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रविवारीय विशेषः राजेन्द्र दानी की कहानी तलब

JAN 30 , 2021
रविवारीय विशेषः राजेन्द्र दानी की कहानी तलब

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आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए राजेन्द्र दानी की कहानी। कहानी का शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह डालता है। लेकिन एक तलब के लिए व्यक्ति क्या कुछ नहीं कर गुजरता उसका दिलचस्प ब्योरा यह कहानी देती है।

ट्रेन चल पड़ी है और चल रही है। प्लेटफार्म छोड़ने के बाद बाहर अंधियारा है। ए.सी. टू कम्पार्टमेंट में अभी सब लोग सो नहीं गए हैं इसलिए भीतर उजियारा है। कहीं-कहीं अंधेरा भी हो गया है। ट्रेन बारह बजे रात को चलती है एक विचित्र समय में, इसलिए कम्पार्टमेंट की गहमागहमी में लोग विचित्रताओं से भरे हुए हैं। ट्रेन की गर्जना ए.सी. कम्पार्टमेंट में नहीं के बराबर सुनाई पड़ती है। लोगों की बातचीत की आवाजें दूर से आती लगती हैं। न जाने क्यों। कृष्णन खुश नहीं है। उन्हें बेइन्तहा सिगरेट की तलब है। वे मौन रहते हैं। अभी एक शादी में इन्दौर जा रहे हैं। वहां भीड़ होगी पर वे चुप रहेंगे। उनकी शुरू से आदत है। घर के छह-सात लोग और साथ में हैं जिनमें एक छोटा बच्चा है, जिसकी टिकट अभी नहीं लगती है। आमने-सामने की दो बर्थ और साइड अपर और लोअर हैं उनके पास। कृष्णन के हिस्से साइड लोअर आई है। वे सत्तर को छूने वाली उम्र में हैं इसलिए ऊपर चढ़ नहीं पाते। पत्नी के अलावा साथ में उसकी दो सालियां हैं और उनमें से एक का जवान बेटा है और एक का वही छोटा बच्चा। छोटे वाले एक साढ़ू भाई भी हैं। उनकी साठ पार की उम्र है और वे भी कृष्णन की तरह सेवानिवृत्त हैं। ट्रेन को चले अभी देर नहीं हुई है और सब लोग अपनी-अपनी बर्थ पर व्यवस्थित होने की कोशिश में हैं। कृष्णन ने पहले ही अपना बेडरोल खोल कर अपने बर्थ को व्यवस्थित कर लिया है।

सिगरेट की तलब सिर्फ दिलो-दिमाग में है इसलिए उन्हें कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है कि घर के तमाम लोग क्या बतिया रहे हैं जबकि वे लोग काफी शोर कर रहे हैं। कृष्णन अभी बैठे हैं और इन्तजार कर रहे हैं कि सब अपनी-अपनी बर्थ पर लेट जाएं और वहां भी अंधियारा हो जाए और वे अपनी इच्छापूर्ति के लिए उठें। सब हड़बड़ी में हैं पर अपनी मनःस्थिति की वजह कृष्णन को लग रहा है कि लोग कितनी देर कर रहे हैं। उनकी ऊब की चरम पर सब आखिरकर लेट गए और किसी ने कहा, “आप भी भैया लेट जाएं।” शायद वह साढ़ू था, पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे कुछ देर और बेचैन बैठे रहे। काफी देर बाद जब वहां भी अंधियारा हो गया और उन्हें इत्मीनान हो गया कि सारे लोग नींद की आगोश में चले गए हैं तब वे उठे। कम्पार्टमेंट में सिर्फ नाइट लैंप जल रहे हैं। वे कम्पार्टमेंट के दरवाजे की ओर जाते हुए जैसे किसी सुरंग में जाते हुए महसूस कर रहे हैं। उनके और घर के सब लोगों के बर्थ, कम्पार्टमेंट के दरवाजे से ज्यादा दूर नहीं है पर उन्हें उस सुरंग में चलते हुए जैसे दूरी कुछ अधिक लग रही है। सिगरेट की तलब की अभूतपूर्व बेचैनी उनके भीतर घर कर गई है और लगातार बढ़ती जा रही है। वे हैरत में हैं कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ पर अब न जाने क्यों हो रहा है। वे पिछले अनेक वर्षों से सबसे छिपकर सिगरेट पी रहे हैं। सब नाराज होते हैं इसलिए ऐसा है। सरकार ने भी चारों तरफ निषेधाज्ञा लगा रखी है इसलिए भी छिपकर सिगरेट पीना भी इत्मीनान भरा नहीं रह गया है। अब अभी भी छिपकर ही तो पीना है। यह गनीमत है कि एअर कंडीशंड कम्पार्टमेंट में यह लुकाछिपी संभव है क्योंकि इस पर सफर करने वाले आमतौर पर रसूख वाले लोग होते हैं, दूसरे यह कि एक हिस्से के बाद कम्पार्टमेंट में दरवाजे के पास कोई होता नहीं है। दूसरी बात कि एयर कंडीशनिंग बरकरार रखने के लिए बर्थ की समाप्ति पर एक डोर और होता है, जो खोलने के बाद अपने आप बंद हो जाता है। वहां से सिगरेट के पीने की गंध अंदर तक पहुंच नहीं पाती। यह सब जानते हुए और याद करते हुए ही कृष्णन चल रहे हैं। एक भरोसा उन्हें अनेक अनुभवों से है कि कोई देख भी लेगा उन्हें सिगरेट पीते हुए तो केवल एतराज ही जता पाएगा, कोई पकड़वाने की धमकी नहीं देगा। अगर ऐसा हुआ तो वे सिगरेट चलती ट्रेन से बाहर फेंक देंगे। तब सिगरेट न पी पाने का मलाल नहीं रहेगा क्योंकि जलाते ही एक लंबा कश तो वे ले ही चुके होंगे।

