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सरकारी उपेक्षा ने किया शिक्षा का बेड़ा गर्क

उच्च शिक्षा पर ध्यान दिए बिना नहीं दूर होगी शैक्षणिक बदहाली, रोजगार के अनुरूप शिक्षा विश्वविद्यालयों का काम नहीं, हुनर का पूरा विमर्श ही नालायकीकरण की ओर धकेलता है
कैंपसों की गरिमा बहाल करने के लिए नई नीतियों की है दरकार

शिक्षा के क्षेत्र में इस संकट का लंबा सिलसिला है। यह लगातार सघन होता रहा है। करीब 30 वर्ष पहले 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई गई थी। उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और उसी समय आर्थिक नीतियों में उदारीकरण का विचार भी जन्म ले रहा था, नई अर्थ नीति की बातें होने लगी थीं। लेकिन शिक्षा नीति में उदारीकरण से संबंधित प्रश्नों, जिज्ञासाओं का कोई स्‍थान नहीं था। उसके पांच वर्ष बाद 1991 में जब पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने तो आर्थिक उदारीकरण की औपचारिक घोषणा कर दी गई। इसके एक वर्ष बाद शिक्षा नीति पर एक नया दस्तावेज आया जिसका नाम था प्रोग्राम ऑफ एक्‍शन।

इस दस्तावेज के अलावा पिछले 25 वर्षों में आर्थिक क्षेत्र के परिवर्तनों को शिक्षा के संदर्भ में समझने के प्रयास नहीं किए गए। एक तरह से यह मान लिया गया कि शिक्षा नीति जैसी 1986 में थी वैसी ही छोड़ दी जाए। दूसरी तरफ आर्थिक उदारीकरण जारी रहा, जिसका मतलब है निजी उद्यमिता को बढ़ावा देना। इसका शिक्षा खासकर उच्च शिक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ा। लेकिन, इसकी चर्चा नहीं हुई। ऐसा माहौल बनाया गया कि सब कुछ सामान्य है, जबकि सच्चाई यह है कि 90 के दशक में ही विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से सरकारें अपनी वित्तीय और अन्य भूमिकाओं से धीरे-धीरे पीछे हटने लगीं। कई राज्यों में तो नियुक्तियां ही करीब-करीब बंद हो गईं। हिंदी पट्टी में विश्वविद्यालयों, कॉलेजों का पूरा काम एडहॉक या कांट्रैक्ट पर शिक्षक रखकर चलने लगा। दूसरी तरफ सेल्फ फाइनेंसिंग पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया। प्रकट रूप में कुछ भी नहीं कहा गया, लेकिन अंदर से ये परिवर्तन जारी रहे। धीरे-धीरे 20-25 वर्षों में विश्वविद्यालय खोखले होते चले गए।

इस बीच एमए, पीएचडी की डिग्रियां हासिल करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती रही। बड़े पैमाने पर युवाओं का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया जो विश्व‌विद्यालयों, कॉलेजों में पढ़ाने के मौके का इंतजार करता रह गया। एक समाजविज्ञानी ने इसे ‘प्रतीक्षारत पीढ़ी’ नाम दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन को भी एक तरह से उपेक्षित छोड़ दिया गया। विश्वविद्यालयों में ऐसे लोग आने से कतराने लगे जो किसी तरह का प्रशासनिक अनुभव रखते थे या किसी दृष्टि के साथ कुलपति बनते। कुलपति जैसे पद के लिए भी अर्जी मांगने की एक नई प्रणाली का धीरे-धीरे विस्तार होने लगा। राजनैतिक दखल जैसी पुरानी बीमारियां भी उच्च शिक्षा में जारी रहीं। सबसे बड़ा परिवर्तन आर्थिक संदर्भों में हुआ। विश्वविद्यालयों के पैसों में कटौती होती चली गई। यही वह कारण था जिससे शिक्षा का निजीकरण होता चला गया।

तमाम राज्यों ने निजी विश्वविद्यालयों को पनपने दिया। निजी विश्वविद्यालय मान्य होंगे या नहीं इसको लेकर केंद्रीय स्तर पर कोई नीति नहीं थी। लेकिन, प्रदेश के स्तर पर निजी विश्वविद्यालय खोलने के विधेयक एक के बाद एक पास होते गए। आज हालत यह है कि देश में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 300 से ऊपर पहुंच चुकी है। कुल दाखिलों के 65 फीसदी निजी विश्वविद्यालयों में हैं। यह बहुत बड़ा परिवर्तन है जो सतह के नीचे हुआ। इस दौर में जिन रिपोर्टों का सबसे ज्यादा प्रभाव हुआ है वे मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से नहीं आईं। मसलन, बिड़ला-अंबानी रिपोर्ट, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग रिपोर्ट का संबंध सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से था। इससे भी अंदाजा लगता है कि शिक्षा मंत्रालय को दूर रखा गया, जिसे मानव संसाधन मंत्रालय कहा जाता है। यूपीए के पहले दौर में स्पष्ट मतभेद दिखाई दिया। एक तो प्रधानमंत्री कार्यालय से सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट आई। तब के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में उच्च शिक्षा पर रिपोर्ट तैयार करवाई। ज्ञान आयोग और उच्च शिक्षा पर यशपाल रिपोर्ट की तुलना करें तो शिक्षा नीति को लेकर आंतरिक संघर्ष बिलकुल साफ दिखाई देता है। ज्ञान आयोग की रिपोर्ट बड़े पैमाने पर निजीकरण की वकालत करती है। यशपाल की रिपोर्ट सरकार को चेतावनी देती है कि वह उच्च शिक्षा में अपनी जिम्मेदारियां पूरी करे वरना शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा। इससे भी अंदाज लगता है कि यह जो पूरा दौर है, एक छिपे हुए विमर्श का दौर है और यह आज भी चल रहा है।

