Home कला-संस्कृति कविता रविवारीय विशेषः मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी दुश्मन उसका आसमां क्यूं हो

रविवारीय विशेषः मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी दुश्मन उसका आसमां क्यूं हो

MAR 27 , 2021
रविवारीय विशेषः मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी दुश्मन उसका आसमां क्यूं हो

in.pinterest.com

आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी। यह एक अनूठी प्रेम कथा है, जो सिर्फ एक हां या न पर टिकी है। इस हां या न के इंतजार के बीच न कोई झगड़ा है, न प्रणय निवेदन की लंबी तकरीरें। लेकिन जब हिस्से में हां आता है, तो यह पाठक को भी पीड़ा देता है। आसमान में चलती और वहीं खत्म होती एक भीगी सी प्रेम कहानी।

वह रन वे पर स्टार्टअप पॉइंट पर खड़ा था और मैं एटीसी (एयर ट्रेफिक कंट्रोल टॉवर) में बैठी थी। आरटी (रेडियो ट्रांसमीटर) पर उसकी खूबसूरत आवाज गूंजी। “जूलियट वन ओ वन परमिशन टू स्टार्ट।” मेरे सामने उसका वजूद कौंध गया।  “क्लियर स्टार्ट अप जूलियट वन ओ वन।” मैंने सांकेतिक भाषा में उसे जहाज उड़ाने की इजाजत के साथ, मौसम का हाल दिया। मौसम थोड़ा बादलों वाला था, जो कुछ ही देर में साफ होने वाले थे। यह पहला इत्तफाक था कि वह नाइट फ्लाइंग पर था और मेरी उस रोज नाइट ड्यूटी थी। उस दिन हमारी सीनियर एयर ट्रेफिक कंट्रोलर भी लेडी ऑफिसर ही थीं। मैं राडार के एक स्कोप (लगभग स्क्रीन जैसा) पर थी।

“गर्ल्स, टुडे यू आर गोईंग टू पेंट एटीसी इन पिंक?” (लड़कियों आज तो तुम एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर को गुलाबी रंग कर ही मानोगी?) वह अपने मिग-21 जहाज का टैक्सी रन करते हुए बोला।

“सर सॉर्टी पूरी करके आइए, वी विल सेलेब्रेट योर 1000 ऑवर्स ऑफ सोलो फ्लाइंग।” (सर अपनी उड़ान पूरी करके वापस आइए, हम आपकी एकल उड़ान के हजार घंटों का जश्न मनाएंगे।)। रचना मैम बोलीं।

“श्योर गर्ल्स, मुझे भी तुम सब को एक सरप्राईज देना है।” कह कर वह उड़ गया।

वह मुझसे आठ-नौ साल सीनियर अफसर था। बाहर से तो खासा संजीदा दिखता था, उसके क्लीन शेव्ड चमकते चेहरे पर हमेशा एक छिपी-सी मुस्कुराहट रहती।  उसके शिष्ट व्यवहार और बातचीत से लगता कि हम सब की तुलना में जीवन को उसने बहुत गहरे उतर कर देखा है। उसके हैलमेट में बंद सिर और नारंगी ओवर ऑल में कसे जिस्म में क्या चलता था, यह कोई जानता नहीं था। गोरे चेहरे और दुबले-लंबे डीलडौल के चलते वह उम्र में उतना बड़ा नहीं लगता था जितना कि वह असल में था। डायनिंग हॉल में अकसर वह खाने की मेज पर मेरी बेवकूफाना  बातों पर हंस देता या मेरी अनुभवहीनता पर आश्चर्य करता। कभी-कभी बड़ों की तरह टोक देता, किसी वजह पर, कभी बेवजह ही, “तुम बेमन से खाना क्यों खाती हो? कितना प्लेट में छोड़ देती हो। गलत है यह।” मैं बस दो साल पहले आई, नई रंगरूट थी। मुझ पर रौब जमाने का सबका हक भी था।

