पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर एक अनूठे समागम का गवाह बना। 23, 24, 25 जनवरी को रायपुर में ‘रायपुर साहित्य उत्सव’ में देशभर के लेखकों, कलाकारों ने हिस्सा लिया। हिंदी साहित्य के इतिहास में यह एक यादगार उत्सव के रूप में याद किया जाएगा। देश भर से आए विद्वानों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और पत्रकारों के लिए यह साहित्य और संस्कृति के किसी महाकुंभ से कम नहीं था।
नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित इस तीन दिवसीय उत्सव में जिस तरह से चार प्रमुख मंडपों और अन्य मंडपों के माध्यम से साहित्य, संस्कृति, लोकसंस्कृति, नाट्यशास्त्र, कहानी, कविता, विभिन्न कलारूपों, फिल्म, पत्रकारिता जैसे विषयों पर देश भर के नामचीन विद्वानों ने विचार-विमर्श किया। वह अपने आप में साहित्य और संस्कृति का एक नया रूपक गढ़ता प्रतीत हो रहा था।
रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के पहले दिन विनोद कुमार शुक्ल मंडप में उद्घाटन समारोह आयोजित था। इस उदघाटन समारोह में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश मुख्य अतिथि तथा छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे।
छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने छत्तीसगढ़ की विराट साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को याद करते हुए ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत विनोद कुमार शुक्ल की विशेष रूप से चर्चा करते हुए उनके लेखन की प्रशंसा की तथा इस आयोजन के महत्व को रेखांकित किया।
उदघाटन समारोह के बाद रायपुर साहित्य उत्सव के विभिन्न मंडपों लाला जगदलपुरी मंडप, श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप, अनिरुद्ध नीरव मंडप सहित अन्य मंडपों में विभिन्न विषयों में चर्चा सत्रों का दौर चला।
उत्सव के प्रथम दिन लाला जगदलपुरी मंडप में समकालीन महिला लेखन, वाचिक परंपरा में साहित्य, काला पादरी में जनजातीय विमर्श, पुरातत्व: मौन साहित्य जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा की गई।
इन सत्रों में इंदिरा दांगी, श्रद्धा थवाईत, जया जादवानी, रुद्रनारायण प्राणीग्राही, महेंद्र मिश्र, उर्मिला शुक्ल, संजीव बख्शी, राहुल सिंह, अजय चतुर्वेदी के विमर्शों ने इन विचार सत्रों को नई दिशा प्रदान की तथा इसे और इन विचार सत्रों को जीवंत भी बनाया।
श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में वंदे मातरम, कविता की नई चाल, छत्तीसगढ़ का साहित्यिक अवदान, समय की समस्या: सेक्युलरिज्म जैसे गहन विषयों पर उपस्थित विद्वानों द्वारा चर्चा की गई।
श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में संपन्न इन सत्रों में जे. नंदकुमार, कुमुद शर्मा, कुलपति वर्धा, बुद्धिनाथ मिश्र, चंद्र शेखर शर्मा, अरुण कुमार निगम, दिलीप मंडल तथा जयप्रकाश पांडे की भागीदारी ने इन विचार सत्रों की गंभीरता को एक नया तेवर प्रदान किया।
अनिरुद्ध नीरव मंडप में पहले दिन के विचार सत्र के प्रमुख आकर्षण थे डिजिटल साहित्य, संवाद, स्मृति शेष : विनोद कुमार शुक्ल: साहित्य की खिड़कियां। इन सत्रों में राजीव तुली, अदिति महेश्वरी, सुधीर शर्मा, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, जयप्रकाश पांडे ने अपने विचारों से इन सत्रों को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। वहीं विनोद कुमार शुक्ल पर केंद्रित विशेष सत्र में डॉ. सुशील त्रिवेदी, सौरभ शर्मा, अनुभव शर्मा, टी.जे.भानु तथा डॉ. नीलम वर्मा ने विनोद कुमार शुक्ल के गहरे साहित्यिक अवदान को गंभीरता पूर्वक रेखांकित करते हुए उनके संपूर्ण साहित्य को आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण निरूपित किया। प्रथम दिन के उत्सव का समापन मनोज जोशी के सुप्रसिद्ध नाटक ‘चाणक्य’ के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ।
