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रविवारीय विशेष: तरुण भटनागर की कहानी दावानल

NOV 08 , 2020
रविवारीय विशेष: तरुण भटनागर की कहानी दावानल

फोटो साभार : wannapik.com

आउटलुक अपने पाठको के लिए अब हर रविवार एक कहानी लेकर आ रहा है। इस कड़ी में आज पढ़िए तरुण भटनागर की कहानी। इतिहास के पन्नों पर यह कहनी भले ही कहीं न हो लेकिन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी गई यह कहानी आज के यथार्थ को कहती है। इस कहानी में तरुण भटनागर आग बिंब के साथ आज के समाज की घटनाओं और उन के निवारण के बजाय टालने की प्रवृत्ति को बहुत खूबसूरती से बताते हैं। यह कहानी बताती है कि कैसे महत्वपूर्ण कामों की अनदेखी एक दिन इस रवायत, आदत और धीरे-धीरे कर्तव्य को ही खत्म कर देती है।

जंगल में पहली आग तेरहवीं सदी में लगी थी।

इस वक्त इस गांव के एक शख्स ने यहां के जमींदार से मदद की गुहार लगाई थी। बड़ी भयावह आग थी वह। अब तक का सबसे ख़ौफनाक दावानल। जमींदार को तब इक्तेदार कहते थे। इस इलाके का इक्तेदार सिकंदर बख्श नाम का एक रौबदार मलिक था। उसके वालिद फारस से आए थे और देहली के सुल्तान की फौज में सरवर थे। सरवर के उनके ओहदे की तासीर ऐसी थी कि जल्द ही उनका खासा रुतबा कायम हो गया। उन्होंने सिकंदर बख्श को इस बात का मशवरा दिया था कि अगर उसे कामयाब होना है, तो उसे देहली के सुल्तान की वफादारी करना आना चाहिए। सिकंदर बख्श अपने वालिद के इस मशवरे पर चलता चला। उसे इस इलाके की इक्तेदारी सुल्तान की वफादारी के ऐवज में ही मिली थी। वह मेहनती था और बहादुर भी। पर बेहद तंगदिल और संगदिल। उसके पास एक शानदार लश्कर थी जिसमें घोड़ों और हाथियों की तादाद रोज-ब-रोज बढ़ रही थी। उसे अपनी रियाया से कोई खास मतलब न था। जमींदारी तोहफे में मिली ही थी। बाकी सब कुछ था ही। रियाया की फिक्र भला वह क्यों करने लगा। रियाया की फिक्र करने की कोई वजह भी नहीं थी।                        

गांव का वह शख्स जिसका नाम रामेश्वर था बारह रोज का लंबा सफर कर इक्तेदार सिकंदर बख्श से गुहार लगाने पहुंचा था। रात को वह एक सराय में रुका था। सराय में ही एक शख्स ने उससे कहा था कि असर की इबादत के बाद इक्तेदार सिकंदर बख्श अपने पेशखाना में बैठता है। वह मगरिब की इबादत तक बैठा रहता है। यह सबसे सही वक्त होता है जब उसके सामने जाकर गुहार लगाई जा सकती है। रामेश्वर ने ऐसा ही किया। अपने तख़्त पर बैठे सिकंदर बख्श को उसकी गुहार से कोई खास मतलब न था। रामेश्वर ने बताया कि कैसे जंगल की आग की जद में आकर तमाम जंगली जानवर मारे गए, कैसे आग ने गांव को अपनी आगोश में ले लिया, कैसे लोगों के मकान जले, कैसे उनके खेतों में खडी फसलों में आग लगी.....बताते बताते रामेश्वर अपने घुटनों पर बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा। आवाम की कोई मदद न करने वाले सिकंदर बख्श को जाने क्या तो हुआ कि उसने इस मामले में गांव के लोगों की मदद करने का हुक्म जारी कर दिया। न सिर्फ इतना बल्कि अपने एक हाजिब से एक फ़रमान भी लिखवाया जिसमें इक्ते के खजाने से मदद के तौर पर खासी रकम गांव के लोगों को देने का हुक्म दिया गया था। इक्तेदार सिकंदर बख्श के तमाम मुलाजिम उसकी इस दरियादिली पर हैरान थे।

