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“इकोनॉमिक ग्रोथ में तेजी का रुझान”

हर राज्य के लिए उसकी जरूरतों और दिक्कतों के हिसाब से नीति बनाकर क्षेत्रीय असमानता को कम करना होगा
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार

हाल के दौर में अर्थव्यवस्‍था की चिंताओं के साथ नीति आयोग भी कई वजह से सुर्खियों में रहा है, खासकर पहले उपाध्यक्ष प्रो. अरविंद पानगड़िया के इस्तीफे के बाद। आयोग के क्रिया-कलापों और कई नीतिगत सिफारिशों पर विपक्ष और कई विशेषज्ञों ने ही नहीं, सत्तारूढ़ पार्टी के सहयोगियों ने भी तीखे सवाल उठाए। इसीलिए आयोग के उपाध्यक्ष अर्थशास्‍त्री राजीव कुमार पर मौजूदा आर्थिक चुनौतियों के बीच नीति आयोग के विजन को आगे बढ़ाने का दारोमदार है। उनसे इस नई भूमिका, आर्थिक हालात, नीतिगत पहल वगैरह पर आउटलुक के संपादक हरवीर सिंह ने विस्तार से बातचीत की। प्रमुख अंश:

 

नीति आयोग में आप जब आए तो मौजूदा सरकार के तीन साल गुजर चुके थे। सरकार देश की अर्थव्यवस्था को जिस दिशा में ले जाना चाहती है, आपके आने के बाद उसमें कोई बदलाव आएगा या फिर चीजें जिस रास्ते पर चल रही थीं, वही जारी रहेगा?

सरकार की नीतियां आखिरकार प्रधानमंत्री के निर्देशन में कैबिनेट बनाती है। उसमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता रहता है। नीतियों का जो संदर्भ है उसमें बदलाव की कोई बात नहीं है। वह नहीं बदला है। यानी, एक निरंतरता है। कुछ मसलों पर प्रधानमंत्री ज्यादा जोर देना चाहते हैं, जो हम समझ गए हैं। पहले 15 साल, सात साल के लिए विजन डॉक्यूमेंट वगैरह बनाने की बात थी। मगर कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री ने न्यू इंडिया 2022 का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि  देश की जनता को खासकर गरीबी और भ्रष्‍टाचार जैसे विकास के शत्रुओं से आजादी मिलनी चाहिए। इसलिए अब हमने भी यह कोशिश की है कि 2022 तक की कैसी अर्थव्यवस्‍था बनेगी और किन मुद्दों पर हम ज्यादा जोर देंगे। उस पर ज्यादा तेजी से हम काम करें। पर सबसे बड़ी बात यह है कि नीति आयोग का जो मैंडेट है उसका योजना आयोग से कोई लेनादेना नहीं है। नीतियों को ऊपर से नीचे की ओर लागू करना हमारा तरीका नहीं है। नीति आयोग का लक्ष्य है कि कैसे हम जमीनी स्तर पर, हर प्रांत के स्तर पर नीतियां बनाने में मदद करें।

राजीव कुमार

राज्यों के लिए अलग क्या कर रहे हैं?

दरअसल, हमारे 29 प्रांत देखा जाए तो 29 अलग-अलग इकोनॉमी हैं। जो नीति मणिपुर में कारगर हो सकती है, वह जरूरी नहीं केरल के लिए भी उचित हो। यानी ‘वन साइज, फिट ऑल’ वाली एप्रोच नहीं चलेगी। योजना आयोग के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही थी। नीति आयोग का दायित्व है कि हर प्रदेश को उसकी जरूरत के हिसाब से नीतियां बनाने में मदद करे। उत्तर प्रदेश में नई सरकार बनी तो नीति आयोग ने लखनऊ में बैठकर नया एक्‍शन प्लान बनाने में सहायता की। यह अहम काम हर प्रदेश के साथ हो रहा है। यह बहुत बड़ा फर्क है।

दूसरा बड़ा फर्क यह है कि अब हम क्या करना चाहिए इसके बजाय कैसे होगा पर जोर देते हैं। क्या करना है, यह बहुत हद तक मालूम है। तीसरा बड़ा काम जो योजना आयोग नहीं करता था, वह है सभी मंत्रालयों के प्रदर्शन का मूल्यांकन। नीति आयोग के ज‌रिए प्रधानमंत्री को फीडबैक दिया जाता है। इस लिहाज से योजना आयोग से बहुत अलग है नीति आयोग।

यह बात सही है कि हर राज्य की अपनी दिक्कतें, अपनी जरूरतें हैं। लेकिन देश के बाकी राज्यों में गुजरात मॉडल लागू करने की बातें भी हुई हैं। क्या आप मानते हैं कि किसी एक राज्य का मॉडल सब पर लागू नहीं हो सकता?

