आउटलुक 5 जून 2017 MAY 22 , 2017 अजीत सिंह

वादों की जवाबदेही की बारी

नरेन्द्र मोदी
Photography by- ज‌ितेंद्र गुप्ता

अजीत सिंह
अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बूते गरीबों के दिलों पर सियासी फतेह का हाईवे बनाने में सफल दिख रहे प्रधानमंत्री के लिए बेरोजगारों की बढ़ती फौज और किसानों की घटती आय बड़ी चुनौती

''शहरों में करीब दो करोड़ से ज्यादा परिवारों के लिए घर बनाने हैं। अगर ये घर नहीं बने तो जवाब मुझसे मांगा जाएगा।... लेकिन कोई कुछ कह देगा इस डर से हम काम करना छोड़ दें तो देश का भला नहीं होगा। इसलिए हमारा दायित्व है कि हमारे गरीब परिवारों को घर मिले।’’  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

(25 जून, 2015 को हाउसिंग फॉर ऑल और स्मार्ट सिटी मिशन लॉन्च करते हुए)

जिस जवाब के मांगे जाने की बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दो साल पहले दिल्ली के विज्ञान भवन में कर रहे थे, वह समय आ गया है। मोदी सरकार तीन साल पूरे कर रही है। संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकने से लेकर अमरकंटक में नर्मदा आरती तक, ये तीन साल एक के बाद एक आयोजनों में गुजरे हैं। बिना थके, बिना रुके प्रधानमंत्री मोदी ने इन तीन वर्षों में वह सब कुछ किया, जो प्रचंड बहुमत और मजबूत नेतृत्व वाली सरकार ही कर सकती है। एक झटके में देश की 86 फीसदी मुद्रा को अवैध घोषित कर दिया, अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देने पाकिस्तान चले गए और फिर सर्जिकल स्ट्राइक भी करा दी।

2014 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों को चारों खाने चित करने के बाद ब्रांड मोदी की मदद से भाजपा उत्तर-पूर्व से लेकर सुदूर दक्षिण तक अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है। यूपी की शानदार जीत इसमें चार चांद लगाती है तो दिल्ली, बिहार और पंजाब जैसी कुछ नाकामियां भी हैं जो साबित करती हैं कि नरेन्द्र मोदी को मात दी जा सकती है। लगभग बिखरे हुए और निस्तेज विपक्ष ने उन्हें अपना आभामंडल बढ़ाने का भरपूर मौका दिया और अवसरों को भुनाना नरेन्द्र मोदी बखूबी जानते हैं। इसलिए बिना एक क्षण गंवाए उनकी नजर अब 2019 पर है। केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए इस बार वे अपने गरीब हितैषी अवतार पर दांव लगाएंगे। भुवनेश्वर में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वे इसका संकेत भी दे चुके हैं। लेकिन इस बीच, 2014 में किए उनके वादों का जवाब भी मांगा जाएगा। हालांकि, कुछ वादों को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चुनावी जुमला करार दे चुके हैं, फिर भी जवाबदेही तो बनती है।

हर साल दो करोड़ नौकरियां

जिस वक्त मोदी सरकार अपने तीन साल के जश्न की तैयारियों में जुटी है, ठीक उसी वक्त देश की नामी आईटी कंपनियों में लाखों लोगों की छंटनी की तैयारी हो चुकी है। एग्जीक्‍यूटिव सर्च फर्म हेड हंटर्स की मानें तो भारतीय आईटी क्षेत्र में अगले तीन साल तक हर साल करीब दो लाख इंजीनियरों की छंटनी होगी। खबर यह भी है कि देश की प्रमुख आईटी कंपनियां करीब 56 हजार इंजीनियरों को उनके प्रदर्शन के आधार पर नौकरी से निकालने का मन बना चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप के राज में अमेरिकी वीजा नियमों की सख्ती ने आउटसोर्सिंग से जुड़ी नौकरियों को खतरे में डाल दिया है। अब ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस जैसे अन्य देशों पर भी आउटसोर्सिंग में कटौती और संरक्षणवादी नीतियों को बढ़ावा देने का दबाव है।