कहते हैं इक्तेदार सिकंदर बख्श की इस दरियादिली की एक वजह थी। उसे शिकार और दावतों का शौक था। रामेश्वर उसके सामने गुहार लगा रहा था, जोर-जोर से और तफ्सील से जंगल में आग से जलकर मर गए जानवरों के बारे में बताता जा रहा था। इक्तेदार सिकंदर बख्श हाथियों की मौत का सुनकर थोड़ा विचलित भी हुआ था। ‘ हाथी....हाथी भी जलकर मर गए।’ अपने तख़्त पर थोड़ा बेचैन होते हुए सिकंदर बख्श ने पूछा था। सिकंदर बख्श के लश्कर में कई हाथी थे। लश्कर के लिए उसे हाथियों की दरकार हमेशा बनी रहती। हाथी बहुत दूर से लाए जाते थे। हाथी बेचने आने वाले दक्खिन के सौदागर उनकी खासी कीमत लगाते थे। इस तरह इक्तेदार सिकंदर बख्श और गांव के उस शख़्स याने रामेश्वर दोनों की तकलीफें अलग-अलग थीं। एक को हाथियों का सुनकर बेचैनी थी तो दूसरे की आंखों में जले हुए खेत और मकानों के मंज़र थे। इस तरह किसी को कभी पता न चलना था कि वह क्या था कि बेरहम और नाशुकरे इक्तेदार सिकंदर बख्श ने गांव के लोगों की मदद का हुक्म क्यों दिया। हर कोई पहले-पहल तो हैरान हुआ। पर फिर धीरे-धीरे इसे उसकी इंसानियत से जोड़कर बताने लगा। गांव के लिए उसकी रहमदिली का किस्सा दूर-दूर तक फैला था। पर असली वजह कोई न जान पाया था।

कुछ वक्त बाद इक्तेदार सिकंदर बख्श के कुछ भरोसेमंद हाजिब आठ दस फौजियों के साथ उस गांव आए। उनके साथ उसका दीवान-ए वज़ारत याने खजाना संभालने वाला सबसे बड़ा ओहदेदार भी आया। गांव के लोगों को कतार में खड़ा किया गया। दीवान-ए वज़ारत का एक फर्राश जिसने एक शानदार लाल पगड़ी बांध रखी थी और जिसकी कमर में पीतल का एक खूबसूरत चपरास बंधा था, जोर से गांव के किसी शख्स का नाम पुकारता और एक हाजिब रौशनाई से भरी दवात थामे उसके पास बैठे दवातिये की दवात में भर्रु को डुबोकर वर्क पर उस शख्स का नाम लिखता और वह शख्स अपना हाथ फैलाकर एक दूसरे हाजिब के पास खड़ा हो जाता था जो घोड़े पर बंधी पोटली में से जीतल से भरी पोटलियां निकाल कर उसके हाथ पर रख देता था। पोटली मिलते साथ वह शख्स सर झुकाकर कहता, ‘हुजूर का इकबाल बुलंद हो’ और फिर वह पोटली लेकर आगे बढ़ जाता। गांव के लोगों ने पहले से यह सब पता किया था कि इक्तेदार के लोगों से पैसा लेते वक्त किस तरह से पेश आना है। गांव के एक शख्स ने बाकायदा इन सब तौर-तरीकों का अभिनय करके लोगों को बताया था कि किस तरह से जीतल से भरी पोटली लेनी है, कैसे कहना है, हुजूर का इकबाल बुलंद हो और लौटने से पहले किस तरह से दीवान-ए वज़ारत को सिजदा करना है। इस तरह इक्तेदार सिकंदर बख्श के हुक्म की तामीर हुई और गांव के हर शख्स को पोटली भर-भर जीतल मिल गया। गांव में एकदम से खुशहाली आ गई। इक्तेदार सिकंदर बख्श की रहमदिली के किस्से को पंख लग गए। एक गांव से दूसरे गांव तक उसकी रहमदिली का किस्सा कहा जाता रहा। तमाम ज़बानों पर, तमाम बतकहियों में जंगल में लगी आग के वक्त इक्तेदार सिकंदर बख्श द्वारा की गई मदद का बखान किस्सों की शकल में परवान चढ़ा।