नीति आयोग में हम कह रहे हैं कि हर राज्य किसी न किसी मामले में बहुत अच्छा है। हम उसको बेंचमार्क मान रहे हैं। मान लीजिए कि पानी का सबसे अच्छा काम गुजरात में हुआ या सड़कों का बड़ा काम पंजाब, हरियाणा में हो गया या फिर खेती का बड़ा काम मध्य प्रदेश में। तो बाकी राज्यों को यह सीखना चाहिए कि इन राज्यों ने कैसे बेहतर किया। जरूरी नहीं कि हर चीज बाकी राज्यों में भी रिप्लिकेट हो। हम चाहते हैं कि पूरे देश में जहां-जहां अच्छे काम हुए हैं, उनसे सीख ली जाए। अगर योजना आयोग सही से काम करता तो पिछले 70 वर्षों में राज्यों के बीच गैर-बराबरी बेतहाशा नहीं बढ़ी होती। अब सवाल है इस अंतर को कैसे कम किया जाए। यह तभी होगा जब हर राज्य की जरूरतों और दिक्कतों को समझकर नीति बनाई जाए। अगर हम क्षेत्रीय असमानता कम करने में कामयाब रहे तो यह नीति आयोग की एक खास पहचान होगी।

अर्थव्यवस्था में जो सुस्ती आई है, उसे आप कैसे देखते हैं? इस सुस्ती के क्या कारण हैं?

इसकी दो बड़ी वजहें हैं। जब 2004 में यूपीए सरकार आई तो उस समय आर्थिक वृद्धि  दर 8.6 फीसदी थी, जो थोड़े दिन नौ फीसदी भी रही। इसका औसत आठ फीसदी के आसपास था। लेकिन जब यूपीए सरकार गई तो आखिरी आंकड़ा 4.6 फीसदी था। यानी यूपीए सरकार के आखिरी दो साल में हमारी अर्थव्यवस्‍था की अधोगति आरंभ हो गई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि उसके पहले के वर्षों में बेतहाशा कर्ज बांटा गया। वह लौटना मुश्किल हुआ और फिर नीतिगत जड़ता सामने आने लगी। घोटाले हो गए। वित्त वर्ष 2012-13 से इकोनॉमी की डाउन स्विंग शुरू हो गई थी। इसके बाद नई सरकार आई तो थोड़ा उछाल आया। एक क्वार्टर में 9.3 प्रतिशत तक ग्रोथ हो गई। लेकिन वह डाउन स्विंग जारी है। उद्योगों को इतने ज्यादा राहत पैकेज दिए और इतना एक्सपेंशन हुआ कि इकोनॉमी दबाव में आ गई। पावर सेक्टर में ही देखिए 25-30 हजार मेगावॉट की नई क्षमता विकसित हो गई जबकि इतनी खपत नहीं है।

दूसरे, अभी एक साल को छोड़कर ग्लोबल इकोनॉमी काफी अस्त-व्यस्त रही। उससे भी असर पड़ा। अब अर्थव्यवस्‍था को फॉरमलाइज करने और करप्शन हटाने के लिए जीएसटी जैसे सख्त कदम उठाए गए। जाहिर है, इससे इन्वेस्टमेंट पर थोड़ा असर जरूर पड़ा, क्योंकि लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि नए नियम-कानून क्या हैं। ब्लैक इकोनॉमी खत्म होने से भी थोड़ा असर पड़ा है।

क्या आप मानते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों के चलते अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त हुई?

जब लंबी छलांग लगानी होती है तो कुछ कदम पीछे जाकर दौड़ते हुए आना पड़ता है। इसी तरह इकोनॉमी को सुदृढ़, पारदर्शी, संगठित और साफ-सुथरा करने के लिए ये दोनों कदम बहुत जरूरी थे। इससे थोड़ा असर तो पड़ा है। बहुत से सेक्टर और बिजनेसमैन कभी टैक्स के दायरे में आए ही नहीं। उन्होंने इनवॉइस देखा ही नहीं। अब उन्हें बदलाव के मुताबिक ढलने में थोड़ी तकलीफ होगी, जो अगले कुछ महीनों में ठीक हो जाएगी।

इन फैसलों की बड़ी मार असंगठित क्षेत्र पर दिख रही है। आपके हिसाब से यह क्षेत्र कितना बड़ा है और इसकी दिक्कतों को कैसे दुरुस्त करेंगे?

