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कितनी जान फूंक पाएगा एजेंडा राहुल

संगठन में भारी फेरबदल के जरिए 'युवा खून’ प्रवाहित करने की कोशिश क्या राहुल के अध्यक्ष बनाए जाने की पूर्व-पीठिका है?
सोन‌ि‌या गांधी के चर्चा करते राहुल गांधी

रम्या की चमक से सोशल मीडिया कांग्रेस के लिए कितनी लहलहाएगी, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी अपनी पस्तहाल नसों में 'युवा खून’ का प्रवाह करने की राह पर चल पड़ी है। यह बेशक उपाध्यक्ष राहुल गांधी की आखिरकार पार्टी की कमान पूरी तरह अपने हाथ में लेने की कवायद मानी जा रही है। उन्हें शिकायत जो रही है कि उनके मन की टीम न मिलने से कांग्रेस में नई जान नहीं आ रही है। सो, संगठन के ऊपरी हलकों में बड़े पैमाने पर बदलाव अक्टूबर में संभावित अखिल भारतीय कांग्रेस के चुनावों की पूर्व-पीठिका मानी जा रही है, जब पार्टी की कमान पूरी तरह बतौर अध्यक्ष राहुल के हाथ आ सकती है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''कांग्रेस कार्यकर्ताओं की यह सर्वसम्मत मांग है कि राहुल गांधी को अध्यक्ष बनना चाहिए।’’

राजनैतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कहीं पुराने और वरिष्ठ नेताओं की ओर से विरोध न झेलना पड़े, इसलिए सोनिया खुद राहुल की पसंद की टीम का गठन कर रही हैं। मौजूदा सांगठनिक फेरबदल में सबसे बड़ी खबर तो एक वक्त राहुल के 'राजनैतिक गुरु’ कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह का लगभग राजनैतिक वनवास है। लेकिन सुर्खियों में तो छाईं पूर्व सांसद, खूबसूरत कन्नड़ अभिनेत्री रम्या। उन्हें दीपेंद्र हुड्डा की जगह पार्टी की सोशल मीडिया टीम की कमान थमाया है। रम्या के ट्विटर पर 4,83,000 से ज्यादा फालोवर है। वे तीखे बयानों से भी चर्चा में रहती हैं।

नए चेहरों के लिए पुराने नेताओं को किनारे करने की मिसाल एक मायने में दिग्विजय सिंह बने। मजेदार यह है कि दिग्विजय सिंह ही लंबे वक्त से पार्टी में बदलाव की मांग कर रहे थे। उन्हें गोवा और कर्नाटक के प्रभारी महासचिव पद से हटा दिया गया है। गोवा में कांग्रेस की सबसे ज्यादा सीटें लाकर भी सरकार न बना पाने की गाज उन पर गिर गई। अब गोवा का प्रभार तमिलनाडु में विधायक रहे ए.चेल्लाकुमार को दिया गया है। हालांकि उन्हें महासचिव का दर्जा नहीं दिया गया है। उनके साथ महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे अमित देशमुख को लगाया गया है।

फिलहाल कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने हैं, वहां का प्रभार भी राहुल गांधी के करीबी लोकसभा सांसद के.सी. वेणुगोपाल को दिया गया है। उनके साथ चार सचिवों को भेजा गया है। गौरतलब है कि कर्नाटक में पार्टी में काफी गुटबाजी है। इसके लिए पार्टी ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के साथ-साथ दिग्विजय सिंह को भी दोषी माना है। वहां कांग्रेस सरकार को एंटी इनकंबेंसी झेलनी पड़ सकती है। फिर, भाजपा वहां जोड़-तोड़ में लगी है। पिछले दिनों भाजपा ने कांग्रेस में वोक्कालिगा समुदाय के बड़े नेता, पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है। इसलिए कांग्रेस वहां एच.डी. देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस से गठबंधन करना चाहती है, लेकिन दोनों पार्टियों के बीच सीटों का तालमेल होना बड़ी चुनौती है। जल्द ही वहां का प्रदेश अध्यक्ष भी बदला जा सकता है।

