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फिर चमकी जादुई छड़ी

एशिया कप की जीत ने भरा खिलाड़ियों में जोश, नए कोच से दिखी आशा की किरण, पर समस्याएं बरकरार
आक्रमणः एशिया कप के फाइनल में गेंद लेकर आगे बढ़ते भारतीय खिलाड़ी

पिछले कुछ दशकों में कितनी बार ऐसा हुआ है, कितनी बार... जब भारतीय हॉकी टीम कोई टूर्नामेंट जीती और उसके बाद उम्मीदें बंधीं कि अब यह टीम दुनिया में टॉप पर पहुंचने के लिए तैयार है। एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं। चलिए, साल 2000 के बाद की ही बात कर लेते हैं। 2001 में जब जूनियर वर्ल्ड कप जीते थे। 2003-04 में जब कोच राजिंदर सिंह सीनियर की टीम लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही थी। हर बार उम्मीद बंधी थी। उम्मीद तब भी बंधी थी जब 2003 में भारत एशिया कप जीता था। जब 2007 में एक बार फिर एशिया कप जीता था। 2014 में जब एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता। 2015 में जब हॉकी वर्ल्ड लीग का कांस्य जीता। 2016 में जब चैंपियंस ट्रॉफी का रजत जीता। 2016 में जब जूनियर वर्ल्ड कप जीता। हर बार उम्मीद बंधी, हर बार बात हुई कि अब टीम को आगे ही आगे बढ़ना है।...और ज्यादातर बार उम्मीदें टूटीं।

पिछले दिनों मिली कामयाबी से एक बार फिर उम्मीद बंधी है। भारतीय टीम ने ढाका में एशिया कप जीता है। खास बात यह है कि टीम के साथ कोच और तमाम खिलाड़ी नए थे। कोच श्योर्ड मारिन्ये का यह पहला टूर्नामेंट था। टीम में तमाम ऐसे खिलाड़ी थे, जो चंद महीने पहले लखनऊ में जूनियर वर्ल्ड कप विजेता टीम का हिस्सा थे। युवा टीम अगर कोई टूर्नामेंट जीतती है, तो जाहिर तौर पर उम्मीदें बंधती हैं। वह भी तब, जब भारतीय टीम चार अलग-अलग तरह से एशियाई चैंपियन है। वह एशियन चैंपियंस ट्रॉफी चैंपियन है। एशियाड यानी एशियाई खेलों की चैंपियन है। अंडर 18 एशिया कप चैंपियन है। और अब सीनियर एशिया कप चैंपियन बनी ही है। लेकिन यह बात भारतीय हॉकी के साथ पूरे भरोसे से नहीं कही जा सकती कि उम्मीदों को परवान चढ़ाया ही जाएगा। इसे लेकर हमेशा संदेह रहता है।

संदेह होने की वजहें हैं। एक बार नहीं, बार-बार ऐसा हुआ है, जब भरोसा टूटा है। जब भारत ने 1998 में एशियाड का स्वर्ण जीता था, तो इसके ठीक बाद कोच एम.के. कौशिक और छह खिलाड़ियों को हटा दिया गया था। जब 2003-04 में राजिंदर सिंह सीनियर की टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, तो कोच को 2004 ओलंपिक से करीब एक महीना पहले हटा दिया गया। 2016 में जब टेरी वॉल्श की कोचिंग में इंडियन टीम ने एशियाड का गोल्ड जीता, तो उसके बाद कोच को फिर हटाया गया। यह बताता है कि कामयाबी की बुनियाद पर बुलंद इमारत बनाना हमें नहीं आता।