उद्योगों में रोबोटिक्‍स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीक पुराने लोगों को बेकार कर रही हैं। हर साल करीब 10 लाख इंजीनियर पैदा करने वाले देश के लिए यह वाकई बहुत बड़ी चुनौती है। उद्योग जगत पहले ही मानता है कि भारत में कॉलेजों से निकलने वाले 90 फीसदी इंजीनियर उनके काम के नहीं हैं। क्रेडिट रेटिंग फर्म क्रिसिल की साल 2014 की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2011-12 से 2018-19 के बीच भारत में गैर-कृषि क्षेत्र की 3.8 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी जबकि 2004-05 से 2011-12 के दौरान इस तरह की 5.2 करोड़ नौकरियां पैदा हुई थीं। 

खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान आठ प्रमुख गैर-कृषि क्षेत्रों में सिर्फ 1.35 लाख नई नौकरियां आईं, जो 2008 के बाद सबसे कम हैं। साल 2009 में तो इन क्षेत्रों में 12.5 लाख नौकरियां आई थीं। इन आंकड़ों से देश में नौकरियों के सूखे को समझा जा सकता है। जबकि इस दौरान 'मेक इन इंडिया’, 'स्किल इंडिया’ और 'स्टार्ट-अप इंडिया’ जैसी सरकारी योजनाओं की धूम मची रही।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा सवाल उठाते हैं कि हर साल दो करोड़ नौकरियां देने के वादे का क्या हुआ? उनका कहना है कि भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नाकामियों का जश्न मना रही है। रोजगार के मोर्चे पर हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं। आईटी कंपनियों की संस्था नैसकॉम ने अगले तीन साल में 20-25 फीसदी नौकरियों के खत्म होने की आशंका जताई है। नौकरियों पर संकट गहराया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बनकर उभर सकता है। क्योंकि आईटी क्षेत्र में छंटनी का असर अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।

एचसीएल के पूर्व सीईओ और संपर्क फाउंडेशन के अध्यक्ष विनीत नायर मानते हैं कि भारत का आउटसोर्सिंग उद्योग एक संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसकी सबसे ज्यादा मार मौजूदा और भावी कर्मचारियों पर पड़ेगी। नौकरियां घटती जा रही हैं और स्टार्ट-अप मृगतृष्णा साबित हुए हैं। रही-सही कसर रोबोटिक्स और ऑटोमेशन ने पूरी कर दी। युवा इंजीनियरों के लिए यह मुश्किल वक्त है।

2022 तक हर सिर पर छत

चुनावी घोषणा-पत्र में भाजपा ने 2022 तक देश के हरेक परिवार के पास पक्का मकान हो, यह सुनिश्चित कराने का वादा किया था। वर्ष 2012 में केंद्र सरकार की एक समिति ने अनुमान लगाया था कि शहरी इलाकों में करीब एक करोड़ 87 लाख मकानों की कमी है। 'हाउसिंग फॉर ऑल’ का वादा पूरा करने के लिए शहरी क्षेत्रों में करीब दो करोड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में तीन करोड़ मकानों की जरूरत है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत एक मई 2017 तक 18.76 लाख मकानों के निर्माण की मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें करीब एक लाख मकानों का निर्माण ही पूरा हो सका है। 2022 तक दो करोड़ मकानों के लक्ष्य को देखते हुए यह धीमी प्रगति है।

प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत पिछले दो वर्षों में कुल 75 लाख मकानों को मंजूरी मिल चुकी है, जिसमें अभी तक केवल 7,858 मकानों का निर्माण पूरा हुआ है। हालांकि, ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि 2016-17 में कई साल से अटके पड़े इंदिरा आवास योजना के 32 लाख मकानों का निर्माण पूरा कराया गया है। लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के खाते में सिर्फ 7,858 मकान ही बने हैं, जबकि 2019 तक 1.35 करोड़ मकान बनने हैं। इस मोर्चे पर मोदी सरकार को काफी तेजी दिखानी पड़ेगी। हालांकि, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधिकारी बड़ी चतुराई से इंदिरा आवास योजना के 32 लाख मकानों को जोडक़र स्थिति को बेहतर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू का दावा कि शहरी गरीबों के आवास के लिए जितना काम यूपीए सरकार ने 10 वर्षों में किया था, उससे ज्यादा काम मोदी सरकार ने तीन साल में कर दिखाया है। अगर 2019 तक शहरी क्षेत्रों में 18.76 लाख और ग्रामीण क्षेत्रों में 75 लाख मकानों का निर्माण पूरा हो जाता है तो इससे कम-से-कम पांच करोड़ लोग सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

