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रविवारीय विशेष: अनुकृति उपाध्याय की कहानी काछम

NOV 22 , 2020
रविवारीय विशेष: अनुकृति उपाध्याय की कहानी काछम

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आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए अनुकृति उपाध्याय की कहानी। यह कहानी यूं तो कुछ युवाओं द्वारा किए जा रहे एक नए शोध या कहें तकनीकी परीक्षण की कहानी है, लेकिन दरअसल यह एक बच्चे की कहानी है, जो समाज के लिए जैसे नहीं के बराबर है। कहानी का पात्र छोटा बच्चा, समाज की विद्रूपताओं और विसंगतियों को इतनी आसानी से बयां करता है कि लगता है जैसे हम सब उसके अपराधी हैं।

सेबेस्टियन तालाब के एक कोने पर पंजों के बल बैठा कछुओं को तैरता देख रहा है। तालाब क्या, एक छिछला गड़हा था, जिसे सेबेस्टियन के पिता ने खोदा था और जिसके किनारों को कंकर-पत्थर, जलघास और नरपत लगा कर संवार दिया गया था। हमारे अहाते में कछुओं के लिए तालाब खुदवाने का प्रस्ताव सेबेस्टियन का ही था।  कछुए हमारे पास कुछ ही समय के लिए थे और उतने थोड़े समय के लिए हम उन्हें बाल्टी या कपड़े धोने के टब में भी रख सकते थे।  हमारी योजना उन्हें जल्दी ही जंगल के बीच बहने वाली नदी में छोड़ आने की थी। सेबेस्टियन ने हमें बताया था कि नदी बांस के बड़े भारी झुरमुटों के बीच से बहती है। पिछले बरस तक वे झुरमुट इतने घने थे कि नदी बांस के अंधियारे खोंपों में बाघ की आंख की चमक भर दीखती थी और उसमें बसने वाले कछुओं-मछलियों को पकड़ना असंभव था। लेकिन पिछले वर्ष वे बांस-वन फूले और खिरा गए। उन सूखे बांसों से इतना अनाज झरा कि सेबेस्टियन के टोल के बहेलिए डेरा ले कर शिकार पर जाने के बजाए पूरे महीने बांस वाले गेहूं चुनते रहे। “अब सूखे-ठूंठे बांसों में घुस कर नदी में पैंठना और काछम पकड़ना आसान है”, सेबेस्टियन ने कहा था। वह खुद भी अपने पिता और चाचा के साथ नदी तक जा चुका था। हम में से अदिति और अनूप वगैरह ने तालाब खोदने का समर्थन किया था। उनका कहना था कि टब में रहने के बाद कछुओं का नदी में रहना मुश्किल होगा। लेकिन तालाब के पक्ष में जो निर्णायक रहा वह था, सेबेस्टियन के पिता का उस दिन नशे में धुत्त न होना। सेबेस्टियन का पिता जब दारू की दुकान पर नहीं पड़ा होता, तब अच्छा काम करता है। उसने कुछ ही घंटों में यह तालाब खोद दिया था जिसके किनारे अब दस साल का सेबेस्टियन अपनी पीठ औंधाए, साठ साल के बूढ़े सा झुका बैठा है। 

कछुए हमें पास के कस्बे में लगने वाले हटवाड़े में मिले थे। छत्ते के शहद, काले गमकते कच्चे गुड़ के पिंडों और बर्तन-भांडों, कपड़े-जूतों की हाटों के बीच अनूप की निगाह टब में, मूंज की रस्सी से बंधे, एक-के-ऊपर एक रखे कछुओं पर पड़ी थी। प्लास्टिक का टूटा टब पहाड़ी नदी से नीले रंग का था और कछुओं की खोल जंगल की छांह जैसी। हाट के धूल-धक्कड़ से गंदले पानी में अधडूबे कछुए गर्मी से हांफ रहे थे। पास बैठा बूढ़ा बहेलिया हमें देखते ही मुंह फेर कर बैठ गया था, जैसे कछुओं से उसका कोई लेना-देना न हो। सेबेस्टियन ने ही धीमे सुर में बात करके सौदा पटाया था। “वो तुम्हारे कपड़ों की वजह से तुम से बात नहीं करना चाहता था।” भौहों में बल डाल कर सेबेस्टियन ने हमें बताया था। “उसने सोचा तुम लोग रेंज वाले हो और काछम के कारण उसे चौकी में बंद कर दोगे। तुम्हें ऐसे कपड़े पहन कर हटवाड़े नहीं आना चाहिए, यहां ऐसे कपड़े सिर्फ रेंज वाले ही पहनते हैं।” हम एक-दूसरे की ओर देख कर हलके से मुस्कुराए थे। वह ठीक ही कह रहा था, हमारे रोजमर्रा के कपड़े- खाकी कमीजें और सूती कैमोफ्लाज पतलूनें गार्ड और रेंजरों की वर्दी से मिलते-जुलते थे। गार्डों और रेंजरों की तरह हमारा काम भी जंगल से जुड़ा था- जंगली पशुओं से फसल को बचाने की विधियों पर प्रोजेक्ट था हमारा। हमने एक शो-फील्ड तैयार किया था और हमारा बहुत सा समय खेत में गुड़ाई, रुपाई करते और मेड़ों-क्यारियों की मरम्मत में बीतता था। इन कपड़ों में हमें काम करने में सहूलियत होती थी।

