Home कला-संस्कृति सामान्य 'लॉकडाउन के बीच महाभारत, 1988 में प्रसारण के वक्त सड़कों पर होता था कर्फ्यू जैसा माहौल'

'लॉकडाउन के बीच महाभारत, 1988 में प्रसारण के वक्त सड़कों पर होता था कर्फ्यू जैसा माहौल'

नीरज झा - MAR 31 , 2020
'लॉकडाउन के बीच महाभारत, 1988 में प्रसारण के वक्त सड़कों पर होता था कर्फ्यू जैसा माहौल'
'लॉकडाउन के बीच महाभारत, 1988 में प्रसारण के वक्त सड़कों पर होता था कर्फ्यू जैसा माहौल'
File Photo
नीरज झा

फैल रही महामारी कोरोना वायरस और 14 अप्रैल तक लागू लॉकडाउन के बीच करीब 33 साल बाद एक बार फिर दूरदर्शन पर रामानंद सागर द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध धारावाहिक 'रामायण' (1986) और बी आर चोपड़ा के 'महाभारत' (1988) का प्रसारण 28 मार्च से शुरु हो गया है। 'महाभारत' में सबसे प्रसिद्ध ‘मैं समय हूं...’ की आवाज और ‘भीष्म पितामह’ के किरदार ने पुरानी पीढ़ी के साथ-साथ नई पीढ़ी में भी अमिट छाप छोड़ी है। मुंबई में पले-बढ़े, आवाज के जादूगर हरीश भिमानी (1956) ने ‘मैं समय हूं...’ में अपनी आवाज दी थी। जबकि मशहूर एक्टर मुकेश खन्ना (1958) ने 'भीष्म पितामह' का किरदार निभाया था। 'रामायण' और 'महाभारत' ने 1980-90 के दशक में हर घर में एक नई पहचान बनाई।

जिसके बाद हर कोई रामायण और महाभारत की गाथा से परिचित होने लगा और इसमें अहम योगदान टेलीविजन का रहा। उस समय हर घर और  गांव में टेलीविजन नहीं था और लोग सामूहिक रूप से इकठ्ठा होकर इसका प्रसारण देखते थे। मुकेश खन्ना बताते हैं, “जब 1988 में इसका प्रसारण किया गया तो लोग टीवी से चिपक जाते थे। उस वक्त सड़के सुनसान हो जाती थी। कई लोग मुझे बताते थे कि आज का एपिसोड काफी अच्छा था। वैसे कहें तो इन 33 सालों में लोगों ने, अनगिनत बार अन्य माध्यमों से इसे देखा होगा, लेकिन यह नई पीढ़ी के लिए एक वरदान ही है, कैसे समय का चक्र घूमता है। आज जब देशभर में कर्फ्यू जैसा माहौल है तब इनकी मांग की गई है। एक वो दौर था जब इसके प्रसारण होते ही सड़कों पर कर्फ्यू जैसा माहौल हो जाता था। अगर आज लोग इसे देख रहे हैं तो यह अच्छी बात है। क्योंकि अब नई पीढ़ियों की आदत बदल चुकी है। ये पीढ़ियां अमेजन प्राइम टाइम और नेटफ्लिक्स वाली हैं। घरों में महिलाएं सास-बहु और इस तरह के सीरियल्स ज्यादा देखने लगे हैं।” 

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की 65 वर्षीय वीना देवी आज भी उस दौर को याद करते हुए बताती हैं, “उस वक्त मेरी शादी के कुछ साल ही हुए थे। गांव में हर किसी के पास आज की तरह टीवी नहीं होता था। हर गांव में बिजली भी नहीं थी। इसलिए मेरे यहां लोग ट्रैक्टर की बैटरी से टेलीविजन चलाकर देखते थे। आलम यह था कि इसके प्रसारण के वक्त सड़कों पर लोग दिखाई नहीं देते थे। अपना सारा काम छोड़कर करीब 200 लोग इकठ्ठा हो जाते थे।” 

