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अखिलेश का नया ब्रह्मास्त्र

हार से सबक लेकर ‘समाजवादी डिजिटल फोर्स’ का किया गठन पर असली परीक्षा तो विपक्षी एका के सवाल पर ही होगी
नई तैयारीः सपा सम्मेलन के दौरान अखिलेश यादव के साथ अन्य नेता

लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी मुख्यालय का एम्फीथिएटर नुमा सभागार 26 सितंबर को खचाखच भरा था। पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक खत्म हुई तो ‘समाजवादी डिजिटल फोर्स’ का गठन हो चुका था और आम सहमति बन चुकी थी कि 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा की हार की एक बड़ी वजह खासकर भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार था, जिसका सपा और उस समय अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार मुकाबला करने में अक्षम साबित हुई।

सो, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ही अगुआई में पार्टी ने अब सोशल मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) को कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया है, जिसका आने वाले दिनों में सपा की सियासत में व्यापक असर दिखेगा। ‘समाजवादी डिजिटल फोर्स’ का मोबाइल डिजिटल एप भी लॉन्‍च हो गया है जो पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के संपर्क में रखने और सूचनाओं का फौरन आदान-प्रदान करने में मदद करेगा। यह फोर्स फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और व्हाट्सएप पर सक्रिय रहेगी।

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, लखनऊ मेट्रो, लखनऊ आइटी सिटी जैसी विकासोन्मुख योजनाओं और लैपटॉप, साइकिल, बेरोजगारी भत्ता जैसे लोकलुभावन कार्यक्रमों के बावजूद सपा की चुनाव में हार ने पार्टी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि केवल विकास के मुद्दे पर चुनाव नहीं जीता जा सकता और जनता से निरंतर और सार्थक संवाद भी जरूरी है। टीम अखिलेश के एक अहम सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “इसमें दो राय नहीं कि 2017 चुनाव के पहले सपा में आपसी फूट और झगड़े से भी पार्टी और सरकार की छवि को काफी क्षति हुई, जो हमारी हार का एक प्रमुख कारण भी था। फिर भी सोशल मीडिया पर हम कमजोर ही साबित हुए और दुष्प्रचार का मुकाबला नहीं कर पाए।”

पार्टी हार की दूसरी बड़ी वजह आपसी फूट से निजात पाने और मायूस कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए क्या कर रही है, यह देखना भी जरूरी है। एक तो ताज नगरी आगरा में 4-5 अक्टूबर को तय सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अखिलेश के लिए अगले पांच साल तक अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान होना पक्‍का हो जाएगा। इससे न केवल 2019 लोकसभा चुनाव, बल्कि 2022 के उप्र चुनाव तक अखिलेश के हाथ ही पार्टी की कमान रहेगी। सम्मलेन में अखिलेश के पिता, सपा के संस्‍थापक मुलायम सिंह यादव के शामिल होने की कम ही संभावना है। हाल में प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में भी यही देखने को मिला, जिसके लिए मुलायम और उनके भाई शिवपाल को न्योता तक नहीं भेजा गया था।

चुनाव में हार के बाद से ही अखिलेश के मिजाज में एक तरह की सख्ती देखी जा रही है। लगता है, वे अब अपने पिता मुलायम सिंह यादव की परछाईं से बाहर निकल चुके हैं। पिछले दिनों अखिलेश पटना में लालू यादव की रैली में शामिल हुए और देश के दिग्गज नेताओं के साथ खड़े होकर बड़ी बेबाकी से भाजपा पर हमला भी बोला।

इधर कुछ हफ्तों के दौरान अखिलेश के दौरों में भी तेजी आई है। उन्होंने फैजाबाद, पटना (बिहार), आजमगढ़, रामकोला, रायपुर (छत्तीसगढ़), गोरखपुर समेत कई स्थानों का दौरा किया है। गोरखपुर में बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में तथाकथित ऑक्सीजन की कमी से हुई बच्चों की मौत के बाद अखिलेश ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी। उप्र से ताल्लुक रखने वाले सीमा पर तैनात जवानों की शहादत पर भी अखिलेश उनके परिवारों से भेंट करते हैं।

अपनी लगातार सक्रियता से अखिलेश ने अपनी छवि छह महीने पूरे कर चुकी योगी आदित्यनाथ सरकार के सामने विपक्ष के सबसे मजबूत नेता की बनाने की कोशिश की है। योगी भी अपने भाषणों में अखिलेश पर ही निशाना साधते हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि भाजपा सरकार के सामने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा ही है। हालांकि इस कोशिश में उन्हें झटका भी लगा है। पिछले दो महीनों के दौरान पार्टी के पांच विधायक पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए हैं।