हमारी हटवाड़ा जाने की कोई योजना नहीं थी। अगर उस शाम वाली घटना न घटी होती तो हम इस तरह काम बीच में छोड़ कर कभी नहीं जाते। उस शाम हम शो-फील्ड की मेड़ पर खड़े प्रोजेक्ट के अगले चरण के बारे में बात कर रहे थे। हमारा काम अच्छा चल रहा था।  हालांकि हमारे खेत को नीलगायों के झुंड से कुछ नुकसान हुआ था लेकिन किसानों के सबसे बड़े दुश्मन जंगली सुअरों ने खेत का तिनका भी नहीं छुआ था। जंगली सुअर रात ही रात में पूरा खेत खोद डालते थे। सर्वे के दौरान हमने इलाके के किसानों से उनके बहुत किस्से सुने  थे। हमने अपने शो-फील्ड में तृण भक्षियों से बचाव की कई विधियां अपनाईं थीं- खेत-मेड़ों पर सरसों और तीखी मिर्चें बोना, मुर्गियों की विष्ठा और टूटे अंडों का घोल बना कर पौधों पर छिड़कना, रंग बदलने वाली सोलर बत्तियां लगाना। अब हमें यह देखना था कि इनमें से कौन सी विधि सबसे सफल है। हम आपस में बात कर ही रहे थे कि गांव वालों का एक दल आ गया और हमें धमकियां देने लगा, “सब पौधे उखाड़ डालेंगे, खेत तहस-नहस कर देंगे।” विपिन ने उन्हें समझाने की कोशिश की, “ये आपके ही फायदे के लिए है, आप खुद देख लो, चारों तरफ रनडुक्कर के खुरों के निशान हैं लेकिन हमारे खेत में एक भी नहीं आया। हमारे एक्सपेरिमेंट्स के कारण खेत बचा।” वे सब और भड़क गए। एक नेतानुमा आदमी ने खेत में थूक दिया, दूसरा अपनी लाठी तौलने लगा, पूरे दल ने हमें चारों ओर से घेर लिया। स्थिति एकदम से गंभीर हो गई और हमने लड़कियों को पीछे कर दिया। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें, तभी गांव का सरपंच वहां आ गया। सरपंच यों तो दुबला-हड़ीला, मंझौले कद का आदमी है लेकिन उसकी आवाज कर्री है और गांव में उसकी जैसी साख किसी की नहीं। हाथापाई करते नशेड़ी भी उसे देख कर अलग हो जाते थे। उसने कड़क कर हमारे चारों ओर घिरे लोगों को ललकारा, “क्या करते हो, चलो यहां से चलो” और वह उन्हें हांक कर ले गया। 

हम इस पूरे घटनाक्रम से चकित थे। गांव के लोगों की हमारे प्रति कोई दुर्भावना रही हो, ऐसा हमें कभी नहीं लगा था। बल्कि वे तो हमेशा हमारी बहुत आवभगत करते थे, चाय-पानी पिए बिना जाने नहीं देते थे। वे हमारी बातें बहुत ध्यान से सुनते थे और उनके कच्चे-पक्के घरों में, गोबर और चिकनी मिट्टी की गंध से महकते फर्श पर बैठ, स्टील के गिलासों से होंठ जला कर चाय पीते हमें लगता था कि वाकई हम कुछ अर्थवान काम कर रहे हैं। सेबेस्टियन ने इस बारे में हमारी भ्रांति दूर की थी। “वो सब तुम्हारे ऊपर हंसते हैं। तुम उन्हें धान की जगह सरसों और अलसी उगाने को क्यों कहते हो? अगर धान नहीं उगाएंगे तो खाएंगे क्या? सब कहते हैं कि तुम मूर्ख हो, नीच जात को अपने घर में आने देते हो, उनके साथ खाते-पीते हो।” उसने गंभीर होकर हमें देखा, “गांव में और कोई भी मेरे बाबा या मुझे या हमारी टोली में से किसी और को अपने घर में नहीं घुसने देता।”

