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हिंदी और उसका सत्ता विमर्श

SEP 17 , 2018

“हिंदी के नाम पर एक पूरा उद्योग स्थापित हो गया है जिस पर करदाता का अरबों रुपया खर्च किया जाता है, फिर भी हिंदी अभी तक मुख्यतः साहित्य, पत्रकारिता और अनुवाद की भाषा ही बनी हुई है”

सितंबर का महीना आते ही सरकारी दफ्तरों में हिंदी की बहार छा जाती है। 14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को नवस्वाधीन भारत की राजभाषा का दर्जा मिला था इसलिए इस दिन को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाने की परंपरा है। यही नहीं, सितंबर में सभी सरकारी दफ्तरों में ‘हिंदी पखवाड़ा’ भी मनाया जाता है और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन गठित राजभाषा समिति के निर्देशानुसार इसे इस तरह मनाया जाना चाहिए कि इसके दौरान 14 सितंबर जरूर पड़े। इसलिए कुछ दफ्तरों में यह पखवाड़ा 1 सितंबर से शुरू होकर 14 सितंबर को समाप्त होता है और कुछ अन्य में 14 सितंबर से शुरू होकर 28 सितंबर को खत्म होता है। यानी हर साल सितंबर का महीना हिंदी से संबंधित कर्मकांड का महीना बन कर रह गया है। कर्मकांड की इस शृंखला में कुछ-कुछ साल के अंतराल पर आयोजित होने वाला विश्व हिंदी सम्मेलन भी जुड़ गया है। इसका आयोजन दक्षिणपंथी तत्वों के प्रतिनिधि अनन्त गोपाल शेवड़े के नेतृत्व में पहली बार 10-12 जनवरी, 1975 को नागपुर में किया गया था और इसका लक्ष्य लगातार अलोकप्रिय होती जा रही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनैतिक बैसाखी पकड़ाना था।

अभी हाल ही में मॉरीशस में ग्यारहवां विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया। उसमें जिस स्तर के लेखकों ने शिरकत की, वहां जैसी बदइंतजामी देखी गई और जिस तरह हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने की कोशिश की गई, वह अभी तक हिंदी के हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। 1950 से लेकर आज तक हिंदी के नाम पर न जाने कितनी संस्थाएं, यहां तक कि विश्वविद्यालय भी स्थापित हुआ है लेकिन क्या हिंदी प्रेमी अपने दिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से कह सकते हैं कि उनकी गतिविधियों के कारण हिंदी के प्रचार-प्रसार में तनिक भी इजाफा हुआ है। हिंदी के प्रसिद्ध कवि-कहानीकार श्रीकांत वर्मा ने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पूर्व मेरे साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि हिंदी के नाम पर बनी इन सफेद हाथियों जैसी संस्थाओं को भंग कर दिया जाना चाहिए।

अक्सर हिंदी प्रेमी इस गलतफहमी के शिकार पाए जाते हैं कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है जबकि हकीकत यह है कि अंग्रेजी के साथ-साथ वह भी सरकारी कामकाज की भाषा है और हिंदी समेत सभी अन्य भारतीय भाषाएं राष्ट्रभाषाएं हैं। लेकिन प्रारंभ से ही हिंदी के हितरक्षक होने का दावा करने वालों का फोकस अंग्रेजी को हटाकर उसकी जगह हिंदी को सत्ता की भाषा बनाने और अंग्रेजी को सभी भारतीय भाषाओं के ऊपर जो वर्चस्व हासिल है, वह वर्चस्व हासिल कराने पर रहा है, इसलिए इस मिथक को भी बहुत जोर-शोर के साथ फैलाया गया कि हिंदी तो राष्ट्रभाषा है और तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी और मलयालम जैसी अन्य सभी क्षेत्रीय भाषाएं हैं। इस सिलसिले में इस तथ्य को भी सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया कि जहां खड़ीबोली हिंदी कही जाने वाली भाषा का इतिहास समुचित रूप से फोर्ट विलियम कॉलेज में 1800 से शुरू होता है और जिसमें गद्य लेखन के प्रणेता उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध

