खुदकशी का कदम

प्रेमशंकर झा
कश्मीरियों को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के आदेश को रद्द कर देगा
कश्मीरियों को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के आदेश को रद्द कर देगा

प्रेमशंकर झा
अनुच्छेद 370 को हटाने के तरीके से उठ रहे कई सवाल, समाधान की जगह पैदा हो सकते हैं संकट

प्रधानमंत्री मोदी हर काम जल्दबाजी में करने वाले शख्स हैं। उनके सत्ता में आने से पहले 15 सरकारों ने बहुत मेहनत से जिस राज्य को मजबूत किया, उसे वे ध्वस्त करने की जल्दबाजी में हैं। यह देश के सभी राज्यों में सहिष्णुता और विविधता के ठौर के लिहाज से एक खास राज्य था, भले ही वह विविधता धार्मिक, जातीय या भाषाई ही क्यों न हो। सहिष्णुता की इस कड़ी की मुख्य आधारशिला भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 था, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को एक विशेष दर्जा हासिल था। अनुच्छेद 370 ने भारत में इसके विलय को कानूनी मान्यता दी। इसने भारत सरकार को कश्मीर पर चार मामलों को लेकर संप्रभुता दी- रक्षा, विदेशी मामले, संचार और मुद्रा। वह कई और मामलों पर भी कानून बना सकती है, लेकिन इसके लिए राज्य विधानसभा की मंजूरी जरूरी थी, जिसके पास आवश्यकता पड़ने पर खुद को संविधान सभा घोषित करने का अधिकार था। पिछले लगातार चार दशकों में यह एकीकरण सुचारु रूप से आगे बढ़ा। शेख अब्दुल्ला ने 1952 के ‘दिल्ली समझौते’ पर हस्ताक्षर किया। इस समझौते ने 1947 के पहले से मौजूद व्यापार और लोगों की आवाजाही पर से प्रतिबंध हटाकर कश्मीर की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह भारत के साथ एकीकृत कर दिया। 1956 से 1994 के बीच राज्य सरकार की सहमति मिलने के बाद 47 प्रेसिडेंशियल ऑर्डर जारी किए गए, जिसने संघ सूची में 97 विषयों में से 94 का विस्तार किया, जिसमें भारतीय संविधान के कुल 395 अनुच्छेद में 260 कश्मीर पर लागू होते हैं।

कश्मीरी राष्ट्रवादियों की शिकायत है कि यह शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और जेल जाने के बाद कश्मीर में कठपुतली सरकारों द्वारा किया गया था। लेकिन इनमें से कुछ ही राजनैतिक मसले थे। इनमें अधिकांश का ताल्लुक उद्योग, व्यापार और परिवहन, शिक्षा, सामाजिक कल्याण, श्रम कानूनों, सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र, कर राजस्व का बंटवारा, योजना अनुदान का हस्तांतरण वगैरह से था। इन सबकी पहल राज्य सरकार की ओर से की गई। इसका प्रमाण इंदिरा गांधी के दूत जी. पार्थसारथी के साथ गहन विचार-विमर्श है, जिससे शेख अब्दुल्ला की 1975 में सत्ता में वापसी तय हुई।

उस समय शेख को सिर्फ चार धाराएं ही ऐसे मिलीं, जिसे वे संशोधित करना चाहते थे। 1960 और 70 के दशक में अनुच्छेद 370 असम और उत्तर-पूर्व में जनजातीय आबादी के शांतिपूर्ण एकीकरण का एक मॉडल बन गया, जो ब्रिटिश भारत से नाममात्र के लिए जुड़े थे, लेकिन अंग्रेज उन्हें कमोबेश अकेले छोड़ गए थे। नगालैंड के नगाओं, मिजो, बाकी नगाओं और अरुणाचल की अन्य जनजातियों और पहले के गारो, खासी और मेघालय के मिकरी को समान अधिकार देने के लिए संविधान में पांच अनुच्छेद जोड़े गए। पांच साल के कार्यकाल के बाद प्रधानमंत्री मोदी के करीबियों में ऐसे लोग भी होंगे, जो मानते होंगे कि अनुच्छेद 370 ने सर्वसम्मति और बिना कोई बल के भारत की एकता में कितनी अहम भूमिका निभाई थी।

ऐसे में अब अनुच्छेद 370 में संशोधन करने की क्या जरूरत थी और वह भी ऐसे तरीके से जिसने न सिर्फ कश्मीरियों, बल्कि भारतीय संविधान की भी अवमानना की? मूल रूप से सरकार का लक्ष्य उन लोगों की नागरिकता के अधिकारों की सीमा को खत्म करना था, जो 1947 में राज्य में रहते थे और उनके प्रत्यक्ष वंशज थे। इसने एक विसंगति पैदा की थी कि आजादी के बाद जम्मू संभाग में बसे बड़ी संख्या में हिंदू और सिख देश के नागरिक तो थे, लेकिन राज्य के नहीं। लेकिन वास्तव में जल्दबाजी और अवमानना दोनों भारत की सांस्कृतिक समरूपता को लागू करने के आरएसएस के दृढ़ संकल्प को दिखलाता है, जो उसके हिंदुत्व के सिद्धांत का सार है।

इसका प्रमाण घाटी में 45 हजार अतिरिक्त सैन्य बलों को भेजकर न केवल सभी कश्मीरियों को भारत के खिलाफ करने की सरकार की तत्परता से दिखती है, बल्कि अमरनाथ यात्रा की अवधि कम करके और “अलगाववादियों” के साथ मुख्यधारा के कश्मीरी दलों के नेताओं की कैद से भी दिखती है। यह तत्परता गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम और नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी कानून में संशोधन जैसे कदम से भी पता चलती है। यह पुलिस को दुनिया के किसी भी हिस्से में भारतीय नागरिक द्वारा भाषण या लेखन में असहमति को कुचलने के लिए प्रबल शक्तियां देता है। इसके तहत पुलिस असहमति जताने वाले को आतंकवादी बताकर, उसकी सभी संपत्तियों को जब्त करके और बिना जमानत के उसे महीनों या संभवतः वर्षों तक कैद में रख सकती है। इस बिल को एक ही दिन संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया और वह भी बिना किसी पूर्व सूचना के, ताकि विपक्ष को राज्यसभा में इसे गिराने के लिए अपनी ताकत जुटाने से रोका जा सके। इन सभी तैयारियों के बाद ही सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाया और भारत के राष्ट्रपति ने, जिसने भारत के संविधान को बनाए रखने की शपथ ली, उसे तोड़ा!

प्रधानमंत्री मोदी और उनके गृह मंत्री ने स्पष्ट रूप से इतिहास या विज्ञान किसी से भी कोई सबक नहीं सीखा है। यदि आप एक बोतल में कॉर्क डालते हैं और उसके अंदर गैस को गरम करते हैं, तो देर-सबेर बोतल फट जाएगी। कश्मीरियों को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के आदेश को खारिज कर देगा। किसी वजह से वह ऐसा नहीं करता है, तो हर कश्मीरी भारत के खिलाफ हो जाएगा। देसी आतंकवाद पैदा होगा और सरकार इसे कुचलने के लिए जितना अधिक बल का उपयोग करेगी, उतना ही अधिक जिहादी और अन्य विद्रोही कश्मीर में जिहाद शुरू करने आएंगे। इस जटिल समस्या का कोई समाधान नहीं है। एक दिन इसका नतीजा परमाणु युद्ध के रूप में दिख सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कश्मीर, 1947 : राइवल वर्जन्स ऑफ हिस्ट्री उनकी चर्चित किताब है)

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