वह पूरी दुनिया घूम चुका था। उसकी कत्थई आंखें किसी पुराने दर्द का हल्का-सा पता देती थीं। कहीं कोई खुरंट लगा घाव था कि आधुनिक लड़कियों को लेकर एक तंज उसकी बातों में छुपा रहता। खासा दुनियादार होते हुए भी स्प्रिचुएलिटी को वह जिरह बख्तर की तरह ओढ़े रखता।

“लाईफ इज टू शॉर्ट... लव योरसेल्फ” यह उसका प्रिय जुमला था। उसने अब तक शादी नहीं की थी इसलिए मैस में ही रहता था। हमारे समाज में पैंतीस पार के अविवाहितों पर जो अटकलें लगा करती हैं वही उसे लेकर लगाया करते थे आस–पास के लोग। कुछ बताते थे कि स्कूल के दिनों की गर्लफ्रेंड थी, जिसने उसके दोस्त से शादी कर ली। कोई कहता अपनी बड़ी बहन की शादी न हो पाने के कारण वह भी बैठा है। कोई कहता फ्लर्ट है, काम चल रहा है तो शादी क्यों करे! कोई-कोई तो हद पार कर देता, शादी को लेकर उसकी नाकाबिलियत पर जुमला कस कर। मैं जानती थी अटकलों से परे किसी को यहां किसी की भीतरी खुशी और दुख से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। फर्क मुझे भी नहीं पड़ता था, पर जब वह सामने पड़ता तो मेरे मन का पानी हल्का-सा हिलता। इतना हल्का कि मुझे पता ही नहीं चलता। मैं मन ही मन बस उससे कुछ पूछना चाहती थी, हकीकत। यह कितना फिजूल ख्याल है, मुझे पता था वह डांटकर भगा देगा।

वह मुझसे बहुत सीनियर था, अपनी स्क्वाड्रन का फ्लाइट कमांडर। आठ-नौ साल हमारे प्रोफेशन में बहुत बड़ी औपचारिकता की दीवार खड़ी कर देते हैं। मुझे वह इंसान के तौर पर पसंद है, मगर उस तरह नहीं जिस तरह असीमा को। असीमा, मेरी रूममेट है और मुझसे चार साल सीनियर अफसर। वह पूरे खुलेपन के साथ कहती है, कि उसके तमाम सनकीपन के, उसके लिए फैली तमाम अफवाहों के साथ वह उसे चाहती है, मुमकिन है कि उसने उस पर यह चाहत जाहिर भी कर दी हो। क्योंकि अचानक उस बंदे ने हमारे कमरे में ताश खेलने आना बंद कर दिया था। पहले की तरह उसने हमारे गैंग के साथ पिक्चर और बाहर पिकनिकों पर जाना भी बंद कर दिया था।

“तुमने नाराज किया उसे? तुम्हीं बुला लो।”

“मैंने कोई नाराज नहीं किया, न आए मेरी बला से। देख नेहा, मैं पलक झुका कर प्यारे शब्द बोलने की जगह उसकी आंख में आंख डाल कर कहना पसंद करूंगी कि हां! तुम मुझे पसंद हो, मैं तुम्हें पसंद होऊं तो बोलो, यस्स! अब मुझे यकीन हो चला है, ही इज हार्ड नट टू क्रेक (उसका अपने खोल से निकलना मुश्किल है) वह अपने अलावा किसी से प्यार कर नहीं सकता।”  

असीमा सुंदर, लंबी और आकर्षक है। उस बंदे के व्यक्तित्व के बरक्स कहीं से कम नहीं, बल्कि इक्कीस ही होगी। कोई भी उससे खुशी–खुशी जुड़ना चाहेगा। उस पर मेडिकल ऑफिसर है। कुछ साल बाद वह चली जाएगी, फौज से बाहर। डॉक्टर है, उसे क्या कमी?  

