यह एक राजनैतिक फैसला है

सुभाष कश्यप
सुभाष कश्यप
सुरेश के. पांडे

सरकार ने जिस तरीके से कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान को वापस लिया, उस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

मुझे लगता है कि यह मूल रूप से एक राजनैतिक फैसला है। जहां तक कानूनी मसले का सवाल है, तो दोनों पक्षों में तर्क दिया जा सकता है लेकिन मोटे तौर पर यह मुझे संविधान के दायरे में लगता है। इसे उचित ठहराया जा सकता है।

क्या अनुच्छेद 367 के जरिए अनुच्छेद 370 में संशोधन किया जा सकता है?

हां, इसे अनुच्छेद 370 के तहत ही कर सकते हैं। अनुच्छेद 370(1) के तहत जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार की सहमति से संविधान के किसी भी प्रावधान को लागू कर सकते हैं। राष्ट्रपति शासन के बाद भारत सरकार ही अब जम्मू-कश्मीर की सरकार है।

क्या राज्यपाल का कदम लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाले जनमत संग्रह की भावना के खिलाफ है, जिसका मूल रूप से वादा किया गया था?

सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों सहित भारत के लोगों की इच्छा का भी प्रतिनिधित्व करती है। उदाहरण के लिए, राज्यसभा में विपक्ष के नेता (कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद) जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधि हैं। इसलिए भारत सरकार अब जम्मू-कश्मीर की भी सरकार है और संसद जम्मू-कश्मीर की विधायिका है। यह नहीं कहा जा सकता है कि वहां निर्वाचित सरकार नहीं है। इसे जम्मू-कश्मीर की जनता सहित हम सबने मिलकर चुना है।

वर्ष 2017 में सरफेसी केस और उसके बाद अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 370 अस्थायी नहीं है।

मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने वास्तव में ऐसा नहीं कहा है, क्योंकि अनुच्छेद 370 खुद इसे अस्थायी प्रावधान बतलाता है। अगर सुप्रीम कोर्ट कहता भी है कि यह अस्थायी नहीं है, तो मैं इससे सहमत नहीं हूं, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से अस्थायी और विशेष प्रावधानों के बीच अंतर किया था। यदि आप अनुच्छेद 371 देखें, तो यह स्पष्ट रूप से नगालैंड के संबंध में विशेष प्रावधानों की बात करता है। यदि आप अनुच्छेद 370 देखें, तो यह जम्मू-कश्मीर के संबंध में अस्थायी प्रावधानों की बात करता है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अस्थायी और विशेष प्रावधानों के बीच अंतर किया। अगर कुछ विशेष प्रावधान थे, तो कुछ अस्थायी प्रावधान भी थे। जम्मू-कश्मीर के मामले में अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था, न कि विशेष प्रावधान। यदि आप अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 371 को देखें, तो आपको अंतर पता चल जाएगा।

पुनर्गठन विधेयक के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा में लद्दाख शामिल नहीं है। तो ऐसे में क्या राज्यपाल लद्दाख के लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं?

वह लद्दाख के लिए उप-राज्यपाल के रूप में काम करेंगे। यही स्पष्ट किया गया है। लद्दाख के मामले में एक ही व्यक्ति उप-राज्यपाल के तौर पर काम करेगा, लेकिन यह समय-समय पर अलग व्यक्ति भी हो सकता है। क्योंकि संविधान में एक राज्यपाल को दूसरे राज्यों या केंद्रशासित प्रदेश का प्रभार देने का प्रावधान है। यह एक संवैधानिक प्रावधान है, जिसके तहत किसी भी राज्यपाल को दूसरे राज्य या केंद्रशासित प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है। केंद्रशासित प्रदेश के मामले में वह उप-राज्यपाल के तौर पर काम करेगा।

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