 में सक्रिय भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850-1885) को माना जाता है, वहीं तमिल जैसी भाषा और उसका साहित्य कम-से-कम दो हजार साल पुराना है। और हिंदीतर भाषा-भाषियों में अपनी जातीय, भाषायी एवं सांस्कृतिक अस्मिता का बोध और उस पर गर्व हिंदी भाषियों की तुलना में कम नहीं है।

पिछले साल 24 जून को उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने, जो उस समय केंद्रीय मंत्री थे, एक विवादास्पद बयान देते हुए कहा था कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, हमारी अस्मिता है और हमें उस पर गर्व होना चाहिए। इसके पहले अप्रैल में नायडू ने संसद की राजभाषा समिति के इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया था कि उन सभी सांसदों और मंत्रियों के लिए लिखने और पढ़ने में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य बना दिया जाए जो हिंदी लिखने-पढ़ने में सक्षम हैं। इस पर कई विपक्षी नेताओं ने विरोध जताया था और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट करके पूछा था कि हमें कब यह राष्ट्रभाषा मिली? 

संविधान के अनुच्छेद 343 में तो उसे अंग्रेजी के साथ-साथ राजभाषा का दर्जा ही दिया गया है। हिंदी के पैरोकारों का हमेशा से यह तर्क रहा है कि अंग्रेजी को हटाकर उसकी जगह हिंदी में पढ़ाई-लिखाई होनी चाहिए और सरकारी और अदालती कामकाज में भी हिंदी का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि आम आदमी अंग्रेजी नहीं समझता है। यह तर्क अपनी जगह बिलकुल सही है लेकिन क्या आज हिंदी प्रदेशों में सरकारी और अदालती कामकाज में इस्तेमाल की जाने वाली हिंदी आम आदमी की समझ में आती है? नहीं। और इसका प्रमुख कारण यह है कि 14 सितंबर, 1949 को जो भाषा हिंदी के तौर पर राजभाषा स्वीकृत हुई, वह उस हिंदी से कोसों दूर थी जिसे आम शिक्षित व्यक्ति जानता है और अपने रोजमर्रा के जीवन में बरतता है। हिंदी के झंडाबरदारों के सामने भी यह हकीकत स्पष्ट थी कि हिंदी का शब्द-भंडार समकालीन वास्तविकता को ग्रहण करने और अभिव्यक्त करने में समर्थ नहीं है।

उन्नीसवीं शताब्दी में ही अनेक विचारकों और नेताओं को यह लगने लगा था कि हिंदी को ही देश की संपर्क भाषा होना चाहिए, क्योंकि वह देश के एक कोने से दूसरे कोने तक थोड़ी-बहुत समझी जाने वाली एकमात्र भाषा है। 1875 में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपने सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने का फैसला किया जबकि वे स्वयं गुजराती थे और संस्कृत में ही बोलते और लिखते थे। बाद में महात्मा गांधी ने भी गुजराती होने के बावजूद महसूस किया कि संस्कृत और अरबी-फारसी के शब्दों से लदी-फदी हिंदी या उर्दू के स्थान पर बोलचाल के आमफहम शब्दों वाली भाषा ही देश की संपर्क भाषा बन सकती है। बांग्ला के महान लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर और तमिल के प्रसिद्ध कवि सुब्रह्मण्यम भारती भी हिंदी को संपर्क भाषा बनाए जाने के पक्ष में थे। लेकिन कांग्रेस में ही अनेक नेता महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू के भाषा-संबंधी विचारों से सहमत नहीं थे और हिंदुस्तानी के सख्त खिलाफ थे। 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जैसे सोच वाले अनेक नेता, जो अन्य संगठनों में थे, भी नागरी लिपि में लिखी हुई ऐसी हिंदी के पक्ष में थे जो अरबी-फारसी के प्रचलित शब्दों के ऊपर भी संस्कृत के अप्रचलित शब्दों को तरजीह दे। स्वाधीनता संघर्ष में अंग्रेजी शासन के साथ-साथ अंग्रेजी हटाना भी एक लक्ष्य था और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा जैसी संस्थाओं ने सुदूर दक्षिण में हिंदी फैलाने में ऐतिहासिक योगदान दिया, क्योंकि तब हिंदी भारतवासियों को एकजुट करने वाली भाषा थी।

