल्का सा धक्का भी नहीं। माथे पर पसीने की चमचमाहट तक नहीं। पर इंसाफ करते वक्त हमें अपने विपरीत भी जाना पड़ जाता है, वहां कई बार सामने पहाड़ आ खड़े होते हैं और खाईयां खुद जाती हैं और मजबूरी ये कि हमें बचाव का रास्ता भी पता होता है पर तब भी, उसके बावजूद उस पहाड़ या खाई से ही गुजरना होता है क्योंकि इंसाफ उसी तरफ होता है। सतजोत ने गलत नहीं कहा था और उन्होंने भी जो कहा था, सच ही कहा था। हां, इंसाफ बेशक सतजोत के कहे के साथ ही खड़ा था। इंसाफ, हजार सचों से भी बड़ा होता है। उस वक्त भी बुल्लेशाह याद आए थे। “आ मिल यार सार लै मेरी, मेरी जान दुक्खां ने घेरी। अंदर खाब विछोड़ा होया, खबर न पाइंदी तेरी। सुन्यी बन विच लुट्टी साईआं, सूर पलंग ने घेरी। इह तां ठग्ग जगत दे, जेहा लावन जाल चफेरी। करम शरहा दे धरम बतावन, संगल पावन पैरीं। जात मजहब इह इश्क न पुच्छदा, इश्क शरहा दा वैरी। नदियों पार मुल्क सजन दा लहवो-लआब ने घेरी।”

मस्जिद बहुत दूर नहीं थी पर फिर भी पांच-सात मिनट तो लग ही जाते थे, वहां तक पहुंचने में। अल्लाबख्श सोलहवें फ्लोर से नीचे उतरा तो दो-तीन नमाजी और मिल गए, जो इधर रोज ही मिल जाते। रमजान के महीने में सभी पांचों वक्त की नमाज पाबंदी से निभाते। और दिन होते तो अल्लाबख्श भी अपने साहिब को छोड़ कर न जाता। कल जुम्मा तुल विदा था यानी रमजान का आखरी शुक्रवार। अब दिन ही कितने बचे हैं ईद में।

साहिब ने कभी उसे टोका तक नहीं। उल्टे, अजान होते ही खुद आवाज दे कर बुलाते, “अल्लाबख्श जाओ, काम तो लगे ही रहेंगे।” शायद यह भी एक वजह थी कि जब तनख्वाह में देरी की वजह से दो नौकर काम छोड़ गए, तब भी अल्लाबख्श नहीं गया। इधर वक्त पर तनख्वाह भले ही नहीं मिलती थी पर साहिब ने तनख्वाह रोकी कभी नहीं, कुछ देर भले ही हो जाती। पांच सौ का नोट देते और तीन-साढ़े तीन सौ का सामान आता, तो भी बाकी बचे पैसों के लिए न पूछते। अल्लाबख्श ने कभी एक पैसा भी उनका नहीं रोका और साहिब ने भी कभी रुपये पैसे का हिसाब नहीं मांगा।

बाकी सब चले गए एक-एक कर के। अल्ला बख्श ही सब कुछ है, इस साहिब का। एक शाम अल्लाबख्श को बुला कर साहिब ने कहा भी था, “तुम भी कहीं काम देख लो मियां, अभी जवान हो, चालीस के भी पूरे नहीं।” पर अल्लाबख्श नहीं गया। साहिब ने कार चलाना तो बहुत पहले सिखा दिया था और जब नई कार खरीदी तो अल्लाबख्श के ही नाम कर दी।

“अस्सलाम वलेकुम।।” इमरान ने सलाम किया, तो अल्लाबख्श का ध्यान टूटा। “कहां खोए हो अल्लाबख्श भाई।”

“नहीं भाई कहीं तो नहीं।”

“एक बात कहें अल्लाबख्श भाई।” इमरान ने वुजू करते वक्ते पूछा।

“हां-हां पूछो।”

