Advertisement

जनतंत्र का जंतर छू मंतर!

असहमति की आवाजों की अभिव्यक्ति देने की जगहों को लगातार सत्ता-प्रतिष्ठान से दूर करना अलोकतांत्रिक
सूना पड़ा जंतर मंतर

नब्बे के दशक और उसके बाद जन्मी पीढ़ी के लिए तो यकीनन दिल्ली का जंतर मंतर जनतंत्र की आवाज का ही पर्याय है। उसके पहले के लोगों को भी धरना-प्रदर्शनों और जुलूस-जलसों की राजधानी में किसी और जगह को याद करने के लिए दिमाग पर जोर ही डालना पड़ेगा। उन्हें राजपथ के दोनों ओर बोट क्लब के विशाल मैदान में कुछ बड़ी रैलियों की याद शायद हो लेकिन यह याद न हो कि जंतर मंतर की ही तरह कभी बोट क्लब भी छोटे समूहों और इकलौते आंदोलनकारियों की अपनी आवाज बुलंद करने की जगह हुआ करता था। वहां भी उनका महीनों डेरा जमता था। इधर दशकों से उसे जब जनतंत्र की आवाजों से सूना कर दिया गया तो छोटे-बड़े सभी आंदोलनों, जलसा-जुलूसों की जगह जंतर मंतर पर सिमट आई। लेकिन अब जंतर मंतर को भी उनसे खाली कराने के आदेश जारी कर दिए गए।

गनीमत तो यह है कि उन्हें नई दिल्ली की सीमा के पार रामलीला मैदान में ही ठौर दिया गया, वह भी विशेष अनुमति के साथ। वरना उनके लिए उपनगरों को वाजिब मानने की दलीलें भी अक्सर ऊंचे हलकों में सुनाई पड़ती हैं। मार्के की बात यह भी है कि बोट क्लब को आधिकारिक तौर पर सुरक्षा के नाम पर बंद किया गया तो जंतर मंतर को प्रदूषण की बुरी हवा लग गई। एक को सरकारी फैसले से 1993 में सुरक्षित किया गया तो दूसरे को हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने वहां रहने वाले लोगों की सेहत के प्रतिकूल पाया। दोनों में एक और समानता है जिसका जिक्र आगे किया जाएगा। दोनों ही दलीलें सत्ता प्रतिष्ठानों, वीवीआइपी या रसूखदार लोगों (जंतर मंतर मार्ग पर भला साधारण लोगों की रिहाइश की कल्पना कैसे की जा सकती है) को बुरी बलाओं से बचाने की हैं।

कोई कह सकता है कि इसमें बुराई क्या है? वाकई बुराई नहीं है। न आतंकवाद के दौर में तंत्र की सुरक्षा बुरी कही जा सकती है, न किसी भी वर्ग के लोगों को प्रदूषण से बचाना। लेकिन लोकतंत्र में सरकार और न्यायाधिकरण जब कोई फैसला ले तो यह न्यूनतम उम्मीद की ही जा सकती है कि वह उन अधिकारों पर भी संवेदनशीलता दिखाए, जो जनतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। आखिर उन आवाजों का क्या होगा, जो अपने दुख-दर्द, अपनी असहमतियां, नीतियों-नियमों का विरोध और सत्तातंत्र की मनमानियों, कदाचार तथा भ्रष्टाचार की मुखालफत सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना चाहते हैं?

यह दोहराने की दरकार नहीं कि ये आवाजें ही जनतंत्र की जान होती हैं। लोकतंत्र की हर परिभाषा असहमति या पीड़ितों की आवाजों के बिना अधूरी ही कहलाती है। हमारे गणतंत्र की आधार-भूमि भी यही है। हमारे महापुरुषों और संविधान-निर्माताओं ने हर आवाज को समाहित करने के लिए मूलभूत अधिकारों का विस्तृत दायरा तैयार किया। कमजोर तबकों को तरजीह देने का सकारात्मक भेदभाव का सिद्धांत भी इसी उदार और सबको समान वजन देने की सोच का नतीजा था। बेशक, हम संविधान में अभिव्यक्ति, बोली और संगठन बनाने के अधिकारों की गवाही दे सकते हैं। इसी से यह भी निकलता है कि हमें असहमतियां इतने करीब से जताने का अधिकार है कि सत्ता-प्रतिष्ठान को जोर से सुनाई पड़े और वह उसकी अनदेखी न कर पाए।