भारत ने पिछला वर्ल्ड कप 1975 में जीता था। पिछली बार ओलंपिक 1980 में जीता था, जब तमाम बड़े देशों ने उस इवेंट का बायकॉट किया था। उसके बाद से लगातार भारतीय हॉकी की कहानी फेल होने की कहानी रही है। यकीनन यह खेल भारतीयों की भावनाओं से जुड़ता है। भले ही यह कागजों में या आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय खेल न हो, लेकिन राष्ट्रीयता की भावनाएं इस खेल के साथ जुड़ती हैं। ये आजादी से पहले भी जुड़ती थीं, जब ध्यानचंद की टीम झंडा फहराने के बाद अगली सुबह यानी 15 अगस्त 1936 को हिटलर के देश जर्मनी में स्वर्ण जीतने में कामयाब हुई थी। गुलाम भारत को बार-बार दुनिया में शीर्ष पर पहुंचाने का काम भारतीय हॉकी ने किया था। तभी आठ ओलंपिक स्वर्ण दिलाने वाला यह खेल हर बार जब बेहतर करता है, तो आम भारतीयों को अच्छा लगता है। हर बार उम्मीद बंधती है, तो ऐसे भारतीय जो हॉकी के बारे में कुछ नहीं जानते, वे भी इसमें कामयाबी की दुआएं मांगते हैं।

यकीनन हॉकी में काफी कुछ बदला है। सरकार से सबसे ज्यादा मदद मिलने वाले खेलों में है हॉकी। कुछ समय पहले ओलंपिक स्वर्ण विजेता शूटर अभिनव बिंद्रा ने हॉकी इंडिया के बारे में कहा था कि सबसे प्रोफेशनल फेडरेशन है। फेडरेशन ने काफी काम भी किया। वह इमेज बदली, जिसमें हॉकी को गरीबों का खेल माना जाता था। इस खेल के साथ कॉरपोरेट जगत जुड़ा। विदेशी कोच और ट्रेनर आए। कभी टीम को नेहरू स्टेडियम के सीलन भरे हॉस्टल में रहना पड़ता था, तबसे लेकर अब चार या पांच सितारा होटल तक का सफर ही खिलाड़ियों को लेकर बदले रवैए की कहानी कहता है।नया जज्बाः ढाका में एशिया कप का ताज जीतने के बाद भारतीय टीमहॉकी में लीग आई। उस लीग ने बहुत फायदा पहुंचाया। भारतीय खिलाड़ी अब तक यूरोपीय खिलाड़ियों के साथ खेलने में हिचकते थे। वह हिचक अब खत्म हो गई। विदेश के बड़े खिलाड़ी भारत नहीं आना चाहते थे। पैसों ने खेल बदला, वे भारत आने के लिए लाइन लगाकर खड़े दिखे। ये सब पिछले एक दशक से कम समय में हुआ है। इसीलिए हमें मानना चाहिए कि हॉकी बेहतरी की ओर गई है। और यह भी समझना चाहिए कि अगर एक देश पिछले तीन दशक में नीचे ही नीचे गया है, तो उसे ऊपर आने के लिए भी समय लगेगा। यहां कोई शॉर्ट कट नहीं है। किसी तरह का कोई जादू नहीं है। बीच-बीच में अच्छे नतीजे जरूर आते हैं लेकिन लांग टर्म में और लगातार अच्छे नतीजों के लिए लगातार बेहतर काम करना ही होगा।

इस वक्त भारत की दुनिया में रैंकिंग छठी है। कोई अन्य एशियाई देश भारत के आसपास भी नहीं है। यह भी एक वजह है कि एशिया कप की जीत को किसी भी तरह का पैमाना नहीं समझना चाहिए। उसे सिर्फ एक शुरुआत माननी चाहिए। नए कोच और नई टीम के साथ हो रही शुरुआत। अब कहानी में जो फैक्टर ट्विस्ट लाते हैं, उन्हें भी ध्यान में रखिए। विदेशी कोच लाने की शुरुआत होजे ब्रासा के साथ हुई। ब्रासा ने पहली बार खिलाड़ियों को प्रोफेशनल होना सिखाया। बल्कि यूं कहें कि खिलाड़ियों को वे बेसिक्स सिखाए, जो उन्हें 10-12 साल की उम्र में सीखने चाहिए थे। लेकिन ब्रासा के भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) और हॉकी इंडिया के अधिकारियों के साथ मतभेद हुए और वे बाहर हो गए।