यही सब कुछ विचारते वे कम्पार्टमेंट के दरवाजे तक पहुंच गए हैं। उनके चलकर वहां तक पहुंच जाने की कोई आवाज उन्होंने होने नहीं दी है। सिर्फ बर्थ जहां खत्म होती है वहां के आटोमेटिक बंद होने वाले दरवाजे को खेलने पर एक ‘चूं-चरर’ की आवाज भर हुई पर वहां की बर्थ पर सोए हुए लोगों को उस आवाज ने डिस्टर्ब नहीं किया है। इसका उन्हें गहरा इत्मीनान है। कम्पार्टमेंट के दरवाजे को खोलने की अब वे मशक्कत कर रहे हैं। ट्रेन में सभी चीजें बेहद टिकाऊ बनाई जाती हैं इसलिए आम तौर पर सब कुछ ठोस लोहे का होता है। दरवाजे को खोलने में एक सहज सी ताकत से काम नहीं चल रहा है, उन्हें जोर लगाकर अतिरिक्त ताकत जुटानी पड़ रही है जो उनकी उम्र में कष्टप्रद है। वे कष्ट उठाकर दरवाजा खोल रहे हैं। ताकत के आखिरी झटके पर दरवाजा खुल गया है। तेज हवा के एक जबर्दस्त झोंके ने उन्हें जैसे पीछे धकेल दिया है। वे यह जानते हुए ही दरवाजा खोल रहे हैं इसलिए वे स्थिर रहे आए और सिर्फ तेज हवा के झोंके का शरीर को हल्का सा धक्का सा लगा। दरवाजे को उन्होंने पूरी तरह खोल लिया है और उसके निचले हिस्से को अपने एक पैर के जूते से दबाए हुए हैं ताकि वह तेज हवा से फिर से बंद न हो जाए। ट्रेन के तेजी से चलने की भयानक गड़गड़ाहट कानों के पर्दों को फाड़ने को बेताब है। पर अपनी इच्छा पूर्ति के लिए इसे तो झेलना ही है। यह सब करने के पहले वॉश बेसिन के पास खड़े होकर जुड़े हुए डिब्बे को भी झांककर उन्होंने देख लिया है कि वहां तो कोई नहीं है या उनकी ओर तो कोई आ नहीं रहा है।