 राजस्थान में सचिन पायलट को फ्री हैंड देने के लिए, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को गुजरात का प्रभारी बनाया गया है। अविनाश पांडे को महासचिव बनाकर राजस्थान का नया प्रभारी बनाया गया है। उनके साथ राहुल टीम के चार युवा नेताओं विवेक बंसल, काजी मोहम्मद निजामुद्दीन, देवेंद्र यादव और तरुण कुमार को सचिव बनाकर लगाया गया है। पायलट कहते हैं, ''राहुल जी युवा लोगों की जो टीम बना रहे हैं, उसका फायदा पार्टी को जरूर मिलेगा।’’

गुजरात में गुरुदास कामत की जगह महासचिव बनाए गए अशोक गहलोत के साथ युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और एमपी राजीव साटव, पूर्व विधायक हर्षवर्धन सपाल, एमएलए वर्षा गायकवाड़ और जीतू पटवारी को सचिव बनाया गया है।

मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय के बीच तालमेल बैठाना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। कमलनाथ लगातार दबाव बना रहे हैं कि उन्हें मध्यप्रदेश का अध्यक्ष बनाया जाए। पार्टी इस बार उन पर दांव खेल सकती। एक हलके में यह भी माना जाता है कि कमलनाथ ही दिग्विजय सिंह के साथ-साथ कांतिलाल भूरिया, अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह और सुरेश पचौरी जैसे नेताओं के साथ तालमेल बैठा सकते हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का यह भी कहना है कि आपसी खींचतान से बचने के लिए कमलनाथ ही बेहतर विकल्प हैं।

राहुल गांधी के करीबी सिंधिया को संतुष्ट करने के उपाय भी तलाशे जा रहे हैं। कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे हाल ही में लोकसभा की लोकलेखा समिति का चेयरमैन बनाए गए हैं। चेयरमैन को कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा होता है। इसलिए चर्चा है कि खड़गे की जगह लोकसभा में नेता का पद सिंधिया को दिया जाएगा, लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि अभी उनका कद उतना बड़ा नहीं है।

पार्टी में कुछ लोगों का यह भी कहना है कि राहुल गांधी को खुद नेता प्रतिपक्ष बनना चाहिए और सिंधिया को डिप्टी बनाना चाहिए। इसमें पेंच यह है कि अगर राहुल को पार्टी अध्यक्ष बनना है तो वे दो पद संभालेंगे जबकि राहुल एक व्यक्ति एक पद के हिमायती हैं।

इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में बदलाव किए जाने की चर्चा है। अंबिका सोनी इस वक्त उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की प्रभारी महासचिव हैं। राहुल गांधी हिमाचल में प्रभारी के साथ-साथ मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को भी बदलना चाहते हैं, क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

ओडिशा में भी चुनाव के मद्देनजर प्रभारी महासचिव बी.के. हरिप्रसाद के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष को भी बदला जा सकता है। कांग्रेस सचिव एस.के. रमणी कहते हैं, ''हमें ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की जरूरत है जो लोगों को पार्टी की नीतियों और कामों के बारे में बताएं और यह नौजवान ही कर सकते हैं।’’

सोशल मीडिया की जिम्मेदारी से हटाए गए दीपेंद्र हुड्डा और उनकी टीम की नाखुशी मिटाने के लिए उन्हें नई जिम्मेदारी देने की चर्चा भी है। पार्टी में महाराष्ट्र के प्रभारी मोहन प्रकाश के बदलने की भी चर्चा है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एआईसीसी के मीडिया प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला दोनों हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे लेकिन राहुल किसी गैर-जाट को अध्यक्ष बनाने के हक में हैं। मध्यप्रदेश से सांसद, वकील विवेक तन्खा को कांग्रेस की लीगल और ह्यूमन राइट्स डिपार्टमेंट का चेयरमैन भी बनाया गया है।

यानी राहुल गांधी कुछ ऐसे मूड में हैं कि पूरे घर के बदल डालूंगा। लेकिन दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में लंबे वक्त से तैनात एक कार्यकर्ता का कहना है, ''सिर्फ प्रभारियों के नाम बदलने से कुछ नहीं होगा। अगर कांग्रेस नतीजा चाहती है तो उसे अपने प्रभारियों का वर्किंग कल्चर बदलना होगा।’’ राहुल अगर यह कार्य संस्कृति बदल पाएं तभी शायद कांग्रेस में नई जान लौटेगी।

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