अनुच्छेद 370 था संघीय ढांचे की शर्त

फैजान मुस्तफा
संविधान में आस्था का सवालः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल के शपथ से पहले संविधान के आगे शीश नवाते हुए
संविधान में आस्था का सवालः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल के शपथ से पहले संविधान के आगे शीश नवाते हुए

फैजान मुस्तफा
जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष दर्जे के रहते ही एकरूपता का लक्ष्य करीब-करीब हासिल कर लिया गया था, नए ‌संशोधन पर कई तरह के सवाल

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन कर दिया है। ऐसा करके भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी वादे को पूरा कर दिया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने  संवैधानिक आदेश (जम्मू-कश्मीर) 2019 संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड (1) में प्रदत्त शक्तियों के आधार पर जारी किया है। यह आदेश अनुच्छेद 370 को निरस्त नहीं करता है। ऐसे में अनुच्छेद 370 को कायम रखकर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को वापस ले लिया गया है।

इस आदेश के आधार पर जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत अब राज्य का राज्यपाल कहलाएगा। साथ ही राज्य की सरकार के लिए कहा गया है कि राज्य का राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करेगा। इसके अलावा राष्ट्रपति के नए आदेश के बाद भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त सारे प्रावधान अब जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे। जहां तक धारा 35ए की बात है तो उसे 1954 में राष्ट्रपति के एक आदेश के जरिए अनुच्छेद 370 में जोड़ा गया था। मूल संविधान में उसका उल्लेख नहीं था। अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर विधानसभा को राज्य के स्थायी निवासी और उनके विशेष अधिकार तय करने का अधिकार देता है। सोमवार का राष्ट्रपति का आदेश अब संविधान के सभी प्रावधानों को राज्य में लागू करने का अधिकार देता है, जिसमें मूल अधिकार भी शामिल है। ऐसे में अब धारा 35ए के तहत मौजूद प्रावधान असंवैधानिक हो गए हैं। धारा 35ए का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई है कि 35ए को भारतीय संविधान में अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन के माध्यम से ही पेश किया जा सकता था, जबकि उसे अनुच्छेद 370 के तहत एक राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से पेश किया गया। हालांकि, सोमवार का राष्ट्रपति का आदेश भी अनुच्छेद 367 में संशोधन करता है। भले ही यह संशोधन की प्रक्रिया को बिना लागू किए जारी किया गया है।

इसी तरह जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल के तहत अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो नए केंद्रशासित प्रदेश बनेंगे। अभी तक केंद्रशासित प्रदेशों को राज्य बनने के तो उदाहरण समाने आए हैं लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई राज्य केंद्रशासित प्रदेश बनेगा। संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को यह अधिकार मिलता है कि वह सामान्य बहुमत से संविधान में संशोधन कर किसी भी राज्य की सीमाओं में बदलाव कर सकती है। साथ ही नया राज्य बना सकती है। लेकिन ऐसा करने से पहले राज्य की विधानसभा को यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के जरिए भेजना जरूरी होता है, जिससे उस राज्य का मत भी पता किया जा सके। अनुच्छेद 3 के तहत एक्सप्लनेशन-2 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह किसी राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तित कर सकता है। इन बदलावों से न केवल जम्मू-कश्मीर को मिलने वाला विशेष दर्जा खत्म हो गया है बल्कि उसका दर्जा अब दूसरे राज्यों की तुलना में भी कम हो गया है। अब भारत में 29 की जगह 28 राज्य होंगे और कश्मीर में गवर्नर की जगह दिल्ली और पुदुच्‍चेरी की तरह एक लेफ्टिनेंट गवर्नर होगा। इसके अलावा अब जम्मू-कश्मीर में कॉरपोरेट, कोई व्यक्ति जमीन खरीद सकेगा। साथ ही राज्य में गैर-कश्मीरियों को भी नौकरियां मिल सकेंगी। इस बदलाव से राज्य में जनसांख्यिकी बदलाव की प्रक्रिया भी शायद शुरू हो जाएगी, जिसका असर आने वाले दशक में दिखेगा।

