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'मैं जनता की रायसाहबी ले सकता हूं, पर सरकार की नहीं’

"उनकी आशा उथली नहीं है। उसके नीचे परिस्थिति की भयंकरता का पूरा ज्ञान है। उन्होंने यथार्थ की निष्ठुरता...
'मैं जनता की रायसाहबी ले सकता हूं, पर सरकार की नहीं’

"उनकी आशा उथली नहीं है। उसके नीचे परिस्थिति की भयंकरता का पूरा ज्ञान है। उन्होंने यथार्थ की निष्ठुरता को तिल-भर भी घटाकर चित्रित नहीं किया। बीसवीं शताब्दी की अमानुषिकता की कठोर कहानी उन्होंने पूरी-पूरी कह दी है।" -डॉ. रामविलास शर्मा

‘पूस की रात’ में ‘हरखू’ की कंपकंपाहट से लेकर ‘गोदान’ में हुई ‘होरी’ की मौत तक की संवेदनाओं को समेटता एक रचना संसार। ‘पंच परमेश्वर’ की जुबान से न्याय के दो आखर निकालकर ‘ईदगाह’ के चिमटे तक बालमन में नए नजरिए की वकालत करती कहानियां। कहा जाता है कि 8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी के भाषण को सुनने के बाद एक शख्स के भीतर बड़ा बदलाव हुआ। उसने अपनी अपनी 25 साल की पक्की सरकारी नौकरी को ठोकर मार  दी थी।

ऊपर उद्धृत लाइनें एक व्यक्तित्व को बयान करती है जिसका नाम है मुंशी प्रेमचंद। असल मायनों में अपनी कृति और जीवन के सलीकों में विभेद किए बगैर जीने का नाम ही ‘प्रेमचंद’ है।

उपन्यास सम्राट के नाम से लोकप्रिय प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी के करीब ग्राम लमही हुआ था। 8 अक्टूबर, 1936 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन जीवन चक्र के इस अंतराल में उन्होंने जो लिखा और जिस तरह जीवन जिया वह आज भी मिसाल के तौर पर जगमग है।

संतन को कहां सिकरी सो काम

सन् 1929 में अंग्रेजी सरकार ने प्रेमचंद की लोकप्रियता के चलते उन्हें ‘रायसाहब’ की उपाधि देने का निश्चय किया।

तत्कालीन गवर्नर सर हेली ने प्रेमचंद को खबर भिजवाई कि सरकार उन्हें रायसाहब की उपाधि से नवाजना चाहती है। प्रेमचंद ने इस संदेश को पाकर कोई खास प्रसन्नता व्यक्त नहीं की, हालांकि उनकी पत्नी बड़ी खुश हुईं और उन्होंने पूछा, उपाधि के साथ कुछ और भी देंगे या नहीं? प्रेमचंद बोले, ‘हां! कुछ और भी देंगे।‘ पत्नी का इशारा धनराशि से था। प्रेमचंद का उत्तर सुनकर पत्नी ने कहा, तो फिर सोच क्या रहे हैं? आप फौरन गवर्नर साहब को हां कहलवा दीजिए।

प्रेमचंद पत्नी का विरोध करते हुए बोले, मैं यह उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता। कारण यह है कि अभी मैंने जितना लिखा है, वह जनता के लिए लिखा है, किंतु रायसाहब बनने के बाद मुझे सरकार के लिए लिखना पड़ेगा। यह गुलामी मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। जिसके बाद प्रेमचंद ने गवर्नर को उत्तर भेजते हुए लिखा, “मैं जनता की रायसाहबी ले सकता हूं, किंतु सरकार की नहीं।” प्रेमचंद के उत्तर से गवर्नर हेली आश्चर्य में पड़ गए।

इस वाकये से कोई भी हैरान हो सकता है। उनकी सादगी और बेबाकी से लबरेज कुछ खत भी अपने आप में नायाब हैं जिसे आज के दौर में पढ़ा जाना चाहिए।

दो खतों की बानगी

बनारसीदास चतुर्वेदी को प्रेमचंद के द्वारा लिखे गए पत्र में भी प्रेमचंद का जीवनबोध छुपा हुआ है। आज पद प्रतिष्ठा के लिए साहित्य रचते लोगों के लिए इसे एक आईना भी कहा जा सकता है-

 

"मेरी आकांक्षाएं कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खानेभर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे अभिलाषा नहीं। हां, यह जरूर चाहता हूं कि दो चार उच्चकोटि की पुस्तकें लिखूं, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूं कि वह ईमानदार, सच्चे और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूं। हां, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े सुलभ होते रहें।"

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"जो व्यक्ति धन-सम्पदा में विभोर और मगन हो, उसके महान् पुरुष होने की मै कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे ही मैं किसी आदमी को धनी पाता हूं, वैसे ही मुझपर उसकी कला और बुद्धिमत्ता की बातों का प्रभाव काफूर हो जाता है। मुझे जान पड़ता है कि इस शख्स ने मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को- उस सामाजिक व्यवस्था को, जो अमीरों द्वारा गरीबों के दोहन पर अवलम्बित है-स्वीकार कर लिया है। इस प्रकार किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, मुझे आकर्षित नहीं करता। बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो। बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देखकर शायद मैं भी वैसा ही होता, जैसे दूसरे हैं- मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।"

आज भी हम ‘गोदान’ से लेकर ‘कर्मभूमि’ तक के हजारों पन्ने उलट-पलट लेते हैं। प्रासंगिकता के पैमाने पर हर अक्षर अपनी गवाही देता है। समाज की विकृतियों को उजागर करने वाले, आसान शब्दों में समाज की तस्वीर उकेरकर नई दृष्टि देने वाले इंसान को शत-शत नमन!

 संदर्भ: संस्मरण  (स्वर्गीय प्रेमचंदजी)- बनारसीदास चतुर्वेदी, प्रेमचंद्र और उनका युग: डॉ. रामविलास शर्मा

 

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