“गांव वाले क्या कहते हैं, क्या नहीं, उससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।” विपिन ने कहा था। लेकिन बाद में, जब सेबेस्टियन चला गया तो उसने चिंता जताई थी, “बहेलियों को लोग चोरी-चकारी करने वाली जाति मानते हैं। तुम्हें ध्यान है सरपंच ने शुरू-शुरू में कहा था कि बहेलियों की बस्ती के पास होने पर भी इस गांव में कभी पुलिस नहीं आई? इन लोगों को काम पर रखने से हमारी क्रेडिबिलिटी पर असर पड़ सकता है।” “क्रॉप रोटेशन के बारे में बात करने से भी हमारी क्रेडिबिलिटी पर असर पड़ रहा है।” अदिति ने तीखी आवाज में था, “तो उसके बारे में भी बात करना बंद कर दें?”

“वो सब दारू के ठेके पर तुम्हें मारने को कह रहे थे। मैंने सुना तो तुरंत सरपंच के घर को दौड़ गया,” सेबेस्टियन ने सरपंच और गांव वालों के जाने के बाद बताया था। “मैंने सरपंच के घर के सामने जा कर खूब पुकारा। पहले तो उसकी बाई ने सोचा मैं खाना मांग रहा हूं और मेरे लिए ये पोळी ले आई।” उसने अपने हाथ में थमी रोटियां हमें दिखाईं। रोटियां बिलकुल बासी, रूखी-सूखी और कड़ी थीं। “लेकिन मैंने उसे कहा, “मुझे तुम्हारे आदमी से काम है।” अपनी कमर से सरकते जर्जर निकर को थामे, सरपंच को तलब करते हाथ भर के सेबस्टियन की कल्पना कर हम मुस्कुरा पड़े! “मैंने सरपंच को सब बता दिया और वो लाठी उठा कर तुम्हारे खेत की तरफ दौड़ा।”  सेबेस्टियन ने रोटियों का एक कौर तोड़ कर मुंह में घुमाया। “सरपंच की बाई ने मुझे कहा, “घर के सामने मत खड़ा रह। जैसे मैं उसके घर की छाया की चोरी कर लेता।” कुछ क्षण वह सूखा कौर चुभलाता रहा।  “यीशू-जीसस कहता है, हम सब भाई हैं।”

“बिलकुल ठीक कहा।” अदिति ने उसके रूखे बालों को थपका। “तुम हमारे साथ चल रहे हो? हम चिकन बना रहे है आज।” सेबेस्टियन ने स्वीकृति में सिर हिलाया। 

सेबेस्टियन अपने धर्म को बेहद संजीदगी से लेता था। अपने निकर की एकमात्र साबुत जेब में वह जीसस क्राइस्ट की एक रंगीन तस्वीर रखता था। तस्वीर में क्रॉस पर लटके मसीहा की देह के चारों ओर  सुनहरी पन्नी की किरणें चिपकी थीं और माथे पर का कांटों का ताज भी सुनहरी पन्नियों का बना था। रास्ता चलते वह ऊंचे सुरों में नागपुर के मिशन में सीखे यीशु के भजन गाता था। कुछ साल पहले उसके परिवार ने, अपनी टोली के एकाध दूसरे परिवारों के साथ ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था। सेबेस्टियन का पिता कई काम कर लेता  था- खाना पकाना, थोड़ा नल-बिजली का काम करना और बागबानी भी। सो उसे मिशन में काम पर लगा लिया गया था और सेबेस्टियन अपने आई-बाबा और भाई-बहनों के साथ मिशन में रहने लगा। वहीं उसने थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीखा और बाइबल की कहानियां और ईश भजन भी। लेकिन उन्हें आखिर मिशन छोड़ना पड़ा क्योंकि सेबस्टियन के पिता की कच्ची दारु की बोतलें एक धार्मिक महिला को उस आलमारी में मिलीं, जिसमें भजन की किताबें और मोमबत्तियां रखी जाती थीं। इसके बाद उसकी नशे की आदत को अनदेखा करना पादरी के लिए एकदम असंभव हो गया।