मुकेश खन्ना का किरदार 'भीष्म पितामह' के रूप में लोगों के दिमाग में इस तरह से इंगित हुआ कि लोग उन्हें वास्तविक रूप में 'भीष्म' मानने लगे थे जिस तरह से लोगों ने 'रामायण' के ‘राम और सीता’ को समझना शुरु कर दिया। इससे पहले भी मुकेश खन्ना ने 15 फिल्मों में अभिनय किया था। मुकेश बताते हैं, “महाभारत मेरा पैक्ट विषय था और मैं बचपन से पढ़ा हूं। मुझे गीता समझ में आज तक नहीं आई। इस बात को मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जितनी महाभारत मैंने पढ़ी उतनी किसी भी 'महाभारत' के अन्य किरदार निभाने वाले लोगों ने नहीं पढ़ी होगी।” 'भीष्म' का किरदार कैसे मिला? इस सवाल पर वो कहते हैं, “मैं 'कर्ण या अर्जुन' के ऑडिशन के लिए गया था लेकिन मुझे दुर्योधन का रोल ऑफर किया गया। जिसे मैंने मना कर दिया। उसके बाद मुझे 'द्रोणाचार्य' का रोल ऑफर किया गया जिसके लिए मैंने हामी भरी। क्योंकि मैं 'महाभारत' का हिस्सा बनना चाहता था, लेकिन 15 दिनों के बाद पता चला कि जो भीष्म का रोल करने वाला है, वो नहीं आ रहा है। फिर मुझे ये ऑफर किया गया और मैंने स्वीकार कर लिया। ‘आयुष्मान भव:’ कहना था इसलिए भगवान ने यह रोल दिला दिया नहीं तो बी आर चोपड़ा तो कुछ और ही चाहते थे।” 

वहीं, 'महाभारत' में सूत्रधार के तौर पर राही मासूम रजा ने “मैं समय हूं,  आज महाभारत की कहानी सुनाने जा रहा हूं।...” लिखा था जो काफी प्रसिद्ध रहा। इसमें हरीश भिमानी ने अपनी आवाज से इस ‘समय’ को जीवित कर दिया और करोड़ों लोग आज भी इसी आवाज को 'महाभारत' के शुरू होने से पहले सुनते हैं। दरअसल, इसे लिखने के समय मासूम रजा ने यह सोचते हुए लिखा था कि टीवी पर कोई इसे बोलते हुए दिखेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए बी आर चोपड़ा और राही मासूम रजा को एक ऐसे आवाज की तलाश थी जो दर्शकों को आकर्षित कर सके। हरीश भिमानी बताते हैं, “मैं पहले से रेडियो प्रोग्राम में अपनी आवाज देता था। कार्यक्रमों के लिए होस्टिंग भी करता था। जब 'महाभारत' के बनने की बात चल रही थी तो राही मासूम रजा को पूरा स्क्रिप्ट लिखने का जिम्मा सौंपा गया और उन्होंने ये लिखा भी। जब मुझे फोन कर बुलाया गया कि आपको ये आवाज देनी है। मैंने सोचा कि कोई डॉक्यूमेंट्री होगी। मैने उसी तरह से पढ़ दिया। पहले एपिसोड की शुरुआत में ‘मैं समय हूं... ’ की स्क्रिप्ट करीब तीन मिनट से ज्यादा की है। लेकिन उन्होंने कहा, नहीं इस तरह से नहीं...। फिर तीसरी या चौथी बार में मैंने अपने मुताबिक पढ़ा उन्हें अच्छा लगा। तो इस तरह से हर दिन रिकॉर्डिंग से पहले वो आवाज मुझे सुनाई जाती थी और वही आवाज टेप में कैद हो गई।”

हम इस बात को बखूबी जानते हैं कि जिस तरह की टेक्नोलॉजी आज है उस दौर में नहीं थी। इस धारावाहिक की शूटिंग करीब सवा दो साल तक चली थी। उन दिनों को याद करते हुए मुकेश बताते हैं, “अगर मैं उन सारे पहलुओं को याद करूं तो एक और महाभारत बन सकती है। अभी जैसी बात नहीं है कि शूटिंग के बाद घर चला गया। सवा दो साल तक एक साथ, एक परिवार की तरह रहना। इससे बड़ी यादें क्या हो सकती हैं। जिन क्षेत्रों में जाने का कभी सोचा नहीं था उन क्षेत्रों में गया। किसी के पास कोई मोबाइल नहीं होता था। सभी एक दूसरे से बातें करते हुए ही अपना समय बिताते थे। बहुत यादगार पल था वो। इसीलिए शूटिंग के अंतिम दिन सभी के आंखों में आसूं आ गए थे। लेकिन मैंने सबको ढांढस बंधाने का काम किया जैसा आपने देखा भी होगा।” 