जैसा कि था ही, इक्तेदार सिकंदर बख्श के जेहन में यह बात घर कर गई थी कि गांव के जंगल में हाथी हैं। गांव से लौटकर आए हाजिबों ने इक्तेदार सिकंदर बख्श को हाथियों के बारे में अच्छी ख़बर दी थी। कुछ दिनों बाद गांव के लोगों को इत्तिला दी गई कि खुद इक्तेदार सिकंदर बख्श गांव आ रहा है। गांव के लोग इक्तेदार सिकंदर बख्श की आवभगत में कोई कमी नहीं रखना चाहते थे। उसने मुसीबत के वक्त गांव की मदद की थी। उसकी मदद का ही प्रताप है कि अब हर घर में संपन्नता है।

शिकार के दल-बल के आने से कई दिनों पहले से तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। शामियाने गाड़ने के लिए जंगल काटे गए, जमीन समतल की गई और गड्ढे खोदे गए। गांव के तमाम लोग इस काम में जुटे। नीली पट्टी वाले चार शामियाने और इन सबसे दूर लाल पट्टी वाला एक खूबसूरत सा शामियाना जो इक्तेदार सिकंदर बख्श के लिए था। खानसामों की पूरी एक फौज आई थी। गांव के कुछ जवान लड़के बर्तन मांजने से लेकर देग के लिए गड्ढा खोदने और मिट्टी का तंदूर लगाने के काम तक हर काम के लिए उनकी मदद को मौजूद थे। कुछ दिनों बाद खुद अमीर-ए-शिकार आया अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ जिसमें उसके नायब शिकारबक याने शिकार महकमे के छोटे अफसरान से लेकर शिकार को घेरने के लिए बजाये जाने वाले बड़े-बड़े नगाड़े बजाने वाले जिन्हें तबलबाज कहा जाता था, तक तमाम लोग शामिल थे। धनुष-बाणों और भालों से लैस तमाम शिकारियों की टोली गांव में पहले से ही आ गई थी।

कहते हैं शिकार की सारी जमावट हो जाने के छह दिन बाद इक्तेदार सिकंदर बख्श अपने लाव-लष्कर के साथ आया था। सारा इलाका उस रात रौशनी से जगमगा उठा था। जलती मशालों और चिरागों की रौशनी में जगमगाते शामियाने देखते ही बनते थे। देग, चूल्हे और तंदूर से उठती तमाम पकवानों की खुशबू से सारा जहान महक उठा था। देर रात तक मौसिकी की आवाज सुनाई देती थी। एक खास महफिल सजाई गई थी। नाचने वाली रक्कासाओं के साथ मशाल थामे मशालची खड़े थे, ताकि इक्तेदार नाच-गान को ठीक तरह से देख सकें और उसका आनंद उठा सकें। रंगीन खूबसूरत कपड़ों में सजी-धजी रक्कासाएं और उनके साथ खूबसूरत बाने में वाद्ययंत्र बजाने वाले तमाम लोग देखते ही बनते थे। अगले दिन सुबह से शिकार शुरू हो गया था। शिकार पूरे एक माह तक चला था। कहते हैं इक्तेदार सिकंदर बख्श ने इन जंगलों से इकतालीस हाथी पकड़े थे। कुछ लोग कहते कि पकड़े गए हाथियों की तादाद सैकड़ा के पार थी। पकड़े जाने वाले हाथी मोटी-मोटी जंजीरों में बांधकर रखे जाते। महावत उन्हें अंकुश से कोंच-कोंचकर काबू में लाने की कोशिशि करते रहते। जैसे-जैसे हाथी थोड़ा बहुत काबू में आ जाते महावत और उसके साथ दो सिपाही उसे इक्तेदार सिकंदर बख्श की राजधानी की ओर ले जाते। जंगल से गुजरते सिकंदर बख्श ने जंगल में लगी आग के निशान देखे थे। जले हुए बेहिसाब दरख्तों और कोयले में तब्दील हो गई जंगल की ऐसी दुनिया को उसने पहली बार देखा था। गांव के लोगों ने मारे गए जंगली जानवरों की हड्डियों का एक ढेर जंगल में लगा दिया था। जिसे वह थोड़ी देर तक खड़ा देखता रहा था। फिर उसने अपने लोगों को जंगल की सरहद पर एक बहुत बड़ा तलाब खोदने का हुक्म दिया।