ब्रासा के अच्छे काम को कुछ समय तक तो माइकल नॉब्स ने भुनाया। लेकिन 2012 ओलंपिक आते-आते समझ आ गया कि वे अच्छे कोच नहीं हैं। भारत 12वें नंबर पर आया। यानी जो अच्छा काम हुआ था, वह कमजोर पड़ा। फिर टेरी वॉल्श आए। उसी वक्त रोलंट ओल्टमंस भी हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर के तौर पर थे। दोनों बहुत अच्छा काम कर रहे थे। टीम ने एशियाड का गोल्ड जीता। लेकिन उसके बाद टेरी वॉल्श से साई और हॉकी इंडिया के अधिकारियों से मतभेद हुए और वह भी बाहर हो गए।

अच्छी बात यह रही कि ओल्टमंस साथ थे। उन्हें ही चीफ कोच बनाया गया। इस वजह से टीम पर ज्यादा बुरा असर नहीं पड़ा। 2016 के रियो ओलंपिक में भारत ने अच्छा मौका खोया। एक खराब मैच ने उसके लिए दिक्कतें पैदा कीं। होना यह चाहिए था कि ओलंपिक खत्म होते ही ओल्टमंस की जगह अगले चार साल के लिए नया कोच चुना जाए। दुनिया के सारे बड़े देश ऐसा ही करते हैं। अब समय कम है। कोच श्योर्ड मारिन्ये के पास उस तरह का अनुभव नहीं है, जैसा ब्रासा, वॉल्श या ओल्टमंस के पास था। भारत को दिसंबर में हॉकी वर्ल्ड लीग में खेलना है। उसके बाद 2018 में वर्ल्ड कप, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेल हैं। फिर 2020 के ओलंपिक हैं ही, जिसके लिए सारी टीमें तैयारी कर रही हैं।

ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि मारिन्ये क्या करेंगे। कुछ और बड़े सवाल भी हैं। जैसे हॉकी इंडिया लीग, जिसने भारतीय हॉकी को बदलने का काम किया। लेकिन इस साल लीग नहीं हो पाई। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा अब इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन के अध्यक्ष हैं। उन्हें अरुण जेटली के करीबी लोगों में गिना जाता है। उनके आने के बाद हॉकी में पैसा आया था। लेकिन 2018 में हॉकी इंडिया लीग के टलने की वजह पैसों की कमी ही है। अब कहा जा रहा है कि लीग 2019 में होगी। लेकिन कुछ भी तय नहीं है।

एक टीम जेपी ग्रुप की है, जिसने हटने की इच्छा जताई थी। जेपी ग्रुप की समस्याओं से हम सब वाकिफ हैं। वेव ग्रुप के बारे में भी कहा जाता है कि वह लीग से जुड़े रहने का इच्छुक नहीं है। वेव ग्रुप उस वक्त लीग से जुड़ा था, जब पोंटी चड्ढा जीवित थे। चड्ढा व्यक्तिगत तौर पर हॉकी में बड़ी रुचि लेते थे। लेकिन उनके निधन के बाद ग्रुप का वैसा जुड़ाव नहीं रहा। सहारा इंडिया परिवार की दो टीमें लखनऊ और रांची हैं। हॉकी इंडिया से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि सहारा ने दो के बजाय एक ही टीम रखने की बात की है। वैसे आधिकारिक तौर पर इस बारे में कोई बयान नहीं आया है।

इसके अलावा, स्टार स्पोर्ट्स भी लीग को लेकर पिछले कुछ समय से ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहा। चैनल को लीग के प्रसारण से लगातार नुकसान हुआ है। इस वजह से पिछले साल भी उसने प्रोडक्शन का जिम्मा अपने पास रखने के बजाय बाहर कॉन्ट्रैक्ट पर दे दिया था। वे उतनी बड़ी रकम खर्च करने के इच्छुक नहीं हैं, जितनी किसी लीग को बड़ा करने में की जाती है। पिछली लीग के प्रमोशन पर भी स्टार स्पोर्ट्स ने खर्चे में भारी कटौती की।

