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साहिर लुधियानवी: आज से मेरे गीत तुम्हारे हैं

MAR 08 , 2018

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है

ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा

तुमने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा

आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला है

कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर

ख़ून चलता है तो रूकता नहीं संगीनों से

सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से

साहिर लुधियानवी। हिन्दी फिल्मों के ऐसे पहले गीतकार, जिनका नाम रेडियो से प्रसारित फरमाइशी गानों में दिया गया। यह बहुत सामान्य सा परिचय है, उस शायर का जो परिचय का मोहताज नहीं।

साहिर लुधियानवी एक मुकम्मल शायर थे। उनकी जो मकबूलियत मोहब्बत के जहां में है उसका कोई सानी नहीं है। साहिर की जितनी शिदद्त प्यार को निभाने में थी, उतनी ही उसके दिए दर्द में भी थी। दुनिया के रंजो ग़म भी उन्हें सताते थे, जो उनकी नज़्मों में झलकता है। साहिर सिर्फ कहने को प्रगतिशील नहीं थे। उनका अपनी बातों पर अटूट विश्वास भी था।

आठ मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना शहर में एक जमींदार परिवार में जन्में साहिर की भजदगी काफी संघर्षों में बीती है। साहिर ने अपनी मैट्रिक तक की पढ़ाई लुधियाना के खालसा स्कूल से पूरी की। इसके बाद वह लाहौर चले गये जहां उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई सरकारी कॉलेज से पूरी की।

कॉलेज के कार्यक्रमों में वह अपनी गजलें और नज्में पढ़कर सुनाया करते थे जिससे उन्हें काफी शोहरत मिली। जानी-मानी पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम कॉलेज में साहिर के साथ ही पढ़ती थीं जो उनकी गजलों और नज्मों की मुरीद हो गयीं और उनसे प्यार करने लगीं लेकिन कुछ समय के बाद ही साहिर कॉलेज से निष्कासित कर दिये गये। इसका कारण यह माना जाता है कि अमृता प्रीतम के पिता को साहिर और अमृता के रिश्ते पर ऐतराज था क्योंकि साहिर मुस्लिम थे और अमृता सिख थीं। इसकी एक वजह यह भी थी कि उन दिनों साहिर की माली हालत भी ठीक नहीं थी।

साहिर 1943 में कॉलेज से निष्कासित किये जाने के बाद लाहौर चले आये जहां उन्होंने अपनी पहली उर्दू पत्रिका 'तल्खियां' लिखीं। लगभग दो वर्ष के अथक प्रयास के बाद आखिरकार उनकी मेहनत रंग लायी और 'तल्खियां' का प्रकाशन हुआ। इस बीच साहिर ने प्रोग्रेसिव रायटर्स एसोसियेशन से जुड़कर आदाबे लतीफ, शाहकार, और सवेरा जैसी कई लोकप्रिय उर्दू पत्रिकाएं निकालीं लेकिन सवेरा में उनके क्रांतिकारी विचार को देखकर पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया।

इसके बाद वह 1950 में मुंबई आ गये। साहिर ने 1950 में प्रदर्शित 'आजादी की राह पर' फिल्म में अपना पहला गीत 'बदल रही है जिंदगी' लिखा लेकिन फिल्म सफल नहीं रही। वर्ष 1951 में एस.डी.बर्मन की धुन पर फिल्म 'नौजवान' में लिखे अपने गीत 'ठंडी हवाएं लहरा के आये' के बाद गीतकार के रूप में कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। साहिर ने खय्याम के संगीत निर्देशन में भी कई सुपरहिट गीत लिखे।

वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म 'फिर सुबह होगी' के लिये पहले अभिनेता राजकपूर यह चाहते थे कि उनके पसंदीदा संगीतकार शंकर जयकिशन इसमें संगीत दें जबकि साहिर इस बात से खुश नहीं थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि फिल्म में संगीत खय्याम का ही हो। 'वो सुबह कभी तो आयेगी' जैसे गीतों की कामयाबी से साहिर का निर्णय सही साबित हुआ। यह गाना आज भी क्लासिक गाने के रूप में याद किया जाता है।

साहिर अपनी शर्तों पर गीत लिखा करते थे। एक बार एक फिल्म निर्माता ने नौशाद के संगीत निर्देशन में उनसे गीत लिखने की पेशकश की। साहिर को जब इस बात का पता चला कि संगीतकार नौशाद को उनसे अधिक पारिश्रमिक दिया जा रहा है तो उन्होंने निर्माता को अनुबंध समाप्त करने को कहा।

उनका कहना था कि नौशाद एक महान संगीतकार हैं लेकिन धुनों को शब्द ही वजनी बनाते हैं। अत: एक रुपया ही अधिक सही गीतकार को संगीतकार से अधिक पारिश्रमिक मिलना चाहिये। गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' साहिर के सिने करियर की अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शन के दौरान अछ्वुत नजारा दिखाई दिया। मुंबई के मिनर्वा टॉकीज में जब यह फिल्म दिखाई जा रही थी तब जैसे ही 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं' बजा तब सभी दर्शक अपनी सीट से उठकर खड़े हो गये और गाने की समाप्ति तक ताली बजाते रहे। बाद में दर्शकों की मांग पर इसे तीन बार और दिखाया गया।

साहिर अपने सिने करियर में दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किये गये। लगभग तीन दशक तक हिन्दी सिनेमा को अपने रूमानी गीतों से सराबोर करने वाले साहिर लुधियानवी 59 वर्ष की उम्र में 25 अक्टूबर 1980 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।

उनकी नज़्म का एक हिस्सा-

भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मगर से हम

ख़ामोश क्यों रहेंगे ज़माने के डर से हम

ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है

क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

देगा किसी मक़ाम पे ख़ुद राहज़न का साथ

ऐसे भी बदगुमान न थे राहबर से हम

माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके

कुछ ख़ार कम तो कर गये गुज़रे जिधर से हम

ऊपर साहिर की प्रगतिशीलता का जिक्रा किया गया था। ये बात उनकी इस नज़्म से पता चल जाती है।

अब तक मेरे गीतों में उम्मीद भी थी पसपाई भी

मौत के क़दमों की आहट भी, जीवन की अंगड़ाई भी

मुस्तकबिल की किरणें भी थीं, हाल की बोझल ज़ुल्मत भी

तूफानों का शोर भी था और ख्वाबों की शहनाई भी

आज से मैं अपने गीतों में आतश–पारे भर दूंगा

मद्धम लचकीली तानों में जीवन–धारे भर दूंगा

जीवन के अंधियारे पथ पर मशअल लेकर निकलूंगा

धरती के फैले आंचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा

आज से ऐ मज़दूर-किसानों ! मेरे राग तुम्हारे हैं

फ़ाकाकश इंसानों ! मेरे जोग बिहाग तुम्हारे हैं

जब तक तुम भूके-नंगे हो, ये शोले खामोश न होंगे

जब तक बे-आराम हो तुम, ये नगमें राहत कोश न होंगे

मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फ़नकार न मानें

फ़िक्रों-सुखन के ताजिर मेरे शे’रों को अशआर न मानें

मेरा फ़न, मेरी उम्मीदें, आज से तुमको अर्पन हैं

आज से मेरे गीत तुम्हारे दुःख और सुख का दर्पन हैं

तुम से कुव्वत लेकर अब मैं तुमको राह दिखाऊँगा

तुम परचम लहराना साथी, मैं बरबत पर गाऊंगा

आज से मेरे फ़न का मकसद जंजीरें पिघलाना है

आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊंगा


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