अर्थशास्त्री अमिताभ कुंडू कहते हैं कि आवास के मामले में मोदी सरकार भी यूपीए की परिपाटी पर ही चल रही है, हालांकि पुरानी योजनाओं में सुधार किए गए हैं। मिसाल के तौर पर, 2017 में घर बनाने के लिए मध्यम आय वर्ग के परिवारों को नौ लाख रुपए तक के कर्ज पर ब्याज में चार प्रतिशत और 12 लाख रुपए तक के कर्ज पर ब्याज में तीन प्रतिशत की छूट दी जाएगी। आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के लिए छह लाख रुपये तक के कर्ज पर 6.5 फीसदी ब्याज छूट का प्रावधान है। पहले इस छूट का दायरा बहुत सीमित था। लेकिन अब इसमें सालाना 18 लाख रुपये तक कमाने वाले परिवार जुड़ गए हैं। इसका फायदा एक बड़े मध्य वर्ग के साथ-साथ रियल एस्टेट सेक्टर को भी मिलेगा। नोटबंदी के बाद बैंकों की ब्याज दरें भी घटी हैं। ऐसे में होम लोन पर ब्याज छूट की योजना गेमचेंजर साबित हो सकती है।

कृषि उपज पर 50 फीसदी मुनाफा

भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों को उपज लागत पर 50 फीसदी मुनाफे का वादा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से प्रेरित था। लेकिन केंद्र की सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि लागत पर 50 फीसदी मुनाफा दिलाना कतई संभव नहीं है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कह चुकी है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को फिलहाल लागू नहीं कराया जा सकता है।

जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता केसी त्यागी कहते हैं कि ‘‘मोदी सरकार किसानों से किए वादे को पूरी तरह भूल चुकी है। 50 फीसदी मुनाफा तो दूर केंद्र सरकार ने राज्यों से फसलों पर मिलने वाला बोनस भी बंद करा दिया है। यह इस सरकार की किसान विरोधी सोच को दर्शाता है। लगातार दो साल सूखे की मार झेलने के बाद किसान को कुछ राहत की उम्मीद थी, लेकिन कर्ज माफी जैसे अहम मुद्दे राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं। जबकि 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों की खुदकुशी के मामले 42 फीसदी बढ़े हैं।’’

100 नई स्मार्ट सिटी

2014 से पहले जब भी मोदी के विकास मॉडल की बात आती तो इसमें चार चांद स्मार्ट सिटी के दावे ही लगाया करते थे। मोदी सरकार में पहले एक-दो वर्षों में इसकी खूब चर्चा रही। लेकिन तीन साल बीतते-बीतते 100 नई स्मार्ट सिटी बनाने के बजाय मामला 100 शहरों को स्मार्ट बनाने पर आ टिका है। किन शहरों को स्मार्ट बनाना है, इसकी पहचान का काम पिछले तीन साल में पूरा नहीं हो पाया है। शहरों के बीच प्रतियोगिता के जरिए 60 शहरों का चयन हुआ, जिनमें से 20 शहर में ही प्रोजेक्ट के साथ आगे आए हैं। हालांकि, अटल मिशन के जरिए देश के 500 शहरों कें बुनियादी ढांचे में सुधार किया जा रहा है, लेकिन नई स्मार्ट सिटी बनाने का दावा गुम है। शहरी नियोजन के विशेषज्ञ शाश्वत बंदोपाध्याय का कहना है कि ‘‘यूपीए सरकार ने जेएनएनयूआरएम के जरिए अरबन ट्रांसपोर्ट, इंफ्रास्ट्रक्चर में जो सुधार किए थे, वे भी बीच में छोड़ दिए गए हैं। साल भर तो यह समझने में ही निकल गया कि स्मार्ट सिटी की परिभाषा क्या होनी चाहिए और इस मिशन में किस तरह के प्रोजेक्ट्स को शामिल किया जाए।’’

स्मार्ट सिटी मिशन में शहरों के चयन को लेकर भी काफी जद्दोजहद रही है। सबसे पहले 100 शहरों की पहचान की गई, जिनके बीच प्रतियोगिता कराई गई। लगभग एक साल बाद 20 शहरों का ऐलान हुआ, जिन्हें स्मार्ट बनाया जाना था। लेकिन पहली सूची को लेकर विवाद खड़ा हो गया तो सरकार को एक और प्रतियोगिता करानी पड़ी, जिसमें 27 शहरों को चुना गया। इसके बाद 13 अन्य शहरों का चयन हुआ। इस तरह स्मार्ट सिटी के तीन साल चयन में गुजर गए।  

