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एक विदेशी महिला डोना जुलियाना के चलते, ईसाई मिशनरियों को मिली थी जजिया में छूट!

SEP 06 , 2017

- नलिन चौहान

भारतीय इतिहास का यह एक अल्पज्ञात तथ्य है कि धर्मांध मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार में एक फिरंगी औरत के कारण विदेशी ईसाई मिशनरियों को हिंदुओं से वसूले जाने वाले जजिया-कर को न देने की छूट मिली थी। लेखक रघुराज सिंह चौहान और मधुकर तिवारी की रिसर्च बुक "जुलियानानामा: द स्टोरी आॅफ डोना जुलियाना डा कोस्टा, ए पुर्तगीज कैथोलिक लेडी एट द मुगल कोर्ट (1645-1734)'' में इस बात का सनसनीखेज खुलासा किया गया है। इस किताब की कीमत ग्यारह हजार रूपए है और अभी देश में इस पुस्तक का विमोचन होना बाकी
है।



पुस्तक के अनुसार, यह एक ध्यान देने वाली बात है कि डोना जुलियाना के सीधे हस्तक्षेप के कारण विदेशी ईसाई फादरों को आगरा में एक से अधिक अवसरों पर जजिया देने में छूट मिली। बादशाह शाह आलम, फर्रुखसियर और मोहम्मद शाह ने भी इनको यह छूट देनी जारी रखी। इस छूट के कारण, औरंगजेब की हुकूमत के समय में पहले उल्लेखित परवाने में निहित था, जिसे पूर्वगृहित सिद्वांत के आधार पर एक और परवाना जारी हुआ। और बाकी सभी परवाने जुलियाना के जेसुइट फादरों और उनके ईसाई आश्रितों की जजिया से माफी के पक्ष में अनुरोध का उल्लेख करते हैं। ऐसे में, कोई शंका नहीं रह जाती कि औरंगजेब ने भी जुलियाना के सीधे हस्तक्षेप कारण छूट दी थी।

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किताब में जुलियाना की तस्वीर

उल्लेखनीय है कि अकबर के हिन्दुओं से जजिया कर हटाने के बाद औरंगजेब ने दोबारा अपने समय (1679) में हिन्दुओं पर जजिया लाद दिया था। 18 मई 1768 में पुर्तगाली-मुगलों के बीच एक संधि हुई थी। इस संधि में भारतीयों के ईसाइयत में मतांतरण से संबंधित एक शर्त थी। औरंगजेब ने इस पर अपनी सहमति दी थी कि पुर्तगाली स्वेच्छा से मंतातरित होने वाले हिन्दू या मुसलमान का बपतिस्मा करवा सकते हैं।

पुस्तक बताती है कि उमा डोना लिखने वाले प्रोफेसर जोस एंटोनियो इस्माइल ग्रेशिया ने पहली बार जुलियाना डायसदा कोस्टा के रूप में जुलियाना के पूरे नाम को ढूंढ निकाला। ब्रावेट का अलहवाल-ए-बीबी जुलियाना एकमात्र स्रोत है जो जुलियाना की शुरुआती जिंदगी के बारे में बताता है। वह अपने पति (फ्रैंक) की मौत के बाद एक जवान विधवा के रूप में आगरा से दिल्ली फादर मैगलन्स के पास लौटी थी।

1969-70 में लिस्बन के सुपीरियर इंस्टीट्यूट आॅफ ओवरसीज स्टडीज के बुलेटिन में प्रकाशित पुर्तगाली दस्तावेजों के अनुसार, जुलियाना  डियासदा कोस्टा, जो कि तब दक्कन में मुगल दरबार के शिविर में थी और गोवा के वायसरॉय कॉन्डे विला वेर्डे (1693-98) के बीच जनवरी-मार्च 1694 की अवधि में राजनयिक पत्राचार का आदान-प्रदान हुआ। जुलियाना के इन आदान-प्रदान वाले पत्रों से यह साफ हो जाता है कि उसने शहजादा  मुअज्जम की रिहाई के बाद न केवल मुगल दरबार में ऊंचा स्थान बना लिया था बल्कि मुगल इलाकों से ईसाइयत को फायदा पहुंचाने के उसके प्रयास बदस्तूर जारी थे।



