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हवा बदली, रुख बदलना बाकी

दो दशकों में पहली बार भाजपा गुजरात में नर्वस दिख रही है तो कांग्रेस के आक्रामक तेवर उसे शुरुआती बढ़त दिला सकते हैं
गांधीनगर में मोदी और अमित शाह की रैली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले राजनैतिक यात्राओं और चुनाव आयोग के एक फैसले ने माहौल गरमा दिया है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की चर्चाओं के बीच चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में चुनाव की तारीख का ऐलान करते हुए गुजरात के मामले में चुप्पी साध ली तो विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया। कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए गुजरात चुनाव के ऐलान में देरी के आरोप लगाए ही, एनडीए में शामिल जदयू ने भी इस पर सवाल उठाए हैं।

पलटवार करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कांग्रेस पर 2012 के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग को प्रभावित करने का आरोप जड़ दिया। ईवीएम के मुद्दे पर साख के संकट से जूझ रहे चुनाव आयोग पर अब इसके पूर्व मुख्य आयुक्त एसवाइ कुरैशी और टीएस कृष्णमूर्ति ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं। बहरहाल, इस सवाल का जवाब अभी तक किसी के पास नहीं कि गुजरात चुनाव की तारीखों के ऐलान में देरी आखिर क्यों हुई? इसने इस संदेह को पुख्ता किया है कि चुनाव में उतरने के लिए भाजपा को थोड़ा वक्त चाहिए। पिछले दो दशक में पहली बार भाजपा को नर्वस माना जा रहा है। 

पेशे से वकील अहमदाबाद निवासी अजय भाई अग्रवाल बताते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि फिलहाल भाजपा ‘डैमेज कंट्रोल’ करने में जुटी है। यह ‘डैमेज’ नोटबंदी, जीएसटी और टैक्स वसूली के बढ़ते शिकंजे की देन है, जिसे लेकर व्यापारी वर्ग खासतौर पर खिन्न है। गुजरात में जीएसटी के खिलाफ व्यापारियों की विरोध रैलियों में यह रोष काफी पहले ही दिखने लगा था। अब जिस तरह पीएम मोदी जीएसटी के पीछे कांग्रेस का हाथ होने की बात कह रहे हैं, उससे जाहिर है कि भाजपा को इससे होने वाले नुकसान का अंदाजा है।

लेकिन भाजपा के लिए तसल्ली की बात है कि कांग्रेस के पास व्यापारियों के गुस्से और भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को भुनाने के लिए राज्य स्तर पर कोई बड़ा चेहरा नहीं है। फिर भी, नोटबंदी और जीएसटी के अलावा किसानों को कपास और मूंगफली का उचित दाम न मिलना, युवाओं की बेरोजगारी और दलित उत्पीड़न की घटनाएं भाजपा के खिलाफ कांग्रेस का मुद्दा बन सकती हैं।

गुजरात में राहुल गांधी की यात्रा से जो हलचल मची उसका असर भाजपा पर दो तरह से दिखाई दिया। एक, राहुल गांधी के खिलाफ ताल ठोकने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के कई शीर्ष नेता उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी पहुंच गए। दूसरे, पीएम मोदी ने कांग्रेस पर हमले तीखे कर दिए। इन दोनों बातों से साफ झलकता है कि भाजपा गुजरात को लेकर थोड़ी डिफेंसिव हो रही है। कांग्रेस के खाते में यह शुरुआती बढ़त है।  

16 अक्टूबर को गांधीनगर में ‘गुजरात गौरव यात्रा’ के समापन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार को गुजरातियों के खिलाफ बताते हुए अमित शाह की गिरफ्तारी और मोरारजी देसाई के साथ हुए बर्ताव का हवाला दिया। इससे जाहिर है, इस चुनाव में वे गुजराती अस्मिता को हथियार बनाएंगे। इससे पहले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को गुजरात में उतारकर भाजपा अपने हिन्दुत्वादी चेहरे को भुनाने का स्पष्ट संकेत दे चुकी है। यानी इस बार नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल से ज्यादा गुजराती अस्मिता और हिन्दुत्ववादी राजनीति पर दारोमदार होगा। कांग्रेस के वायरल हुए ‘विकास पागल हो गया है’ प्रचार की काट के लिए पीएम मोदी ने ‘हूं विकास छू, हूं गुजरात छू’ का नारा दिया है।