शिकार के बाद जाते वक्त उसने शिकार के काम में मेहनत करने वाले गांव के लोगों को इनामो-इकराम दिए। गांव के जिस शख्स ने बड़ी मेहनत से जंगल में हाथियों का ठिकाना ढूंढ निकाला था और जहां से इक्तेदार के लोगों ने एक साथ नौ हाथी पकड़े थे, उस शख़्स पर इक्तेदार खास तौर पर खुश हुआ था। गांव के उस शख़्स को और एक दूसरे शख़्स को जिसकी बहादुरी से इक्तेदार सिकंदर बख्श खासा खुश हुआ था इन दोनों को उसने अपनी फौज में नौकरी पर रख लिया था। बाद में इन दोनों ने इस्लाम कबूल किया और इनके नाम हुए अख्तियारुद्दीन और आसिफुद्दीन। जब गांव में तालाब बनाने का काम शुरू हुआ तो इनमें से आसिफुद्दीन को इक्तेदार सिकंदर बख्श ने उस काम की निगरानी के लिए गांव वापस भेज दिया। तालाब बनवाने के पीछे इक्तेदार सिकंदर बख्श का ख़ास मकसद था। वह चाहता था कि अबकी बार अगर जंगल में आग लगे तो फैलने से पहले उस आग को रोकने का माकूल इंतजाम हो जाए। इसके लिए उसने तालाब से शुरू होने वाली एक चौड़ी मोरी बनवाई थी। पत्थरों की बनी इस मोरी में तालाब से आता पानी बहता था। मोरी पहाड़ियों की तलहटी तक एकदम सीधी थी और फिर पहाड़ी के चारों ओर चक्कर लगाकर पहाड़ी के पीछे तक जाती थी। हल्की ढाल के कारण तालाब का पानी इस मोरी में बह निकलता था। मीलों दूर तक मोरी में बहता यह पानी मोरी में बहता हुआ गांव के ठीक सामने वाली पहाड़ी के पीछे तक जाता था। पहाड़ी के पीछे मोरी एक बडे से हौज के ऊपर खत्म होती थी। इस तरह पानी उस हौज में इकठ्ठा होता जाता। इसका फायदा यह था कि एक तो भरी गर्मी में पहाड़ी के पार, तालाब से मीलों दूर भी इफरात में पानी मौजूद रहता। जानवरों के लिए भी और अगर जंगल में आग लग जाए, तो उस आग को बुझाने के लिए भी। इक्तेदार सिकंदर बख्श ने इस हौज से करीब पांच मील आगे एक और हौज बनाने का भी सोचा था। यह भी ठीक इसी तरह से मोरी से जुडा होता। पर वह यह काम न करवा पाया। कुछ वक्त के बाद तालाब और जंगल की आग की देखभाल करने का काम उसने आसिफुद्दीन को सौंप दिया।

तालाब बनने के बाद गांव के लोगों ने तालाब के पास का मीलों लंबा जंगल काटकर साफ कर दिया था। यहां वे अब खेती करने लगे थे।  शिकार के वक्त इस जगह का जंगल साफ कर बहुत सी जमीन वैसे भी खाली पड़ी ही थी। तालाब के पानी के कारण यह सारा इलाका खेती के लिए हासिल हो गया। साल भर तालाब भरा रहता और किसान उसके पानी से सिंचाई करते। तालाब और हौज की देखभाल के साथ-साथ इक्तेदार सिकंदर बख्श ने आसिफुद्दीन को इन किसानों से सिंचाई और खेती पर लगने वाला लगान भी वसूलने का जिम्मा दे दिया था। तय यह हुआ कि कुल वसूले गए लगान का एक तिहाई मेहनताने के रुप में आसिफुद्दीन को मिलेगा। बाकी बचा हुआ उसे इक्तेदार सिकंदर बख्श के दीवान-ए वजारत के पास जमा करना होगा। गांव के लोग इस तरह आसिफुद्दीन को अमीन साहेब कहने लगे। बाद में आसिफुद्दीन के परिवार के लोग अपने नाम के साथ अमीन लगाने लगे जैसे अमीन अहमद खान, अमीन असद खान, अमीन दौलत खान आदि।

