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न्यूनतम आय गारंटी लागू करना नामुमकिन नहीं

संतोष मेहरोत्रा - APR 19 , 2019
न्यूनतम आय गारंटी लागू करना नामुमकिन नहीं
समस्याः 2012 के बाद गैर-कृषि नौकरियों के साथ-साथ मजदूरी में भी तेजी से गिरावट आई
संतोष मेहरोत्रा
“देश में गरीबों की संख्या 20 करोड़ या लगभग पांच करोड़ परिवार होने की संभावना, इन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लाने के लिए 'न्याय' जैसी योजना हो सकती है कारगर, बशर्ते सही तरीके से लागू की जाए”

मार्च 2009 में जब मैं योजना आयोग के डेवलपमेंट पॉलिसी डिविजन का प्रमुख था, तो आयोग ने मुझसे गरीबों के लिए न्यूनतम आय गारंटी (एमआइजी) के लिए एक पेपर तैयार करने के लिए कहा था। हालांकि, तब गरीबों को बिना शर्त एमआइजी के लिए तीन जरूरी व्यवस्थाएं नहीं थींः (क) गरीबों की उचित पहचान, (ख) हर गरीब परिवार के बैंक खाते और (ग) वैसे लाभार्थी जो बायोमेट्रिक रूप से पहचानने योग्य/क्रॉस-चेक किए जा सकते हैं। आज वे सभी प्रावधान हैं।

ऐसे कई लोग हैं, जो गरीबों को एमआइजी की तरह का ‘लाभ’ देने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। एक कारण राजकोषीय लागत है। स्पष्ट रूप से, एमआइजी सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा, या बुनियादी ढांचे के निवेश पर खर्च के रूप में बाधा नहीं बननी चाहिए। यह देखते हुए कि भारत फिलहाल सभी तीन सार्वजनिक सेवाओं पर कितना कम खर्च करता है, तो इस लिहाज से एमआइजी की वजह से पड़ने वाले राजकोषीय घाटे के औचित्य को भी समझने की जरूरत है। इस समय एमआइजी देश के सामाजिक सुरक्षा का एक अनिवार्य तत्व क्यों बन गया है?

ऑल इंडिया डेट ऐंड इन्वेस्टमेंट सर्वे के अनुसार, 70 फीसदी से अधिक ग्रामीण आबादी के पास एक या एक से अधिक ऋण हैं। 2013 में 64 फीसदी गैर-किसान परिवारों (लगभग 43 फीसदी) के उलट लगभग 74 फीसदी किसान परिवार कर्ज में थे (1993 में लगभग 50 फीसदी)। संपत्तियों के कर्ज में होने की घटना से संकेत मिलता है कि ग्रामीण परिवारों के सबसे निचले तबके का 19.6 फीसदी और समृद्ध तबके का 22 फीसदी कर्ज में है। इसी तरह शहरी परिवारों के दो निम्न तबके का 9.3 फीसदी और 14.6 फीसदी कर्ज में है। ‘गैर-व्यवसाय’ (यानी सख्त जरूरत वाले उपभोग के लिए) के कारण ये लोग कर्ज में डूबे हुए हैं। ऐसी जरूरत पूरी करने के लिए ग्रामीण इलाकों में सबसे निचले तबके का 85 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में 90 फीसदी कर्जदार है। ये कर्ज उनके बाकी के खर्च पर, खासतौर पर मैन्यूफैक्चर की हुई चीजों पर खर्च में बड़ी बाधा बनते हैं। इससे मैन्यूफैक्चरर्स की मांग पर व्यापक असर पड़ता है, जो इस क्षेत्र में कम निवेश की वजह बनती है।