“तुमने परमानेंट कमीशन के लिए अप्लाय नहीं किया?” मैंने असीमा से पूछा था।

“ऊंह!, उसके अलावा फिर फौज में मेरे लिए क्या है? उसने अब तक कुछ कहा भी नहीं। बाहर जाकर मैं एक जगह टिक तो सकूंगी।”

“तुमने उससे पूछा था?”

“सीधे–सीधे तो नहीं, जैसा तुम सोच रही हो। पर मैं जानती हूं वह जानता है कि मुझे उसके जवाब का इंतजार है।”

लेकिन उसने तो फिर हमारे कमरे की तरफ रुख तक नहीं किया। पहले वह हर शुक्रवार की शाम हमारे कमरे में आ जाया करता था। हम स्वीप खेला करते। ताश का यह खेल उसी ने मुझे सिखाया। असीमा अपलक उसे ताका करती या उसके लिए बंगाली ढंग की फिश पकाती थी। मैं छुट्टी पर चली गई थी और पता नहीं मेरे पीछे से ऐसा क्या हुआ! 

पिछले सप्ताह ही की तो बात है, शनिवार–इतवार के साथ एक छुट्टी और जुड़ गई थी। राजस्थान के इस रेगिस्तानी शहर से पंद्रह किमी दूर इस एयर बेस के आस–पास कोई मॉल, पिक्चर हॉल नहीं है, जहां हम समय काट लें। वैसे तो हम सभी बेहद व्यस्त रहते लेकिन हम जब भी खाली होते पार्टी कर लेते थे। तेज संगीत, डांस, शराब, खाना और बातें। उस दिन भी हम पार्टी मूड में थे। असीमा सबसे आगे। पहले सब बार में इकट्ठे हुए। मेज बजा-बजा कर गाने का मूड बन गया।  कोई जाकर इसे भी स्कैवेश कोर्ट से बुला लाया। पसीने से गीले बाल, वह आकर मेरे और असीमा के पास बैठा गया। असीमा ने मुझे एसएमएस किया, “आह! यह ईथर की तरह महक रहा है, मैं मीठी बेहोशी में जा रही हूं।” मैंने असीमा को हंस कर आंख दिखाई। तभी उसने अनाउंस किया कि ड्रिंक्स आज मेरी तरफ से। सारे बैचलर्स ने उसके नाम का हुर्रा किया।

सब कोरस में गा रहे थे। मस्ती भरे ताजा फिल्मों के गीत कि अचानक वह जोर से गाने लगा, “ये जो मोहब्बत है, उनका है काम...” हम सब सब चुपचाप उसकी सधी आवाज को सुनने लगे। असीमा ने मुंह बिचकाया।

“उदास गीतों को खुशी के अंदाज में गाना एक कला है, इनकी धुनें जिंदादिल होती हैं। ये जीने की ताकत देती हैं।”

“सर क्या गाते हैं आप।” सबने कहा था।

“मेरी मां बंगाली थीं, वे जितनी खूबसूरत थीं, उतना खूबसूरत गाती थीं। हिंदी गानों में उनकी जान बसती थी। कह कर उसने जेब से वॉलेट निकाल कर सबको अपनी मां की फोटो दिखाई, जो थोड़ी पुरानी होकर और सुंदर हो गई थी।”

“आप इनसे हूबहू मिलते हैं।” असीमा ने उसकी आंखों में डूब कर बोला और उंगलियां चटकाने लगी।

अचानक कहीं से सिगरेट के धुंए के बीच एक बहस उठी, “आजकल के प्यार पर, ट्रायल एंड एरर पर, लव मैरिज पर, अरेंज्ड मैरिज पर। अफसरों के आपस में सूटेबल मैच देख कर शादी कर लेने पर। सब बोल रहे थे। मैं भी, असीमा भी। बस वही चुप था। सिगरेटों से ही नहीं, बहस से भी धुंए निकल रहे थे। बार के धुएं में सबके चेहरे खो गए थे।

“लड़कियां प्रेम नहीं करतीं, लड़के का करिअर और भविष्य देख कर तय करती हैं कि साथ रहना है।”