जहां तक कश्मीर को अनुच्छेद 370 की वजह से मिले विशेष दर्जे की बात है, तो उसके लिए हमें उस दौर में जाना होगा, जब इस प्रावधान के जरिए कश्मीर का भारत में विलय हुआ था। दरअसल भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में ब्रिटिश भारत के तहत आने वाले क्षेत्रों को दो देशों के रूप में विभाजित करता है। इसी के तहत 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए। लेकिन उस समय 546 रियासतें, जो ब्रिटिश भारत के साथ समझौते के तहत अधीनता स्वीकार करती थीं, उनकी संप्रभुता 15 अगस्त 1947 के बाद बहाल हो गई। उस वक्त इन रियासतों को तीन विकल्प दिए गए थे। पहला यह कि वे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रह सकती हैं, दूसरे यह कि वे भारत में मिल जाएं और तीसरा विकल्प था कि वे पाकिस्तान के साथ मिल जाएं। धारा 6ए के अनुसार देश चुनने का तरीका रियासतों को विलय समझौते के तहत मिलेगा।

हालांकि विलय की शर्तें क्या होंगी, यह तय नहीं किया गया था। सेक्शन (2) राज्यों को यह अधिकार देता था कि राज्य विलय की शर्तें तय कर सकते थे। उसके आधार पर संसद को राज्य के लिए कानून बनाने का अधिकार होगा। साथ ही राज्य की विधायिका अपना अधिकार क्षेत्र भी तय कर सकती थी। कुल मिलाकर रियासतों का भारत या पाकिस्तान में विलय की शर्तें ठीक उसी तरह तय होनी थीं, जैसे दो देशों के बीच समझौते होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार दो राज्यों के बीच हुए समझौते का सम्मान होना चाहिए। यदि समझौते का उल्लंघन होता है तो कानून यही कहता है कि दोनों राज्य यथास्थिति में पहुंच जाएंगे।

कश्मीर के मामले में राजा हरि सिंह ने शुरू में स्वतंत्र रहने का फैसला किया था। इसके साथ उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल समझौता किया। इसका मतलब यह था कि उन्हें भारत या पाकिस्तान में विलय करने के लिए कुछ और समय मिल जाए। पाकिस्तान ने इस समझौते को स्वीकार करते हुए वहां डाक और टेलीग्राफ सेवा शुरू की। लेकिन जब कश्मीर पर अफरीदियों, स्थानीय जनजातियों और बिना वर्दी पहने पाकिस्तान की सेना ने आक्रमण कर दिया, उस वक्त हरि सिंह ने भारत से मदद के लिए दरवाजा खटखटाया। इस मौके पर हमने अपनी सेना उसी शर्त पर भेजने का फैसला किया, जब हरि सिंह कश्मीर का भारत में विलय करते। ऐसी परिस्थिति में 26 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला की सलाह पर विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। उस समय स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की तरफ से 27 अक्टूबर 1947 को समझौते को मंजूरी दी। विलय की शर्तों के तहत भारतीय संसद को यह अधिकार मिला कि वह जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए कानून बना सकती है। कश्मीर विलय के समझौते के नियम 5 के तहत हरि सिंह ने यह शर्त रखी थी कि मेरे द्वारा तय की गई शर्तों में भारत सरकार उस वक्त तक बदलाव नहीं कर सकती है, जब तक संशोधनों को मैं स्वयं स्वीकार नहीं करता हूं। यही नहीं, नियम 7 के तहत यह भी उल्लेख किया गया कि भविष्य में बनने वाले संविधान के जरिए कोई भी कानून समझौते की इस शर्त में रुकावट नहीं पैदा कर सकेगा।

भारत की नीति स्पष्ट रूप से कहती थी कि जब विलय पर किसी तरह का विवाद होगा तो उस पर निर्णय, केंद्र सरकार द्वारा किए गए एकतरफा फैसले से नहीं बल्कि राज्य के आम लोगों की इच्छा से होगा। विलय के समझौते को स्वीकार करते हुए लॉर्ड माउंटबेटेन ने साफ तौर पर कहा था कि जब कश्मीर में कानून की स्थिति और शांति बहाल हो जाएगी और आक्रमणकारी भगा दिए जाएंगे, तो विलय का फैसला आम लोगों की राय से होगा। ऐसे में स्पष्ट है कि भारत ने कश्मीर विलय को पूरी तरह से तात्कालिक और अस्थायी समझौते के रूप में सम्मान दिया था। कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला ने 17 मई 1949 को पंडित जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल और एन. गोपालस्वामी अायंगर की सलाह से लिखे पत्र में कहा था कि कई मौकों पर सरदार पटेल और मैंने कहा है कि भारत की कश्मीर को लेकर जो तय नीति है उसके आधार पर जम्मू और कश्मीर का संविधान राज्य की प्रतिनिधि वाली विधानसभा ही बनाएगी।