एजुकेशन लोन भी इसी का अंग है। विद्यार्थियों को ऊंची फीस देने के लिए लोन दिया जाए और बाद में उनसे रिकवरी की जाए। अब परिस्थिति यह है कि रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है। शिक्षित बेरोजगारी पूरे देश में फैली हुई है। मेरठ, आगरा, वाराणसी जैसे शहरों में ऐसे व्यवसाय पनप रहे हैं जिसको डिग्री लेकर बैठे युवाओं ने खुद विकसित किया है। जैसे कोचिंग इंडस्ट्री, ट्यूश्न का पूरा उद्योग। राजधानी दिल्ली के ह‌ी मुखर्जी नगर में सैकड़ों की संख्या में आइएएस कोचिंग संस्‍थान खुले हुए हैं। कोटा, भोपाल, इंदौर जैसे शहर अब कोचिंग के लिए मशहूर हो गए हैं। यह एक नेटवर्क बन गया है जिससे तरह-तरह की और समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से पता चलता है कि राजनीति, नौकरशाही, कोचिंग संस्‍थानों को चलाने वाले, निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज चलाने वाले या सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों की प्रवेश समितियों के अध्यक्षों के बीच कितने बड़े पैमाने पर मिलीभगत रही है। इससे अंदाजा लगता है कि पिछले 15-20 वर्षों में शिक्षा किस तरीके से नियोजित दुर्गति का शिकार बनी।

आज आप जब इलाहाबाद या पुराने किसी भी विश्वविद्यालय को देखते हैं तो लगता है कि उनको अचानक क्या हो गया है। पर सच यह है कि यह अचानक नहीं हुआ है। उनकी उपेक्षा का सिलसिला लंबा है। उसका विश्लेषण करने की स्थिति में कोई बदलाव नहीं है। सरकार ने विश्लेषण की बात तो की, लेकिन उसकी शुरुआत ही नहीं हुई। जब कपिल सिब्बल मानव संसाधन मंत्री थे तो घोषणा हुई थी कि समाजशास्‍त्री और शिक्षाविद आंद्रे बेते की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनाया जाएगा, जो पूरी स्थिति का आकलन करेगा। वह बना ही नहीं। जबसे मौजूदा सरकार आई है, हम सुन रहे हैं नई शिक्षा नीति बनाई जाएगी। पर साढ़े तीन साल बाद भी उसका अता-पता नहीं है।

असल में उदारीकरण से संबंधित आर्थिक नीतियों के शिक्षा में क्या निहितार्थ हैं या उसके क्या प्रभाव हैं, इसको दो टूक आंकने को आज भी कोई तैयार नहीं है। कोई कहना नहीं चाहता कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से काफी पीछे हट चुकी है। अब उसकी जिम्मेदारियां कुछ अलग किस्म की बन गई हैं जिनसे भारी विकृतियां पैदा हो गई हैं।

रेगुलेटरी संस्‍थाओं मसलन मेडिकल काउंसिल, एसआइसीटीई, एनसीटीई, ये संस्‍थाएं उच्च शिक्षा में काम कर रही निजी संस्‍थानों की निगरानी के लिए हैं। इन संस्‍थानों में एक चीज एक समान पाएंगे कि ये सभी जबर्दस्त भ्रष्टाचार का शिकार हो गई हैं। इन सबसे पता चलता है कि विश्वविद्यालयों का संकट कितना गहरा है। धीरे-धीरे पूरी प्रक्रिया इतनी ढीली हो चुकी है कि जब तक सरकार के स्तर पर कोई आमूल और विहंगम समझ विकसित नहीं की जाती तब तक हल निकलना संभव नहीं है।

यह माना जाने लगा है कि विश्वविद्यालयों का काम अर्थव्यवस्‍था में एकदम फिट होने के लिए तैयार लोगों को पैदा करना है। यह अपने आप में एक विकृत मान्यता है। विश्वविद्यालय या कॉलेज का काम है कि वह किसी विषय में विद्यार्थी को गहराई से दृष्टि दे। ज्ञान के क्षेत्र में उसको आगे बढ़ाए। ये जो पूरा विमर्श है हुनर का, वह अपने में एक विचलन है। अब ऐसा माना जाने लगा है कि विश्वविद्यालय व्यावसायिक, वोकेशनल शिक्षा की कोई संस्‍था हैं। यह प्रवृत्ति इसलिए बढ़ी है क्योंकि विश्वविद्यालयों में पैसे की भयंकर कमी होती चली गई। विश्वविद्यालयों को ऐसे वोकेशनल पाठ्यक्रम शुरू करने पड़े जिनमें काफी फीस लेकर प्रवेश दिलाना आवश्यक हो गया। कई विश्वविद्यालय एयरहोस्टेस, फूलों की खेती, यहां तक कि ब्यूटी पार्लर तक का कोर्स चला रहे हैं। तरह-तरह के पाठ्यक्रम शुरू करते-करते विश्वविद्यालयों की छवि ही बदल गई है।