दुनिया के दूसरे लोकतंत्रों की तो छोड़िए, यह अधिकार हमें आजादी की लड़ाई के दौरान हमारे महापुरुषों ने दिलाया है। गांधी ने तो इस अधिकार को ऐसे बुनियादी मानवाधिकार का दर्जा दिलाया कि दुनिया में हर कहीं हर तरह की असहमति को प्रकट करने, अपने वाजिब अधिकार हासिल करने के लिए आतताई राजसत्ताओं से भी टकराने का औजार धरना, प्रदर्शन और अनशन बन गया। लेकिन पहले बोट क्लब या अब जंतर मंतर से विरोध की आवाजों को दूर करने के पैरोकार कहेंगे कि धरना, प्रदर्शन, अनशन से किसे गुरेज है, बस यह कुछ दूर से हो।

अब आइए जरा जानते हैं कि इन दलीलों का आधार क्या है। वोट क्लब या संसद मार्ग या उससे सटा जंतर मंतर आजादी के बाद से ही धरना-प्रदर्शन, जनसभाओं, नुक्कड़ सभाओं का केंद्र रहे हैं। इतिहास खंगालेंगे तो संसद मार्ग के अंतिम छोर पर ऐन संसद के दरवाजे तक जुलूस जाया करते थे। 1966 में गो-हत्या पर पाबंदी के लिए विशाल जुलूस ऐन संसद के दरवाजे पर हिंसक हो उठा, जिसमें कई लोग हताहत हो गए थे। अब जुलूस संसद मार्ग थाने पर ही रोक दिया जाता है, जहां से संसद तक आवाज भला क्योंकर पहुंचती होगी। इसी तरह बोट क्लब अनेक विशाल रैलियों और जनसभाओं का निगेहबान रहा है। हर पार्टी, हर मोर्चा अपनी ताकत का अंदाजा इसी से दिया करता था कि बोट क्लब पर उसकी रैली कितनी बड़ी हुई।

यही आमजन की ताकत तय करती थी कि उसे सत्ता कितनी तवज्जो देती है या वह देश में कैसी फिजा तैयार कर सकता है। साठ और सत्तर के दशक में कांग्रेस और विपक्षी नेताओं की रैलियों को याद करें। याद की‌जिए 1980 में चरण सिंह के नेतृत्व में विशाल किसान रैली की। फिर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का बोट क्लब पर लगभग हफ्ते भर का वह किसान धरना, जिसकी वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अपनी दिवंगत मां, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर रैली लालकिले के पिछवाड़े करनी पड़ी थी। टिकैत से बोट क्लब खाली कराने की कोशिशें भी हुईं लेकिन टिकैत की रैली की भीड़ प्रधानमंत्री की रैली से अधिक साबित हुई। लगभग उसी दौर में विश्व हिंदू परिषद ने बोट क्लब पर विशाल रैली की जिससे अध्योध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन में तेजी आ गई थी।

लेकिन सत्ता-तंत्र और राजधानी का एलिट तो विदका था टिकैत की रैली से ही। आप याद करें तो कई अंग्रेजी अखबारों ने बोट क्लब पर बदबू फैलाने के लिए दबी जुबान में टिकैत के आंदोलन की आलोचना शुरू कर दी थी। यह दलील दी जाने लगी थी कि बोट क्लब को सैर-सपाटे की जगह के रूप में साफ-सुथरा बनाए रखना चाहिए। उसके बाद सुरक्षा की दलील आई कि राष्ट्रपति भवन से लेकर तमाम सरकारी भवन, संसद आसपास हैं इसलिए सुरक्षा का खतरा हो सकता है। अब जरा राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में शोर और अन्य प्रदूषण से रिहाइश मुश्किल होने की अपील लेकर जाने वालों की दलील को देखिए। दोनों में एक ही तरह की मानसिकता दिखाई दे सकती है। कुछ-कुछ ऐसी ही दलीलें मजदूर रैलियों से शहर में ट्रैफिक जाम के हालात के बारे में टिप्पणियों में भी नजर आती हैं।

बहरहाल, सवाल यह है कि असहमति की आवाजों की जगह इतनी दूर कतई नहीं होनी चाहिए, जिससे सत्ता-प्रतिष्ठान को कोई फर्क ही न पड़े। मसला जंतर मंतर या बोट क्लब का नहीं है, बल्कि जनता के अधिकारों का है। लेकिन हाल के फैसले पर तो आम आदमी पार्टी की सरकार भी खुलकर कुछ नहीं बोल पाई, जिसका अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान जन्म ही जंतर मंतर से हुआ। 

Advertisement
Advertisement
Advertisement