गुजरात में चुनाव की तारीख का ऐलान होने से ठीक पहले पीएम मोदी एक महीने के भीतर चार बार गुजरात का दौरा कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने बुलेट ट्रेन और सरदार सरोवर बांध से जुड़े बड़े ऐलान किए। अपने गृह नगर वडनगर भी हो आए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात का मोर्चा फतह करने के लिए जी-जान से जुटे हैं। मोदी-शाह की जोड़ी की इस मेहनत और रणनीति के बूते ही भाजपा नए क्षेत्रों में सियासी जमीन तलाशने में कामयाब रही है। लेकिन इस बार चुनौती अपने गढ़ में मिल रही है। सियासी माहौल में भाजपा विरोधी रुख के बावजूद भाजपा को शहरी मतदाताओं और बूथ लेवल मैनेजमेंट पर पूरा भरोसा है।

गुजरात भाजपा को करीब से देखने वाले जानकार बताते हैं कि राज्य स्तर पर नेतृत्व के मामले में भाजपा का हाल भी कांग्रेस जैसा ही हो गया है। मोदी-शाह की जोड़ी पर अत्यधिक निर्भरता पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

लंबे समय बाद गुजरात में भाजपा के खिलाफ एक माहौल दिख रहा है। दो साल पहले पाटीदार आंदोलन से शुरू हुआ सिलसिला जीएसटी को लेकर व्यापारियों के विरोध और राज्य सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर से गुजरता हुआ दलित उत्पीड़न की घटनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। हार्दिक पटेल, जिग्नेश शाह और अल्पेश ठाकुर की तिकड़ी भी भाजपा का खेल बिगाड़ सकती है। हार्दिक पटेल ने ‘संकल्प यात्रा’ और जिग्नेश मेवाणी ने ‘आजादी कूच’ के जरिए अपनी सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश की है। जिग्नेश का जोर दलित-मुस्लिम एकता पर है। उनका दावा है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में दलित और मुस्लिम समुदाय 25 से ज्यादा सीटें प्रभावित कर सकते हैं। अल्पेश ठाकुर भी ओबीसी और दलित समुदायों को लामबंद करने में जुटे हैं। हालांकि, अभी इन तीनों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन इनका भाजपा विरोधी रुख साफ दिख रहा है।

करीब तीन महीने पहले राज्यसभा चुनाव में सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की नाटकीय जीत से गुजरात कांग्रेस में आत्मविश्वास भर गया था। कांग्रेस के गुजरात और राष्ट्रीय नेताओं के बीच तालमेल के चलते ही क्रॉस वोटिंग करने वाले दो विधायकों के वोट चुनाव आयोग से रद्द कराने में पार्टी को कामयाबी मिली थी। यह तालमेल कांग्रेस के लंबे समय से शिथिल संगठन के लिए शुभ संकेत है। मोदी के गढ़ में राहुल की ‘नवसर्जन यात्रा’ हलचल मचाने में कामयाब रही। तंज और व्यंग्य के जरिए राहुल गांधी आजकल भाजपा और पीएम मोदी पर खूब निशाने साध रहे हैं। लेकिन गुजरात में मोदी-शाह के मुकाबले किसी दमदार चेहरे की कमी कांग्रेस के दावे को कमजोर करती है। संगठन की कमजोरियां और शंकर सिंह वाघेला सरीखी बगावतों के असर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन कमजोरियों के बावजूद इस बार कांग्रेस गुजरात में भाजपा को चुनौती देने के मामले में पिछले चुनाव से बेहतर स्थिति में नजर आ रही है। इस बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गुजरात में न होना भी एक बड़ा फैक्टर है।

गुजरात भाजपा से जुड़े सूत्र भी मानते हैं कि पिछले तीन साल में दो बार मुख्यमंत्री बदलने से पार्टी को नुकसान पहुंचा है। मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का काम प्रभाव नहीं छोड़ पाया। लेकिन इस बदले माहौल को अपने पक्ष में करने में कांग्रेस कितनी कामयाब होगी, इस पर भी बड़ा सवालिया निशान है। कांग्रेस में अंदरूनी गुटबाजी भी भारी पड़ सकती है। राहुल गुजरात चुनाव से पहले पार्टी अध्यक्ष बनते हैं तो उनकी टीम में गुजरात से कौन-से चेहरों को जगह मिलेगी, उसका असर इन चुनावों पर पड़ सकता है। अहमद पटेल के अलावा अर्जुन मोढवाडिया, शक्ति सिंह गोहिल, भरत सिंह सोलंकी, सिद्धार्थ पटेल के अलग-अलग गुट माने जाते हैं।

कांग्रेस के भीतर इस बिखराव को थामना राहुल गांधी के लिए आसान नहीं होगा। फिर भी कुछ चीजें फिलहाल कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रही हैं। जैसे, वंशवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा इस बार कांग्रेस पर पहले की तरह हमलावर नहीं हो पा रही है। इसके पीछे अमित शाह के बेटे के कारोबार को लेकर उठे सवाल और भाजपा का केंद्र और राज्य की सत्ता में होने जैसी वजहें हैं।

(साथ में अहमदाबाद से तिकेंदर रावल)

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