सेबेस्टियन के पिता के बारे में हमें हमारे प्रोजेक्ट-डायरेक्टर के एक परिचित ने बताया था, “बहेलिए जंगल, जानवरों वगैरह के बारे में बड़े जानकार होते हैं और ये तो सब तरह के काम जानता है।” हमें बहेलियों के बारे में बेहद उत्सुकता थी। हम जानते थे कि बहेलिए बाहर के लोगों से दूर रहते हैं, अपनी बस्तियों में किसी को घुसने नहीं देते। इसलिए जब एक सुबह सेबेस्टियन और उसका पिता वन विभाग के पुराने, दरकते बंगले पर हमसे मिलने आए, तो हमने बिना आगे पूछताछ उसे काम पर रख लिया। पहले ही दिन सेबेस्टियन पूरे बंगले का चक्कर लगा आया था। उसके पास हमारे लिए बहुत सी सलाहें थीं। मसलन- हमें रसोई के पास वाली नाली की मरम्मत करवानी चाहिए और टूटी दीवार के पास सब्जियां बोना बकरियों को दावत देना है। “गांव वाले कहेंगे कि जब तुम अपनी बाड़ी को बकरियों से नहीं बचा सकते तो खेतो को रनडुक्कर से क्या बचाओगे?” उसने अपनी आंखें हम पर गड़ा कर पूछा था। जब तक हम सेबस्टियन के पिता की नशे की लत के बारे में जान पाए, तब तक सेबेस्टियन हमारी नादानी देख कर स्वयं को हमारा अभिभावक नियुक्त कर चुका था। सेबेस्टियन का पिता तो इने गिने दिनों ही काम पर आता लेकिन सेबेस्टियन हर सुबह ताजा दूध लिए हमारे दरवाजे पर खड़ा रहता। उसने और भी बहुत से छोटे-मोटे काम खुद ही अपने जिम्मे कर लिए थे जैसे, मुर्गियों को दाने डालना और ताजे अंडे इकठ्ठा करना, हमारे सोलर लैंप को बंगले के सबसे उजले कोने में चार्ज करने के लिए रखना, हल्दी-मिर्ची या माचिस के लिए गांव की परचून की दूकान तक दौड़ जाना। उसके भजन घर के कोने-कोने में गूंजते और विपिन अनखना कर कहता, कि ये हिम्स उसे अपने स्कूल के दिन याद दिलाते हैं, जब सुबह-सुबह फादर्स मार्को, “कम सिनर्स, टू द गॉस्पेल फ़ीस्ट” गवाते थे और गलत सुर लगाने वालों को असेम्बली के बाद छड़ी से पीटते थे।

मिशन के पादरी ने ही सेबेस्टियन का नाम रखा था। “संत सेबेस्टियन में इतनी ताकत थी कि लोगों ने उन पर तीर चलाए तो भी वो नहीं मरे।” सेबेस्टियन ने हमें गर्व से बताया था। 

“सेबेस्टियन से पहले तुम्हारा क्या नाम था?” विपिन ने पूछा।

“नाम?”  

“हां, तुम्हें सब क्या कह कर बुलाते थे?” विपिन ने हमारी ओर नजर डाल कर कहा, “लोकल कल्चर ऐसे ही नष्ट हो रहा है, नए नाम रख के पुरानी परंपराएं खत्म कर रहे हैं...”

“मुझे लड़का या पाजी, हरामखोर, खालच्या जाति कह कर बुलाते थे। गांव के लोग अब भी यही कहते हैं।” सेबेस्टियन ने गंभीर भाव से कहा।

विपिन का चेहरा बुझ गया। “अनपढ़ लोग हैं यहां के, उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए...” वह बुदबुदाया।

“कल भी एक आदमी ने मुझे गाली दी थी, चोर और नीच जात कहा था। मुझे गली में एक नई पतंग मिली थी, वो छीन कर कहा, “चोर बहेलिए, खालच्या जाति, भाग यहां से नहीं तो मारूंगा।” “मैं भाग आया लेकिन गली के कोने पर रुक कर मैंने अपना नाम खूब जोर-जोर से चिल्लाया जिससे अगली बार उसे पता रहे कि मेरा नाम सेबेस्टियन है, चोर नहीं।”