इन सब हरकतों के बाद वे परम आश्वस्ति से भर गए हैं। भीतर ही भीतर उन्होंने अपने से कहा, “हां, अब वक्त है परम इच्छा की पूर्ति का।” और यह कहते हुए उन्होंने पैंट के दाहिने जेब में बेहद आहिस्ता से हाथ डाला सिगरेट और माचिस निकालने के लिए। पहले सिगरेट का पैकेट हाथ में आया। उसे उन्होंने बाहर निकालकर दूसरे हाथ में पकड़ लिया है। अब वे दोबारा उसी जेब में हाथ डाल रहे हैं। पर ये क्या जेब में काफी गहरे तक हाथ डालने पर भी माचिस मिल नहीं रही है। उसके वहां न मिलने पर उनका चेहरा तनाव भरा दिखने लगा है। अब वे हड़बड़ा गए हैं। उसी हड़बड़ी में पैंट के दोनों जेबों में हाथ डालकर बेसब्री से माचिस ढूंढ़ रहे हैं, पर उसका कोई पता नहीं है। यहां तक कि उन्होंने शर्ट के जेब में भी हाथ डालकर देख लिया है, पर माचिस वहां पर भी नहीं है। एक उद्विग्न हताशा उनके भीतर समाने को जैसे तैयार है। उन्हें शंका हुई कि शायद सिगरेट का पैकेट निकालते हुए माचिस जेब से गिर गई हो। दरवाजे के पास उजाला था तो उन्होंने वहां के पूरे हिस्से को गहरी नजरों से छान मारा, मगर वहां एकदम सफाई थी, न तो कोई कचरा था न कोई माचिस। उसी हताशा में उन्हें शंका हुई कि वे घर के लोगों को दिखाने के लिए एक बार अपनी बर्थ पर लेट गए थे, कहीं माचिस जेब से निकलकर बर्थ में तो नहीं गिर गई। वे तेजी से अपनी बर्थ की ओर चले। इस बार उन्होंने कोई ऐसा जतन नहीं किया कि किसी तरह का शोर न हो। उनकी हताश उद्विग्नता बढ़ रही थी। बर्थ के पास पहले से ही अंधेरा था, लाइट वे जलाते तो हो सकता है दूसरे लोग भी जाग जाते इसलिए वे अंधेरे में ही अपनी बर्थ के कोने-कोने को टटोल रहे हैं। पर वहां भी माचिस का नामो निशान नहीं है। अपने एक छोटे से बैग को भी अंदाज से उन्होंने अच्छी तरह खंगाल डाला, पर कुछ नहीं मिला वहां भी। उद्विग्नता के साथ अब गुस्सा उबलकर उनके चेहरे पर उतर आया है। यह गुस्सा वे किस पर उतारते, स्वयं को तमाचे मारने के अलावा क्योंकि उनकी माचिस के गुम हो जाने का जिम्मेदार उनके अलावा कोई नहीं है और अब सिगरेट की तलब गहरी और निढाल हताशा में बदल रही है।

वे थक हार कर अपनी बर्थ में लुढ़क गए हैं। सरकारी निषेधाज्ञा ने यह भी न बचने दिया था कि वे किसी जागते हुए व्यक्ति से माचिस मांग लेते या यह पूछते कि उसके पास माचिस है क्या?

ट्रेन के दरवाजे को खोलने के बाद जो गड़गड़ाहट उन्होंने सुनी थी वह और भी तेज होकर उनके अंदर बज रही है और वे गहरी चिढ़, खीज और हताशा में अब सो जाने की कोशिश में हैं। पता नहीं कितने जतन किए तब जाकर नींद लगी है।

वहां गहरी नींद में वे जैसे एक दिव्य दुनिया में हैं। ट्रेन वही है, उसकी सारी हलचल वैसी ही है, पर सुबह की पौ फट रही है, गहरे अंधेरे के बाद एक हल्की सी उजास फैल रही है। कम्पार्टमेंट की बंद कांच की खिड़कियों से मन्द-मन्द सा उजाला घर कर रहा है। सोए हुए लोग और उनकी तरह-तरह की सामग्री पर धीमा उजाला फैल रहा है। वे सोए हुए हैं पर जागा हुआ महसूस कर रहे हैं। यह विचित्र अनुभव है। पर यह विचित्रता बेहद सुखकर है, वे इस सुख को सब कुछ भूलकर पूरी तरह जी लेना चाहते हैं। यह भी अजीब है कि वे ऐसा कर पा रहे हैं अन्यथा ऐसा कर पाना आम तौर पर कठिन होता है। उनका अभ्यस्त मौन जैसे बिखर जाना चाह रहा है। वे खुशी में खूब सारा बतिया लेना चाह रहे हैं पर वहां खुशी के अलावा कोई नहीं है। अब कोई बेचैनी, कोई आलस्य साथ में नहीं है। शरीर के रेशे-रेशे को स्फूर्ति ने अपने प्यार भरे आगोश में ले लिया है।

