Home कला-संस्कृति आजादी के बाद किसी महिला को पहली बार कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, पढ़ें इंटरव्यू

आजादी के बाद किसी महिला को पहली बार कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, पढ़ें इंटरव्यू

हरिमोहन मिश्र - MAR 19 , 2021
आजादी के बाद किसी महिला को पहली बार कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, पढ़ें इंटरव्यू
अनामिका
हरिमोहन मिश्र

“टोकरी में दिगंतः थेरीगाथा उन स्त्रियों की अभिव्यक्ति है, जो हर तबके, ग्रामीण, पिछड़ी जातियों, आदिवासी, समाज के अभावग्रस्त क्षेत्रों से संबंध रखती हैं”

इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2020 हिंदी की प्रसिद्ध कवि, आलोचक, प्राध्यापक अनामिका को उनके कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंतः थेरीगाथा 2014’ के लिए दिया गया है। कविता के लिए यह प्रति‌ष्ठित पुरस्कार पाने वाली वे देश की पहली कवयित्री हैं। उनसे कविता, स्‍त्री लेखन, इस दौर में अभिव्यक्ति के खतरे जैसे तमाम पहलुओं पर हरिमोहन मिश्र ने विस्तृत बातचीत की। प्रमुख अंशः

कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पहली कवयित्री होने पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या रही है?

मैं तो एक अंधा कुआं हूं जिसमें बहुतेरी अनुगूंजें रहती हैं। तमाम तरह की देशी-विदेश उन औरतों की जिनसे मैंने अंतरंग गपशप की है। बचपन से अब तक- अनवरत। वे मेरी कल्पना की स्थायी नागरिक हैं। मेरी कविता झुग्गियों और विस्थापन बस्तियों में रहने वाली उन स्त्रियों की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जो गांव-घर, कस्बे-शहर, सफर करते बस-ट्रेन में खुले मन से अपनी जिंदगी की बतकही करती हैं। टोकरी में दिगंतः थेरीगाथा उन स्त्रियों की अभिव्यक्ति है, जो हर तबके, ग्रामीण, पिछड़ी जातियों, आदिवासी, समाज के अभावग्रस्त क्षेत्रों से संबंध रखती हैं और उनके संवाद में समूचा संसार, उसकी अलग-अलग परतें खुलती हैं। यह सम्मान उस स्‍त्री संसार को है, जो उनकी गीतों, उनकी बतकही में विराट आकार लेता है, जहां स्त्रियां अपने अधिकार के लिए झगड़ती हैं, लेकिन कभी हिंसक नहीं होतीं क्योंकि उनका जिनसे सामना होता है, उनसे वे प्रेम भी करती हैं। उनका यह संघर्ष एक सम्यक दृष्टिसंपन्न समानता पर आधारित समाज के लिए होता है। स्‍त्रीवाद हमेशा सौम्यता, उदारता का हामी है।

आज स्‍त्री लेखन में भारी विस्फोट दिखता है। आप इसकी वजह क्या पाती हैं?

लोकतंत्र गहराया है, स्त्री शिक्षादीप्त हुई है, इंटरनेट एक खुला आकाश बना है। यह देखकर सुखद अनुभूति होती है। वैसे, स्त्रियां हमेशा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती रही हैं। वे घर में चूल्हा-चौका करते हुए, ओखल या चक्की चलाते हुए, खेत-खलिहान में काम करते हुए, सफर में, हर मौके पर उनके समूह गीतों में संसार की परतें, स्‍त्री-पुरुष संबंधों के उलझे धागों की अभिव्यक्ति होती रही है। चाहे वह भक्ति आंदोलन हो या उसके पहले पौराणिक साहित्य, हर दौर में स्त्रियों की मौजूदगी भरपूर रही है। भक्ति आंदोलन के दौरान कितनी ही स्‍त्री कवयित्रियों की उपस्थिति मिलती है। और कभी भी वे कटु यथार्थ को अभिव्यक्त करने से नहीं हिचकीं, बस उनका विरोध प्रेम, करुणा, समानता को मूर्धन्य और सौम्यता से जगाने वाला होता है। मीरा बाई का साहित्य ही देखिए। महादेवी और उनके बाद के स्त्री लेखन का विरोध सविनय अवज्ञा जैसा है।