इक्तेदार सिकंदर बख्श ने आसिफुद्दीन को जंगल की आग की जिम्मेदारी भी दे रखी थी। इसके लिए उसे कुछ टट्टू और एक सेवक की सेवा उपलब्ध हुई। टट्टुओं और दूसरी तमाम चीजों के खर्च के साथ-साथ कुछ दीगर खर्चों के लिए भी आसिफुद्दीन को इक्ते के खजाने से रकम मिलती थी। इस तरह उसकी यह जिम्मेदारी थी कि वह जंगल की आग पर निगाह रखे और अगर कहीं आग दीखे तो उसे बुझाने का काम करे। वह सुबह शाम जंगल को ताकता था। जंगल में कहीं भी धुंआ दीखता तो अपने टट्टुओं के साथ उसी तरफ को चल पड़ता। टट्टुओं की पीठ पर दोनों तरफ बड़ी-बड़ी छागलें लटकती होतीं। इन छागलों में वह तालाब से पानी भर लेता। उसे पानी से लबालब भरी छागल लटकाए टट्टुओं को साथ लेकर चलने की हिदायत थी। सो वह ऐसा ही करता। जंगल में उस मौके पर जहां आग जल रही होती, पहुंचकर वह आग बुझाने का काम करता। अगर पानी खत्म हो जाए तो फिर से तालाब से या अगर वह हौज के पास होता तो हौज से छागल भर पानी लेकर फिर आग पर पानी उड़ेलता। कभी उसे एक साथ काफी टट्टू अपने साथ लेकर चलने पडते। वक्त के साथ वह इतना अनुभवी हो गया था कि पहाड़ियों पर उठती धुएं की लकीर देखकर ही उसे अंदाज लग जाता था कि आग कितनी बड़ी होगी, किस इलाके में होगी और उसे बुझाने के लिए कितने टट्टुओं पर छागल भरकर ले जानी पड़ेगी। इस तरह वह दावानल से जंगल की हिफाजत करता रहा।

जब तक वह जिंदा रहा, दावानल तो दूर, जंगल में कभी आग भी नहीं लग पाई। पर वक्त के साथ-साथ बहुत सी चीजें बदल गईं। खासकर इक्तेदार सिकंदर बख्श की मौत के बाद। जो ताकतवर होता है उसके हुक्म की तामीर को काम माना जाता है। उसके मरने के बाद उसके हुक्म की तामीर की अहमियत नहीं रह जाती है। कहते हैं दिल्ली में खिलजियों के दौर में तख़्त की जो लड़ाई चली उसमें सिकंदर बख्श सुल्तान की ओर से लड़ा था। वह सुल्तान का हमेशा वफादार रहा था। सुल्तान ने शायद ही कभी कोई ऐसी लड़ाई लड़ी थी, जिसमें इक्तेदार सिकंदर बख्श या उसकी फौज सुल्तान की ओर से न लड़ी हो। पर इस बार सुल्तान जंग हार गया था और सिकंदर बख्श जंग में मारा गया था। कहते हैं, इस जंग में अख़्तियारुद्दीन भी मारा गया था। कुछ सालों बाद देहली की सल्तनत पर तुगलकों का कब्जा हो गया था। अब सल्तनत का मरकज भी बदल गया था। देहली की सल्तनत अब सीरी से नहीं चलती थी। सुल्तान ने तुगलगाबाद और बाद में जहांपनाह नाम का नया मरकज बना लिया था। इधर इलाके का इक्तेदार भी बदल गया था। उसने पुराने इक्तेदार के तमाम कारिंदों को नौकरियों से निकाल दिया और अपने लोगों को रख लिया था। आसिफुद्दीन को मिलने वाली तनख़्वाह बंद हो गई। पर फिर भी वह जंगल की आग के काम में लगा रहा। यह उसे एक किस्म की जिम्मेदारी लगता था। इसके साथ ही उसे यह भी अहसास था ही कि इस काम की बदौलत ही उसे गांव में खासी अहमियत और इज्जत मिली थी। लोग उसे अमीन कह कर बुलाते थे। सिकंदर बख्श की मौत के बाद भी लोग उसे अमीन ही कहते। इस तरह उसने भी इस ओहदे की अहमियत और इससे हासिल होने वाली इज्जत की वजह से इस काम को करते रहने का सोचा और इस तरह जंगल की आग के इस काम में लगा रहा। फिर उसके इंतकाल के बाद उसकी औलादों ने उसके काम को आगे बढ़ाया पर बरसों बाद धीरे-धीरे इस काम में उसकी औलादों का मन लगना बंद हो गया।