“उस काफिर अछूत के घर में कब तक जूठे बर्तन धोते रहोगे, कब तक उसकी जूठन खाओगे, कुछ तो ईमान का ख्याल करो।” इमरान ने पहले भी दो-तीन बार यह कहा था और अल्लाबख्श टाल गया था। तभी साथ में हाथ-पैर धोता आदिल बोला, “अल्लाबख्श भाई को कम मत समझो इमरान भाई, उसका मकान इन्हीं के नाम होगा देख लेना। गाड़ी तो लिखवा ही ली।”

“तुम्हें किसने कहा कि मेरे साहिब अछूत हैं।” अल्लाबख्श थोड़ा रोष से बोला, “वो पंजाबी हैं।”

“सोसायटी के सारे लोग जानते हैं, मेरी मेमसाहब ने मुझे बताया कि तेरा साहब पंजाबी हरिजन है।” इमरान ने कहा।

“पर इमरान भाई एक बात बताओ, इस्लाम में तो कोई जात-पांत है नहीं, तो तुम क्यों परेशान हुए जाते हो और मैं भी कोई शेख-सैयद तो हूं नहीं, एक अदना सा नौकर हूं।” 

यह सुन कर नाजिम बोला, “कुछ शर्म करो तुम लोग, खुदा के घर में भी क्या जात-पांत, जमीन-जायदाद लगा रखी है। यहां इबादत के लिए आए हो या सियासत के लिए।” नाजिम की इस बात के बाद सब चुप हो गए।

अल्लाबख्श ने नमाज पढ़ी और फ्लैट पर लौट आया। देखा साहिब बैठे बैठे अब भी शराब पी रहे हैं। आरामकुर्सी पर अधलेटे जाने कहां खोए हुए हैं। एक तरफ, एक किताब खुली रखी थी, कुछ कागज दबे थे चश्मा  और पेन नीचे रखा था, मतलब कुछ लिख रहे हैं। सामने की छोटी रैक में उनकी लिखी बीसियों किताबें सज रही थीं। वह दबे पांव दूसरे कमरे में जा बैठा। आधे घंटे बाद उन्होंने आवाज लगाई, “अल्लाबख्श।”

“जी साहिब, खाना लगा दूं।” अल्लाबख्श ने आ कर पूछा तो उन्होंने कहा, “हां, लगा दो।” खाना खा कर कुमार साहब लेटने को हुए, तो अल्लाबख्श ने एक गिलास पानी, कोस्टर से ढक कर सिरहाने रख दिया। फिर कुछ अनमना सा वहीं खड़ा रहा।

“कुछ कहना चाहते हो क्या?”

“हां साहिब। अगर आपको बुरा न लगे तो।”

“हां पूछो।” कुमार साहब सीधे लेट गए।

“साहिब आप हरिजन हो क्या?” अल्लाबख्श ने सहमते हुए पूछ ही लिया। 

“किस ने कहा तुम से?” कुमार साहब ने मुस्करा कर पूछा।

“इमरान भाई और आदिल भाई कहते हैं कि अपनी पूरी सोसायटी यही कहती है।”

कुमार साहब मुस्कुाराते रहे। उन्होंने पूछा, “तो क्या तुम्हें कोई दिक्कत है काम करने में?”

“नहीं-नहीं साहिब, आप तो मेरे मालिक हो। मैंने तो उन दोनों को भी झाड़ पिला दी कि तुम कैसे मुसलमान हो जो जात-पांत को मानते हो।” अल्लाबख्श ने जैसे अपनी सफाई दी।”  

“तो फिर जाओ, मेरे आराम में खलल न डालो। और सुनो इमरान और आदिल से कहना कि हम हरिजन नहीं है, अब हमें दलित कहते हैं।” इतना कह कर कुमार साहब ने दूसरी तरफ करवट बदल ली। हालांकि उन्हें लगा कि सोलहवें फ्लोर तक भी नीचे का कुछ शोर आ रहा है।

अजय नावरिया

6 जून 1972, कोटला मुबारकपुर (दिल्ली) में जन्म। उधर के लोग चर्चित उपन्यास। सुधा स्मृति साहित्य सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली का साहित्यिक कृति सम्मान। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर।

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