“हर पोस्टिंग पर मंगेतर बदलती हैं। कैरियर ग्राफ देख कर।”

“हे, आई ऑबजेक्ट! बकवास है यह। लड़के कौन से प्रेम करते हैं? उनको भी दो तनख्वाहें चाहिए होती हैं। मैं कुछ ऐसी शानदार करिअर वाली लेडी ऑफिसर्स को जानती हूं जो केवल इश्क के कारण बाहर अपना लॉ या एमबीए कर शानदार करिअर छोड़ फौज में आईं, अपने बॉयफ्रेंड के कारण। यहां भी कोई बेकार की ब्रांच ले कर।” असीमा बोली।

“तुम लोग भी कम नहीं, लड़कियों को समझते क्या हो? प्यार सुंदर, बोल्ड लड़की से। शादी या तो नौकरी वाली से या मोटे दहेज वाली से। आजकल इश्क़-विश्क़ कौन करता है? जो हम करें, तुम प्रेक्टीकल तो हम डबल प्रेक्टिकल।”

“करने वाले इश्क़ भी करते हैं। मेरी एक बैचमेट ने सार्जेंट से शादी कर ली।”

प्यार, व्यवहारिक लड़के, बेवफा लड़कियां। शादी से भागते लड़के, प्रेम में सब छोड़ती लड़कियां। खूब शोर मचा, अंत में बात उस पर आ टिकी। अनजाने में या जानकर, पता नहीं।

“सर, आप कुछ बोलिए”, हमारी तरफ से एक नया-नया आया फ्लाइंग ऑफिसर बोला।

“बॉयज़, ये डिसकस करने की बात नहीं, कर गुजरने की बात है। माना इश्क करना और इश्क में चोट खाना भी एक शिवालरी है यारों। लेकिन एक हद बाद इंसान को कहीं सेल्फिश हो ही जाना चाहिए। दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें। वैसे गालिब चचा तो नसीहत दे ही गए हैं।”

“वफा कैसी कहां का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा

तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यूं हो”

वाह-वाही का शोर उठा, वह शेर कह कर जाने लगा।

“इतनी जल्दी खाना सर? सर अभी तो महफ़िल जमी है। वीकेंड शुरू हो चुका है। सर यह ग़जल तो पूरी हो जाए।”

उसने बारटेंडर को सबके दो-दो ड्रिंक लाईन-अप करने को कहा। खुद सिगरेट सुलगा ली। ग़ज़ल के कुछ शेर और कहे गए। जो मेरे कुछ पल्ले पड़े, कुछ नहीं। असीमा दीवार पर लगे टीवी को घूरती रही मानो उसे ग़ालिब में और गज़ल कहने वाले में कतई रुचि न हो। मैं कनखियों से असीमा को देख रही थी। हर शब्द उसे चोट पहुंचा रहा था, वह होंठ भींचती जा रही थी।

“हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमां क्यूं हो।” 

बार बंद होने का समय हो रहा था, उस पर शायरी से पक चुके बारमैन ने सबके दो दो ड्रिंक लाईन अप किए और चला गया। मैंने तौबा की, शराब से नहीं जूस से। असीमा वोद्का ले लेती है। उसने अपना गिलास उठाया और सिप करने लगी। लड़के जोश में आ गए। एक ऑफिसर ने अहमद फ़राज की ग़ज़ल सुनाना शुरू की। समां बंध गया था।

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं

सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

मैंने कहा, “असीमा को नेरुदा ज़बानी याद हैं, सुनाओ न यार।” बहुत ज़िद के बाद अपनी मीठी आवाज़ और कमाल के उच्चारण के साथ असीमा ने कविता शुरू की।

I love you as certain dark things are to be loved,

in secret, between the shadow and the soul…

(मैं तुम्हें प्यार करती हूं वैसे ही जैसे किन्हीं ख़ास स्याह चीजों को प्यार किया जाता है सबसे छुपा कर, रूह और परछाईयों के बीच) 

