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साहित्य/गीतांजलि श्री: सांप्रदायिकता की शिनाख्त करती स्त्री-कथा का सम्मान

प्रियदर्शन - JUN 18 , 2022
साहित्य/गीतांजलि श्री: सांप्रदायिकता की शिनाख्त करती स्त्री-कथा का सम्मान
नई इबारतः अनुवादक डेजी रॉकवेल के साथ गीतांजलि श्री (दाएं)

“बुकर चयन समिति ने मौजूदा समय की ऐसी बड़ी लेखिका को पहचाना है, जो हमारे समय के जलते सवालों से मुठभेड़ करने में भी हिचकती नहीं”

गीतांजलि श्री को मिले अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान के बाद उनकी तथाकथित दुरूह शैली और जटिल भाषा पर जो बहस चल पड़ी, उसमें वह कथावस्तु अलक्षित रह गई, जो गीतांजलि श्री के लेखन-संसार को हमारे लिए अलग तरह से महत्वपूर्ण बनाती है। तीन दशकों से कहीं ज्यादा समय से लगातार कथा-साहित्य में सक्रिय गीतांजलि श्री एक साथ दो स्तरों पर काम करती हैं। उनकी सारी रचनाएं जैसे मन का सुराग खोजने वाली रचनाएं हैं, व्यक्तियों की मार्फत वे परिवारों को और परिवारों की मार्फत समाज को पहचानती हैं। वे चरित्रों को बिल्कुल उनके अंतर्जगत की प्रतिक्रियाओं से पकड़ने की कोशिश करती हैं। इससे कभी-कभी यह भ्रम होता है कि वे व्यक्तिवादी अनुभवों की कथाकार हैं, कुछ निर्मल वर्मा, वर्जीनिया वुल्फ या ऐसे और भी लेखकों की तरह जो हमारे अंदरूनी संसार की तलाश में भटकते हैं।

लेकिन गीतांजलि श्री के चरित्रों का यह आंतरिक विश्व बाहरी कार्य-व्यापार के आईने में ही घटित होता है। दुनिया जैसी है, जिस दिशा में जा रही है, जिन सवालों से जूझ रही है, वे सब उनके चरित्रों में परिलक्षित-प्रतिबिंबित होते हैं। और यही वह चीज है जो अचानक गीतांजलि श्री को हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण बना डालती है। हम पाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में जो विमर्श हमारे लिए सबसे जरूरी रहे हैं, जिन सवालों से हमारी रोजाना मुठभेड़ होती है, वे उनके मौन-से लगते लेखन में बहुत मुखरता से अभिव्यक्त हो रहे हैं।

मसलन, सांप्रदायिकता के सवाल को लें। उनका उपन्यास हमारा शहर उस बरस नब्बे के उस जलते हुए दशक में आता है, जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर है और 400 साल पुरानी एक मस्जिद ध्वस्त की जा चुकी है। यह टूटन जैसे पूरे समाज पर पसरी हुई है और उन लोगों को भी तोड़ रही है जो खुद को इन सबसे ऊपर मानते हैं। उपन्यास की कहानी तीन-चार नहीं बल्कि पांच चरित्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। दद्दू,  शरद, हनीफ और श्रुति। पांचवीं वह गुम किरदार है जो दरअसल कथावाचक भी है- जिसे गवाह बने रहना है। इनके बीच बहस होती है, हंसी-मजाक होता है, दुनिया भर की बातें होती हैं। लेकिन धीरे-धीरे हम पाते हैं कि हालात बदल रहे हैं, किरदार बदल रहे हैं, दुनिया की धूल-गर्द, संदेह और सलवटें उनके रिश्तों में भी चली आ रही हैं। शरद कुछ हिंदू हुआ जा रहा है और हनीफ कुछ मुसलमान। घर तक पहुंचने वाली यह सच्चाई इसके पहले विश्वविद्यालय के विभाग को बांट चुकी है और समाज को भी। यह वह जगह है, जहां दूर से देखी जा रही एक पारिवारिक बहस अपने भीतर बदल रही सच्चाई का प्रतिबिंब बन जाती है। उपन्यास बताता है कि बाहर की सांप्रदायिकता से लड़ाई जितनी जरूरी है, उतनी ही शायद अपने भीतर नामालूम ढंग से चली आने वाली सांप्रदायिकता से भी। अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन को लेकर उस दौर में काफी कुछ लिखा गया। बहुत सारी कविताएं, कुछ कहानियां और उपन्यास भी। लेकिन हमारा शहर उस बरस अपनी एक अलग वैचारिक-संवेदनात्मक लकीर खींचता हुआ हमें आज तक याद है।