दो अलग-अलग चीजें हैं। एक तो इन्फारमल सेक्टर है और एक पैरलल सेक्टर है। ये जरूरी नहीं कि इन्फारमल सेक्टर वाले सारे पैरलल सेक्टर में हों। पैरलल सेक्टर वह हैं जो कभी टैक्स नहीं देते। इस ब्लैक इकोनॉमी को लेकर कई अटकलें लगती हैं। शंकर आचार्य ने ब्लैक इकोनॉमी को 25 फीसदी बताया था। मेरा भी मानना है कि इसका आकार करीब 25-30 फीसदी जरूर होगा। अब जीएसटी और नोटबंदी की वजह से काले धन की इस अर्थव्यवस्था को झटका लगा है। जो साढ़े तीन-चार लाख करोड़ रुपया अभी अकाउंट्स में आ गया, वह पहले घूम रहा था। अर्थव्यवस्‍था को चला रहा था। एक रुपया आठ-दस बार घूमता है। मान लीजिए चार लाख करोड़ रुपया अटक गया जो चालीस लाख करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधियों को चलाता था, वह अब ठहर गया है। मगर, मुझे उससे कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि वो जो था सारा उपद्रवी पैसा था। मतलब न उसका कोई लेखा-जोखा था, न उसकी कोई जवाबदेही-जिम्मेदारी थी।

जहां तक असंगठित क्षेत्र का सवाल है, ये इन्फारमल क्रेडिट पर काम करते हैं। बिना टैक्स चुकाए काम करते हैं। मगर ये कारोबार जिस दिन से शुरू होते हैं, उसी रोज से बंद होने की दिशा में बढ़ने लगते हैं। कभी खुद का विस्तार नहीं कर पाते। इसकी वजह यही है कि वे फॉरमल सेक्टर में नहीं रहते। इसलिए वे बढ़ना भी नहीं चाहते, क्योंकि बढ़ेंगे तो नजर में आ जाएंगे। 

लेकिन इन्फॉरमल सेक्टर में सुस्ती का असर नौकरियों पर दिख रहा है?

कुछ हद तक इन्फॉरमल सेक्टर में नौकरियां कम हुईं हैं। मगर उसके साथ-साथ सर्विस सेक्टर तेजी से बढ़ा है। पर इसके कोई आंकड़े नहीं होते, क्योंकि हमारे आंकड़े पांच साल में एक बार इकट्ठे किए जाते हैं। इसलिए हमारा सांख्यिकी विभाग अब नए सिरे से रोजगार के आंकड़े इकट्ठे करेगा। नई प्रणाली से करेगा। अगले नौ दस महीने में नई संख्या मिल जाएगी। फिर उसकाे हम हर तिमाही आपको बता पाएंगे।

अर्थव्यवस्था में कब तक सुधार आने की उम्मीद है?

सुधार शुरू हो गया है। दूसरी तिमाही में करीब साढ़े छह फीसदी ग्रोथ होगी और उसके बाद बढ़ती ही रहेगी। यह गति धीरे-धीरे बढ़ेगी क्योंकि इकोनॉमी की नींव बहुत सुदृढ़ हो रही है।

रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए नीतिगत मोर्चे पर कौन-से कदम उठाए जा रहे हैं? ये कितने कारगर होंगे?

सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर को जो पैकेज दिया है, जिसमें ईपीएफओ का 12.5 फीसदी का एम्पलॉयर का शेयर सरकार देगी, वह हम सभी बड़े सेक्टरों को देना चाहते हैं। दूसरा बड़ा काम हम अप्रेंटिससिप एक्ट, 1961 के क्रियान्वयन को लेकर कर रहे हैं। इससे उद्योगों और ट्रेंड लोगों, दोनों का फायदा होगा।

शिक्षा और स्वास्थ्य ये दो बुनियादी सेवाएं हैं। इन्हें लेकर क्या आप कुछ अलग करने जा रहे हैं?

इन क्षेत्रों में हम बहुत काम कर रहे हैं। हमने न्यूट्रिशन स्ट्रेटजी बनाई है। हम हॉस्पिटल को लेकर एक रैंकिंग कर रहे हैं। क्वालिटी एजुकेशन को लेकर रैंकिंग कर रहे हैं। सोशल सेक्टर पर हमारा बहुत फोकस है। प्रधानमंत्री के लिए सबसे महत्वपूर्ण सेक्टर यही है। वे चाहते हैं कि इसमें जरूर कोई बेहतरी हो। सोशल सेक्टर में अगर इंप्रूवमेंट नहीं होगा तो बाकी सब व्यर्थ है। हमारे देश में अभी भी 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। इस कलंक को हम मिटाकर रहेंगे।

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