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पल-पल मरता झरिया

पुनर्वास की सुस्त रफ्तार से किसी भी वक्त पाताल की आग में समा सकती हैं लाखों जिंदगियां
बर्निंग कोलः घनुडीह में कोयले में लगी आग। यहां फिलहाल माइनिंग जोरों पर है

झरिया कोलफील्ड, यानी हर ओर काली धूल, धुआं, आग और जहरीली गैस। सौ साल से भी ज्यादा समय से लगी आग से खोखली हो चुकी जमीन पर टिकी लाखों जिंदगियां, कब पाताल में समा जाएं, पता नहीं। इसी साल 24 मई की सुबह झरिया के फुलारीबाद में 40 वर्षीय बबलू अंसारी 10 साल के बेटे रहीम के साथ अपने घर के बाहर जमीन में समा गए। शिमलाबहाल बस्ती की 17 साल की मीरा तो घर की दीवार पर आइना टांग रही थी जब पाताल में चली गई। एक दशक में झरिया कोलफील्ड में अचानक जमीन धंसने और मौत की दर्जनों घटनाएं हो चुकी हैं। सरकार भी मानती है पांच लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी खतरे में है। इनके पुनर्वास के लिए 2008 के मास्टर प्लान में 2021 की समय सीमा तय है। हालांकि इस पर पहली बार सरकारी विचार-विमर्श 1997 में सुप्रीम कोर्ट में पीआइएल दायर होने के बाद शुरू हुई। लेकिन, 2017 बीतने को है और इस आग के दरिया से निकालकर दूसरी जगह बसाए गए परिवारों की संख्या है केवल 2221।

बबलू का परिवार इस घटना के बाद से एक स्कूल में रह रहा है। उसकी पत्नी रुखसाना बताती है, ‘‘उस समय भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और राज्य सरकार ने आर्थिक मदद देने की बात कही थी, लेकिन आज तक एक फूटी कौड़ी नहीं मिली है।’’ मोहरी बांध के लोग तो सड़कों के किनारे रहने को मजबूर हैं। यहां अगस्त के अंत में अचानक जमीन हिलने लगी और घर भरभरा कर गिर पड़े। पूरी बस्ती के पाताल में समाने से पहले ही लोग घर से निकल भागने में कामयाब रहे। कोयली देवी ने बताया, ‘‘हम खाना खा रहे थे कि अचानक जमीन हिलने लगी। बच्चों को लेकर किसी तरह से हम घर से भागे। सारा समान जमीन निगल गई।’’ लक्ष्मण प्रसाद ने बताया कि यहां रात के वक्त भी लोग घर के दरवाजे बंद नहीं करते। क्या पता कब जमीन में दरार पड़ जाए और जान बचाकर भागने की नौबत आ जाए।

लाखों लोगों की जिंदगी के साथ यह खिलवाड़ खनिज संपदा से संपन्न झारखंड राज्य के धनबाद जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर हो रहा है। अंग्रेजों ने 1890 के आसपास इस इलाके में कोयला खोजा था और उसके बाद देश के हर हिस्से से लोग झरिया कोलफील्ड पहुंचे और यहीं रच-बस गए। 1916 में पहली बार भौंरा की एक भूमिगत खदान में आग लगी। लेकिन, पुनर्वास पर गंभीरता 1997 में पश्चिम बंगाल के वामपंथी नेता हराधन राय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पीआइएल दायर करने के बाद दिखाई गई। शीर्ष अदालत ने झरिया की आग को ‘राष्ट्रीय त्रासदी’ घोषित किया। लोगों को बसाने के लिए योजना बनाने और प्रगति रिपोर्ट पेश करने का आदेश केंद्र को दिया।

इसके बाद झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण (जेआरडीए) का दिसंबर 2004 में गठन हुआ। 2005 में मास्टर प्लान तैयार हुआ। 2008 में संशोधित मास्टर प्लान आया, जिसे 12 अगस्त 2009 को केंद्र सरकार ने मंजूरी दी। बारह सालों में इसे पूरा करना था। 7,112 करोड़ के इस मास्टर प्लान को दुनिया का सबसे बड़ा पुनर्वास कार्यक्रम कहकर खूब प्रचा‌रित और प्रसारित भी किया गया।

जेआरडीए का 2009 का सर्वे बताता है कि झरिया कोलफील्ड में 595 अग्नि प्रभावित क्षेत्र हैं। यहां 91,879 परिवार रहते हैं जिनका पुनर्वास किया जाना है। 40 हजार परिवार ऐसे इलाकों में रहते हैं जो अत्यंत खतरनाक हैं। पर पुनर्वास के लिए जेआरडीए बेलगड़िया में जो टाउनशिप बना रहा है वहां अब तक 4352 घर ही बनाए जा सके हैं। धनबाद के उपायुक्त और जेआरडीए के प्रबंध निदेशक ए दोड्डे ने बताया कि चार हजार घरों का निर्माण कार्य चल रहा है, जो अगले साल मार्च तक पूरा हो जाएगा। उनके अनुसार पुनर्वास के काम में सबसे बड़ी दिक्कत जमीन अधिग्रहण की है। पुनर्वास के लिए 2730 एकड़ जमीन की जरूरत है। बीसीसीएल ने 849.68 एकड़ जमीन दी है। जेआरडीए खुद 120.82 एकड़ जमीन का ही अब तक अधिग्रहण कर पाया है।