सांप्रदायिकता के इस सवाल पर गीतांजलि श्री बाद में भी लौटती हैं। जैसे लगता है कि हमारा शहर उस बरस को बाद के बरसों में भी वे देख रही हैं। शायद 2012 के आसपास उनका संग्रह यहां हाथी रहते थे आता है और उसकी कुछ कहानियां फिर से बहुत मार्मिक ढंग से सांप्रदायिक आघातों से तहस-नहस हो चुकी नागरिकता को दर्ज करती है। संग्रह की पहली कहानी इस शहर की है जो आधुनिकता और सांप्रदायिकता के साझा वास्तुशिल्प से बन रहा है। कुछ साल पहले दंगे हुए हैं और नदी के आरपार चीजों और समुदायों की जगह तय हो गई है। तरह-तरह की घिचपिच और खिचखिच से भरा पुराना बेडौल शहर अब पीछे छूट चुका है और एक साफ-सुथरा, सलीकेदार, सुसंगत शहर उभर रहा है। उसकी पीठ पर स्मृति का बोझ नहीं है। लेकिन इस शहर की स्थिर-सुस्पष्ट नगर-योजना के बीच किसी प्रेतछाया की तरह मौजूद एक वृद्धा अपने वास्तविक रूप में जब हमारे सामने आती है तो एक चुपचाप घटित हो रही त्रासदी का बहुत मार्मिक चेहरा सामने आ जाता है। फिर यह राज खुलता है कि जो सांप्रदायिकता हमारे शहरों की संस्कृति बनती जा रही है, वह कहां-कहां तक मार कर रही है और हम उसके आगे घुटने ही नहीं टेक रहे, उसके मददगार भी हुए जा रहे हैं। इस मारकता का अनुभव संग्रह की कुछ और कहानियों में मिलता है।

रेत समाधि तक आते-आते लेखिका एक और छलांग मारती नजर आती हैं। वे बड़ी सूक्ष्मता से राजनीतिक सरहदों के बेमानीपन को दर्ज कर देती हैं। यहां भी एक वृद्धा है जो अपने पति की मृत्यु के बाद इस तरह अवसादग्रस्त है कि बिस्तर से उठने को तैयार नहीं। दीवार की ओर मुंह किए, बिस्तर से चिपकी वह बिल्कुल दीवार और बिस्तर हो जाना चाहती है। लेकिन यहां भी एक सुराख है, जो उसे वहां से उठने को मजबूर करता है। वे लौटती हैं और तमाम स्मृतियों के बीच अपने लिए वह स्मृति चुनती हैं जो उन्हें पाकिस्तान से जोड़ती है। वह पाकिस्तान पहुंच भी जाती है। इस उपन्यास में लेखिका तरह-तरह की युक्तियों से एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करती हैं। इसमें मंटो का टोबा टेक सिंह, मोहन राकेश का गनी, कृष्ण बलदेव वैद, कृष्णा सोबती, विनोद कुमार शुक्ल सब चले आते हैं।

तो यह वह गीतांजलि श्री हैं जिनकी चर्चा इन दिनों कम हुई है। वैसे भी वे चर्चा से बाहर रहने वालीं, इसे लगभग नापसंद करने वाली लेखिका हैं। लेकिन बहुत मौन ढंग से उनका लिखा हुआ हमारे बीच पसरता जा रहा है।

