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नेशन वॉन्ट्स टू नो, 'क्या है होली’

खोजी पत्रकार बन गए बच्चे जिद पकड़ बैठे कि होली से पहले मालपुआ का प्रोमो टेस्ट होना चाहिए। अब उन्हें कौन समझाए कि प्रोमो के चक्कर में असली माल पर हाथ साफ करने वालों की कमी नहीं है
नेशन वॉन्ट्स टू नो, 'क्या है होली’

बड़ा अजीब जमाना आ गया है, अभी तक तो सिर्फ अपने बापू ही अपुन से आने-जाने से लेकर खर्च-जमा का हिसाब रखते थे, पर जब से ये 'नेशन वॉन्ट टू नो’ का चलन ञ्चया चला है, अपुन तो बड़ी मुश्किल में आ गए हैं। अब तो घर का बच्चा-बच्चा भी हर बात पर सवाल दागता है और आंख दिखाओ तो टका-सा जवाब देता है कि टीवी नहीं देखते क्या, आजकल सवाल पूछने का चलन जोरों पर है।

 

अरे भाई, इस चलन ने तो अपुन की जान ही ले ली है। अब तो लगता है, टीवी में फिर से वह रामायण वाला युग आ जाए तो बेहतर है। बच्चों को न्यूज देखने की सलाह देकर अपुन उनके गेस्ट कम टारगेट ज्यादा बन गए हैं। अब तो घर का हर शख्स एंकर-सा ही लगता है। वैसे भी पत्रकार के घर में उसके साथ रहते-रहते उसके तर्क-वितर्कों के चलते ही घरवाले आधे पत्रकार तो बन ही जाते हैं। ऊपर से यह टीवी की बहस, चिक-चिक देखकर अब हर कोई अपनी बात को लंबी से लंबी खींच ले जाने में निपुण होता जा रहा है।

 

कल तो हद ही हो गई, जब अपुन ने बच्चों के पिज्जाई स्वाद से दूर जाकर इस बार होली पर मालपुए बनाने के लिए घर की सीनियर मोस्ट एंकर की तरह व्यवहार करने वाली श्रीमतीजी से कहा। आज के जुकरबर्गीय बच्चों ने सबसे पहले सवाल दाग दिया, 'नेशन वॉन्ट्स टू नो वॉट इज मालपुआ।’ वह तो खैर रही कि गूगल बाबा की मदद से अपुन ने उन्हें मालपुआ की फोटो के दर्शन करा दिए वरना पता नहीं कहीं ये ट्विटर पर ट्रेंड कर हमारी तो इज्जत की ग्लोबली बेइज्जती कर देता। टीवी देखकर खोजी पत्रकार बन गए हमारे बच्चे तो जिद पकड़ बैठे कि होली से पहले एक बार मालपुआ का प्रोमो टेस्ट हो जाए। हम मना कर ही रहे थे कि घर टपके हमारे एक चैनलिया पत्रकार मित्र ने बच्चों की हां में हां मिलाते हुए कहा, 'गुरु मालपुए की लॉन्चिंग से पहले उसका ट्राई रन तो करा लो।’ फिर क्या हमने भी कहा बनो लो कुछ मालपुए और कर लो उसके स्वाद की टेस्टिंग।

 

पर जब फेसबुक पर हमने, 'फीलिंग हैप्पी, इटिंग मालपुआ’ लिखा तो न जाने मालपुए को लेकर कितने पिज्जुओं को इसका टेस्ट भी कराना पड़ा। लो जी अपुन के आधे मालपुए तो नेशन को समझाने-चटवाने में ही निपट गए।

 

अब एक राहत है कि कुछ महीनों से एग्जाम के चलते बच्चों के देर तक टीवी न देखने के चलते हम सन्नाटे को चीरते हुए उनके सनसनी टाइप सवालों से जरूर बच जाते हैं। पर यह जो नए ठुमकने वाले प्रोग्राम दिनभर चलते हैं, इनके नित-नए नृत्य शैलियों पर दागे जा रहे सवालों से आजकल अपुन घायल हो रहे हैं। अपुन ने तो घर मे टीवी इसलिए लगवाया था कि सबका मन लगे और ज्ञान बढ़े पर अब तो इसके चलते हमारे ही ज्ञान की रोज टेस्टिंग होती रहती है। बस सहारा है गूगल महाराज का। इधर सवाल तो उधर मोबाइल पर गूगल वर्जन से पाया जवाब। तो भइया अगली बार तो उस डीटीएच कंपनी का कनेक्‍शन लेंगे जिसमें सवाल दागते टीवी वाले लोग कम दिखें, नहीं तो घर में एंकर बने हमरे लोग कहीं इतने ग्रूम न हो जाए कि नेशन से यूनिवर्सल तक के सवाल अपुन पर ही दागते रहें।

 

और तो और, अब तो कुछ चैनलों ने काली स्क्रीन भी चलानी शुरू कर दी है, इसकी देखा-देखी अपुन के घर की काली भैंस भी अब टीवी पर आने को आतुर है। अब उसे कौन समझाए कि भइया तुम भैंस हो, कोई खबर नहीं कि तुक्वहारे 'कालेपन’ से ही टीआरपी बटोर ली जाए। उधर एक चैनल हर बात को ब्रेकिंग के तौर पर ऐसे दिखाता है जैसे कुछ अंतराल पर विज्ञापन दिखाने के लिए ब्रेक लेना एंकर के लिए जरूरी है, उसी तरह हर खबर को ब्रेकिंग कहना भी जरूरी है।

 

वैसे अभी होली पर देखिए कि ये चैनल वाले आपको कैसा-कैसा रंग लगाते हैं। कुछ तो पुराने 'रंग’ से ही सराबोर कर देंगे क्यांेकि उनका मानना है, दो-चार साल पहले जो होली-स्पेशल बनाया था वह अब किसे याद होगा। गुरु कुछ नए गाने चेप कर उन्हें ही चला दो तो कुछ उस दिन भी पच्चीसों बार टीवी पर आई फिल्में दिखाकर 'हैप्पी होली’ की इतिश्री कर लेंगे।   

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