एमआइजी के पक्ष में एक सबसे मजबूत तर्क यह है कि गरीब (छोटी और मामूली जोत के किसान, भूमिहीन मजदूर और शहरी क्षेत्रों में झुग्गीवासी) बिरले ही धन-संपत्ति जोड़ पाते हैं। अगर उनकी थोड़ी-बहुत संपत्ति जुड़ती भी है, तो उसे वे सूखे, बाढ़, परियोजनाओं की वजह से विस्थापन, स्वास्थ्य खर्चों वगैरह में गंवा देते हैं। ऐसे सभी गरीबों को अपनी रोजमर्रा और आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नकदी कर्ज की आवश्यकता होती है। वे शायद ही कभी उत्पादक जरूरतों के लिए कर्ज लेते हैं। इसलिए अस्थिर आय (आकस्मिक श्रमिकों और स्वरोजगार वाले) संपत्ति जोड़ने की जगह रोजमर्रा के खर्च और कर्ज चुकाने में खत्म हो जाती है। गैर-रोजमर्रा खर्च उन्हें फिर कर्ज में धकेल सकता है। इसलिए, वे अक्सर कर्ज अदायगी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं और गरीबी रेखा से निकलना असंभव हो जाता है।

वर्ष 2011-12 में गरीबों की कुल संख्या 26.8 करोड़ थी (तेंडुलकर समिति के अनुमान के मुताबिक)। इसमें 2004-05 के बाद से तेजी से गिरावट आई थी, क्योंकि तब गरीबों की संख्या 40.6 करोड़ थी। गरीबी में उस तेजी से गिरावट का कारण था सालाना 75 लाख नई गैर-कृषि नौकरियों में बढ़ोतरी, जिसके बाद श्रम बाजार में मजबूती आई और वास्तविक मजदूरी दर में वृद्धि हुई। हालांकि, 2012 के बाद गैर-कृषि नौकरियों के साथ-साथ मजदूरी में भी तेजी से गिरावट आई। इसलिए, अभी भी गरीबों की संख्या 20 करोड़ या लगभग पांच करोड़ परिवार होने की संभावना है। एमआइजी गरीब परिवारों को गरीबी से ऊपर ऊठने की एक संभावना मुहैया करता है और इस तरह गैर-जरूरी खर्च में भी मदद करता है। हालांकि, एमआइजी को इतना भी उदार नहीं होना चाहिए कि यह वयस्कों को श्रम करने के लिए हतोत्साहित करने लगे। ‘न्याय’ सबसे गरीब परिवार को हर महीने छह हजार रुपये देने की पेशकश करता है। इससे मनरेगा की मांग में कमी आ सकती है और यहां तक कि खुले बाजार में मजदूरी के काम में गिरावट आ सकती है। अगर उत्पादकता के संदर्भ में देखें, तो इससे मजदूरी में वृद्धि होगी, जिससे रोजगार में और कमी आएगी। दूसरा, यह कृषि से गैर-कृषि कार्यों में पलायन को रोक सकता है- जो कि विकासशील देश में संरचनात्मक परिवर्तन की विशेषता है। ये व्यापक विकास को जोखिम में डाल सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रमाणों से पता चलता है कि एमआइजी श्रम आपूर्ति को तब तक नहीं रोकता है, जब तक कि वह बहुत उदार न हो।

इस प्रकार, हालांकि एमआइजी जरूरी और लागू करने योग्य है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय अर्थशा‌िस्‍त्रयों ने भी बहुत छोटी रकम के हस्तांतरण का सुझाव दिया। इसलिए, जब 10 साल पहले हमने योजना आयोग में नकद हस्तांतरण का सुझाव दिया, तो यह अपेक्षाकृत छोटी राशि (6000 रुपये सालाना से कम) थी। यह पीएम किसान योजना के तहत छोटी/मामूली जोत के किसानों को दिए जाने वाले प्रस्ताव से अधिक नहीं था। अंतर यह है कि पीएम किसान गैर-समावेशी है। यह बंटाईदारों, भूमिहीन मजदूरों, ग्रामीण इलाकों में गैर-कृषि श्रमिकों और शहरी गरीबों को इस नकदी हस्तांतरण के दायरे से बाहर रखता है।

लाभार्थियों की सही पहचान

किसी भी अर्थव्यवस्था, जिसमें अनौपचारिक रोजगार का हिस्सा अधिक है, उसमें आय के आधार पर एमआइजी के लाभार्थियों की पहचान की कोई भी कोशिश बेहद जोखिम भरा काम है। एनएसएसओ के पांच वार्षिक उपभोग व्यय सर्वे के आधार पर गरीबों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है, और यह उपयोग व्यय के आधार पर लगाया जाता है। लेकिन उस सर्वे का इस्तेमाल एमआइजी के लिए गरीबों की पहचान करने में नहीं किया जा सकता है। पहचान परिवारों की जनगणना के माध्यम से की जानी चाहिए। शुक्र है कि 2013 के बाद से भारत में परिवारों की पहचान के लिए एक या सात से अधिक जरूरतों वाले बेहतर सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) मौजूद है। हर परिवार की पहचान-निरीक्षण योग्य विशेषताओं पर आधारित है। उनकी प्रत्यक्ष जांच हो सकती है। इसलिए यह ‘आय’ (जो कांग्रेस की ‘न्याय’ स्कीम के लिए इस्तेमाल की जाने वाली) की तुलना में बहुत अलग संकेतक है।