वे उसी अवस्था में अपनी बर्थ से उठ गए हैं। अब उनके पास वाली खिड़की के मटमैले कांच से बाहर की हरियाली उल्टी दिशा में तेज रफ्तार दौड़ रही है। वह बहुत खुश हैं पर मटमैले कांच से उसकी खूबसूरती का पर्याप्त नजारा वे नहीं कर पा रहे हैं। उनकी इच्छा होने पर वे अपनी बर्थ से उठकर खड़े हो गए हैं। फिर बाहर की ओर चल पड़े हैं। वे तेज बेपरवाह चल रहे हैं और सोते हुए लोगों के बीच से होते हुए कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर पहुंच गए हैं। उन्होंने बिना किसी कष्ट के दरवाजे को खोल लिया है। हवा के तेज झोंके अंदर समाने लगे हैं। खुशी की अनुभूति बढ़ती जा रही है। बाहर की हरियाली अब स्पष्ट दिख रही है इसलिए और कि होती हुई सुबह की हवा ठंडी है। ठंडक बाहर-भीतर अब एक जैसी हो गई है। वे दरवाजे पर खड़े हैं और ट्रेन की रफ्तार सुस्त होती जा रही है। न जाने क्यों सुस्त होती हुई ट्रेन की चाल उनकी खुशी को बढ़ा रही है। ट्रेन सुस्त होते-होते एक छोटे से स्टेशन पर रूक गई है। ट्रेन के रूकने का वह समयसारिणी के अनुसार स्टेशन नहीं है फिर भी न जाने क्यों रूक गई है? यह अच्छा है बुरा नहीं है, कृष्णन ऐसा सोच रहे हैं। उन्होंने अपना चेहरा दरवाजे से बाहर निकाल लिया है और चारों ओर सिर घुमाकर देख रहे हैं। एक ओर कच्चे से प्लेटफार्म पर दूर लिखा दिख रहा है ‘आमगांव।’ उन्हें नहीं मालूम इन्दौर वहां से कितनी दूर है। वह यह भी सोचकर अकारण खुश हैं। प्लेटफार्म पर कोई नहीं है। शायद वहां से न तो किसी को ट्रेन में चढ़ना है न उससे उतरना है। जाती हुई दिशा की तरफ उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा तो कोई रेड सिग्नल नहीं था। फिर किस कारण से ट्रेन रूकी है उन्हें इस बात की जानकारी की जरूरत भी नहीं है।

वे सिर्फ खुश हैं और बने रहना चाहते हैं पर अचानक उनकी निगाह न जाने क्यों प्लेटफार्म पर, एकदम ट्रेन के दरवाजे के बिल्कुल सामने एक बेंच पर चली गई है। बेंच पर कोई बैठा नहीं है पर वे नींद में रहने के बावजूद चौंक गए हैं, वहां एक माचिस की डिबिया पड़ी हुई है। उन्हें लग रहा है कि कोई खाली डिबिया फेंक गया होगा, इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है, चौंकने वाली कोई बात नहीं है। उन्होंने वहां से ध्यान हटाने की कोशिश की पर वह हटा नहीं है और मन में बार-बार यह ख्याल आ रहा है कि क्या पता उसमें एकाध तीली बची हुई हो। यह ख्याल उन्हें घेर रहा है बुरी तरह। वे उसके घेरे को तोड़ नही पा रहे हैं। उनसे माचिस की डिबिया केवल चार-पांच कदम की दूरी पर पड़ी है और वे वहां से नजर हटा नहीं पा रहे हैं। वे डर रहे हैं, उन्हें जागते हुए की उद्विग्न हताशा फिर अपनी गिरफ्त में लेने आतुर है। वे बच न सके और नीचे उतरकर उन्होंने कदम बढ़ा दिए हैं। बेंच तक पहुंचकर उन्होंने माचिस उठा ली है और कांपते हाथों से उसे खोल रहे हैं। माचिस खाली नहीं है उसमें लबालब तीलीयां भरी हुई हैं। यह देख वे अपार प्रसन्नता से भर गए हैं और ट्रेन के हॉर्न को सुनते ही माचिस सहित ट्रेन पर चढ़ गए हैं। आश्चर्य मिश्रित खुशी यथावत है।