उत्सव के दूसरे दिन 24 जनवरी का प्रारंभ चारों मंडपों में आयोजित विभिन्न विचार सत्रों से हुआ। विनोद कुमार शुक्ल मंडप में राष्ट्र सेवा के सौ वर्ष, धार्मिक फिल्में और टेली धारावाहिकों का दौर, भारत का बौद्धिक विमर्श, भारतीय ज्ञान परंपरा, माओवादी आतंक और लोकतंत्र जैसे गंभीर विषयों पर मुकुल कानिटकर, प्रफुल्ल केतकर, नीतीश भारद्वाज, आदित्य शुक्ला, राम माधव, कृष्णा दास, कमलेश कमल, ऐश्वर्य पुरोहित को सुनना श्रोताओं के लिए उपलब्धि से कम नहीं था। विनोद कुमार शुक्ल मंडप में कार्यक्रम का समापन अटल बिहारी वाजपेई की स्मृति में आयोजित काव्य पाठ से हुआ।
लाला जगदलपुरी मंडप में छत्तीसगढ़ के लोक गीत, आज की हिंदी कहानियां, राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे, डिजिटल युग के लेखक और पाठक, डॉक्टर आंबेडकर विचारपुंज की आभा जैसे विषयों पर विचारोत्तेजक चर्चाएं हुईं। इन चर्चाओं में पीसी लाल यादव, बिहारी लाल साहू, परदेशी राम वर्मा, जयश्री राय, सतीश जायसवाल, हर्षवर्धन त्रिपाठी, रुबिका लियाकत, सर्वेश तिवारी, नवीन चौधरी, दिलीप मंडल, कौशल पवार ने हिस्सेदारी की।
वहीं दूसरे दिन श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया, साहित्य के झरोखे से इतिहास, शैक्षणिक संस्थानों में भाषा और साहित्य का स्तर जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा हुई जिसमें टीजे भानु, अनुज शर्मा, ओम उपाध्याय, चितरंजन कर, भारत भास्कर, अशोक शर्मा जैसे विषय विशेषज्ञों ने इन सत्रों को अपने विचारों से एक नई पहचान दी
वहीं रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन अनिरुद्ध नीरव मंडप में साहित्य उपनिषद से एआई तक, बाल साहित्य जैसे विषयों पर आयोजित सत्रों में गोपाल कमल, ओमप्रकाश व्यास, विकास दवे, संजीव सिन्हा की भागीदारी महत्वपूर्ण रही।
रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे तथा अंतिम दिवस 25 जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल मंडप में दो विचार सत्र आयोजित थे, जिनके विषय थे संविधान और भारतीय मूल्य तथा सिनेमा और समाज। इन दोनों सत्रों में शिव प्रकाश, हितेश शंकर, सुप्रसिद्ध फिल्म निदेशक अनुराग बसु, चंद्र प्रकाश द्विवेदी और मनोज वर्मा को सुनना सबके लिए रोचक तथा प्रीतिकर अनुभव था।
उत्सव के अंतिम दिन लाला जगदलपुरी मंडप में ट्रैवल ब्लॉग, पत्रकारिता और साहित्य, शासन और साहित्य विषय पर राहुल चौधरी, कायनात काजी, अनंत विजय, हिमांशु द्विवेदी, सुशील त्रिवेदी, इंदिरा मिश्रा, संजय अलंग और गौरव सिंह ने इन विचार सत्रों को जीवंत बनाने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाई। इसी दिन श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में नवयुग में भारत बोध, नाट्यशास्त्र और कला परंपरा जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ का भी आयोजन संपन्न हुआ।
साहित्य महाकुंभ के लिए देश के अनेक मसिजीवियों ने राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा, कमिश्नर जनसंपर्क रवि मित्तल तथा छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा का विशेष प्रयास रहा।
रिपोर्ट ः डॉ. नीलम वर्मा