अदिति की आंखों में एक गीली चमक थी। “पतंग तो जिसको मिलती है उसी की होती है, सेबेस्टियन। कल गांव में मुझे दिखाना कौन आदमी था, मैं उस से बात करूंगी।”

“तुम क्यों दुखी हो रही हो?” सेबेस्टियन ने सांत्वना दी। “पतंग तो वैसे भी मेरे पास नहीं रहती, बड़े लड़के छीन ही लेते हैं।”

“मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आज गांव वाले इतने भड़के हुए क्यों थे,” शो-फील्ड से लौटते हुए विपिन ने कहा, “सब तो ठीक चल रहा था...”

“क्योंकि कल रात को रनडुक्कर उनके खेतों में घुस गया और खूब फसल बिगाड़ी।”

“जंगली सुअर आए? तुमको कैसे पता ?”

“सबको पता है,” सेबेस्टियन ने कंधे उचकाए और सिर झटका, “तुम्हारे खेत में नहीं आया, आसपास के खेतों में घुसा। जहां तुमने पौध लगाई है, पहले वो खेत खाली पड़ा रहता था। जंगली कांदा, लाल माठ, पत्थर-फोड़ ये सब उगते थे। किसी के पास बुसाया बीज हुआ, तो वहां छोड़ देते थे। डुक्कर सबसे पहले उसी खेत को खूंदता था। जब सरपंच ने तुम्हें वो खेत दिया तो उसे कहां पता था कि कि तुम अलसी-तुलसी लगा कर सचमुच अपना खेत डुक्कर से बचा लोगे?”

“तुम ये सब जानते थे तो हमें बुवाई से पहले क्यों नहीं कहा? हम किसी दूसरे गांव में जगह देखते।”

सेबेस्टियन ने आंखें चौड़ी कर हमें देखा। “दूसरे गांव में? वहां मेरे बिना तुम्हारा काम कैसे चलता? तुम्हारी मदद कौन करता?”

बंगले पर वापस आ कर हमने प्रॉजेक्ट-डायरेक्टर को फोन लगाया था। “दिस इस सीरियस।” उनका स्वर चिंतित था, “क्वाइट सीरियस। मुझे शुरुआत में ही अचरज हुआ था कि तुम लोगों ने इतनी जल्दी फील्ड वर्क के लिए जगह कैसे तय कर ली। ये सब बहुत खोज-बीन करके तय करना होता है, पूरा प्रॉजेक्ट इसी पर डिपेंड करता है। लेकिन मैं तुम्हारी ऑटोनॉमी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था। खैर, लेट मी पुल सम स्ट्रिंग्स। मैं एमएलए से बात करता हूं। तुम लोग शो-फील्ड पर मत जाओ, अपने लोकल लोगों को काम करने दो कुछ दिन वहां।”

“दो हजार किलोमीटर की दूरी से ऑटोनॉमी में इंटरफियर करना कठिन है,” अदिति ने कॉल के बाद तल्खी से कहा था। “एक बार फील्ड तो क्या, डिस्ट्रिक्ट में आ कर भी नहीं झांका उन्होंने, लेकिन पेपर पब्लिश होने पर लीड इन्वेस्टिगेटर...”

अब जबकि हम शो-फील्ड या गांव में नहीं जा सकते थे, हमारे पास करने को कुछ नहीं था और इसीलिए हमने अगले दिन हटवाड़ा जाने का तय किया था। सेबेस्टियन को साथ ले जाने की पैरवी अदिति ने की थी। उसे साल, सागौन और महुआ के वनों के बीच से जाती पगडंडियों और कच्ची सड़कों पर हमारी जीप की पिछली सीट पर हिचकोले खाते जाने में जाने क्या आनंद आता था। सारे रास्ते वह चटर-चटर बतियाते हुए, पेड़ों, पक्षियों के नाम और गांव-थान की दिलचस्प बातें बताता जाता था। “इस गांव के लोग चमगादड़ों की पूजा करते हैं। उधर, दूसरी तरफ गुफा में मंदिर है, बारिश के पहले अमावस पर मेला भरता है, खूब गाना-बजाना होता है, चमगादड़ों को जंगल के फल और महुआ चढ़ाते हैं।”

“तुम्हें ये सब कैसे पता है, सेबेस्टियन?”