उसके चुप होने के बाद वह उससे मुखातिब हुआ। उसकी आंखों में सुरूर था। सिंगल मॉल्ट का या कि असीमा के शब्दों का।

“असीमा तुम भी तो कविताएं लिखती हो? अपना लिखा कुछ सुनाओ।”

“कुछ ख़ास नहीं सर, बस यूं ही कुछ फिलॉसफी!” मुझे लगा सुलह हो गई।

“फिलॉसफी की तो तुम लोगों की उम्र नहीं। तुम लोग तो बच्चे हो। इस उम्र में तो हमने किसी की गोरी पीठ पर कविता लिखी थी, घर जाकर उसने किसी तरह आईने में पढ़ी।” लड़कों का शोर गूंजा।

“क्या बात है सर! कौन थी वह लकी गर्ल?” उसे चढ़ गई है। वह जान गया था। उसने आखिरी पैग छोड़ दिया आधा ही और उठ गया।

“डिनर सर?”

“आयम डन। सॉरी मैंने तुम लोगों की शाम खराब की।” कह कर उसने असीमा को ताका और मुड़ कर चला गया। असीमा ने उसके ताकने को जानबूझ कर इग्नोर किया। सच ही में अजीब है यह बंदा। इतनी सुंदर, ज़हीन, डॉक्टर लड़की तुमको भाव दे रही है, तुम हो के....ब्लोहॉट-ब्लोकोल्ड (कभी नरम-कभी गरम) मैं असीमा की जगह होती तो दो साल तक पीछे नहीं भागती। मुझे क्या?”

ख़्यालों की पटरियों पर मैंने उस दिन की बातों की रेल ही चला डाली थी कि तभी रचना मैम के पास मैट ऑफिस से मैसेज आया, क्लाउडिंग डिफ्यूज (बादल बिखर) नहीं हो रही है, बल्कि घनी हो सकती है, अगले चालीस मिनटों में आसमान में उड़ रहे दोनों जहाजों को सुरक्षित नीचे उतरने के संदेश दे दिए जाएं। मेरे साथी आरटी पर उससे संपर्क करते तभी अचानक आरटी पर उसकी ही आवाज गूंजी। वह कह रहा था, “जूलियट वन ओ वन कॉलिंग गोल्ड फिश।” उसने रेडियो ट्रांसमीटर की सांकेतिक भाषा में संपर्क करना चाहा।

“जूलियट वन ओ वन गो अहेड।”

“रॉजर... आय एम एन काउंटरिंग आई एम सी। एंटरिंग इन क्लाउड। हैंडिंग 090 क्लाईम्बिंग टू नाईन ज़ीरो।” (मेरा जहाज इंस्ट्रुमेंटल मैट कंडीशन में है, सामने बादल हैं, 090 डिग्री पर मैं दो हजार नौ सौ फीट पर ऊपर जा रहा हूं)

“जूलियट वन ओ वन, गोल्ड फिश... आय एम गेटिंग यू, करेक्ट योर हैडिंग। क्लाइंब एंड मैंटेन हैडिंग एट लेवल 350 एंड रिपोर्ट लेवलिंग आउट” (हां आपको सुन पा रही हूं, जहाज का रुख सही करें और तीन हजार पांच सौ की ऊंचाई तक जाएं। उस स्तर पर जाकर रिपोर्ट करें)

कुछ देर सन्नाटा रहा, मगर रडार पर जो दिख रहा था, वह ठीक नहीं था। रचना मैम मेरे ही पास थीं। “जूलियट वन ओ वन यू आर अपीयरिंग इनवर्टेड, गो टू इंस्ट्रुमेंट। गो टू इंस्ट्रुमेंट!”

