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अनारकली और उमराव जान: कितनी हकीकत, कितना फसाना

नाज खान इतिहास में दर्ज कितने ही किस्से हैं, जिनकी वास्तविकता को लेकर आज भी संशय बरकरार है। कोई इन्हें...
अनारकली और उमराव जान: कितनी हकीकत, कितना फसाना

नाज खान

इतिहास में दर्ज कितने ही किस्से हैं, जिनकी वास्तविकता को लेकर आज भी संशय बरकरार है। कोई इन्हें कुछ तथ्यों के हवाले से सच साबित करने की कोशिश करता है तो किसी ने कई दलीलें देकर इन किरदारों, किस्सों के फर्जी होने की बात कही है। यही वजह है कि आज भी न सिर्फ ‘पद्मावती-अलाउद्दीन खिलजी’ के ऐतिहासिक किस्से की सत्यता पर ही सवाल उठते हैं, बल्कि कुछ इतिहासकारों ने तथ्यों के हवाले से पद्मावती के किरदार को पूरी तरह काल्पनिक करार दिया है, तो वहीं कुछ ने इसके वास्तविक होने के पक्ष में अपनी दलीलें पेश की हैं।

यह पहला किस्सा नहीं है जिसकी सत्यता पर सवाल उठ रहे हों, इससे पहले भी न सिर्फ जोधा के वजूद को लेकर ही बहस होती रही है, बल्कि इतिहास में जोधा-अकबर के संबंध को लेकर भी अलग ही तथ्य सामने रखे गए हैं। इसके अलावा भी सलीम-अनारकली’का किस्सा हो या उमराव जान का किरदार हैं, इनकी वास्तविकता आज भी सवालों के घेरे में है। इसके बावजूद ये आज भी उतने ही प्रसिद्ध हैं। उर्दू का बेहतरीन नाटक कहा जाने वाला ‘अनारकली’ मुगल काल में पनपी ‘सलीम-अनारकली’ की उस प्रेमकहानी को सामने रखता है जिसमें एक क्रूर शासक अपनी दासी अनारकली को प्रेम के अपराध की सजा के तौर पर दीवार में चुनवा देता है। जहां इस किस्से में लोगों की दिलचस्पी आज भी बनी हुई है, वहीं आज भी इसकी सत्यता बहस का मुद्दा है। वहीं, उर्दू के आला उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ की खूबी है इसको दिलकश अंदाज में लिखा जाना। यही वजह है कि आज भी इस किस्से की तहकीक इसकी सत्यता और इसके फर्जी होने के इर्द-गिर्द घूम रही है। मगर इसे सच मानें या काल्पनिक किरदार इसमें अपने दौर की फजा सांस लेती नजर आती है।

अनारकली और शहजादा सलीम की कहानी भी ऐसा ही एक किस्सा है जिसे कुछ लोग हकीकत मानते हैं तो कुछ लोग अनारकली के वजूद से ही इंकार करते हैं। कुछ लोगों के मुताबिक दरबारे-अकबर में अनारकली नाम की एक कनीज थी। कहा जाता है कि अकबर ने अपने बेटे सलीम और अनारकली के बीच पनप रहे प्रेम को महसूस कर लिया था और इसी की सजा के तौर पर उसने अनारकली को दीवार में चुनवा दिया। समय-समय पर कुछ लेखकों ने न सिर्फ अपनी दलीलों से इस प्रेम कहानी को वास्तविकता के करीब बताया है, बल्कि अपनी तहरीरों में अनारकली के मकबरे का भी जिक्र किया है।

1892 में सैयद मुहम्मद लतीफ ने इस कहानी को अपनी किताब ‘तारीख लाहौर और उसके आसार कदीमा’में हकीकत के तौर पर बयान किया है और लिखा है कि, ‘अनारकली को नादिरा बेगम या मुशर्रफुन्निसा का खिताब दिया गया था। वह अकबर के हरम में दाखिल एक दासी थी। अकबर को शक हुआ कि सलीम अनारकली के बीच प्रेम के संबंध हैं और उसने सजा के तौर पर उसे दीवार में चुनवाने का हुक्म दे दिया। सलीम को अनारकली की मौत का अफसोस हुआ और उसने अनारकली को दफन की गई जगह पर एक आलीशान मकबरा बनवा दिया।’

सैयद लतीफ ने लिखा है, ‘यह मकबरा पंजाब के सिविल सेक्रेट्रिएट, लाहौर में मौजूद है। इस मकबरे पर दो तारीखें दर्ज हैं, 1599 और 1615। अनारकली की मौत की तारीख 1599 और 1615 उसके मकबरे की तामीर की तारीख हो सकती है। इस घटना के दस साल बाद यानी बादशाह बनने के बाद सलीम ने यह मकबरा तामीर कराया होगा।’ 1642 में दाराशिकोह ने भी ‘सफीनतुल औलियाए’ में मकबरे के बारे में लिखा मगर यह नहीं साफ नहीं है कि इस मकबरा में कौन दफन है। वहीं डॉ. अब्दुल्ला चुगताई ने इस बारे में लिखा है कि, ‘यह मकबरा जहांगीर की चौथी पत्नी साहिब जमाल का है जिसकी 1599 में लाहौर में मौत हुई थी।

