Advertisement

कमाई पहले, भलाई पीछे

स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपकर कमाई में जुटे हैं जाने-माने चैरिटेबल हॉस्पिटल
बदला रूपः बीएलके में अब सारे फैसले निजी प्रबंधन कंपनी रेडिएंट करती है

जगह और समय के लिहाज से दिल्ली में स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर में भले ही फर्क दिखता हो लेकिन दो अलग-अलग नजरिए से यह एक ही कहानी कहती है। पहले जगह के पैमाने पर देखें। दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों, जेजे कॉलोनी, गांवों और अधिकृत कॉलोनियों में 738 अस्पताल हैं। क्षमता के हिसाब से इनमें लगभग 37,000 मरीज भर्ती हो सकते हैं। हालांकि, पूरी राजधानी में इनका विस्तार असमान है। सबसे ज्यादा आबादी वाले जिलों में कम बेड वाले अस्पताल हैं। वहीं, कम आबादी वाले इलाकों जैसे, नई दिल्ली या मध्य दिल्ली में अधिक बेड वाले अस्पताल हैं।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू में समाजशास्‍त्र के प्रोफेसर रनवीर सिंह ने स्प्रिंगर-2017 जॅर्नल के लेख ‘मार्जिनलाइजेशन इन ग्लोबलाइजिंग दिल्ली’ में इन तथ्यों का जिक्र किया है। इससे तात्कालिक निष्कर्ष निकलता है कि अधिकांश गरीब मरीजों को सस्ते इलाज के लिए एक से दूसरी जगहों पर भ्‍ाटकना पड़ता है। इससे दिल्ली में आए एक व्यापक बदलाव का भी पता चलता है। मौजूदा हालात सात दशक पहले की उस स्थिति से बिलकुल उलट हैं, जब शहर में पहली बार बड़े अस्पताल खुले।

1947 में विभाजन के दौरान परोपकार की सोच रखने वाले बहुत से कारोबारी लाहौर और कराची जैसे शहरों से पलायन कर दिल्ली आए। सरकार ने ऐसे कई धनाढ्य लोगों को जो जाति, संप्रदाय और सामाजिक रुतबा भुलाकर सभी को मुफ्त में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना चाहते थे, रियायतें दीं। ये रियायतें 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक में दी गईं, ताकि ट्रस्ट या सोसायटी  के तौर पर अस्पतालों की स्‍थापना की जा सके। इनके बारे में माना गया कि ये गैर-लाभकारी होंगे। रियायतों के कारण दिल्ली में काफी तेजी से अस्पताल बनने लगे, जो पहले से मौजूद मिशनरी या ब्रिटिश सैन्य अस्पतालों, यूनानी या आयुर्वेदिक संस्‍थानों या आर्य समाज और गुरुद्वारों की ओर से चलाए जा रहे क्लीनिकों का विकल्प या उसके पूरक बनने लगे।

आठवें दशक के काफी बाद में इनमें से कई चैरिटेबल अस्पताल धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्वास्‍थ्य संस्‍थानों में बदल गए। इस दौरान मध्य और नई दिल्ली को छोड़कर लगभग पूरी दिल्ली में स्वास्‍थ्य सेवाओं पर निजी क्षेत्र का दबदबा हो गया। दरअसल, मध्य और नई दिल्ली में खास तबके के लोगों को सर्वोत्तम सरकारी सुविधाएं मिलती थीं।

मसलन, मूलचंद खैराती राम अस्पताल अब मूलचंद हेल्‍थकेयर बन चुका है। इसकी स्‍थापना लाहौर में 1928 में हुई थी। 1947 में इसके संस्‍थापक ट्रस्टी लाला खैरातीराम दिल्ली आ गए। 1951 में उन्होंने दिल्ली के दिल में सरकार से मिली नौ एकड़ जमीन पर मूलचंद ग्रुप के मुनाफे से संचालित सौ फीसदी आयुर्वेदिक अस्पताल स्थापित किया।

इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर दलित स्टडीज की निदेशक संघमित्रा आचार्य बताती  हैं कि उस समय की राज-व्यवस्था से स्वास्‍थ्य क्षेत्र में भलाई का काम करने वालों का घनिष्ठ संबंध था। मूलचंद अस्पताल, विभाजन से प्रभावित लोगों की मदद की जरूरत से ही उपजा था। ज्यादातर ट्रस्ट अस्पतालों में यही दिखता है।

मूलचंद को बदलाव की कहानी के तौर पर देखा जा सकता है। यह ट्रस्टों से संचालित अस्पतालों की अनूठी कहानी है, जिसमें अमीर मरीज भुगतान करते हैं और इससे होने वाली कमाई से गरीबों (जिन्हें आय का प्रमाण देना होता है) का इलाज होता है। रनवीर सिंह एक खास परिवर्तनकारी तत्व देखते हैं, जिससे यह तस्वीर बनी कि अस्पताल बीमारों का इलाज नहीं कर रहे, बल्कि स्वास्थ्य सेवा बेच रहे हैं। इस तरह पहले जो स्वास्‍थ्य सेवा थी, आज स्वास्‍थ्य प्रबंधन हो गया है। लेकिन, ऐसा क्षेत्र जो मानव से जुड़ा हो, खासकर स्वास्‍थ्य, वह यांत्रिक प्रबंधन मॉडल के लिए उपयुक्त नहीं है। बीएल कपूर हॉस्पिटल की कहानी भी ऐसी ही है। इसकी भी शुरुआत लाहौर में हुई और बाद में (1959) में दिल्ली आ गया। इसे 25,000 रुपये में पूसा रोड पर पांच एकड़ जमीन दी गई। पहली जांच रिपोर्ट में यह अस्पताल इस परिघटना का मुख्य उदाहरण बना।