बीसीसीएल की जिम्मेदारी केवल अपनी जमीन पर बसे लोगों को बसाने की है। उसकी जमीन पर अग्नि प्रभावित इलाकों में 23,874 परिवार रहते हैं। इनमें 15,852 लोगों को तत्काल दूसरे जगह पर बसाने की जरूरत है। 29,444 ऐसे परिवार हैं जो अपनी जमीन पर बसे हैं। इन्हें मुआवजा देकर हटाया जाना है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि झरिया कोलफील्ड में नए निर्माणों पर 1990 से ही रोक लगी है, लेकिन जमीन की रजिस्ट्री आप अब भी करा सकते हैं।

समस्या केवल जमीन अधिग्रहण या निर्माण कार्यों की सुस्त रफ्तार की ही नहीं है। विस्‍थापितों के आंकड़े पर भी हाल तक विवाद चल रहा था। 2004 में जो सर्वे किया गया था उसमें विस्‍थापित होने वाले परिवारों की संख्या 23,874 बताई गई थी। यह सर्वे शुरू से ही विवादों में रहा। स्‍थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हीं लोगों के नाम शामिल किए जिन लोगों ने जेआरडीए की टीम को रिश्वत दी। 2009 में दोबारा सर्वे में विस्‍थापित परिवारों की संख्या बढ़कर 91,879 हो गई। केंद्रीय कोयला मंत्रालय 2004 के सर्वे के आधार पर पुनर्वास पर अड़ा था। इस मसले पर बीते 10 नवंबर को दिल्ली में हाई पावर कमेटी की बैठक हुई थी। झारखंड के खान आयुक्त अब्दुल बकर सिद्दीकी ने बताया कि इस बैठक में मंत्रालय 2009 के आधार पर पुनर्वास के लिए राजी हो गया।

पुनर्वास में देरी के लिए कोयला मंत्रालय के अधिकारी राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं, जमीन अधिग्रहण और निर्माण कार्य स्‍थानीय प्रशासन को करना है। हमारी भूमिका सिर्फ पैसा उपलब्‍ध कराने तक ही सीमित है। बेलगड़िया में जिन लोगों को बसाया गया है वे भूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। रोजगार का कोई साधन यहां उपलब्‍ध नहीं है। नौ बाई दस का एक कमरा रहने के लिए और 10 बाई छह का बरामदा यहां बसाए गए परिवारों को मिला है। लोगों ने टॉयलेट को भी कमरा बना लिया है। हाल में लोदना के कुम्हारपट्टी से 96 परिवारों को यहां लाकर बसाया गया। इन लोगों का आरोप है कि पुनर्वास नियम के अनुसार मिलने वाला 10 हजार रुपए और पांच सौ दिन की न्यूनतम मजदूरी इनलोगों को नहीं मिली है। भोला लाहिरी बताते हैं,," कुम्हारपट्टी से आने के बाद से हम भूखे मरने को मजबूर हैं। छत तो मिल गई है, लेकिन काम-धंधा नहीं है। कोई सुविधा नहीं है।" पुनर्वास की सुस्त रफ्तार के बीच घनुडीह, भगतडीह, बोका पहाड़ी, कुकुरतोपा, बागडिगी, लालटेनगंज, एलयूजी पीट, इडली पट्टी जैसे दर्जनभर इलाके आग की भेंट चढ़ मानचित्र से गायब हो चुके हैं। करीब 10 इलाके गायब होने की कगार पर हैं। आग का हवाला दे इसी साल 15 जून को 123 साल पुरानी 41 किमी लंबी धनबाद-चंद्रपुरा रेल लाइन बंद कर दी गई। इससे पहले 2001 में धनबाद-झरिया रेल लाइन बंद की गई थी। सात हजार छात्रों वाले झरिया के आरएसपी कॉलेज को बेलगड़िया के एक स्कूल में शिफ्ट कर दिया गया है। 115 साल पुराने राज प्लस टू स्कूल पर भी ताला जड़ ‌दिया गया है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि पुनर्वास की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? स्‍थानीय लोगों की मानें तो लोगों को बसाने के लिए सरकार कभी गंभीर ही नहीं रही। उसकी नजर कोयले पर है। बीसीसीएल का आकलन है कि आग से अब तक करीब चार करोड़ 50 लाख टन कोयला जलकर राख हो चुका है। लेकिन, एक अरब 86 करोड़ टन कोयला अब भी बचा हुआ है। योजना ओपन माइनिंग के ज‌रिए इसे निकालने की है। जो इलाके खाली हो चुके हैं, वहां आउटसोर्सिंग के जरिए धड़ल्ले से यह काम चल रहा है। झरिया बचाओ आंदोलन के संयोजक अशोक अग्रवाल कहते हैं,‘‘कोयला निकालने के लिए ही सरकार रेल लाइन, स्कूल, कॉलेज बंद कर रही है। बाजार उजाड़े जा रहे हैं। ताकि लोग घर बार छोड़कर जाने को मजबूर हो जाएं और मुआवजा न देना पड़े।’’

सरकारें अब भी 2021 तक पुनर्वास का काम पूरा कर लेने का दावा करती हैं। पर आठ साल में चार हजार घर बनाने वाली सरकार बचे हुए चार साल में करीब 50 हजार घर कैसे बनाएगी, इसका कोई रोडमैप नहीं है। माना कोयला कीमती है, पर जिंदगी अनमोल है। पुनर्वास पर देर से जागी सरकार ने जल्‍द ही इस बात को नहीं समझा तो लाखों जिंदगी पाताल की आग में कभी भी समा सकती है।

 

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