इस बीच हरि सिंह ने 30 अक्टूबर 1947 को नेशनल कान्‍फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला को 22 अधिकारियों वाली आपात परिषद का प्रमुख बना दिया। उसके बाद 5 मार्च 1948 को उन्हें अपना प्रधानमंत्री बनाया। उसी दिन हरि सिंह ने यह भी ऐलान किया कि राज्य का एक संविधान बनाया जाएगा, जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। विलय के समय जम्मू-कश्मीर सरकार ने मसौदे का जो ड्रॉफ्ट तैयार किया था, उस पर सहमति बनाने के लिए करीब 5 महीने तक बातचीत चलती रही। उसके बाद 27 मई 1949 को अनुच्छेद 306ए, जो अब 370 है, पारित हुआ। संविधान सभा में प्रस्ताव को पेश करते हुए एन.गोपालस्वामी आयंगर ने कहा था कि वैसे तो कश्मीर का विलय पूर्ण हो गया है लेकिन जब राज्य में परिस्थितियां सामान्य हो जाएंगी तो हम जनमत संग्रह का मौका देंगे। उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर जनमत संग्रह भारत के पक्ष में नहीं हुआ, तो हम कश्मीर को भारत से अलग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

उसके बाद 16 जून 1949 को शेख अब्दुल्ला और तीन सदस्य, भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में शामिल हुए। आयंगर ने 17 अक्टूबर 1949 को फिर दोहराया कि कश्मीर की विधायिका द्वारा तैयार किया गया अलग से संविधान और जनमत संग्रह हमारा वादा है। उसी दिन भारत की संविधान सभा ने अनुच्छेद 370 को भारत के संविधान में शामिल किया।

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान के 21वें भाग का पहला अनुच्छेद है। इस भाग का शीर्षक है ‘अस्थायी, परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’। ऐसे में अनुच्छेद 370 इस मामले में अस्थायी है। हालांकि वह इसलिए है क्योंकि कश्मीर की गठित संविधान सभा को अनुच्छेद 370 में बदलाव करने, खत्म करने और बनाए रखने का अधिकार था। इसके अलावा अनुच्छेद 370 के विषय में जो भी व्याख्या की जाती है, वह जनमत संग्रह तक अस्थायी है। इसके पहले दिल्ली हाइकोर्ट ने 2017 में कुमारी विजयलक्ष्मी की याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका में उन्होंने अनुच्छेद 370 को अस्थायी बताते हुए कहा था कि इसे बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अस्थायी शब्द के बावजूद अनुच्छेद 370 को अस्थायी नहीं माना था। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में संतोष कुमार मामले में भी ऐतिहासिक कारणों को मानते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया जाना स्वीकार किया था। इसके पहले 1969 में भी सुप्रीम कोर्ट ने संपत प्रकाश मामले में अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रवृत्ति वाला मानने से इनकार कर दिया था। उस वक्त 5 न्यायाधीशों वाली बेंच ने कहा था कि अनुच्छेद 370 कभी खत्म नहीं हुआ।

जम्मू-कश्मीर की तरह भारत के दूसरे राज्य भी हैं जिन्हें विशेष दर्जा मिला हुआ है। नगालैंड में भी संसद का कोई भी कानून उस वक्त तक लागू नहीं हो सकता जब तक उसकी विधानसभा उसकी सहमति नहीं देती है। यह अधिकार नगाओं की धार्मिक, सामाजिक प्रथाएं, पारपंरिक कानून और उसके पालन के साथ-साथ भूमि और उसके संसाधनों के स्वामित्व और उसके हस्तांतरण के लिए है। यही नहीं, दीवानी और फौजदारी मामले पर फैसले को लेकर भी उनके पास विशेष अधिकार हैं। इसके अलावा एक अहम बात यह है कि ट्येनसांग जिले में नगालैंड विधानसभा द्वारा पारित कानून भी सीधे लागू नहीं होता है। ट्येनसांग मामले को लेकर एक अलग से मंत्री होता है। यानी राज्य में ही कई ऐसे क्षेत्र और जिले हैं जिन्हें ज्यादा स्वायत्तता मिली हुई है। ज्यादा स्वायत्तता देने से संघीय ढांचा ज्यादा मजबूत होता है। इसके विपरीत केंद्रीकरण ज्यादा होने से पृथकतावादी ताकतों को बढ़ने का मौका मिलता है। नगालैंड की तरह ही असम, मणिपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, सिक्किम आदि राज्यों को भी विशेष दर्जा मिला हुआ है। सिक्किम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समझौते तक ही मुद्दे को सीमित रखा है। संघीय ढांचे को बनाए रखने के लिए हमारा संविधान अलग-अलग राज्यों को अलग-अलग तरह की स्वायत्तता प्रदान करता है।