भला जंगल की आग को बुझाना भी कोई काम है, आसिफुद्दीन की औलादें सोचा करतीं। यह भी कोई काम हुआ कि रात दिन पहाड़ियों पर बिखरे जंगल की ओर देखते रहो। फिर कहीं आग दीखे तो उसे बुझाने जाओ। इस काम से किसी को क्या फायदा ? इस काम का मेहनताना मिलना तो दूर ऊपर से अब तक गांव के लोग भी ठीक से समझ नहीं पाए कि आखिरकार यह किस किसम का काम हुआ। यह ठीक है कि वे इस काम को इज्जत की नजर से देखते हैं। उन्हें लगता है यह काम इक्तेदार का शुरू कराया काम है। बड़े और ताकतवर आदमी के शुरू कराए काम को लोग खास काम मानते ही हैं। पर वे यह नहीं देखते कि इस काम को करने वाले के क्या कष्ट हैं। उसकी तकलीफें और इस काम से होने वाले नफे-नुकसान से भी उन्हें कोई वास्ता नहीं। किसी काम को अहमियत देने और इज्जत बख्शने भर से काम नहीं चलता। जिंदगी चलाने के लिए रोटी की जरूरत होती है और रोटी कमाने के लिए पैसे चाहिए होते हैं। काम तो होता है खेती करना, मिट्टी के बरतन बनाना, जानवर पालना। भला जंगल की निगरानी करना, वह भी आग से, यह कौन सा काम हुआ। इस काम को करते रहने की कोई वजह भी नज़र नहीं आती।                

तारीख़ में कहीं भी इक्तेदार सिकंदर बख्श का जिक्र नहीं मिलता। कोई नहीं जानता कि कौन थे अख़्तियारुद्दीन और आसिफुद्दीन। जब आग का ही जिक्र नहीं हो तो उसे बुझाने की कोशिश को भला क्योंकर तारीख में जगह मिलने लगी।

जंगल में अब भी आग लगती है। पुराना तालाब है और टूटकर दरक चुकी मोरियों के निशान भी। जंगल छितर हो चुके हैं। जंगल की आग में पेड़ भी जलते हैं और जानवर भी। गांव में एक बरेदी है। एक चरवाहा। जिसका नाम अमीन इम्तियाज खान है। उसने अपनी मां से एक बार पूछा था कि वे लोग अपने नाम के साथ अमीन शब्द क्यों लगाते हैं। उसकी मां ने उससे इतना ही कहा, यह एक पुरानी रवायत है। बस और कुछ भी तो नहीं।

 

तरुण भटनागर

25 सितंबर 1968

एम एससी (गणित) तथा एम ए (इतिहास) की पढ़ाई करने वाले तरुण भटनागर की कहानियों में पौराणिक, ऐतिहासिक संदर्भ के साथ-साथ आधुनिक समय की भी झलक दिखती है। घटनाओं को कहने का उनका अपना ढंग है, जो पाठकों को बांधे रखता है। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तरुण भटनागर को वागीश्वरी पुरस्कार और शैलेश मटियानी पुरस्कार मिल चुका है।

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