'महाभारत' में युद्ध के दौरान हम सभी ने घोड़े भी देखें होंगे। इन दिनों अन्य सीरियल या सिनेमा में जो दृश्य दिखाए जाते हैं वो टेक्नोलॉजी का कमाल होता है। वास्तविकता बहुत कम होती है, लेकिन 'महाभारत' के घोड़े वास्तविक थे। मुकेश खन्ना कहते हैं, “बिल्कुल, उस वक्त उतने संसाधन नहीं थे। बड़ी परेशानी होती थी। उस तरह के न कैमरे थे और न टेक्नोलॉजी। शूटिंग अधिकांशत: मुंबई के फिल्मसिटी और एक रिजॉर्ट में पूरी की गई थी। जबकि जितने भी युद्ध के दृश्य हैं वो जयपुर में फिल्माए गए। कुछ दृश्य गुजरात में भी शूट किए गए। युद्ध वाले दृश्य के लिए घोड़े और खड़ी भीड़ वास्तविक है। क्योंकि, कई गांव के लोग शूटिंग को देखने के लिए इकठ्ठा हो जाते थे।”  

ऐसा नहीं है कि उसके बाद 'महाभारत' नहीं बनी। एकता कपूर द्वारा 2008 में बनाई गई 'महाभारत' को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। इस पर खन्ना बताते हैं, “देखिए, एक बार जो 'महाभारत' बन गया वो बन गया। राही मासूम रजा, पं. नागेंद्र शर्मा और बी आर चोपड़ा जैसे लोग अब नहीं रहें, जिन्होंने इसमें जान डाली थी। एकता कपूर की 'महाभारत' को हम महाभारत नहीं कह सकते हैं। वेद व्यास के महाभारत को बिना पढ़े ये लोग बनाते हैं, जो बिल्कुल भी सही नहीं है। मैं खुले तौर पर इसकी आलोचना करता हूं।” 

अभी भी जब हम मुकेश खन्ना को गूगल पर सर्च करते हैं तो शक्तिमान के रूप में उनकी तस्वीर सबसे पहले आती है। इस पर वो कहते हैं, “देखिए, बच्चों के लिए मैं शक्तिमान हूं और बड़ों के लिए 'भीष्म पितामह'। मैं बच्चों के साथ काफी नजदीकी रखता हूं। इसलिए हमने शक्तिमान (1997) बनाया था। अब इसके फिर से बनाने पर बात चल रही है।“  

हरीश भिमानी की उम्र करीब 64 साल हो चुकी है। फिर भी उनकी आवाज उसी तरह की है। हरीश बताते हैं, “अभी भी मैं रिकॉर्डिंग करता हूं। महीने में लगभग 30 से 40 रिकॉर्डिंग हो जाती हैं। सरकार की तरफ विज्ञापन के लिए ऑफर भी आते हैं। जैसे मैंने इस लॉकडाउन में हेल्थ को लेकर किया रिकॉर्डिंग किया है, जो स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन की तरफ से मिला था। अपनी आवाज को लेकर मैं सिर्फ वोकल व्यायाम करता हूं।” 

मुकेश खन्ना ने सैकड़ों फिल्मों में काम किया। कई किरदार उन्होंने निभाया। लेकिन यह एक पहेली बनी रह गई कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की? इस सवाल पर मुकेश बताते हैं, "यह निजी बात है इसलिए इसे रहने दीजिए। हां, ऐसा नहीं है कि 'महाभारत में 'भीष्म' का किरदार निभाने के साथ आजीवन शादी न करने की प्रतिज्ञा लेने के कारण मैंने शादी नहीं की"

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