(जूलियट एक शून्य एक आपने तो जहाज पलट दिया है, आप उपकरणों की मदद लें)

“ओह नो! वो तो इनवर्टेड... अब तो इजेक्शन भी मुश्किल।”

मैं घबरा गई और मेरी चीख सी निकल गई। जब वह बोला... “जूलियट वन ओ वन रिपोर्टिंग क्लियरिंग क्लाउड़्स आयम सीईंग स्टार्स...” (मैं बादलों से बाहर हूं और सामने सितारे दिख रहे हैं)

मैं बर्फ में बदल गई। स्टार्स? और राडार पर उसके जहाज का कोई संकेत नहीं था। अफरा-तफरी की शुरुआत हो चुकी थी।

“रचना मैम!” हम दोनों मुंह बाए सफेद चेहरे लिए एक-दूसरे को देख रहीं थीं। आरटी पर रचना मैम चीखीं, “मिकी, गो इंस्ट्रुमेंटल। रिवर्ट कर लेफ्ट ले कर हैड टुवार्ड्स अप।” (मिकी उपकरणों की सहायता लो। या सीधे होकर, बायीं तरफ घूम कर ऊपर जाओ)  

“मेडे–मेडे! ओ... फक इट। आयम फिनिश्ड!”   

वह तेजी से नीचे आते हुए जहाज को गाली दे रहा था, उसके आखिरी शब्द जो मैंने सुने, “मम्मी खत्म सब। हे एमी, यस्स! यस्स!”

उसके बाद आरटी कनेक्शन खो गया! एटीसी में जितने लोग थे टावर में चले आए। मेरे साथ सभी के चेहरों के रंग फीके पड़ गए। हम सब जानते थे उसे स्पेसियल डिसऑरिएंटेशन (जहाज उड़ाते हुए होने वाला दिशा भ्रम) हुआ है। वह आसमान में नहीं चढ़ रहा था, आकाश समझ कर उसने जिस दिशा में थ्रोटल दबाया वह तो जमीन थी। जिनको वह सितारे समझा वे जमीन की रोशनियां थीं। मेरे हाथों से पसीने छूट गए। मैंने अपनी मुट्ठियों को ऐसे भींचा कि मेरे ही नाखून उनमें गड़ गए। मेरा मन किया मैं सिर धुनूं, नहीं, मुझे हिस्टारिकल नहीं होना चाहिए। मैं रडार स्क्रीन पर से गायब बिंदू की खाली जगह में आंख गड़ा कर चेतना-शून्य सी हो गई। नीचे रनवे से एंबुलेंसों के सायरनों की आवाजें आ रही थीं।  मैंने आकाश में देखा तारे स्तब्ध नीचे को ताक रहे थे।

देखने वालों ने देखा होगा जहाज एक पलटी दाईं तरफ लेकर तीर की तरह जमीन की तरफ बढ़कर कुछ ही पलों में जमीन में धंसा होगा और आग के बगूले में बदल गया होगा। उसकी आवाज अंतरिक्ष में बिखर गई होगी। रडार डाटा बता रहा है, वह आकाश में 2900 फीट तक चढ़ा, कुछ देर की उड़ान के बाद वह बादलों में घिर गया। बादलों से निकल आना उसके बाएं हाथ का खेल था मगर उसे दिशा भ्रम हुआ फिर बाईं की जगह दाईं तरफ घुमाव लेकर वह बादलों से निकल कर धरती की दिशा में मुड़ गया। और सब खत्म! मैंने सर थामा और वहीं जमीन पर बैठ गई। दूसरा जहाज सुरक्षित उतर गया था। मेरा मस्तिष्क सुन्न होकर भी, क्या-क्या सोच रहा था। उसकी मौत, असीमा, उसकी आखिरी चीखें, कोर्ट ऑफ इनक्वायरी में मुझे क्या कहना होगा? क्या पता वह इजेक्ट कर गया हो। काश...। वो रात बीती नहीं, मन में कालिख बन कर जम गई। जमी रहेगी।