हिंदी और उर्दू संभवतः विश्व की अकेली ऐसी भाषाएं हैं जिनका भाषा शास्‍त्रीय आधार बिलकुल एक जैसा है, “मैं वहां गया” या “मैं बाजार जा रहा हूं” जैसे वाक्य हिंदी के भी हैं और उर्दू के भी। 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी और उर्दू का विभाजन न केवल धार्मिक आधार पर किया गया, बल्कि लिपि के आधार पर भी कर दिया गया। फारसी और अरबी की लिपियों से निकली लिपि में लिखी और फारसी-अरबी के शब्दों को बरतने वाली भाषा को उर्दू और नागरी लिपि में लिखी और फारसी-अरबी शब्दों से मुक्त भाषा को हिंदी कहा गया। लेकिन बाद में हिंदी साहित्य में अपभ्रंश के साथ-साथ अवधी, ब्रज और मैथिली की साहित्यिक संपदा को भी सम्मिलित कर लिया गया। लेकिन हिंदी के विद्यार्थियों को शायद ही कभी यह बताया जाता हो कि चाहे मलिक मुहम्मद जायसी का महाकाव्य पद्मावत हो या बिहारी की सतसई, उनकी अनेक प्रतियां फारसी लिपि में मिली हैं और इसके कारण भी पाठान्तर की समस्या पैदा हुई है। सवाल यह है कि यदि फारसी लिपि में लिखी गई ये महत्वपूर्ण पुस्तकें हिंदी साहित्य का अंग हैं, तो फिर गालिब का गद्य क्यों नहीं है? जब हिंदी के बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र लड़खड़ाता हुआ गद्य लिख रहे थे जिसमें कहीं ब्रज के क्रियापद आते थे और कहीं अवधी के, तो उनसे भी पहले लिखे गए गालिब के पत्रों की साफ-सुथरी खड़ीबोली हिंदी को हिंदी क्यों नहीं माना गया?

कारण जो भी रहे हों, वास्तविकता यही है कि 12 सितंबर, 1949 को जब संविधान सभा में इस विषय पर बहस हुई तो सेठ गोविंद दास, पुरुषोत्तम दास टंडन, रविशंकर शुक्ल और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे हिंदी समर्थकों का पूरा जोर इस बात पर था कि तत्काल अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को अधिष्ठित कर दिया जाए जबकि सभापति राजेंद्र प्रसाद का आग्रह था कि इस बिंदु पर अधिकाधिक सदस्यों के बीच आम सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और एन. जी. आयंगर ने एक पांच-सूत्री फार्मूला सुझाया जिसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय अंकों और हिंदी के साथ अंग्रेजी का भी राजभाषा के रूप में इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन हिंदी-समर्थक गुट मतदान पर अड़ा रहा और केवल एक वोट से उस हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया जो नागरी लिपि में लिखी जाए और नए शब्द बनाने के लिए संस्कृत के शब्द भंडार का उपयोग करे। आज इसी तत्सम बहुल कृत्रिम हिंदी को राजभाषा बना दिया गया है जिसमें इंजीनियर को अभियंता कहा जाता है- यह शब्द किस आम आदमी की समझ में आता है और कौन इसे रोजमर्रा की बातचीत में प्रयोग करता है? और जिसके कारण रेलवे स्टेशन पर मुसाफिरखाना प्रतीक्षालय और पाखाना शौचालय हो गया है, ठंडा पानी पीने वाले को शीतल पेय जल तलाश करना पड़ता है और अंदर-बाहर आने-जाने वालों को आगम-निर्गम ढूंढ़ने की जरूरत पड़ती है। आम आदमी के लिए यह भाषा वैसी ही अबूझ है जैसी अंग्रेजी।

हिंदी के नाम पर एक पूरा उद्योग स्थापित हो गया है जिस पर करदाता का अरबों रुपया खर्च किया जाता है। फिर भी हिंदी अभी तक मुख्यतः साहित्य, पत्रकारिता और अनुवाद की भाषा ही बनी हुई है। समाज विज्ञान या दर्शन या प्राकृतिक विज्ञानों में हिंदी में मूल पुस्तकें शायद ही लिखी जाती हों। विद्यार्थियों को ऐसे अनुवाद से काम चलाना पड़ता है जिसे समझना अक्सर टेढ़ी खीर साबित होता है।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)     


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