कॉन्डे विला वेर्डे के दौर में औरंगजेब के मुगल दरबार में जुलियाना के पति या पिता के नाम के उल्लेख के बिना उसकी मौजूदगी की खबर एक रहस्यमय बात है। जबकि मुगल दरबार में जुलियाना की नियुक्ति में फादर मैगथनस ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी का नतीजा था कि वह शहजादे मुअज्जम, जो कि औरंगजेब के बाद  बहादुशाह प्रथम के रूप में मुगल बादशाह बना, की सबसे कम उम्र की शिक्षिका बनी। किताब के मुताबिक, 1661 में दक्कन से शहजादा मुअज्जम की अगली वापसी के बाद की अवधि के समय के आसपास ही औरंगजेब ने जुलियाना को शहजादा के उस्ताद मुल्ला सालेह को हटा कर शहजादे की शिक्षिका नियुक्त किया था। यह कदम शहजादे मुअज्जम और जुलियाना की जिंदगी के हिसाब से एक बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उस समय शहजादे मुअज्जम और जुलियाना दोनों ही जवान थे यानी शहजादे की उम्र अठारह साल तो जुलियाना सिर्फ सत्रह साल की थी।

पुस्तक बताती है कि 1681-82 के आसपास जुलियाना गोवा से मुगल दरबार में पहुंची और शीघ्र ही औरंगजेब की बेगम और शहजादे मुअज्जम की अम्मी नवाब बाई की खिदमत में लग गई। जब 1686 में मुअज्जम और उसकी अम्मी बादशाह औरंगजेब की नजरों में गिर गए तब जुलियाना ने उनके प्रति अपनी अटूट वफादारी निभाई।

औरंगजेब ने मार्च 1686 को अपने बेटे को उसके पूरे परिवार सहित कैद कर दिया और सात बरस के लंबे समय तक कड़ी नजर के साथ सख्त कारावास में रखा। ऐसे में, बीबी जुलियाना को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया तथा वह महल से बाहर आ गईं। जुलियाना के पहले जवान शाहजादे की शिक्षिका होने और फिर उसके जनाना में मुख्य परिचारिका होने के कारण इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि उसने कैद के दौरान शाहजादे की बहुत मदद की थी। यह बात उसके प्यार, वफादारी और मुअज्जम के साथ उसके खास रिश्ते को उजागर करता है। शहजादे मुअज्जम की रिहाई के बाद जुलियाना का रसूख में भारी इजाफा हुआ।



1714 में दिल्ली में जुलियाना से मिलने वाले फादर देसीदेरी के अनुसार, जुलियाना ने मुगल शहजादा-शहजादियों सहित शाही खानदान के दूसरे बच्चों (जेएम लाॅफांत का कहना है कि औरंगजेब ने जुलियाना को शहजादा मुअज्जम  की शिक्षा की जिम्मेदारी दी थी) को पढ़ाया था। शहजादा मुअज्जम और जुलियाना की पहली मुलाकात दिल्ली में दारा शिकोह की हवेली, जो कि तब उसका निवास स्थान थी, में हुई।

वे (पुर्तगाली) भी इस बात से भली भांति अवगत थे कि जुलियाना की वजह से मुअज्जम पुर्तगाली पादरियों पर बहुत मेहरबान था और इसी वजह से जुलियाना ने गोवा से ईसाई सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी खड़ी की थी। मुअज्जम ने काबुल में इन्हीं ईसाइयों के लिए फादर माघलहैंस को अपनी व्यक्तिगत पहल पर आगरा से बुलाया था। जिससे फादर मुअज्जम के साथ रहने वाले ईसाइयों की जिम्मेदारी उठा सकें। दिलचस्प बात यह है कि इसी समय जुलियाना ने गोवा से अनेक पुर्तगाली सैनिकों को मुअज्जम की शाही खिदमत में रखवा दिया। यह बात फादर एंटोनिया डी मैगलन्स के काबुल आने से पहले हो चुकी थी। इसी का नतीजा था कि मुअज्जम के तोपखाने में कई पुर्तगाली तोपची तैनात किए गए।

इतना ही नहीं, मुगल बादशाह औरंगजेब की 1707 में हुई मौत के बाद उसके बेटों के बीच तख्त पर काबिज होने को लेकर जजाऊ के मैदान में छिड़ी जंग में इस फिरंगी औरत और उसके तोपचियों ने अपने कारनामे से लड़ाई का रूख बदलते हुए हिंदुस्तान के भावी मुगल बादशाह बहादुर शाह की गद्दीनशीनी तय की।


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