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मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश सरकार से लेकर अब तक, कितने बदल गए पुराने शहर?

OCT 05 , 2017

नलिन चौहान

मुगल साम्राज्य की 17 वीं शताब्दी की राजधानी शाहजहांनाबाद, भारत में पुराने परकोटे वाले शहरों की सामयिक संस्कृति का सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक है। जहां के नगर नियोजन में रसील इखवान अल सफा जैसे इस्लामी पाठ और हिंदू वास्तु शास्त्रों को अर्थपूर्ण ढंग से समावेश किया गया था। ये पाठ महजबी और गैर महजबी इमारतों के निर्माण, जिसमें मंदिर से लेकर मस्जिद और शहरियों के मकान शामिल थे, के स्वरूपों में झलकते थे।

हाल में ही ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न स्थित डेकिन विश्वविद्यालय में व्याख्याता यामिनी नारायणन की रूटलेज से प्रकाशित "रिलीजन, हैरिटेज एंड द सस्टेनेबल सिटी हिंदुइज्म एंड अर्बनाइजेशन इन जयपुर" (धर्म, विरासत और टिकाऊ शहर, जयपुर में हिंदू धर्म और शहरीकरण) शीर्षक वाली पुस्तक इस बात को सामने रखती है।

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किताब का कवर

यह पुस्तक भारत के पुराने शहरों में धर्म और मूर्त धार्मिक विरासत जैसी प्रासंगिक अवधारणाओं के माध्यम से शहर के सतत विकास का आकलन देश के पुराने और आधुनिक शहरों के शहरी नियोजन के लिए नए ढांचों को खड़ा करने की प्रक्रिया को समझने की एक समझ देती है। जहां पुराने शहर, दूसरे उपेक्षित ऐतिहासिक शहरों के साथ तुलनात्मक रूप से जानने का एक महत्वपूर्ण सिरा देते हैं।

किताब की लेखिका, यामिनी नारायणन

उत्तर और मध्य भारत में अंग्रेजों के राज से पहले के परकोटे वाले शहर, वहां के शहरी परिदृश्य का अभिन्न भाग रहे हैं। ऐसे में, इस चीज को समझने के लिए दिल्ली, जयपुर, आगरा, लखनऊ और अमृतसर जैसे पुराने शहरों के परकोटे वाले स्थान महत्वपूर्ण हैं। ये सभी शहर विभिन्न धार्मिक मान्यताओं वाले राजवंशों के संरक्षण में विकसित हुए पर उनके कामकाज की प्रवृति और गतिशीलता का स्वरूप एकसमान था जो कि व्यापार, आमोद-प्रमोद और श्रम के इर्दगिर्द केन्द्रित था।

यामिनी नारायणन इस बात को रेखांकित करती हैं कि देश में नगर नियोजन और उसकी योजना को तैयार करने के प्रतिमानों तथा पुराने शहरों के पास, निजी क्षेत्र की पहल के कारण बसी बसावटों में रहने वाली आबादी के एक अलग तरह की बाड़बंदी और विभाजित स्थानीयता वाले आधुनिक शहरों को सिखाने के के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। भारत में पुराने ऐतिहासिक परकोटे वाले शहर, अंग्रेजी राज से पहले के भारतीय शहरों और उसके नागरिकों तथा धर्म को सम्मान देने की एक स्मृति-भर हैं। ऐसा इसलिए भी हुआ है क्योंकि दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और बंगलूर जैसे बड़े महानगरों में निजी क्षेत्र की बनी आवास कालोनियां ने शहर में ही एक अलग तरह की लक्ष्मण रेखा खींच दी है, जहां आज का मध्यम वर्ग बहुसंख्यक है।

चांदनी चौक की पुरानी पेंटिंग

पुस्तक के अनुसार, भारत में अंग्रेजी उपनिवेशवाद के बाद बने शहरों के साथ ही पुराने परकोटे वाले शहरों का महत्व घटना शुरू हुआ। 1857 के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ शासकों ने ब्रितानिया साम्राज्य में नए बड़े शहरों को बनाने की शुरूआत की और वे पुराने परकोटे वाले शहरों से बाहर निकलने लगे।

उल्लेखनीय है कि शाहजहांनाबाद की पश्चिम और उत्तर दिशा की दीवारों के विपरीत दक्षिण-पश्चिमी तरफ की दीवार को असलियत में एक रूकावट माना गया था तथा 1820 के दशक में इसके कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि मार्च 1859 में “दिल्ली गजट” नामक अखबार ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि महल यानी लालकिला के भीतर इमारतों को गोला-बारूद से नेस्तानाबूद करने का काम हो रहा है।