अनुच्छेद 370 खुद ही अनुच्छेद एक का उल्लेख करते हुए जम्मू-कश्मीर को भारत का राज्य कहता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलजारी लाल नंदा ने कहा था कि अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान और कानून को कश्मीर में लागू करने का रास्ता है। जवाहरलाल नेहरू ने भी एक बार लोकसभा में कहा था कि अनुच्छेद 370 को नष्ट किया गया है। भारत के संविधान को जम्मू-कश्मीर में लागू करने के लिए अनुच्छेद 370 का 48 बार इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर पर राष्ट्रपति के आदेशों को लागू करने के लिए भी अनुच्छेद 370 ही एक जरिया है, जिससे राज्य का विशेष दर्जा खत्म होता है।

साल 1954 के एक फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह से भारतीय संविधान को लागू किया जा चुका है, जिसमें संविधान में किए गए संशोधन भी शामिल हैं। केंद्र की सूची के 97 में से 94 विषय राज्य पर लागू होते हैं। इसी तरह संविधान के कुल 395 अनुच्छेद में से 260 अनुच्छेद राज्य पर लागू होते हैं। ठीक इसी तह 12 अनुसूचियों में से 7 अनुसूचियां भी जम्मू-कश्मीर में लागू होती हैं। कश्मीर के संविधान के ज्यादातर अनुच्छेद भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के समान ही बने हुए हैं। यही नहीं, अनुच्छेद 370 के जरिए जम्मू-कश्मीर संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन किया जा चुका है जबकि अनुच्छेद 370 ऐसा अधिकार नहीं देता है। पंजाब में एक साल बाद भी राष्ट्रपति शासन लगा रहे इसके लिए संविधान में 59वां, 64वां, 67वां और 68वां संशोधन किया गया। अनुच्छेद 370 लागू करके ही हम जम्मू-कश्मीर में बिना संशोधन के ऐसा कर पाए।

इसी तरह अनुच्छेद 249 संसद को राज्य सूची के विस्तार का अधिकार देता है जिसे हम राज्यपाल जगमोहन की सिफारिशों के जरिए अनुच्छेद 370 की वजह से लागू कर पाए। इसके लिए कश्मीर विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित करने का इंतजार नहीं करना पड़ा। कुल मिलाकर एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अलावा अनुच्छेद 370 में ऐसा कुछ नहीं है जो सवाल खड़े करे। वास्तव में अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर से ज्यादा हमारे लिए उपयोगी रहा है। जम्मू-कश्मीर के संविधान का अनुच्छेद तीन उसे भारत का अभिन्न अंग मानता है। राज्य के संविधान की प्रस्तावना में भारतीय संविधान की संप्रभुता की तरह का कोई दावा नहीं किया गया है, बल्कि उसका संविधान भारतीय संघ और राज्य के मौजूदा संबंधों को परिभाषित करता है। इससे आगे बढ़कर यह भी कहा गया है कि राज्य के निवासी वहां के नागरिक नहीं, बल्कि राज्य के स्थायी निवासी हैं।

जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बने रहने के लिए संविधान राज्य को कुछ स्वायत्तता देता है, जो संघीय भावना को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। ऐसे में अनुच्छेद 370 स्वायत्तता बनाए रखने के लिए अमल में लाया गया। वैसे भी यह समझना जरूरी है कि अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे के रहते ही एकरूपता का लक्ष्य कश्मीर में करीब-करीब हासिल कर लिया गया था।

हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी गौर करना होगा। उसने 1962 में भारतीय संघ और पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में भारत के मजूबत संघीय ढांचे के लिए राज्यों के बीच हुए समझौते को सबसे अनिवार्य विशेषता बताया था। यह भी कहा कि यह विशेषता नहीं रहेगी तो भारत संघीय व्यवस्था वाला राज्य भी नहीं रहेगा। 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संघीय ढांचे को भारतीय संविधान का मूल आधार बताया। यानी अनुच्छेद 370 हमारे संघीय ढांचे का अहम हिस्सा है। हालांकि अब उसे खत्म कर दिया गया है।

(लेखक जाने-माने न्यायविद और एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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