सलीम-अनारकली की इस प्रेमकहानी की हकीकत पर इसलिए भी शुबा है, क्योंकि जिस शहजादा सलीम ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक जहांगीरी’में अपनी जिंदगी की अहम बातों और हालात का बारीकी से जिक्र किया है, उसमें कहीं भी अनारकली का जिक्र ही नहीं है। अगर यह सत्य है तो उसके जीवन की इस अहम घटना का इसमें जिक्र होना चाहिए था।

कन्हैयालाल बंदा ‘तारीख लाहौर’ में लिखते हैं कि, ‘अनारकली अकबर की एक बेहद खूबसूरत कनीज थी। उसका असली नाम नादिरा था। जिसके सुर्ख और खूबसूरत गालों की वजह से उसे अनारकली खिताब दिया गया था। जब बादशाह अकबर रियासत के सियासी कामों के लिए महल से दूर थे, तब बीमारी की हालत में अनारकली की मौत हो गई थी।’

ऐतिहासिक घटनाओं के अलावा साहित्य के भी कुछ ऐसे पात्र हैं जो वास्तविकता के इतने करीब लिखे गए हैं कि इनको अगर काल्पनिक भी मान लिया जाए तो भी यह अपने दौर की एक सत्य घटना नजर आते हैं। अपने आस-पास के कुछ वास्तविक किरदारों को कल्पना में पिरो कर लिखने में जिस तरह शरतचंद्र को महारत हासिल थी, इसी सिलसिले की एक कड़ी उर्दू साहित्यकार मिर्जा हादी रुसवा भी कहे जाते हैं, जिनका उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ हकीकत के इतने करीब है कि यह समझना मुश्किल है कि यह वास्तविकता है या महज कहानी।

कहा जाता है कि इसे पढ़कर लोग अक्सर अकबरी दरवाजे के आस-पास उमराव जान का पता पूछते फिरते थे। इस उपन्यास में उमराव जान जो फैजाबाद की एक तवायफ है और इसमें उससे मुलाकात करने वाले रुसवा का जिक्र है। इसी पर फिल्म उमराव जान भी बनी है। उमराव जान के वास्तविक पात्र होने की जितनी दलीलें पेश की जाती रही हैं वहीं, अपनी तहकीक की बिना पर कुछ ने इसे महज कहानी करार दिया है और बताया है कि इसके पात्र रुसवा और उमराव जान के समय में काफी अंतर है। उमराव जान जिस दौर की तवायफ थी उससे काफी बाद में यानी 1858 में इसके लेखक यानी रुसवा पैदा हुए थे। ऐसे में इस कहानी को हकीकत समझना सही नहीं है। वहीं, महमूना बेगम ने अपनी दलीलों से यह साबित किया है कि ‘अदा’ और ‘रुसवा’ दोनों फर्जी किरदार हैं। यह बात सही है कि इस नाम की एक तवायफ गुजरी है, मगर मिर्जा हादी रुसवा के जमाने में इस नाम की कोई तवायफ लखनऊ में मौजूद नहीं थी। हालांकि इस उपन्यास के सच होने की हिमायत में भी कुछ तथ्य पेश किए गए हैं।

तमकीन काजमी ने मिर्जा हादी रुसवा से सुनकर कुछ बातें इस उपन्यास के बारे में लिखी थीं कि, ‘जब रुसवा ने उमराव जान अदा उपन्यास को छपवाया तो उमराव जान को अपनी जिंदगी के पहलुओं को लिखने पर गुस्सा आया और उसने भी रुसवा से बदला लेने की ठान ली। उसे पता चला कि अपनी जवानी में रुसवा भी किसी विदेशी महिला के प्रेम में गिरफ्तार थे। इसके लिए उसने मिर्जा की एक मसनवी ‘नालाए रुसवा’ को किसी तरह हासिल कर लिया। इसमें रुसवा ने अपने इश्क को लेकर अपनी दास्तान नज्म की है। बदला लेने के लिए इसी को उमराव जान ने ‘जुनूने-इंतजार यानी फसानाए मिर्जा रुसवा’के नाम से प्रकाशित करवा दिया।

बहरहाल, अगर उमराव जान लेखक का सच्चा किस्सा है तो उसे दाद देनी चाहिए कि उसने एक तवायफ की जिंदगी की हकीकत को इतने दिलचस्प अंदाज में लिखा है कि लोग उसकी हकीकत आज भी ढूंढ़ते फिरते हैं और अगर इसे फर्जी किस्सा मानें तो भी यह उपन्यासकार की महारत मानना पड़ेगी कि उसने एक काल्पनिक किस्से को हकीकत के कितना करीब रख दिया है।

हालांकि पहले भी कुछ किस्से या किरदार वास्तविकता की कसौटी पर कसे जाते रहें हैं। कभी किसी ने इन्हें कोरी कल्पना के तौर पर साबित करने की दलीलें पेश की हैं तो किसी ने इनकी सत्यता साबित करने वाले तथ्यों को पेश किया है, बहरहाल, यह बहस का मुद्दा रहा है और तब तक रहेगा जब तक कि मुतमईन करने वाली दलीलें पेश नहीं की जातीं, मगर इतना तय है कि इन किस्सों या किरदारों को गढ़ने में लेखकों की महारत से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनकी सत्यता पर बहस के बावजूद पढ़ने वाला इनको वास्तविकता के करीब महसूस करता है और उस दौर के हालात की तस्वीर उसकी निगाहों में तैरने लगती है।

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