अगले दिन पता चला, तेज स्पीड के कारण, वह इजेक्शन नहीं कर सका था, संभव भी नहीं था हमारे स्टेशन से तीस किलोमीटर की दूरी पर जहाज मरूस्थल की धरती में आधा गड़ कर जल गया था। उसका शव राख हो गया था।

तुरंत ही कोर्ट ऑफ इनक्वायरी हुई। अगले तीन दिन अजीब हाल में गुजरे। मैं फूट फूट कर रोना चाहती थी, मगर दिन में मैं प्रिसाइडिंग अफसर और कोर्ट ऑफ इनक्वायरी के सदस्यों के सामने बैठी होती थी। रात को बुत बनी असीमा के सामने। हालांकि अपने पक्ष में मुझे कुछ नहीं कहना था, सब कुछ रिकॉर्डेड था। रिपोर्ट्स आईं, न बादलों की गलती थी, न जहाज में खराबी थी। बादलों से निकलते हुए उसे स्पेसियल डिसऑरिएंटेशन हुआ था। आकाश में एक से दिखते दृश्य के कारण होने वाला दिशाभ्रम। वजह थी, वेस्टीब्यूलर इल्यूजन*।

जिस दिन यह रिपॉर्ट पढ़ी जा रही थी, रिकॉर्डिंग्स सामने लाई जानी थीं मैंने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के लिए आए एक बहुत सीनियर अफसर को हांफते हुए दूसरे से कहते सुना, “हर पायलट एक न एक दिन दिशा भ्रम का शिकार होता है। गति और एक सा दृश्य मिलकर उसे भ्रम देते हैं कि हॉराईज़न उलट दिशा में है। जो इसमें घुस कर इस से बच जाते हैं, वो बास्टर्ड्स होते हैं, जैसे कि मैं। मुझे लेह में महसूस हुआ था, जब मैं यंग था... लिटरली मुझे लगा था कि मैं जेट के पंखों पर बैठा खुद को कॉकपिट में जहाज उड़ाता देख रहा हूं। उसके बाद मैंने मेडिकल करवाया और ग्राउंड पर आ गया।”

अगले सेशन में ब्रीफिंग रूम में रिकॉर्डिंग्स सुनी गईं। असीमा मेरे पास ही बैठी थी, वैसे ही चुप, जैसी कि मेरी आशंका सही थी उसके आखिरी शब्दों की रिकॉर्डिंग्स भी...सब सन्न थे जब उसके आखिरी बोल गूंजे, “ओ हैल मेडे, मेडे... फक इट... आयम फिनिश्ड! एम्मी! यस्स... गुडबाय मम्मी।”

असीमा का बुत हिला, उसने मेरी हथेलियों को लगभग अपनी हथेलियों से पीस दिया। मुझमें ताब नहीं थी न उसकी तरफ देखने की, न उससे हाथ छुड़ाने की। बतौर प्रोफेशनल सबके सामने रोने की इजाजत किसी को नहीं थी। क्रेशेज पार्ट ऑफ प्रोफेशन हैं।

उस रात हम दोनों रात को एक बजे एक–दूसरे से लिपटे जग रहे थे। अपने में डूबी थी असीमा। हम दोनों ने ही तीन दिन से न ठीक से कुछ खाया था, न ही पूरी नींद ली थी। टुकड़ों में नींद और टुकड़ों में खाना, टुकड़ों में ही एक-दूसरे से छिप कर आंसू। मैं उठी और कॉफी बना लाई।

“मैंने सायरन सुने थे। मुझे लग रहा था कुछ बड़ा घट रहा है। मैंने उस पल अपनी घड़ी देखी थी। मुझे ख्याल आया था कि मिकी सर को टेक ऑफ किए बीस मिनट बीते हैं। मैं सोचती ही रह गई कि मुझे वहां जाना चाहिए क्या? क्योंकि उस वक्त मेरी ड्यूटी खत्म हो चुकी थी। मैं यहां कमरे में थी। नेहा, उस शाम उसका प्री फ्लाइट मेडिकल मैंने ही किया था। मुझसे कुछ छूटा या उसने कुछ छिपा लिया? वेस्टीब्यूलर सेंसेज़*...!”

