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उभरा नया गुजरात मॉडल

सत्ता के लिए धर्म, गुजराती अस्मिता और अंततः पाकिस्तान जैसे प्रचार के औजार बने, उससे चुनाव का एक नया गुजरात मॉडल उभरा है, जिसका खतरनाक अक्स अगले राज्य विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव में भी दिख सकता है
आरोप-प्रत्यारोप के बीच खूब चले कटाक्षों के तीर

यह अंक जब आपके हाथ में होगा, उसके कुछ दिन बाद ही देश में हाल के सबसे अहम चुनाव के नतीजे आ जाएंगे। यह चुनाव देश के लिए एक नया मॉडल लेकर आया है, जो आगे आने वाले चुनावों की दिशा भी तय करेगा। भले समीक्षक यह कहें कि गुजरात का चुनाव जीतने के लिए केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा और उससे सत्ता छीनने की कोशिश कर रही कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का स्तर नीचे गिरने का रिकार्ड कायम होता गया लेकिन मेरा मानना है कि यह चुनाव गुजरात मॉडल पर ही लड़ा गया। बात उस गुजरात मॉडल की नहीं, जिसे दिखाकर भाजपा ने केंद्र और राज्यों में सत्ता हासिल की बल्कि इस बार चुनाव लड़ने का नया गुजरात मॉडल सामने आया। तय है कि यह मॉडल अगले विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी दिखेगा। हालांकि इसके मूल में आर्थिक मसले ही हैं। इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात चुनाव का जिम्मा अपने कंधों पर लेना पड़ा क्योंकि उन्हीं के नेतृत्व में आशाओं को नई ऊंचाई देने वाला मॉडल खड़ा हुआ था।

लेकिन पिछले कुछ बरसों में कहानी की स्क्रिप्ट बदल गई। गुजरात मैन्यूफैक्चरिंग का हब है और इसी मोर्चे पर देश की इकोनॉमी पर चोट पड़ गई क्योंकि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने नीचे का रुख ऐसा पकड़ा कि ऊपर आने को तैयार ही नहीं दिखता। चाहे मोरबी का सिरेमिक कलस्टर हो या सूरत का डायमंड और टेक्सटाइल हब। राजकोट का डीजल इंजिन मैन्यूफैक्चरिंग हब हो या साणंद और जीरमगांव का ऑटो हब। इन्हीं सबने मिलकर तो गुजरात की विकास दर को नई ऊंचाइयां दीं और राज्य को संपन्न बनाया। लेकिन जब इकोनॉमी में सुस्ती आई तो गुजरात के विकास का यह पहिया धीमा पड़ गया। नतीजा यह हुआ कि राज्य की सामाजिक और आर्थिक खामियां ज्यादा दिखने लगीं। बेरोजगारों की खड़ी होती फौज के चलते निजीकरण की वजह से महंगी शिक्षा भी एक मुद्दा बन कर उभरा और स्वास्थ्य सेवाओं की खामियां भी सामने आईं। साथ ही, किसानों को वाजिब दाम न मिलने से पैदा हो रहा संकट भी उभर कर आ गया। इसी बुनियाद पर पाटीदार आंदोलन ने जन्म लिया।

इसी बीच नवंबर, 2016 में लागू की गई नोटबंदी और जुलाई, 2017 में लागू किए गए वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) की उलझन और दिक्कतों ने स्थिति को और बिगाड़ा। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक खुशहाली का सब्जबाग फीका पड़ने लगा। इसी स्थिति ने कांग्रेस को अपराजेय दिखने वाली भाजपा के मुकाबले में खड़ा कर दिया क्योंकि इन परिस्थितियों ने तमाम व्यापार तथा औद्योगिक कलस्टरों की गतिविधियों को धीमा कर दिया। इसका कोई तात्कालिक हल राज्य सरकार और प्रधानमंत्री के पास भी नहीं है। जो कोशिशें हो रही हैं, उनके सकारात्मक नतीजे नहीं दिख रहे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगातार गिरावट के बाद चालू वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर मामूली बढ़कर 6.3 फीसदी पर पहुंची लेकिन यह स्थायी है या नई गिरावट के पहले एक ठहराव, कहना मुश्किल है। अक्टूबर के ताजा आंकड़ों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) गिरकर 2.2 फीसदी की वृद्धि दर पर आ गया। चालू वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर के बीच यह वृद्धि दर केवल 2.5 फीसदी है। इसलिए साल की बकाया अवधि में यह दर बहुत ऊपर जाएगी, कहना मुश्किल है। हालांकि सीएसओ की ओर से जारी जीडीपी के आंकड़ों में दूसरी तिमाही में मैन्यूफैक्चरिंग की वृद्धि दर सात फीसदी बताई गई है। यह एक पहेली ही है कि 2.5 फीसदी की आइआइपी वृद्धि से सात फीसदी की मैन्यूफैक्चरिंग वृद्धि कैसे हो जाती है? वैसे, इकोनॉमिस्ट मानते हैं कि आइआइपी के आंकड़े ज्यादा विश्वसनीय हैं क्योंकि उसका आधार बड़ा है जबकि सीएसओ का आध्‍ाार शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के आंकड़े ही होते हैं।

दूसरा बड़ा डर महंगाई दिखा रही है। नवंबर में खुदरा महंगाई दर 15 माह के उच्चतम स्तर 4.88 फीसदी पर पहुंची है। इसमें सबसे ज्यादा योगदान ईंधन कीमतों का रहा है जहां महंगाई दर 7.9 फीसदी रही है। विश्व बाजार में तेल की कीमतें मजबूत बनी रहने की संभावना है। सो, महंगाई में कमी लाना एक चुनौती है। ये आर्थिक आंकड़े यहां इसलिए रखे जा रहे हैं क्योंकि इनका असर आने वाले दिनों में दिखता रहेगा और बेहतर जीवन की आम आदमी की उम्मीदों को पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल बना रहेगा।

ऐसे हालात में लोगों को अपने पाले में करने का जो मॉडल भाजपा के पास है, वह उसने गुजरात में पेश किया है। प्रचार का औजार ‘अच्छे दिनों’ की जगह धर्म, गुजराती अस्मिता और अंततः पाकिस्तान बन गया। धर्म विशेष के एक नेता का डर भी दिखाया गया। चुनाव जीतने के लिए इस स्तर पर उतरना लोकतंत्र के हित में तो नहीं है। प्रधानमंत्री की कुछ टिप्पणियों का दूरगामी नकारात्मक असर दिख सकता है। कांग्रेस के कुछ नेताओं की भाषा और शब्दों को भी सही नहीं ठहराया जा सकता। यानी सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों ने जो नया गुजरात मॉडल तैयार किया, वह आने वाले चुनावों में कैसे इस्तेमाल होगा, यह काफी कुछ गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा। 

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