सुपर स्पेशिलिटीः मूलचंद खैरातीराम अस्पताल अब मूलचंद हेल्थपकेयर बन चुका है

2001 में चैरिटेबल अस्पतालों के कॉरपोरेटीकरण को लगातार कानूनी चुनौतियां मिलने के बाद ए.एस. कुरैशी समिति की स्‍थापना की गई। इसकी रिपोर्ट दिल्ली के चार चैरिटेबल अस्पतालों पर केंद्रित थी। इनमें से एक बीएल कपूर भी था। रिपोर्ट में अतिआधुनिक सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल बनाने के लिए पुराने अस्पताल को नए सिरे से बनाने  के लिए ट्रस्टी और खरीदारों के बीच ‘गोपनीय समझौता’ होने की बात कही गई थी।

रिपोर्ट की बात बाद में सही निकली। अस्पताल को ध्वस्त कर बीएलके सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल का निर्माण किया गया। लेकिन बीएलके अभी भी गैर लाभकारी सोसायटी है। इसके कानूनी उत्तराधिकारी डॉ. बी.एल. कपूर के वारिस और उनके परिवार के सदस्य हैं। लेकिन, अब पूरी तरह से इसका प्रबंधन रेडिएंट लाइफ केयर नामक कंपनी कर रही है। प्रबंधन की आउटसोर्सिंग के बाद इसके कामकाज में बड़ा बदलाव आया।

रेडिएंट के आने के बाद जो बदलाव हुए हैं, उसे आप क्या कहेंगे। कामकाज का पेश्‍ोवर अंदाज। कुछ हद तक पारिवारिक ट्रस्ट को पेशेवर सीईओ रखने के लिए कहने जैसा है। लेकिन यह जो भी है, रेडिएंट का पेशेवर रवैया सामने आने के बाद यह व्यापार योग्य वस्तु बन जाती है! इसलिए रेडिएंट लाइफ केयर ने जुलाई में 49 फीसदी हिस्सेदारी वैश्विक प्राइवेट इक्विटी फर्म ‘केकेआर एंड कंपनी’ को 20 करोड़ डॉलर डॉलर में बेच दी।

रेडिएंट मुंबई के नानावटी अस्पताल का भी प्रबंधन करती है। 20 करोड़ डॉलर का इसका अंशकालिक मूल्यांकन इसके लाभ कमाने और वृद्धि करने की क्षमता पर आधारित है। फंड का प्रबंधन करने के लिए कथित तौर पर बीएलके का विस्तार 1,600 बिस्तरों के चार हिस्सों वाले अस्पताल के तौर पर किया जाना है। नानावटी मामले में भी अस्पताल का 1000 बिस्तर तक विस्तार करने के लिए ट्रस्टियों और रेडिएंट ने 2014 में समझौता किया था। बीएलके में होने वाले बदलावों से परिचित मेडिकल इंडस्ट्री के एक एक्जिक्यूटिव ने बताया कि बीएलके अस्पताल में सब कुछ रेडिएंट देखती है। डॉ. कपूर के परिवार की इसमें कोई भूमिका नहीं है। बीएलके के एक प्रवक्ता ने बताया कि मैनेंजमेंट कंपनी के पास किसी अस्पताल का मालिकाना हक नहीं है, लेकिन डॉक्टरों की नियुक्ति, वित्तीय और रोजमर्रा के मामलों पर फैसला वही करती है, क्योंकि वह लीज पर अस्पताल को चलाती है। अस्पताल के पुनर्निर्माण को लेकर सारा निवेश रेडिएंट ने किया है।

जैसा कि बीएलके (या नानावटी) और रेडिएंट समान संस्थाएं नहीं हैं। रेडिएंट एक प्रबंधन संस्‍था है, जबकि बीएलके का संचालन पारिवारिक सदस्यों वाली पंजीकृत सोसायटी करती है। यही वजह है कि 1950 से अभी तक अस्पताल की कानूनी ‌स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। अस्पताल के प्रवक्ता से जब कॉरपोरेट सामाजिक दायित्वों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने विस्तृत जानकारी के लिए प्रबंधन से बात करने को कहा और बताया कि सरकार ने जमीन नहीं दी। यह ट्रस्ट की निजी जमीन है। इसलिए मुफ्त उपचार की बात ही नहीं है।

इससे पता चलता है कि कभी चैरिटेबल संस्‍थान रहे अस्‍पतालों ने जब एक बार दूसरी तरफ जाने को लेकर निर्णायक कदम उठाया तो फिर वे शुद्ध लाभ कमाने वाले मॉडल की तरफ बढ़ते गए। एक वैश्विक इक्विटी दिग्गज कंपनी को गैर-पारंपरिक व्यवसाय में दांव लगाने के लिए रेडिएंट में उम्मीद दिखती है। अब ये लोग बोर्ड की बैठकों में साथ बैठेंगे। शहर के एक हिस्से में जहां स्वास्‍थ्य सेवाएं पहले से ही असमान हैं, वहां लोग अब पूरी तरह से प्रबंधन के नजरिए से सोचेंगे। 

Advertisement
Advertisement
Advertisement