‘‘चायऽऽऽऽ गरम चायऽऽऽऽ गरम चाय’’ की तेज आवाज से नींद खुल गई है। खिड़की के कांच से साफ दिख रहा है कि ट्रेन किसी स्टेशन पर रूकी है। वहां बहुत सारे लोगों की तेज हलचल है। वे हाथ घड़ी पर नजर डालकर देख रहे हैं, सुबह के सात बजने को हैं पर उजाला सात बजे वाला नहीं लग रहा है। संभव है यह इसलिए है कि खिड़की का कांच मटमैला है। उनके साथ के सभी लोग अभी भी सो रहे हैं। शायद इसलिए भी कि ट्रेन को तो इन्दौर साढ़े दस बजे पहुंचना है और वहां से आगे कहीं नहीं जाना है, इस ट्रेन का वह अंतिम स्टेशन है। उन्हें फिलहाल नींद का कुछ याद नहीं है और न वे याद करने की कोशिश ही कर रहे हैं। अब चाय वाले का शोर नहीं है। वह आवाज लगाते हुए कम्पार्टमेंट से बाहर निकल गया है। अब उन्हें चाय पीने की इच्छा हो रही है। उन्हें पता नहीं ट्रेन उस स्टेशन पर कब रूकी है और कब चलने वाली है। उन्होंने अपने शरीर से ओढ़े हुए कंबल को अलग कर दिया है और खड़े हो गए हैं। अब चाय पीने की इच्छा प्रबल हो उठी है। वे कम्पार्टमेंट के दरवाजे की ओर चल पड़े हैं। रास्ते में उन्हें कुछ जाग गए लोग दिख रहे हैं पर अपनी-अपनी बर्थ से खड़े नहीं हुए हैं उनके जैसे। उनकी चाल तेज और बेपरवाह है। मिनट के चौथे हिस्से में ही वे दरवाजे तक पहुंच गए हैं। एक चाय वाला नजदीक ही खड़ा दिख गया है। उन्होंने उसे इशारे से बुलाकर एक चाय देने कहा है। उसे पैसे देकर वे दरवाजे से नीचे उतर कर चाय पीते हुए पूरे स्टेशन का मुआयना कर रहे हैं। सब तरफ का शोर सुनाई पड़ रहा है। सौभाग्य से चाय बहुत अच्छी है इसलिए शोर असर नहीं कर रहा है।

पर तभी अचानक ट्रेन के इंजिन ने तेज और लंबा हॉर्न बजाया है। यह संकेत है कि ट्रेन चलने वाली है। वे फुर्ती से ट्रेन में चढ़ गए हैं। चाय अभी खत्म नहीं हुई है और ट्रेन ने अच्छी खासी रफ्तार पकड़ ली है। चाय की समाप्ति पर चाय का कागज का मग उन्होंने बाहर उछाल दिया है। स्टेशन काफी पीछे छूट गया है। अब फिर से हरियाली का आनंद उन्हें खुशनुमा बना रहा है।

वे दरवाजे से हटना नहीं चाह रहे हैं। हवा शीतल है पर तेज है। वे दरवाजे के पास से थोड़ा सा खिसककर पीछे हो गए हैं। ट्रेन की रफ्तार अब डराने वाली हो चली है। खुशी की मौज तब भी उनके भीतर बढ़ रही है।

इसी अवस्था में वे वहां बने वाश बेसिन से टिक गए हैं। अचानक उन्होंने पैंट के दोनों जेबों में न जाने क्यूं दोनों हाथ डाल लिए हैं। पर यह क्या... दाहिने जेब के अंदर उन्होंने महसूस किया कि सिगरेट के पैकेट के साथ माचिस भी है। वे चौंक गए हैं और सिगरेट के पैकेट और माचिस को बाहर निकालकर विस्फरित नजरों से देख रहे हैं। वह सच जैसा नहीं लग पा रहा है जिसे वे देख रहे हैं पर यह सिर्फ उनका सच है। माचिस नींद से निकल कर उनकी जेब में पहुंच गई है। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि वे जाग रहे हैं। उन्हें सब कुछ याद आ गया है।

पर यह विचित्र अनुभव है। उनके शरीर में अब अजीब और गहरा स्फुरण हो रहा है।

उनके होठों में अब एक सिगरेट दबी है और वे माचिस से एक तीली निकालकर फिर उसे डिबिया से रगड़कर जला रहे हैं। जलती तीली उनके होठों में दबी सिगरेट को जला रही है। उसकी रोशनी से उनका चेहरा चमक रहा है।

राजेन्द्र दानी

5 नवंबर 1953, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़। दूसरा कदम, उनका जीवन, संक्रमण, कछुए की तरह, नेपथ्य का अंधेरा, महानगर, एकत्र, मेमोरी फुल, भूलने का रास्ता, पारगमन (कहानी संग्रह), प्रतिष्ठित पत्रिका पहलमें संपादन सहयोग। अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार (म.प्र. साहित्य अकादमी), गायत्री कथा सम्मान, विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान

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