एसईसीसी जनगणना (जिसे पूरा करने में दो साल लगे) इन जरूरतों के आधार पर देश के सभी 24.49 करोड़ परिवारों का डाटा मुहैया कराता है। इनमें 17.97 करोड़ ग्रामीण और 6.51 करोड़ शहरी परिवार हैं। ग्रामीण परिवारों में 7.07 करोड़ परिवार स्वतः गैर-समावेशी श्रेणी के तहत आते हैं (14 मापदंडों में से किसी पर बेहतर घरों में,  जैसे, 2/3/4 व्हीलर/मछली पकड़ने की नाव का मालिक है, या 2.5 एकड़ से अधिक सिंचित भूमि है)। ये गरीब के लिए किसी स्कीम के लाभार्थी नहीं हो सकते।

इस गैर-समावेशन के बाद आय हस्तांतरण लाभ के लिए विचार किए जाने वाले परिवारों की पहली श्रेणी को स्वतः एसईसीसी में शामिल किया जाना चाहिए, जिसमें गरीब और निराश्रित (15.9 लाख परिवार, पंक्ति 1, तालिका 1) शामिल हैं। ये समावेशन के पांच मापदंडों में से किसी एक को पूरा करते हैं। (बिना आश्रय और/या निराश्रित परिवार, भिक्षा पर रहने वाले, मैनुअल मेहतर परिवार, आदिम जनजाति समूह, कानूनी रूप से मुक्त बंधुआ मजदूर)। दूसरी श्रेणी में एक से अधिक जरूरी मापदंड (डेप्रिवेशन) वाले परिवार हैं।

एक से अधिक (सात में से) जरूरी मापदंड वाले 5.36 करोड़ ऐसे ग्रामीण परिवार हैं, जो इस प्रकार हैं: एक या उससे कम कमरे वाले, कच्ची दीवारें और कच्ची छत वाले परिवार; परिवार में 18 से 59 वर्ष के बीच के किसी भी वयस्क सदस्य का नहीं होना; महिला प्रधान वाला वैसा घर; जिसमें 16 और 59 वर्ष के बीच का कोई वयस्क पुरुष सदस्य न हो; किसी अन्य सक्षम वयस्क सदस्य के साथ विकलांग सदस्य वाला परिवार’ एससी/एसटी परिवार; 25 वर्ष से अधिक आयु वाला असाक्षर परिवार; और भूमिहीन परिवार, जो अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा मैनुअल श्रम से अर्जित करता है।

सिर्फ एक जरूरी मापदंड (डेप्रिवेशन) वाले 3.36 करोड़ परिवारों पर भी विचार किया जा सकता है। इसके अलावा योग्य लोगों को जोड़ने के लिए हम ऐसे परिवारों को शामिल कर सकते हैं, जिन्हें स्वतः बाहर नहीं रखा गया है, लेकिन किसी भी जरूरी मापदंड के कारण उन्हें इसमें रखा नहीं गया है। ऐसे 2.01 करोड़ परिवार हैं। शहरी क्षेत्रों के मामले में लाभार्थियों की पहचान करने के लिए जरूरी मापदंडों के लिए विस्तृत डाटा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, झुग्गी में रहने वाले परिवारों का विवरण है, जिसे हम एक शुरुआती बिंदु के रूप में लेते हैं। ऐसे 1.31 करोड़ शहरी झुग्गी-बस्ती वाले परिवार हैं। विस्तृत डाटा उपलब्ध होने पर शहरी गरीबों को बेहतर तरीके से लाभ पहुंचाया जा सकता है।

(लेखक जेएनयू में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर और सेंटर फॉर लेबर के चेयरपर्सन हैं)

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