जूता या सिनेमा हॉल या पेस्ट्री

आलोक पुराणिक
नरम-गरम
नरम-गरम

आलोक पुराणिक
कुल मिलाकर लिबर्टी की कोई कमी नहीं है। पेस्ट्री से लेकर जूतों तक, जूतों से लेकर राजनेताओं के आचरण तक यह बिखरी पड़ी है

लिबर्टी यानी स्वतंत्रता, मुक्ति विषय पर चालू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त निबंध।

लिबर्टी क्या है। यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। लिबर्टी दिल्ली में एक सिनेमाहॉल का नाम है। ये पुराना सिनेमाहॉल है, नए सिनेमाहॉलों के सामने यह बहुत पुराना लगता है। नई चाल के सिनेमाहॉल बहुत फूं-फां टाइप होते हैं। नई चाल के सिनेमाहॉलों ने पुरानी चाल के सिनेमाहॉलों को परेशान कर रखा है। लिबर्टी पुराने वक्त का बड़ा ब्रांड रहा है सिनेमाहॉलों में। अब वैसी बात नहीं है। लिबर्टी की अब वैसी बात नहीं है। हां लिबर्टी नाम का जूता चकाचक चल रहा है।

जूता इस मुल्क में धुआंधार चलता है।

बल्कि कई बार लगता है कि जूता ही चलता है। कभी पब्लिक चलाती है नेताओं पर। कभी नेता चलाते हैं पब्लिक पर। जूता चांदी का भी होता है, जिसे साफ भाषा में रिश्वत कहा जाता है। इस जूते को चलने से तो कोई रोक ही नहीं सकता है। लिबर्टी नाम की पेस्ट्री भी कुछ इलाकों में पॉपुलर है। पेस्ट्री चिकनत्व से भरपूर होती है, इससे हेल्थ का सत्यानाश भी होता है। यानी चिकनी बातें आखिर में चौपट ही करती हैं। इस मुल्क के नेताओं की बातें भी ऐसी ही होती हैं। पेस्ट्री का कारोबार भी बढ़ रहा है, नेता भी बढ़ रहे हैं, चौपटीकरण भी बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि लिबर्टी अगर जूते का ब्रांड हो, तो चलता जाता है। लिबर्टी क्या है, इस सवाल को कई आयामों से देखा जा सकता है। लिबर्टी यानी आजादी इस मुल्क में तरह-तरह की आजादी है। बंदे को डेंगू से मरने की आजादी है, थोड़ा सब्र कर ले, तो डेंगू के बाद चिकनगुनिया भी हो सकता है। डेंगू से बच जाएं, तो चिकनगुनिया से मरने की स्वतंत्रता है। दिल्ली के एक अस्पताल में कुछ बच्चे इसलिए मर गए कि डिप्थीरिया का टीका उपलब्ध नहीं था। बिहार के बच्चों को इस सबके अलावा चमकी से मरने की स्वतंत्रता भी है। यानी तरह-तरह की स्वतंत्रताएं बिखरी पड़ी हुई हैं, जितना मन हो जिसका उतनी स्वतंत्रता ले सकता है। छोटे जेबकट आपकी जेब काट सकते हैं, आपको स्वतंत्रता है कि छोटे जेबकटों से अपनी जेब कटवा लें, वरना आम्रपाली बिल्डर जैसे बड़ेवाले आपकी जेब की सफाई कर सकते हैं। विख्यात क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी एक जमाने में बताया करते थे कि आम्रपाली बिल्डर के फ्लैट खरीदने चाहिए। धोनी की सलाह पर जेब कटे या किसी दूसरे की सलाह के बगैर जेब कटे। चॉइस है। तरह-तरह की चॉइस है। इस चॉइस को ही हम चुनने की स्वतंत्रता कह सकते हैं। इसे ही लिबर्टी कह सकते हैं।

जेब छोटे वाले से कटवाएं या बड़े वाले से, यह चुनने की स्वतंत्रता पब्लिक की है। उधर नेताओं की स्वतंत्रता है कि वह समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस से होते हुए भाजपा में आ जाएं या अगर दांव लग रहा हो, तो यात्रा उलटी भी कर सकते हैं। नेता पर अपार लिबर्टी है। जो कांग्रेस का प्रवक्ता हुआ करता था, अब शिवसेना की तरफ से विचार रख सकता है। जो समाजवादी पार्टी में हुआ करता था, अब वो भाजपा का प्रवक्ता हो सकता है। इसे लिबर्टी कहते हैं, इधर से उधर, उधर से इधर, किधर से किधर। हम बात सिर्फ गौरव भाटिया, कुलदीप सिंह सेंगर, प्रियंका चतुर्वेदी की नहीं कर रहे हैं।

इतनी लिबर्टी बिखरी पड़ी है मुल्क में कि यह एकदम परम आजाद टाइप का देश लगता है। आजाद कथाएं बहुत पहले इस नाम की एक पत्रिका निकलती थी, जिनमें अश्लील टाइप की कथाएं छपती थीं। हर साल बुखार से बच्चे मर जाएं, उस परम पावरफुल मुल्क में जहां आजादी के सत्तर साल से ज्यादा गुजर गएं हैं। इससे ज्यादा अश्लील कुछ नहीं हो सकता।

कुल मिलाकर लिबर्टी की कोई कमी नहीं है। पेस्ट्री से लेकर जूतों तक, जूतों से लेकर राजनेताओं के आचरण तक यह बिखरी पड़ी है। नेता को पूरी लिबर्टी है कि चमचे, चेले तो जनता के बीच से आए। पर पद के लिए नेता सिर्फ अपने कुनबे से आएं। देश इस तरह से, लिबर्टी के पथ पर फुलटू स्पीड से दौड़ रहा है। या कम से कम दौड़ता दिखता तो है। परम पावरफुल, विश्व गुरु भारत का मंगलयान ऊपर उड़ रहा है। चंद्रयान टू भी ऊपर उड़ रहा है, इन यानों को लिबर्टी है कि वह साल दर साल हर साल पानी में डूबते शहरों और उन्हें देखते हेलिकोप्टरित नेताओं के फोटो खींचे। अलबत्ता तमाम फिल्मी सितारों को भी लिबर्टी है वह तमाम आइटमों पर फिल्म बनाकर उसे टिकट खिड़की पर कैश करा लें। जैसे अक्षय कुमार को लिबर्टी है कि वह मंगल मिशन की फिल्म में काम करके देशभक्ति के पथ बहुत स्पीड से दौड़ते हुए दिखें। यह अलग बात है कि वह देशभक्ति की दौड़ में इतनी स्पीड से आगे निकल गए कि वह देश के नागरिक न रहे, केनेडा के नागरिक हो लिए। केनेडा का नागरिक भारतीय देशभक्ति से नोट पीट सकता है, यह भी तो एक तरह की लिबर्टी है।

तो कुल मिलाकर साबित यह होता है कि इस मुल्क में बहुत-बहुत मतलब बहुतै ज्यादा लिबर्टी है। जिसकी जितनी मरजी हो अपने लेवल की लिबर्टी खींच सकता है।

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