लेकिन गीतांजलि श्री को असल में पहचानना चाहिए तो उनके स्त्री चरित्रों की मार्फत जो बिल्कुल पारंपरिक परिधान में रहती हैं, लेकिन उसमें अटती ही नहीं। वे लगभग हमेशा वहां से बाहर निकल आती हैं, कुछ ऐसा कर जाती हैं जिसकी दुनिया उनसे कल्पना नहीं करती। आप चाहें तो मुहावरेदार भाषा में इसे मौजूदा स्त्री-विमर्श से जोड़ सकते हैं लेकिन यह उनके लेखन में इतनी तरह से और इतने स्तरों पर पैबस्त है कि वह इस मुहावरे में भी समाने वाला नहीं है। मसलन, नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में ही आए उपन्यास तिरोहित की चच्चो और ललना बेहद मामूली लगती स्त्रियां हैं। लेकिन उन्हें देख रहा बिटवा जान रहा है कि कैसे इन दोनों स्त्रियों ने समाज को अपने ठेंगे पर रखा है और खुद को उससे अदृश्य भी रखा हुआ है। यह बात बार-बार दोहराई जा चुकी है कि यह उपन्यास हिंदी में किसी महिला द्वारा स्त्री समलैंगिकता पर लिखा संभवत: पहला उपन्यास है (हालांकि इस वाक्य में ठीक अगली सांस के साथ यह भी जोड़ने की जरूरत महसूस होती है कि यह इतना भर नहीं है, इससे काफी आगे है।)

बहरहाल, यह स्त्री-कथा, जिसे विद्रोही, बागी, चलन से अलग, अपारंपरिक कुछ भी कहा जा सकता है। जैसे, एक स्त्री आंख है जो सारी चीजों को देख और रच रही है। उनके उपन्यासों माई, हमारा शहर उस बरस, खाली जगह, तिरोहित और रेत समाधि में, उनके कहानी संग्रहों वैराग्य और वहां हाथी रहते थे में, उनके बहुविध लेखन में यह स्त्री अलग-अलग स्तरों पर और अपारंपरिक रूपों में मौजूद है। कहीं नियति के दुख और अवसाद झेलती हुई, कहीं मौन विद्रोह का रास्ता बनाती हुई।

बहरहाल, जिस कथावस्तु की चर्चा से यह टिप्पणी शुरू हुई, उसका तीसरा पक्ष भी अनुपेक्षणीय और शायद इतना ही महत्वपूर्ण है। वह परंपरा के बहुत सूक्ष्म रूपों से उनका परिचय है, पारिवारिकता के बहुतेरे द्वंद्वों की स्मृति है और वह भाषिक संपदा है जिससे वह यह सारा माहौल रचती हैं। वे जीवन की हलचल को ठीक उसी तरह दर्ज करने की कोशिश में जैसे अपनी कलम लहराती हुई लिखती हैं। उनके लहरदार, कहीं लंबे और कहीं छोटे, कभी उठे हुए और कहीं दबे हुए वाक्य, उनका पूरा भाषिक विन्यास जो कहीं-कहीं अराजक और अबूझ भी लगता है। लेकिन अंतत: एक विराट अनुभव-संसार को उसकी बहुत सारी बारीकियों के साथ रचने में सक्षम होता है। उनकी भाषा में अलग तरह की हिंदी खिल उठती है जो न अकादमिक-प्राध्यापकीय हिंदी है न निरी साहित्यिक। उसमें हमारे खोए हुए शब्द भी मिलते हैं। उनको मिला बुकर सम्मान इस हिंदी का भी सम्मान है। बुकर की चयन समिति ने वाकई हमारे समय की एक बड़ी लेखक को पहचाना है, ऐसी बड़ी लेखक जो हमारे समय के जलते सवालों से मुठभेड़ करने में हिचकती नहीं।

प्रियदर्शन

(लेखक साहित्यकार और पत्रकार हैं)

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