“पता नहीं, मगर नाइट फ्लाइंग के लिए वो हमेशा उतावले रहते थे। उस दिन उसकी इसी बात पर मेरे सामने सीनियर मैट ऑफिसर से बहस हो गई थी। उन्होंने कहा था, “मिकी, ऊपर जाने की इतनी भी उतावली में मत रहो। मौसम की तो सुननी पड़ेगी। चालीस मिनट बाद क्लियरेंस दे दूंगा।” यह बात मुझे अजीब लगी थी। वो पलट कर बोले, “आसमान मेरे लिए घर है सर। इससे बुरे मौसम में मिग्स उड़ाए हैं। मेरे नाइन हंडरेड नाइंटी नाईन आवर्स पूरे हो चुके हैं, आज स्पेशल दिन है हजार होने दें। विजिबिलिटी की कोई प्रॉब्लम तो है नहीं। जरा से बादल हैं छंट जाएंगे।”  

“हां, वह कहता था मुझे बाज की तरह आसमान से प्रेम है, चाहे वह नीला हो, बादलों से भरा सलेटी हो कि गहरा काला, सितारों से भरा तो सबसे बढ़िया। मगर अब? अब जब भी मैं किसी बाज को नाक की सीध में उतरता देखूंगी वह याद आएगा।” वह कॉफी के मग को घूरते हुए बोली।

“तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि आखिरी पलों में वह यह सब बोला था।”

“असीमा, उन पलों में क्या गुजर रहा था, क्या कहूं? हां मैंने ही उसके आखिरी शब्द सुने, मगर सुन कर भी नहीं सुना कुछ...”

“उसने यस्स कहा था। एम्मी यस्स!”

“हां, आयम्म फिनिश्ड यस्स... यही तो?”

“नेहा! वह एम्मी यस्स बोला।” असीमा की आंखें डबडबा रही थीं।

“एम्मी मैं हूं। मैंने कितना इंतजार किया था इस यस्स का। लेकिन नेहा, यह यस्स... नहीं ही कहता तो बेहतर था। अब मैं आगे किस बात का इंतजार करूंगी?”  कह कर पहली बार असीमा फूट पड़ी हिचकियों में, जैसे कोई बरसाती नदी पत्थरों से फूट कर बह निकले।

* वेस्टी ब्यूलर इल्यूजन – गति और दिशा को कान के भीतरी हिस्से ऑटोलिथ से महसूस करना। कई बार यह पायलट को गलत निर्देश दे देता है। इनर्शिया की वजह से भीतरी कान का यह हिस्सा एल्टीट्यूड में महीन और एकसार गति के कारण हो रहे बदलाव महसूस नहीं कर पाता और भ्रामक अनुभव होने लगते हैं। इससे पायलट दिशा भ्रम का शिकार हो जाता है।

* मे डे ! मे डे ! आपात स्थिति में पुकारा जाने वाला, वैश्विक तौर पर मान्य संकेत है। इसे 1923 में लंदन एयरपोर्ट पर एक एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और रेडियो ऑफिसर ने ही इजाद किया था क्योंकि यह एक फ्रांसीसी शब्द ‘मेदेयर’ जैसा है जिसक अर्थ है, हेल्प मी।

मनीषा कुलश्रेष्ठ

26 अगस्त, 1967 को जोधपुर, राजस्थान में जन्म। विज्ञान से स्नातक। कठपुतलियां, कुछ भी तो रूमानी नहीं, बौनी होती परछाई, केयर ऑफ स्वात घाटीलोकप्रिय कहानी संग्रह। शिगाफ और शालभंजिका चर्चित और प्रशंसित उपन्यास। हाल ही में प्रकाशित मल्लिका उपन्यास बहुत चर्चित रहा। कई सम्मान और पुरस्कार उनके खाते में दर्ज हैं।