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जैविक खाद से निकला मनी मंत्र

दिल्ली में पले-बढ़े करण सीकरी किसानों को समझा रहे हैं जैविक खाद से कमाई के नुस्खे
करण सीकरीः देश का पहला ऑटोमेटिक वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाने और गन्ने की नई किस्म खोजने के लिए ‘कृषि उद्यमी का नवाचार’ अवार्ड दिया गया

यह एक आम धारणा बन चुकी है कि किसानों के बच्चे और नई पीढ़ी खेती में नहीं आना चाहती। लेकिन कुछ नौजवान ऐसे भी हैं, जो न सिर्फ इस धारणा को बदल रहे हैं बल्कि खेती को मुनाफे का कारोबार बनाकर दिखा रहे हैं। ऐसा ही एक नाम है, एमबीए पास करण सीकरी।

दिल्ली में पढ़े-लिखे करण सीकरी ने न सिर्फ खेती को तरजीह दी, बल्कि जैविक खाद से मिट्टी की दशा-दिशा सुधारने का बीड़ा भी उठाया है। इसी का परिणाम है कि आज उन्होंने हरियाणा के कुरुक्षेत्र के साहबाद में स्थित सीकरी फार्म में देश का पहला ऑटोमेटिक वर्मी कंपोस्ट प्लांट स्थापित कर दिया। इस प्लांट में देसी और विदेशी मशीनों से विश्व की सबसे अच्छी तकनीक से जैविक खाद बनाई जाती है। ढंगाली स्थित जैविक वर्मी कंपोस्ट प्लांट में सालाना आठ से 10 हजार टन जैविक खाद तैयार हो रही है और इसकी बिक्री के लिए वह खुद मार्केटिंग भी कर रहे हैं। हरियाणा के साथ पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली से अच्छी मांग आ रही है। जैविक वर्मी कंपोस्ट की पैकिंग ऑटोमेटिक मशीनों से की जाती है। इसकी भर्ती 50 किलो, 25 किलो और 10 किलो में की जा रही है। 50 किलो जैविक वर्मी कंपोस्ट की कीमत करीब 300 रुपये है, जबकि 25 किलो जैविक वर्मी कंपोस्ट की कीमत 150 रुपये है। जैविक वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए कच्चे माल के लिए भी ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। आसपास की गोशालाओं के साथ ही डेयरियों से सस्ते भाव में गोबर आसानी से मिल जाता है। इससे गोशालाओं की भी अतिरिक्त आय हो जाती है। 

जैविक वर्मी कंपोस्ट से न सिर्फ जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, बल्कि इससे फसलों की पैदावार में भी भारी बढ़ोतरी होती है। करण सीकरी का मानना है कि जब तक जमीन की उर्वराशक्ति नहीं बढ़ेगी, तब तक किसानों की आय दोगुना नहीं की जा सकती। इसलिए ज्यादा से ज्यादा जमीन में जैविक खाद का उपयोग किए जाने की जरूरत है। इसलिए ढंगाली स्थित वर्मी कंपोस्ट को नेशनल ब्रांड बनाने की तैयारी है और इसके लिए किसानों को जोड़ा जा रहा है। अलग-अलग राज्यों के किसानों को जोड़कर उन्हें सीकरी फार्म पर खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। साथ ही स्वयं का प्लांट लगाने को प्रेरित भी किया जा रहा है।

पांच एकड़ में बने इस ऑटोमेटिक वर्मी कंपोस्ट प्लांट में करीब चार करोड़ रुपये की लागत आई है। वह कहते हैं कि शिक्षा के बाद वह अपने पिता जी के साथ खेती करने आ गए थे। लेकिन परंपरागत खेती की बजाय नई तकनीक और नवाचार के विचार के चलते वह इस कारोबार को शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सके। करण सीकरी कहते हैं कि आसपास के गांवों के सैकड़ों लोगों और महिलाओं को भी वह रोजगार दे रहे हैं। कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया में काफी लेबर की जरूरत पड़ती है। जिसके चलते महिलाओं को भी काम मिलता है। इसके साथ ही आधुनिक मशीनों का उपयोग हो रहा है। इसमें से कई आइएआरआइ ने तैयार की है। साथ ही मॉइस्चर बनाए रखने के लिए शेड में स्प्रिंकलर का इस्तेमाल किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया कंपोस्ट तो तैयार करने की अवधि घटा देती है। सीकरी अपने फार्म में आधुनिक तकनीक से खेती तो कर ही रहे हैं, साथ ही पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन से खेतों की सिंचाई कर रहे हैं। सिंचाई के लिए नेटो फिम की ड्रिप सिंचाई, मधुमक्खी पालन, कार्बनिक शहद निर्माण, पशुपालन और उच्च तकनीक से वे उन्नत खेती करते हैं। 

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