इसके एक साल बाद, जब लार्ड कैनिंग ने वास्तुकला या ऐतिहासिक महत्व की पुरानी इमारतों को संरक्षित किए जाने का आदेश दिया तो तब तक काफी नुकसान हो चुका था। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने 1861 में, रेलवे लाइन के निर्माण के हिसाब से लाल किले के कलकत्ता गेट सहित कश्मीरी गेट और मोरी गेट के बीच के क्षेत्र को ध्वस्त कर दिया। अंग्रेजों ने पूरी सुरक्षा की जांच के बाद कलकत्ता गेट के स्थान से होते हुए रेलवे लाइन बिछाई। इसके पीछे उनका मकसद साफ था कि अगर भविष्य में भारतीयों की ओर से दोबारा ऐसा प्रयास होता है तो ब्रितानी सेना उसे जल्दी और आसानी से दबा सकें।

कश्मीरी गेट

इस संबंध में मिस्टर पार्थ ने “भारत के अंग्रेजों के प्रारंभिक बंदरगाह शहर, उनकी योजना और वास्तुकला 1640-1787” शीर्षक नामक पुस्तक में लिखा है कि अंग्रेजों ने भारतीय शहरों की प्रकृति, भारतीयों के अंग्रेजों की गुलामी के विरूद्व दोबारा संघर्ष का बिगुल बजाने के भय और शहरों में नए निर्माण के लिए जगह बनाने के लिए पुराने शहर के केंद्रों को ध्वस्त करने की बातों को ध्यान में रखते हुए अपनी नीति में योजना और डिजाइन का पालन किया।

इतना ही नहीं, वर्ष 1863 में एक विशेष चिकित्सा समिति ने लालकिले को यूरोपीय सैनिकों के लिए अस्वस्थकारी करार देते हुए रिज पर पुरानी छावनी के स्थान को अधिक उपयुक्त बताया। जबकि वर्ष 1872 में कर्नल क्रेक्रॉफ्ट ने दिल्ली को सुन्दर बनाने के लिए कई योजनाओं का सुझाव दिया लेकिन वे अधिकतर सिविल लाइन्स केंद्रित थी, जिससे अंग्रेज़ों शासन का नस्लीय दृष्टिकोण ही उजागर होता है। इसी तरह वर्ष 1881 में नगर पालिका के दिल्ली दरवाजे को ध्वस्त करने की मंशा पर तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ ने एतराज जताया क्योंकि वह कश्मीरी दरवाजा और उससे सटी दीवारों का ऐतिहासिक महत्व के कारण संरक्षण करना चाहता था।

लाल किला की पुरानी तस्वीर

ब्रितानी राज में 1857-1911 की अवधि में दिल्ली का पूरा शहर विध्वंस का गवाह बना। फिर दिल्ली में रेलवे के आगमन के साथ नई इमारतें बनी। शहर के पश्चिम की दिशा की ओर आबादी का विस्तार हुआ। दिल्ली की जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के हिसाब से यह एक महत्वपूर्ण काल था। इस अवधि में ब्रितानी सरकार ने अपनी सेना और प्रशासन में काम करने वाले अंग्रेजों के लिए घर, कार्यालय, चर्च, बाजार बनाए और इस तरह गोरों की आबादी शाहजहांनाबाद के परकोटे की दीवार से बाहर बसी।

नई दिल्ली का विकास

पुस्तक बताती है कि अंग्रेज राज के वर्ष 1911 में हुए दिल्ली दरबार में, अंग्रेजी भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की। इसके बाद, एडवर्ड लुटियन को पुराने शहर शाहजहांनाबाद की सीमाओं के बाहर एक नई राजधानी यानी नई दिल्ली बनाने की जिम्मेदारी दी गई। ब्रितानी ताज के कोहिनूर होने के कारण भारत की नई राजधानी का एक सुंदर शहर के रूप में विकास अंग्रेजों के शाही प्रभुत्व और नस्लीय श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति के लिए जरूरी था। आखिर नई दिल्ली को अंग्रेज भारत का एक भव्य प्रतीक जो बनाना था। यही वह मोड़ है, जहां भारत के पुराने मध्यकालीन शहर अंग्रेजों की नई दिल्ली जैसे औपनिवेशिक शहर से पीछे छूट गए।

दिल्ली दरबार

पर कहते हैं न कि इतिहास अपने को दोहराता है। आज अंग्रेजों की बनाई नई दिल्ली में कनॉट प्लेस का बाजार भी अब ठीक इसी तरह महत्व कम होने के अनुभव से गुजर रहा है।

कनॉट प्लेस की पुरानी तस्वीर

यह आजादी के बाद के दौर में चंडीगढ़ सरीखे आधुनिक शहरों के नियोजन की ओर ध्यान केंद्रित होने के कारण हुआ है। यह समय का न्याय है कि इन शहरों की चमक अब दिल्ली के बाहरी हिस्सों में निजी क्षेत्र के भवन निर्माताओं के बनाए गुड़गांव या हैदराबाद के बाहरी इलाके में बंजारा हिल्स के सामने मंद पड़ गई है।


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