बुलेट ट्रेन का इंतजार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अच्छे दिनों का वादा बुलेट ट्रेन के जरिए ही रफ्तार पकड़ने वाला था। सुरेश प्रभु को रेल मंत्रालय का जिम्मा सौंपने के बाद रेलवे में सुधार के कई बड़े दावे किए गए। ट्विटर पर सुनवाई, स्टेशनों पर साफ-सफाई और टिकट बुकिंग व्यवस्था में सुधार दिखा है, लेकिन बुलेट ट्रेन अभी दूर की कौड़ी है। तीन साल गुजरने के बावजूद मुंबई-दिल्ली बुलेट ट्रेन की परियोजना गति नहीं पकड़ पाई। जबकि 2015 के मुकाबले 2016 में रेल के पटरी से उतरने के मामले 70 फीसदी बढ़ गए। जाहिर है, रेलवे का जर्जर ढांचा हाईस्पीड का बोझ वहन करने की स्थिति में नहीं है। इसके लिए भारी निवेश करना होगा। बुलेट ट्रेन के लिए 2023 तक इंतजार करना पड़ेगा। इस पर होने वाले करीब 97 हजार करोड़ रुपये के खर्च को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, जापान ने बुलेट ट्रेन के लिए भारत को 79 हजार करोड़ रुपये की वित्तीय मदद की पेशकश की है। लेकिन इस तरह की मदद की कीमत भी चुकानी पड़ती है।

 

गंगा अब भी मैली

भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में गंगा की निर्मलता को काफी महत्व दिया था। मोदी सरकार ने आते ही सबसे पहले गंगा की सफाई पर ध्यान दिया और बहुत जोर-शोर से 'नमामि गंगे’ अभियान की शुरुआत की थी। लेकिन पिछले तीन वर्षों का बड़ा हिस्सा गंगा की निर्मलता और अविरलता पर विचार मंथन करते हुए बीता है। दोआब पर्यावरण समिति के अध्यक्ष डॉ. चंद्रबीर सिंह का कहना है कि ‘आज भी गंदे नाले गंगा में गिर रहे हैं, फिर गंगा निर्मल कैसे होगी?’

कुल 20 हजार करोड़ रुपये के 'नमामि गंगे’ अभियान के तहत पिछले 20 मार्च तक करीब 11 हजार करोड़ रुपये के 145 प्रोजेक्ट मंजूर हो चुके हैं। इनमें से केवल 13 प्रोजेक्ट पूरे हुए हैं। जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार, ‘‘पिछले तीन साल में गंगा की सफाई पर एक हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है। लेकिन, इसका असर दिखना बाकी है।’’

गंगा सफाई के मामले में केंद्र सरकार की दो अहम योजनाएं तो एक-दूसरे के विपरीत काम कर रही हैं। ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के तहत गंगा किनारे के इलाकों में करीब 15 लाख शौचालय बनवाने की योजना है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के आकलन के मुताबिक, ‘समुचित मल प्रबंधन के अभाव में गंगा किनारे शौचालयों से रोजाना निकलने वाला 18 करोड़ लीटर मल-मूत्र आखिरकार गंगा में गिरेगा। छोटे-बड़े 138 नाले पहले ही गंगा नदी में रोजाना करीब 608 करोड़ लीटर गंदा पानी पहुंचा रहे हैं। ऐसे में गंगा सफाई की चुनौती बढ़ती ही जाएगी।’

'56 इंच पर सवाल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तीन साल के जश्न पर सवाल उठाते हुए ट्वीट करते हैं, ''आज नौजवान नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, किसान खुदकुशी कर रहे हैं और सरहद पर जवान मर रहे हैं। सरकार किस बात का जश्न मना रही है?’’ हर खाते में 15 लाख रुपये पहुंचाने जैसे जुमलों को नजरअंदाज भी कर दें तो मोदी सरकार ने पिछले तीन साल में जितना काम किया है, उससे ज्यादा अगले दो साल में कर दिखाने की चुनौती है क्योंकि कई अहम कार्यक्रम अभी प्लानिंग के स्तर पर हैं, इनका जमीन पर उतरना और असर दिखाई देना बाकी है।

हालांकि, इन तीन वर्षों में विमुद्रीकरण जैसे साहसिक कदम मोदी सरकार के खाते में हैं। लेकिन कश्मीर में बढ़ता उपद्रव और नियंत्रण रेखा पर बढ़ता तनाव सरकार की चुनौतियां बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के नेशनल मीडिया पैनलिस्ट जयवीर शेरगिल कहते हैं कि ‘‘2014 से अब तक भारत के 572 जवान शहीद हो चुके हैं। तीन बार पाकिस्तानी सुरक्षा बल हमारे जवानों के शवों को क्षत-विक्षत कर चुके हैं। कहां है मजबूत सरकार और देश को नहीं झुकने देने के दावे?’’  