ये सब ऐसा है, जो हॉकी में आ रहे पैसे और ग्लैमर पर ब्रेक लगाने का काम करता है। इस लिहाज से देखा जाए, तो मैदान पर जो समस्याएं हैं, उसके अलावा बाहर की भी समस्याएं हैं। लेकिन ऐसी समस्याएं हर खेल में आती हैं। उनसे पार पाया जा सकता है। जरूरत है कि इन समस्याओं का असर मैदान या टर्फ पर न दिखने दिया जाए। उसके लिए श्योर्ड मारिन्ये की कोचिंग क्षमता बेहतर होना जरूरी है। वह बड़े शालीन किस्म के माने जाते हैं। ऐसे में ब्रासा या वॉल्श की तरह वह अधिकारों या कुछ और बातों पर लड़ेंगे, ऐसा लगता नहीं। लेकिन अभी उम्मीद यही कर सकते हैं कि वह नॉब्स की तरह न हों, जिनकी कोचिंग क्षमता को लेकर कोई खास अच्छी बात नहीं की जाती। मारिन्ये के पास बेहतर प्रदर्शन के लिए टीम है। आखिर चंद महीने पहले ही भारत ने जूनियर वर्ल्ड कप जीता है। अगर खिलाड़ियों में जूनियर स्तर पर विश्व जीतने की क्षमता है, तो जाहिर तौर पर सीनियर स्तर पर भी होगी। जरूरत यही है कि उन्हें सही तरीके से तराशा जाए। जूनियर से सीनियर का सफर आसान नहीं होता। यही वह उम्र होती है, जब आपको दुनिया की तमाम बातें आकर्षित करती हैं। आप चकाचौंध में खो सकते हैं। उन्हें बचाकर रखना फेडरेशन से लेकर कोच तक हरेक की जिम्मेदारी में आता है।

यकीनन इस टीम में हरमनप्रीत सिंह हैं, जो शानदार ड्रैग फ्लिकर हैं। गुरजंत सिंह ने एशिया कप में अच्छा खेल दिखाया है। कप्तान मनप्रीत सिंह दुनिया के शानदार खिलाडि़यों में गिने जाते हैं। डिफेंस में सुरिंदर कुमार, डिप्सान टिर्की, वरुण कुमार ने क्षमताएं दिखाई हैं। चिंगलेनसाना सिंह, रमनदीप, एसवी सुनील सीनियर टीम के हैं। आकाशदीप सिंह और ललित उपाध्याय ने भी अपने बेहतर होने के संकेत दिए हैं। इसके अलावा, हमें याद रखना चाहिए कि रूपिंदर पाल सिंह और कोथाजीत सिंह जैसे खिलाड़ी एशिया कप जीतने वाली टीम में नहीं थे। इनके आने से टीम और मजबूत होगी।

गोलकीपर सूरज करकेरा और आकाश चिकते ने प्रभावित किया है। इन्हें मौका मिला, क्योंकि सीनियर गोलकीपर पीआर श्रीजेश पूरी तरह फिट नहीं थे। पूरे टूर्नामेंट में इन खिलाड़ियों ने सिर्फ चार गोल खाए। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि फाइनल में मलेशिया के खिलाफ भारतीय डिफेंस ने जो गलतियां की थीं, वह अगर किसी बड़ी टीम के खिलाफ होतीं, तो मुकाबला हाथ से निकल जाता।

यकीनन यह टीम ऐसी है, जिसके साथ 2020 ओलंपिक का कोर ग्रुप तैयार किया जा सकता है, जिसके साथ प्लान किया जा सकता है कि अगले कुछ समय में क्या कुछ करना है। बशर्ते फेडरेशन, कोच और खिलाड़ियों का रवैया प्रोफेशनल हो। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो एक बार फिर पिछले कुछ दशकों की तरह हम यही कहते दिखाई देंगे कि एक बार फिर भारतीय हॉकी चूक गई है। जैसा वह पहले न जाने कितनी बार करती दिखाई दी है। फिर, किसी पॉजिटिव सोच के लिए इसी तरह किसी और एशिया कप के जीतने का इंतजार करते रहेंगे जो हमें फिर उम्मीद की किरण देगा। आखिर यह खेल दिलों से जुड़ता है।

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