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शहरनामा/ कालीन भैया के मिर्जापुर से बिल्कुल अलग है शहर का मिजाज

उत्पल पाठक (स्वतंत्र पत्रकार) - NOV 17 , 2020
शहरनामा/ कालीन भैया के मिर्जापुर से बिल्कुल अलग है शहर का मिजाज
शहरनामा/ कालीन भैया के मिर्जापुर से बिल्कुल अलग है शहर का मिजाज
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कालीन भैया का सच

मिर्जापुर का नाम सुनते ही आजकल 'कालीन भैया' का खौफ तारी हो जाता है। लगता है, यह ऐसा शहर है, जहां तमंचे की तालीम छुटपन से ही मिल जाती है। बॉलीवुड वालों की वेब सीरीज जो न दिखाए! आप चाहें तो कुछेक सरगनाओं की याद कर भी सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर मिर्जापुर संगठित अपराध के मामले में पूर्वांचल के अन्य शहरों बनारस, गाजीपुर, चंदौली, आजमगढ़ और जौनपुर की तुलना में काफी शांत माना गया है। इसीलिए विवाद भी उठा, लोग खफा हैं और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने प्रतिबंध की भी मांग की। वेबसीरीज में मुंबई फिल्मों की ही तरह न तो यहां की भाषा-बोली है, न इस इलाके की खास कोई समझ। यहां की बोली मिर्जापुरी भोजपुरी है, लेकिन आप वेब सीरीज में कहीं नहीं सुनते।

 प्राचीनता की झलक

आज का मिर्जापुर या अपभ्रंश में 'मीरजापुर' नाम भले चलन में है लेकिन यह नाम सिर्फ 285 वर्ष पुराना है। इस इलाके का वर्णन प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में भी है लेकिन शहर के प्राचीन नाम को लेकर कई भ्रांतियां हैं। लोकमान्यता के अनुसार विंध्याचल, अरावली और नीलगिरी से घिरे इलाके का नाम विंध्यक्षेत्र है। कालांतर में मांडा के समीप का क्षेत्र पम्पापुर, वर्तमान का अमरावती क्षेत्र गिरिजापुर तथा आसपास का क्षेत्र सप्त सागर के नाम से विख्यात हुए। विन्ध्य माहात्म्य में वर्णित श्लोक के अनुसार, विंध्य क्षेत्र के पूर्व भाग में महालक्ष्मी, दक्षिण भाग में महाकाली तथा पश्चिम में महासरस्वती निवास करती हैं। मिर्जापुर नाम 1575 में मुगल शासक मिर्जा मुकाम के चुनार किले पर आधिपत्य के बाद पड़ा।

फीकी नहीं पड़ती पत्थरों की चमक 

मिर्जापुर को प्रकृति ने खूबसूरती के साथ भरपूर खनिज संपदा से नवाजा है। दुनिया भर में मशहूर यहां के लाल पत्थरों पर मौसम और समय की मार बेअसर साबित होती है। इन पत्थरों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जितना ही पुराना होता है, उतना ही चमकता है। यहां के पत्थरों से न सिर्फ देश के कई प्रसिद्ध घाट बने हैं बल्कि वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य भवन, सारनाथ का मुख्य बौद्ध मंदिर, थाई मंदिर में कांधार शैली की 80 फुट ऊंची प्रतिमा, सारनाथ के वियतनामी मंदिर में 70 फुट की पद्मासन की मूर्ति, स्तूप, मथुरा, वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिरों सहित देश विदेश में हजारों बौद्ध प्रतिमाओं, मूर्तियों और कलाकृतियों का निर्माण यहां के बलुआ पत्थर से हुआ है।

 मिर्जापुरी कजरी

पूर्वांचल में कहावत है, “लीला रामनगर क भारी, कजरी मिर्जापुर सरनाम।” यानी काशी के रामनगर की रामलीला और मिर्जापुर की कजरी गायन विधा अपने आप में विशिष्ट है। “मिर्जापुर कईले गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइलन बलमू” सुनकर तो लोग झूमने लगते हैं। इस कजरी गायन के पीछे एक लोक मान्यता है। कहते हैं, प्राचीन काल में शैव और शक्ति उपासकों के युद्ध में शक्ति उपासकों की जीत हुई थी और यहां कजला देवी की पूजा शुरू हुई, जिसे मां विंध्यवासिनी का ही दूसरा नाम माना जाता है। विंध्यवासिनी मंदिर में झरोखे से दर्शन करके कजली टीका लगाने की परंपरा आज भी है। हर वर्ष के ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से विंध्यवासिनी मंदिर में प्रख्यात कजरी गायक भावांजलि प्रस्तुत करते हैं।

 धार्मिक महत्व 

विंध्य पर्वतमाला पर बसा मां विंध्यवासिनी मंदिर शक्ति उपासकों के लिए आस्था का केंद्र है। तीन किलोमीटर दूर पहाड़ी पर मां अष्टभुजा का मंदिर है। मान्यता है कि कृष्ण जन्म से पूर्व यशोदा के गर्भ से पैदा हुई कन्या को कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझकर पटक कर मारना चाहा लेकिन कन्या छूटकर आकाश में चली गई और बाद में इसी अष्टभुजा पर्वत पर स्‍थापित हुई। इसके अतिरिक्त भैरव कुंड, भैरव-भैरवी मंदिर, पाषाण पर बना श्रीयन्त्र भी समीप है। कंतित नामक स्थान में अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के भांजे इस्माइल चिश्ती की दरगाह है। प्रयाग से काशी जाने के क्रम में गुरु तेग बहादुर जी ने मिर्जापुर में समय व्यतीत किया था, गुरुद्वारा अहरौरा, गुरुद्वारा छोटा मिर्जापुर इसके गवाह हैं।

चुनार किला

मिर्जापुर का यह उपनगर न सिर्फ अपने चीनी मिट्टी के बर्तनों, पीतल के बर्तनों और पत्थरों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि राजा भर्तहरि के आलीशान किले के लिए भी मशहूर है। नैनागढ़ नामक स्थान पर बसे चुनार किले पर 1029 में कन्नौज के राजा सहदेव ने राज्य किया। कालांतर में मुगलों और ब्रितानी शासकों ने भी राज किया।  किले में अंग्रेज गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स का आवास समेत सूर्य घड़ी भी है।

तिलिस्म, तंत्र और गुप्त विद्या 

चूना दरी, राज दरी, देव दरी, सिद्धनाथ दरी समेत लखनिया दरी जैसे अनेक छोटे-बड़े जल प्रपातों और गुफाओं से घिरा होने के साथ प्रचुर मात्रा में शक्तिपीठों के कारण म‌िर्जापुर और आसपास का सारा इलाका तंत्र साधना करने के लिए सिद्ध स्थान माना गया है। शायद यही कारण रहा होगा कि पंडित देवकीनंदन खत्री ने अपने उपन्यास चंद्रकांता संतति में म‌िर्जापुर के नौगढ़, विजयगढ़, चुनारगढ़ समेत ऐय्यारी और तिलिस्म का अद्भुत वर्णन किया है। 

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