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नीतीश कुमारः भीड़ में अकेले

‌‌बिहार के मुख्यमंत्री पर हैं सभी की ‌न‌िगाहें
नीतीश कुमार

ताकत: कद्दावर शख्स‌ियत, बेदाग छवि। लंबा प्रशासनिक अनुभव

कमजोरी: बिहार के बाहर उनकी पार्टी जदयू का आधार नहीं

मौका: राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभरने और विपक्ष का चेहरा बनने का अवसर

आशंका: राष्ट्रीय मंच पर पदार्पण से बिहार भी हाथ से न जाता रहे

 अपनी धुन के पक्के, सिद्धांतों पर अडिग और बेदाग छवि वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा अलग दिखने का जोखिम उठाते रहे हैं। हाल में उन्होंने एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद पर ही नहीं, सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी पर उन्हीं नरेन्द्र मोदी का समर्थन करके सबको हैरानी में डाल दिया, जिनका उन्हें सबसे तगड़ा विरोधी माना जाता रहा है। यही नहीं, अपनी गठबंधन सरकार में बड़े घटक राजद (80 सीटें जबकि जदयू की 71 सीटें) के नेता लालू प्रसाद और उनके परिवार के खिलाफ सीबीआइ के छापों पर चुप्पी साध ली, जबकि लालू के साथ बाकी विपक्ष इसे राजनैतिक बदले की कार्रवाई मान रहा है।

नीतीश के यही तेवर उन्हें विपक्ष के बाकी किरदारों से एकदम अलग जमीन पर ला खड़ा करते हैं। आखिर मोदी के हाथ में भाजपा नेतृत्व आने के साथ ही उन्होंने एनडीए से नाता तोड़ा था और बाद में विपक्षी एकता की पहल की और महागठबंधन बनाकर मोदी को चुनौती दी थी। तो, उनके मौजूदा तेवर क्या कहते हैं? जदयू महासचिव के.सी. त्यागी कहते हैं, ''राष्ट्रपति चुनावों के बाद हम वहीं हैं जहां थे।’’ वे यह भी इशारा करते हैं कि अपनी बेदाग और निर्विवाद छवि के सहारे नीतीश विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे दमदार शख्स‌ियत हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं, ''हकीकत तो यही है कि हम जनाधार के मामले में बिहार तक सीमित हैं इसलिए छोटे किरदार ही हैं।’’

एक पेंच यह भी है कि लालू के परिवार खासकर उनके बेटे तथा उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी के खिलाफ बेनामी संपत्त‌ि के मामले में सीबीआइ की एफआइआर पर नीतीश क्या फैसला लेते हैं। लालू की पार्टी राजद ने साफ कर दिया है कि तेजस्वी इस्तीफा नहीं देंगे, जबकि जदयू की बैठक में इस बारे में फैसला नीतीश पर छोड़ दिया गया है। सवाल यह है कि अगर इससे गठबंधन पर आंच आती है तो नीतीश का अगला कदम क्या होता है?

खैर, नीतीश के रवैए का कुछ अंदाजा उनके इतिहास से भी मिलता है। नब्बे के दशक में लालू से टूट कर समता पार्टी बनाने में जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव का नेतृत्व केंद्र में भले रहा हो पर उसकी धुरी नीतीश कुमार ही बने थे। उन्होंने ही बिहार में मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद पहचान की राजनीति की उस धारा का रुख मोड़ने का नेतृत्व किया था, जिसकी अगुआई लालू प्रसाद यादव कर रहे थे। इसी राजनीति को मजबूत करने के लिए उन्होंने बाद में अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के साथ पसमांदा मुसलमानों का भी एक वर्ग तैयार किया। फिर, 2014 के लोकसभा चुनावों में सफाए के बाद नए गठबंधन का जज्बा पैदा हुआ। सीधा-सा गणित यह था कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को मिले कुल 31 प्रतिशत या हिंदी प्रदेश में 40 प्रतिशत से कुछ ऊपर वोट को बाकी पार्टियों की एकजुटता से चुनौती दी जा सकती है। लेकिन तीन साल बाद यह गणित भी गड़बड़ाने लगा है और बिहार के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने नीतीश शायद एक बार फिर भीड़ में अकेले दिखने लगे हैं।

यह कहना तो नाइंसाफी होगी कि महज चुनावी गणित साधने के लिए ही महागठबंधन का विचार आगे आया। मोदी के नेतृत्व में अलग किस्म की भाजपा के उभार से पुराने समाजवादी और लोकदलीय कुनबे को समेटने का एहसास गहराया तो नीतीश और लालू एक साथ आए। इसे व्यापक आधार देने के लिए पहले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, एच.डी. देवेगौड़ा की जेडी (एस) और ओमप्रकाश चौटाला के इनेलोद की बैठक भी हुई। कांग्रेस को भी साथ लेने का फैसला किया गया।

बहरहाल, जमीनी राजनीति में राजनैतिक अहमियत और अहंकारों तथा कई तरह के दबाव भी बहुत सारी चीजें तय करने लगते हैं। इन तीन साल में यही हुआ और एका या गठबंधन की सोच किनारे होती गई। बिहार में महागठबंधन की विजय से बना जज्बा भी कम होने लगा। शायद व्यावहारिक राजनीति, अपनी अलग छवि के प्रति संवेदनशीलता और कुछ लोगों के मुताबिक अहंकार ने भी नीतीश को अलग राह पकड़ने की ओर प्रेरित किया।

लेकिन यह भी सही है कि महज बिहार सरकार को बचाना ही नीतीश की अगली बाजी का एकमात्र लक्ष्य नहीं हो सकता (अगर राजद किसी वजह से अलग होता है तो 320 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए के 54 विधायकों से सरकार बच सकती है)। जाहिर है, राजनीति की अगली ऊंचाई पर भी नीतीश की नजर होगी इसलिए वे अभी भी विपक्ष के खेमे से 2019 में मोदी को चुनौती देने वाले एक बड़े दावेदार हो सकते हैं।

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