Home कला-संस्कृति सामान्य भीमा-कोरेगांव युद्ध की कहानी, जिसकी सालगिरह पर सैकड़ों लोग जमा हुए

भीमा-कोरेगांव युद्ध की कहानी, जिसकी सालगिरह पर सैकड़ों लोग जमा हुए

आउटलुक टीम - JAN 01 , 2019
भीमा-कोरेगांव युद्ध की कहानी, जिसकी सालगिरह पर सैकड़ों लोग जमा हुए
भीमा-कोरेगांव युद्ध की कहानी, जिसकी सालगिरह पर सैकड़ों लोग जमा हुए
युद्ध की सांकेतिक तस्वीर (बाएं), जय स्तंभ (दाएं)

नये साल के मौके पर महाराष्ट्र के पुणे जिले में भीमा-कोरेगांव युद्ध की 201वीं सालगिरह के आयोजन में सैकड़ों लोग पेरणे गांव के पास स्थित जय स्तंभ (युद्ध स्मारक) पर जमा हुए। इसके लिए भारी सुरक्षा के इंतजाम किए गए क्योंकि पिछली बार यहां हिंसा हो गई थी। इस मौके पर जय स्तंभ को सजाया भी गया।

माना जाता है कि इस युद्ध में अंग्रेजों ने तब अछूत माने जाने वाले महार समुदाय को साथ लेकर पेशवा को हराया था। दलित संगठन इसे 'महार सैनिकों' की जीत मानते हैं, वहीं दक्षिणपंथी समूह इसे 'अंग्रेजों की जीत का जश्न’ बताकर इसका विरोध करते रहे हैं। इस वजह से इसे लेकर विवाद और तनाव की स्थिति भी रहती है।

क्या थी भीमा-कोरेगांव की लड़ाई?

अंग्रेजों ने भारत में पैर जमाने के लिए स्थानीय लोगों की काफी सहायता ली थी इसीलिए उनके सैनिकों में भारतीय लोग ज्यादा होते थे। अंग्रेजों ने इसी तरीके से कई लड़ाईयां लड़ी।

ऐसी ही एक लड़ाई 1 जनवरी 1818 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में लड़ी गई। पेशवा बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में 28 हजार मराठाओं को पुणे पर आक्रमण करना था। पेशवा की सेना काफी मजबूत थी। इसमें 20,000 घुड़सवार और 8,000 पैदल सैनिक थे यानी करीब 28 हजार की सेना।

रास्ते में उनका सामना कंपनी की सैन्य शक्ति को मजबूत करने पुणे जा रही सैनिकों की टुकड़ी से हो गया। कंपनी की टुकड़ी का नेतृत्व कैप्टन फ्रांसिस स्टैंटन कर रहे थे। इस टुकड़ी में 834 लोग थे। इसमें पैदल सेना के लोगों में महार रेजिमेंट के लोग ज्यादा थे। ये लोग शिरूर से भेजे गए थे। भीमा नदी के पास एक गांव में उन्होंने पेशवा के सैनिकों को देखा।

दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हुई। कप्तान फ्रांसिस स्टैंटन के नेतृत्व में कंपनी के सैनिक लगभग 12 घंटे तक डटे रहे। मराठा सेना ने गोलीबारी बंद कर दी। रात में, कंपनी के सैनिकों पानी की आपूर्ति करने में कामयाब रहे लेकिन पेशवा के सैनिक अगले दिन कोरेगांव के पास बने रहे लेकिन एक भी हमला नहीं किया। 2 जनवरी की रात को कैप्टन स्टैंटन पहले पुणे की दिशा में जाने का नाटक करते थे लेकिन फिर अपने शहीद सैनिकों को लेकर शिरूर वापस लौट आए। इसके बाद ब्रिटिश कंपनी की ओर से जनरल स्मिथ 3 जनवरी को कोरेगांव पहुंचे, लेकिन इस समय तक पेशवा क्षेत्र छोड़ चुके थे।

मारे और घायल हुए सैनिक

834 कंपनी के सैनिकों में से 275 लोग मारे गए, घायल हो गए या लापता हो गए। मृतकों में दो ब्रिटिश अधिकारी शामिल थे। पैदल सैनिकों में से 50 मारे गए और 105 घायल हुए। तोपखाने में 12 लोग मारे गए और 8 घायल हुए। ब्रिटिश अनुमानों के अनुसार, पेशवा के लगभग 500 से 600 सैनिक युद्ध में मारे गए या घायल हुए।

क्यों है महारों के लिए यह युद्ध खास

कंपनी के सैनिकों में मुख्य रूप से बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री से संबंधित महार रेजिमेंट के सैनिक थे और इसीलिए महार लोग इस युद्ध को अपने इतिहास का एक वीरतापूर्ण हिस्सा मानते हैं। यह अस्मिता विमर्श और दलित विमर्श का भी अहम विषय है क्योंकि उन्हें अछूत माना जाता था।

कोरेगांव की लड़ाई में अपनी बहादुरी के लिए पुरस्कार के रूप में, बॉम्बे नेशनल इन्फैंट्री की पहली रेजिमेंट की दूसरी बटालियन को ग्रेनेडियर बना दिया गया। उनकी रेजिमेंट को बंबई नेशनल इन्फैंट्री की पहली ग्रेनेडियर रेजिमेंट के रूप में जाना जाने लगा। कप्तान स्टैंटन को गर्वनर जनरल ऑफ इंडिया का मानद सहयोगी नियुक्त किया गया।

युद्ध के परिणाम के बारे में

जनरल थॉमस हिस्लोप ने इस युद्ध को "सेना के इतिहास में दर्ज किए गए सबसे वीर और शानदार उपलब्धियों में से एक" कहा। एमएस नारावने के अनुसार, "एक विशाल संख्या में मराठा सेना के खिलाफ कंपनी के सैनिकों की एक छोटी संख्या द्वारा दिखाई गई वीरता सही रूप में कंपनी की सेनाओं के इतिहास में वीरता और धैर्य का सबसे गौरवशाली उदाहरण माना जाता है।"

हालांकि एक मत यह भी है कि युद्ध में किसी भी पक्ष ने निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी लेकिन पेशवा की बड़ी सेना को महारों की बहुलता वाली कंपनी की एक छोटी टुकड़ी से कड़ी टक्कर मिली, यह बात महत्व रखती है।
हालांकि आज इस युद्ध को ऊंची जाति पेशवाओं पर निचली जाति की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है लेकिन बहादुर माने जाने वाले महारों ने एक दौर में शिवाजी, राजाराम और पेशवा शासकों सहित मराठा राज्यों के लिए भी लड़ाईयां लड़ी थीं।

जयस्तंभ

बाद में अंग्रेजों ने भीमा-कोरेगांव में अपनी जीत के स्मरण में जयस्तंभ का निर्माण कराया था। धीरे-धीरे यह दलितों की विजय का प्रतीक बन गया। हर साल हजारों की संख्या में दलित समुदाय के लोग यहां आकर श्रद्धांजलि देते हैं।

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