हालांकि सपा के नेता इससे विचलित नहीं दिखते। वे दूसरे मोर्चे पर बदस्तूर सक्रिय हैं। अखिलेश ने 21 सितंबर को बहुजन समाज पार्टी के बागी नेता और एक समय बसपा प्रमुख मायावती के काफी करीबी रहे इन्द्रजीत सरोज को उनके हजारों समर्थकों के साथ पार्टी में शामिल किया और इसके साथ ही आने वाले फूलपुर (इलाहबाद) लोकसभा उपचुनाव के लिए बिगुल भी फूंक दिया। उप्र में जल्द ही फूलपुर और गोरखपुर में लोकसभा उपचुनाव होने वाले हैं। गोरखपुर की सीट योगी अदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद खाली हुई है, जबकि फूलपुर सीट उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई है।

वैसे तो उप्र में विपक्षी महागठबंधन बनाने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस को एक मंच पर लाने की बातें चल रही हैं, फिर भी अखिलेश ने इन्द्रजीत सरोज को अपनी पार्टी में शामिल करके मायावती के नाराज होने का जोखिम उठाकर यह साफ कर दिया है कि भविष्य में वे अपनी शर्तों पर ही राजनीति करेंगे।

बसपा से गठबंधन पर खुलकर अभी तक अखिलेश ने कुछ नहीं कहा है, पर कांग्रेस के साथ 2017 के गठजोड़ को दोहराने का रुझान साफ दिख रहा है। बसपा के साथ गठबंधन पर आने वाले दिनों में ही तस्वीर साफ होगी, क्योंकि अभी मायावती पार्टी में अपने छोटे भाई आनंद कुमार और उनके पुत्र को स्थापित करने और अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश में मशगूल हैं।

मुलायम अब हाशिए पर

सपा मुख्यालय की ओर जाने वाली सड़क के दोनों तरफ होर्डिंग्स में अखिलेश की चिरपरिचित मुस्कराती तस्वीरें स्वागत करती हैं, लेकिन उनके पिता और पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव की तस्वीर अब छोटी होती जा रही है। कई होर्डिंग्स में तो अब मुलायम नदारद हैं। शिवपाल सिंह यादव, जिनसे अखिलेश का छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है, अब किसी भी होर्डिंग में बिरले ही नजर आते हैं।

राजनैतिक विश्लेषक तथा टिप्पणीकार प्रो. रमेश दीक्षित के अनुसार अपने पांच साल (2012-2017) के कार्यकाल के दौरान अखिलेश ने साबित कर दिया है कि उनमें उप्र जैसे बड़े और जटिल राज्य की बागडोर संभालने की कूव्वत है। वे कहते हैं, “सपा समर्थकों को अखिलेश में भविष्य दिख रहा है, इस वजह से सारे कार्यकर्ता और नेता उनके साथ जुड़ रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मुलायम भी अखिलेश की सफलता पर मन ही मन बहुत खुश हो रहे होंगे, बाहर से वो चाहे जितना भी रोष व्यक्त करते रहें।”

पिछले कई हफ्तों से कयास लगाए जा रहे थे कि मुलायम और शिवपाल जल्द ही एक नई पार्टी अथवा मंच का ऐलान करेंगे। मगर कयासों के उलट, 25 सितंबर को सपा कार्यालय के समीप स्थित लोहिया ट्रस्ट के कार्यालय में पत्रकारों से रूबरू मुलायम ने साफ कर दिया कि अभी नई पार्टी बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इतना ही नहीं एक पिता होने के नाते उन्होंने अखिलेश को आशीर्वाद देने की भी बात कही। प्रेस वार्ता में शिवपाल नदारद रहे। बाद में शिवपाल ने जरूर नया मोर्चा बनाने की बात की पर सियासी हलकों में इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

दरअसल पिछले दिसंबर में सपा में पार्टी नेतृत्व को लेकर मुलायम और अखिलेश गुटों में रस्साकशी में लगभग स्थितियां अखिलेश के हक में हो गई थीं। हाल में राज्य सम्मेलन में मुलायम के पाले के बड़े नेताओं खासकर बेनी प्रसाद वर्मा के पहुंचने से भी यह संकेत मिलता है कि अखिलेश के नेतृत्व को अब कोई खास चुनौती नहीं बची है। वर्मा बेटे को टिकट देने का विरोध करने से अखिलेश से नाराज बताए जाते थे।

लेकिन असली सवाल यही है कि अखिलेश राज्य में भाजपा की चुनौती का मुकाबला कैसे करते हैं और विपक्ष के एका के सवाल पर क्या करते हैं। इसकी पहली परीक्षा तो फूलपुर और गोरखपुर के संसदीय उपचुनावों में ही होनी है।

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