ज्ञान की जगह हुनर का विमर्श विकसित होता चला गया है। इसका इस्तेमाल विश्वविद्यालयों की जड़ें खोदने के लिए किया गया। इसी बात को यशपाल समिति ने उजागर करते हुए 2008 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विश्वविद्यालय का मुख्य काम समाज में ऐसी स्वायत्त जगह का निर्माण करना है जहां ज्ञान और शोध के आधार पर विभिन्न विषयों की चर्चा हो सके। ये जो विश्वविद्यालय की ऑटोनॉमी का सवाल है यह दरअसल ज्ञान से जुड़ा हुआ सवाल है। यदि आप विश्वविद्यालय से ज्ञान को धीरे-धीरे गायब कर देते हैं तो ऑटोनॉमी अपने आप खत्म हो जाती है और फिर वह पैसे का एक खेल बन जाता है। विश्वविद्यालय से रोजगार के लायक आदमी की मांग करना ही अनुचित है। रोजगार के लिए जो-जो अपेक्षाएं हैं, उसे समझना और उस आधार पर प्रशिक्षण देना रोजगार देने वाले का काम है।

हमारी विश्वविद्यालयी शिक्षा का लगातार पतन हो रहा है। विश्वविद्यालय बगैर शिक्षक के चल रहे हैं। नियुक्ति नहीं होने के कारण ऐसे लोग जो ज्ञान और शोध में ही अपना भविष्य देखते हैं, उनकी संख्या धीरे-धीरे घटती गई। इससे शिक्षा का स्तर गिरा है, इसलिए उद्योग जगत को यह कहने का मौका मिल गया है कि हमारे पास जो ग्रेजुएट आ रहे हैं, वे किसी लायक नहीं हैं। यह जो नालायकीकरण का उद्योग है, उसमें यह देखने की दरकार है कि हमने यह कैसे स्वीकार कर लिया कि विश्वविद्यालय बिना शिक्षकों के चल सकते हैं।

सात साल पहले आया शिक्षा का अधिकार कानून इधर के दौर की एकमात्र महत्वपूर्ण और अच्छी घटना है जिससे अंततः स्कूल में हरेक बच्चे के प्रवेश को सुनिश्चित करना संभव हो पाया है। यह कानून बहुत लंबे संघर्ष के बाद बना है। 1911 में गोपालकृष्‍ण गोखले ने ऐसे कानून की पहली बार एक कल्पना की थी और उसका दस्तावेज बनाया था। हालांकि 2002 में शुरू हुआ सर्वशिक्षा अभियान अब मुश्किल में है। जब यह शुरू हुआ था तो केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का पैसा राज्यों तक पहुंचता था। उस अतिरिक्त पैसे से ही दाखिला बढ़ाना संभव हो पाया। अब यह अभियान धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ता जा रहा है। केंद्र से पैसा काफी कम हो गया। यह राज्यों के जिम्मे छोड़ दिया गया है कि वे शिक्षा के अधिकार कानून को अमल में लाने के लिए समुचित वित्तीय प्रबंध करें। दक्षिण के कई राज्य जहां प्रारंभिक शिक्षा पहले से बेहतर स्थिति में थी ऐसा कर पा रहे हैं। लेकिन, उत्तर भारत के राज्यों में पैसे की कमी होने से उपेक्षा शुरू हो गई है। परिस्थिति नाजुक है। शिक्षा के अधिकार कानून में तीस बच्चों के ऊपर एक शिक्षक की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। इस लिहाज से देखें तो देश में इस समय बारह लाख शिक्षकों की कमी है। इनमें से 75 फीसदी की कमी हिंदी भाषी राज्यों में है। शिक्षकों की कमी, शिक्षकों की हैसियत, उनकी आमदनी घटने और इन क्षेत्रों में आई कई विकृतियों से शिक्षा का अधिकार कानून पर संकट बढ़ता जा रहा है। जहां तक स्कूली शिक्षकों की योग्यता का सवाल है तो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की दुर्दशा इतनी गंभीर हो गई है तो स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षक कहां से आएंगे। इस पूरी दुर्दशा के लिए उच्च शिक्षा का संकट ही जिम्मेदार है। यदि शिक्षा का स्तर सुधारना है तो पहले उच्च शिक्षा पर ध्यान देना होगा, क्योंकि शिक्षक वहीं से पैदा होता है।

(लेखक दिल्‍ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और एनसीईआरटी के निदेशक रह चुके हैं) 

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