आउटलुक 25 सितंबर 2017 SEP 11 , 2017 कपिल सिब्बल

अधिकारों को पुख्ता आधार

सुप्रीम कोर्ट
कपिल सिब्बल
निजता का अधिकार संवैधानिक हुआ, अब व्यक्तिगत जीवन में ताक-झांक होगी नामुमकिन

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से देश के प्रशासन और जनता के बीच ताल्लुकात का रंग-ढंग बदल जाएगा। आखिर पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निजता के हक को मौलिक अधिकार की मान्यता दी है। देश के हर नागरिक को यह हक होगा कि उसकी निजी जिंदगी में बिना कानूनी मंजूरी के कोई दखलअंदाजी न की जाए। हर नागरिक का घर एक मंदिर माना जाता है। वह घर में बैठकर क्या करता है, उसके परिवार और उसके बीच कैसे संबंध हैं, वह क्या खाता है, क्या पीता है, उसका यौन रुझान क्या है, अगर वह किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता तो उसके इन हकों में कोई दखल नहीं दे सकता। ये निजी हक केवल परिवार से ही संबंधित नहीं हैं, न केवल घर के दायरे में ही लागू होते हैं। घर से बाहर रहने पर भी हर आदमी के निजी हक हैं। वह कहां जाता है, किससे मिलने जाता है, इसके बारे में भी सरकार उससे बिना किसी कानूनी आधार के पूछताछ नहीं कर सकती।

इस फैसले के दायरे और भी विस्तृत हैं। मसलन, सूचना क्रांति के बाद टेक्नोलॉजी का जो विस्फोट हुआ है उसके जरिए सरकार निजी मामलों में दखलअंदाजी कर सकती है। टेक्नोलॉजी के जरिए सरकार आपसे बिना पूछे और बिना घर में प्रवेश किए, आपको देख भी सकती है और आपकी बातें भी सुन सकती है। टेक्नोलॉजी से यह संभव हुआ है कि कई किलोमीटर दूर से भी सरकार सुन सकती है कि आप अपने घर में क्या बातचीत कर रहे हो, जबकि आप घर की बात को सुरक्षित मान रहे होते हो। ये साधन पहले सरकार के पास नहीं थे लेकिन आज वह इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर सकती है। इस पर रोक लगानी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह रोक लग सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे निजी अधिकार बेरोकटोक हैं। अगर कोई घर बैठे कानून का उल्लंघन करता है, ड्रग्स रखता है या गोल्ड बार रखता है, तो सरकार उसकी जांच कर सकती है और घर में प्रवेश भी कर सकती है। हमारे निजी हक तभी तक अक्षुण्‍ण हैं जब तक हम कोई ऐसा काम नहीं करते जिससे समाज का नुकसान हो और कानून का उल्लंघन हो। ये अधिकार बिना शर्त नहीं हैं।

लेकिन अब निजता के हक को सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक दर्जा दे दिया है। इसलिए सरकारी महकमे बिना वजह बताए कोई तहकीकात नहीं कर सकते। मसलन, अक्सर जब इनकम टैक्स अफसर सर्च और सीजर के लिए छापा मारते हैं तो वे यह समझते हैं कि घर में हर चीज की जांच-पड़ताल कर सकते हैं। अब सवाल उठेंगे कि क्या इनकम टैक्स अफसर पति-पत्नी के बीच लिखे खत पढ़ सकते हैं? अगर इनकम टैक्स अफसर अपनी सूचना के अनुसार घर में रखी गोल्ड बार की खोज में आया हो तो क्या वह प्रापर्टी के कागज जब्त कर सकता है? यही नहीं, आने वाले दिनों में ये सवाल भी उठेंगे कि क्या सरकार बिना आरोप के जीपीएस के जरिए यह पड़ताल कर सकती है कि कोई घर से निकलकर कहां गया? क्या सरकार आधार कार्ड के जरिए यह पता कर सकती है कि मैं किस फ्लाइट से किस शहर में गया या मेरे बैंक में कितना पैसा है? या क्या वह मेरी इनकम टैक्स रिटर्न की पूछताछ कर सकती है जबकि रिटर्न इनकम टैक्स और नागरिक के बीच कॉन्फिडेंशियल होता है? ऐसे सवाल भी उठेंगे कि क्या टैक्स डिपार्टमेंट से संबंध न रखने वाला कोई सरकारी अधिकारी बिना नागरिक की सहमति के उसके इनकम टैक्स रिटर्न और ब्योरों की जानकारी हासिल कर सकता है?

बेशक, सरकार दखलअंदाजी कर सकती है लेकिन पहले उसे किसी संवैधानिक कानून की सहायता लेनी होगी। दूसरे, किसी घोषित मकसद के आधार पर ही दखलअंदाजी हो सकती है। अगर दखलअंदाजी बिना जरूरी मकसद के की जाती है तो वह असंवैधानिक होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इन सब बातों को साफ कर दिया है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि हर नागरिक का डेटा चाहे वह सरकार के पास हो या नॉन स्टेट एजेंसी के पास, उसकी सुरक्षा करना भी सरकार का कर्तव्य है। अगर उसकी कानून के मुताबिक सुरक्षा नहीं होगी तो ऐसी कार्रवाई असंवैधानिक कहलाएगी। इसके लिए सरकार ने एक कमेटी बैठाने का फैसला किया है। जस्टिस (रिटायर) श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में बनी कमेटी 31 दिसंबर तक डेटा सुरक्षा कानून बनाने के बारे में राय सरकार को देगी। यह डेटा सुरक्षा कानून सरकार और नॉन स्टेट एजेंसियों, दोनों पर लागू होगा।

असल में टेक्नोलॉजी का दायरा इतना बढ़ चुका है कि हर नागरिक का डेटा पब्लिक डोमेन में जा चुका है और उसकी सुरक्षा जरूरी है। टेक्नोलॉजी हर नागरिक के बीच संबंध बदल रही है और नागरिक तथा सरकार के बीच संबंध भी टेक्नोलॉजी बदल रही है। आने वाले दिनों में हम किस तरह से निजता हक सुरक्षित रख पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन ऐतिहासिक फैसलों में गिना जाएगा, जिसने एक नई सोच के साथ देश के हर नागरिक के निजी हकों की सुरक्षा करने का अहम कदम उठाया है।

(लेखक जाने-माने अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)

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