“मैं एक बार गया था। उन लोगों ने मुझे मंदिर पर चढ़ने नहीं दिया। मैंने एक पेड़ पर से सब देखा।” सेबेस्टियन ने नाक सुड़की, “चमगादड़ में से सड़े मुर्दे की-सी बदबू आती है, उसकी तो पूजा करते हैं लेकिन मुझे मंदिर पर चढ़ने नहीं देते।”

सेबेस्टियन के पिता के तालाब खोदने के अगले ही दिन प्रॉजेक्ट-डायरेक्टर का फोन आया था। “गाइज, मैंने तुम लोगों का अब तक का इकठ्ठा किया डेटा देखा है। बहुत अच्छा काम! मुझे लगता है कि पेपर लिखने के लिए ये काफी है। सेकंड फेज के लिए इस डेटा पर आधारित मैथेमैटिकल मॉडल्स से काम चल जाएगा।”

हमने एक-दूसरे की ओर देखा। “आप प्रोजेक्ट डिस्कंटिन्यू कर रहे हैं?” विपिन ने सावधानी से पूछा। 

“नहीं, बिल्कुल नहीं! तुम लोगो ने इतनी मेहनत की है और फिर प्रॉजेक्ट फुली फंडेड है, हम अपने डोनर्स के प्रति जवाबदेह हैं। लेट्स से कि मैंने प्रोजेक्ट को रीइवैल्यूट किया है कि कितना काम फील्ड में करने की जरूरत है, कितना दफ्तर से हो सकता है। हम साइंटिस्ट हैं, हमें अपनी पद्धति, अपनी योजना को लगातार क्वेश्चन करना चाहिए।  तुम लोग समझ रहे हो मैं क्या कह रहा हूं?” कुछ क्षण को खामोशी रही। “लुक गाइज मामला काफी नाजुक है और यही सबसे अच्छा तरीका है। इस साल पंचायत के चुनाव होने वाले हैं और सरपंच का कहना है कि अगर तुम लोग यहां काम करते रहे तो वह चुनाव हार जाएगा। सो पैक अप एंड कम बैक।”

हमारी तैयारी हो चुकी थी, सामान बंध चुका था और भारी एक्विपमेंट ट्रेन से भेजा जा चुका था। विपिन ने दूध-सब्जी का हिसाब कर दिया था और शो-फील्ड पर काम करने वाले मजदूरों का भी। सेबेस्टियन का पिता कहीं नशे में धुत्त पड़ा था। उसकी तनख्वाह के पैसे विपिन ने सेबेस्टियन को दे दिए थे। “सारी मुर्गियां-चूज़े तुम्हारे, अपने बाबा को कहना कि दड़बों की लकड़ी, लोहे का जाल और मुर्गियों का दाना भी ले जाए। कछुओं को नदी में छोड़ने की जिम्मेदारी तुम्हारी है।  इस तालाब में बहुत दिन मत रहने देना।” सेबेस्टियन ने सिर हिलाया था और नोट सावधानी से मोड़ कर अपनी जेब में, जीसस की फोटो के साथ रख लिए थे। अब वह अपनी जेब को सावधानी से दाहिनी हथेली से ढांपे, तालाब पर झुका कछुओं को तैरता देख रहा था।

“सेबेस्टियन” अदिति ने आवाज दी, “चलो, मुर्गियां पकड़ते हैं। अनूप जीप से तुम्हारे डेरे तक पहुंचा आएगा।”

सेबेस्टियन ने पीठ सीधी की और उठ खड़ा हुआ। “अगर मैं काछम होता तो कितना अच्छा होता। फिर मैं हमेशा पानी में रहता।” उसने धीरे-धीरे कहा। तालाब धूप में झिलमिला उठा, उसका आकार अस्पष्ट हो गया और वह अहाते भर में फैल गया। कछुए उसके लहरहीन, शांत जल में तिरते रहे।   

अनुकृति उपाध्याय

हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समान रूप से लिखती है। उनकी कहानियों में एक अलग तरह का नयापन होता है, जिसके कारण उन्होंने बहुत ही जल्द पाठकों के बीच अपनी पहचान बना ली है। हाल ही में आया कहानी संग्रह जापानी सराय बहुत चर्चित रहा। अनुकृति की कहानियों में वैश्विक दुनिया झांकती है और यह दुनिया मानवीय स्वभाव के मूल तंतु को हमेशा पकड़े रखते हैं।

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