कालाधन और टैक्स आतंकवाद

यूपीए सरकार पर टैक्स टेररिज्म फैलाने का आरोप लगाते हुए भाजपा ने जीएसटी लागू करने का दावा किया था। जीएसटी के मामले में मोदी सरकार काफी हद तक इस वादे पर खरी उतरी है। विभिन्न राज्यों और राजनैतिक दलों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं था। फिर भी जीएसटी की अधिकांश बाधाएं पार कर मोदी सरकार एक जुलाई से इसे लागू करने जा रही है। यह एक ऐतिहासिक कदम है। इससे कारोबार की राह आसान होगी और देश की जीडीपी में दो फीसदी की बढ़त दर्ज हो सकती है। विदेशों में छिपा काला धन वापस लाने के मामले में इन तीन वर्षों में कोई बड़ी कामयाबी तो नहीं मिली। मगर इस दौरान विजय माल्या बैंकों का हजारों करोड़ डुबाकर विदेश भागने में सफल जरूर रहा। इससे मोदी सरकार की काफी किरकिरी हुई। विदेश में छिपे काले धन के बजाय अब सरकार का जोर देश में छिपे काले धन पर है। तभी नोटबंदी जैसा कदम उठाया गया। आयकर विभाग का कहना है कि ‘‘नोटबंदी के बाद करीब 23 हजार करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला है और 91 लाख नए करदाता सामने आए हैं।’’

इससे भी बड़ी बात यह है कि कई दिनों तक कतारों में खड़ी रही जनता ने मोदी सरकार के साहस और निर्णय क्षमता पर अपने विश्वास की मुहर लगाई है। तीन साल शासन करने के बाद किसी सरकार की इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी। अगले दो साल मोदी सरकार को यही भरोसा कायम रखना है।

जश्न की तैयारी

-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 26 मई को असम के गुवाहाटी से करेंगे जश्न का आगाज

-भाजपा 26 मई से 15 जून तक मनाएगी मोदी सरकार के तीन साल का उत्सव

-पीएम मोदी 26 हजार लोगों को भेजेंगे पत्र

- देश के 900 शहरों में कार्यक्रम आयोजित होंगे। 500 शहरों में 'सबका साथ सबका विकास’ कार्यक्रम, 125 जगह होंगे मोदीफेस्ट

-उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं के लाभार्थियों के साथ किसी गांव में एक दिन गुजारेंगे केंद्र सरकार के मंत्री

-कैबिनेट मंत्री 27-28 मई को देश भर में मीडिया ब्रीफिंग करेंगे

-यूपीए के 10 साल की तुलना मोदी सरकार के तीन साल से करते हुए प्रचार किया जाएगा

-26 मई को देश के 400 अखबारों के पहले पेज पर विज्ञापन, करोड़ों एसएमएस

कारगर कदम

-नोटबंदी के बाद 91 लाख नए करदाता सामने आए, 23 हजार करोड़ की अघोषित आय पकड़ी

-सस्ते एलईडी बल्ब की योजना

-सरकारी कर्मचारियों की बायोमैट्रिक्स उपस्थिति

-बीपीएल परिवारों को रसोई गैस की उज्ज्वला योजना, 2.21 करोड़ एलपीजी कनेक्‍शन जारी

-जनधन स्कीम के तहत 28 करोड़ से ज्यादा खाते, जिनमें 64 हजार करोड़ रुपये से अधिक जमा

-छोटे व्यापारियों को मुद्रा लोन

-जीएसटी पर विभिन्न पक्षों के बीच सहमति बनाना, संबंधित विधेयक संसद से पारित कराना

-हाईवे निर्माण की रफ्तार बढ़ाना

-गैस सब्सिडी छोड़ने की मुहिम

 

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या
एपल स्टोर से

Copyright © 2016 by Outlook Hindi.