आजादी के आंदोलन में भी अनेक स्‍त्री लेखिकाओं ने हर विधा में कलम चलाई, जिनकी चर्चा अब जाकर होने लगी है। शिवरानी देवी की चर्चा कम हुई पर उनका लेखन महत्वपूर्ण है।

बिल्कुल, अनेक लेखिकाओं ने अपनी भूमिका निभाई है, जिनकी चर्चा सम्यक भले न हुई हो मगर उनकी उपस्थिति नजरअंदाज नहीं की जा सकती। मुझे तो लगता है, गांधी जी ने सविनय अवज्ञा तो स्त्रियों से ही सीखी है। कभी किसी स्‍त्रीवादी आंदोलन में एक कतरा भी हिंसा नहीं हुई क्योंकि जिनसे उन्हें अपने अधिकार के लिए लड़ना है, उनसे वे नफरत नहीं करतीं और उनका संघर्ष उन्हें अधिक उदात्त बनाने के लिए होता है। गांधी जी का सविनय अवज्ञा ही नहीं, चरखा भी स्त्रियों से ही लिया हुआ है, जो हर घर में वे चलाया करती थीं।

आज लोकतंत्र पर बंदिशों का माहौल है, ऐसे में अभिव्यक्ति पर आप कैसा संकट देखती हैं?

निरंकुश और गैर-जवाबदेह शासन लोकतंत्र के लिए भला नहीं है। यह जरूर है कि अभिव्यक्ति के साधन व्यापक हुए हैं तो पहले की तरह या इमरजेंसी की तरह अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाना संभव नहीं है। इसलिए अभिव्यक्ति तो हो रही है। लेकिन लोगों से बिना राय-मशविरा किए कानून बना देना उचित नहीं है। कोई भी अगर कुछ कह रहा है तो उसे सुना जाना चाहिए। लोग किसी भी जत्‍थेबंदी में सड़क पर ठंड में, बारिश में बैठे हैं तो उनकी बात पर उदारता से विचार होना चाहिए। कोई भी कानून बनाने के पहले उस पर लोगों से राय-विचार होना चाहिए। कानून एकतरफा नहीं बनाया जाना चाहिए। मौजूदा शासन की दिक्कत यह है कि इसमें राजनीतिक प्रशिक्षण की कमी है। लोकतंत्र में कभी मनमानी नहीं चल सकती। नए कानून लागू करने से पहले पब्लिक डिबेट और राजनीतिक कैंपों में सम्यक प्रशिक्षण होने चाहिए।

अब एक थोड़ा अप्रिय सवाल। सोशल मीडिया पर आपके पुरस्कार स्वीकार करने को लेकर कुछ स्‍त्री, दलित और अन्य लेखक रोष प्रकट कर रहे हैं? इस पर आपको क्या कहना है?

पुरस्कार संयोग-शासित होते हैं, पर जिसे मिल ही गया वह करे तो क्या करे? मेरे मत में हर व्यक्ति अपने ढंग से विशिष्ट और हर तरह से ध्यान के योग्य होता है। हमारे समाज का यह दुर्भाग्य है कि हर व्यक्ति की प्रतिभा के साथ पूरा न्याय नहीं हो पाता, न उसे सम्यक अवसर मिल पाता है। इसलिए उसका मन बिदका-सा रहता है। हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है। प्रेमचंद कहते हैं, सफाई से गंदगी बढ़ती है। सबकी अपनी-अपनी राय है। बुद्घ कहते हैं, किसी को कोई कांटा चुभा है तो बेहतर यही है कि बातचीत से कांटा निकाला जाए। संस्‍थाओं की एक अहम भूमिका है, उन्हें अगर काम नहीं करने दिया जाएगा या उनका सम्मान नहीं होगा तो लोकतंत्र चलेगा कैसे! साहित्य आकादमी पर दक्षिण भारत का एक मामला था, जिसके लिए उसने माफी मांग ली तो उसे खत्म मान लिया जाना चाहिए।

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